मैं घर लौटा तो ऐसा
था जैसे किसी आदमी को खा जाऊँगा। चाची दरवाज़े पर खड़ी थी और कभी भी गिर सकती थी।
पिताजी अन्दर कमरे में बन्द थे और मेरे पहुँचते ही चाची कहने लगी थी कि कहीं वे
पंखे से लटककर फाँसी न लगा लें। जैसे वह उन्हें जानती ही न हो कि वे क्या कर सकते
हैं और क्या नहीं, और जैसे मेरा फ़र्ज़ है कि अभी दरवाज़े में टक्कर मारकर उसे गिरा
दूं और उन्हें अपने आत्मसम्मान के साथ चैन से रोने भी न दूं।
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| By Sally Mann |
मैं पसीने से भीगा
हुआ था। चाची टेबल फ़ैन इसलिए नहीं चलाना चाहती थी कि फिर हम आपस में तेज़ आवाज़ में
बोलते और आवाज़ बाहर जाती। मुझे बहुत तेज़ गुस्सा आ रहा था और निशा अगर ग़लती से लौट
आती तो मैं उसे काट डालता। इसलिए साढ़े तीन घंटे तक उसे ढूंढ़कर लौटने के बावज़ूद
अन्दर कहीं मैं चाहता था कि वह न मिले, नहीं आए।
- सुबह तक वो नहीं आई तो मैं घर का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लूंगी और मैं और तेरे पापा जी कभी बाहर नहीं निकलेंगे।
यह एक तरह का नैतिक दबाव था, मुझ पर, कि मुझे उसे वापस लाना चाहिए। वह न मिले तो किसी लड़की को मारकर चाकू से उसके नक्श निशा जैसे बनाने चाहिए और उसमें रुई भर के सुबह से पहले देहरी पर बिठा देना चाहिए।
- सुबह तक वो नहीं आई तो मैं घर का दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लूंगी और मैं और तेरे पापा जी कभी बाहर नहीं निकलेंगे।
यह एक तरह का नैतिक दबाव था, मुझ पर, कि मुझे उसे वापस लाना चाहिए। वह न मिले तो किसी लड़की को मारकर चाकू से उसके नक्श निशा जैसे बनाने चाहिए और उसमें रुई भर के सुबह से पहले देहरी पर बिठा देना चाहिए।


