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इतना रवाना हुए कि घर भी पहुँचने की तरह लौटे |
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हम सब बचा रहे थे अपने-अपने घरों की औरतें |
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तुम माँगती हुई सपना, मैं तकिया खरीदकर देता हुआ |
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तुम काटती जाती फ़ोन |
चार तरह से जीना
किताबें लिखना
और अपना खून पीना
तुम ऊपर के किसी फ्लोर पर हो
और कोई खा गया है हमारे बीच का ज़ीना
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कहीं और करेंगे हम अपने बच्चे पैदा |
पहली बार इस ज़िद्दी गाय ने नहीं माँगे दुहने के लिए तुम्हारे ही हाथ
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ग्यारहवीं ए के लड़के |
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कैसे लेते हैं आप लोगों से विदा? |
क्या सिखा सकते हैं मुझे
कहीं से लौटते हुए हँसी जा सकने वाली कोई सुन्दर हँसी?
कैसे लेते हैं आप लोगों से विदा?
क्या हाथ भी पकड़ते हैं, क्या छूते हैं उनकी आँखें?
क्या बताते हैं कि कब आएँगे फिर और कब नहीं
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पर हम थे कि कसूर था |
हमारे घर को हमारे बाद जलाया गया
चाँद को उस दिन थोड़ा सलीके से बुझाया गया
बर्फ़ सुन्दर नहीं थी लेकिन उसे अदा से गिराया गया
ऐसे में हमारी बेहतरी इसी में थी कि उन्हें मानते अपना शहर, अपना ख़ुदा
लेकिन शहर को बचानी थी अपनी तेजी, ख़ुदा को जाने क्या
और हमें अपना इकलौता सिर बचाना था
कपड़े बचाने थे बाद में और हम कहते थे कि किताबें भी बचाएँगे
लेकिन फेंक देते थे,
किसी पुराने शब्द की तरह
हम रात भर परेशान रहते थे
कि कहीं तो जाएँ, किसी की नींद में जाकर गिरें
किसी को खोल दें आँखें खोलने की तरह
फ़्लैश की तरह याद आएँ किसी को
कोई हमें पहचान कर रो पड़े
कि क्या शक्ल बना ली है, चेहरा धो लो, कुछ खाओगे ना?
फिर आओगे ना?
तब हमें कोई मनाता
तो हम उसकी छाती में धँस जाते
कहाँ सोए, कहाँ जागे, कहाँ-कहाँ से भागे
कौन भूला, किस किसने घूरा, बार-बार बताते
जबकि सही कहा आपने
कि दोहराव एक चिकना शब्द है
जिस पर फिसलकर गिरने से बेहतर है कि छाती से बाहर आया जाए
कोई पूछे कि क्या मिज़ाज हैं तो उसे कोई महल दिखाया जाए
पर हम थे कि कसूर था
लड़कपन हम पर दौरे की तरह छाता था
ऐसा था नहीं पर लगता था कि
पिछले बरस हमें सुन्दर रोना आता था
अपने क़रीब आने के रूमानी ख़याल में हम
किसी बरसाती शादी में इंतज़ाम की तरह खराब हो रहे थे
चाँद हो रहा था तेरा चेहरा और हम जितना पढ़ते थे
उतने किताब हो रहे थे
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किसी इतवार का गाना |
आपने अपनी बैठक में जो रस्सियाँ बाँधी थीं हमारे तमाशे के लिए
हम तभी से सर, उन पर झूल रहे हैं
और आपको ऐसा लगता है कि भूल रहे हैं
हम अपने यक़ीन, अपनी आग का
इश्क़ जैसा कोई ख़ूबसूरत नाम रखना चाहते हैं
भूख लगने पर उसे चखना चाहते हैं
लेकिन आप देखते तक नहीं हमें और चिल्लाने में मशगूल हैं
रोटियाँ नहीं हैं माना, पर क्यों इतने स्कूल हैं?
और स्कूल से वे जो बच्चे लौट रहे हैं
आप उनसे झूमकर गले मिलेंगे, हमारे बारे में बताएँगे
वे बच्चे हैं सर! वे गिर पड़ेंगे
उनके कलेजे भर भर आएँगे
पर आखिर में सब ठीक होगा, जैसे सब ठीक हो जाना चाहिए
किसी इतवार वे कहेंगे कि उन्हें कविता नहीं, गाना चाहिए
हम नहीं दावा करते कि अच्छा गाएँगे लेकिन ये ज़रूर है कि
गले को चाकुओं से काटकर आपके सामने सजाते जाएँगे
फिर भी ज़रूरी नहीं कि आप और वे ग़मगीन हों
बल्कि दुआ करेंगे कि आपके यहां बहुत चाय हो, बिस्कुट नमकीन हों
आप चाहे हमें चींटियों की तरह भूल जाएँ
आपके बच्चे किसी जन्नत जैसे स्कूल जाएँ
बस हमें या तो आसमान दें या अँधेरी कोठरी,
ये सुन्दर कमरा और इसमें चार जालियाँ न दें
बस इतना कीजिए कि जब हम खाने को कुछ माँगें
तो थालियाँ दें, न दें पर तालियाँ न दें
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महान होने से ठीक पहले एक नदी थी |
महान होने से ठीक पहले एक नदी थी
जिसमें हम धो रहे थे अपना हँसना
रोटियाँ बहुत थीं, दाँत कम थे जैसे जश्न बहुत था, फ़ुर्सत कम
रस्में इतनी थीं हमारे होठों के बीच में कि हम
कविता की तरह
सिर पर लगाने की कोई ग़ैरज़रूरी चीज हो गए थे
इतने मज़बूर दोनों कि उसके पास मुझसे बाँटने को थी अघा जाने की याद
मैं उसे बताता था कि कितनी और तरह से भूखा रहा जा सकता है
इसके बाद जो बात मैंने उससे कही
वह किसी और की बात थी, कहीं और कही गई किसी और दुख में
जिसे मैं ज़िन्दा बचने के अकेले रास्ते की तरह उससे कह रहा था
भूल रहा था उतना ही
लोग इतने थे कि अपने पिता को पहचानना हुआ जाता था मुश्किल
मैं जिसके हाथ के भरोसे सोता था हर दोपहर
सर उठाकर देता था तुम्हें गालियाँ
वह किसी नाटक का किरदार था, जिसे इंटरवल से पहले मरना था
इस तरह सुखांत की मज़बूरियों के बीच
क्लाइमैक्स में उसने जो हाथ मेरे माथे पर रखा
वह उसका हाथ होते हुए भी किसी डॉक्टर, किसी बूढ़ी औरत का हाथ था
जिसकी उंगलियाँ जीवन की तरह चमकती थीं
फिर भी हम दोनों एक आख़िरी तरह से खाली थे
मैं इस खेल को हारते हुए
भारी बनाते हुए अपनी आवाज़ को
ज़िन्दा लोगों की तरह गिड़गिड़ाया भरसक
जबकि मुझे याद था कि इस तरह मैं उन बच्चों की भी तौहीन कर रहा था
जिन्हें मेरे बाद पैदा होना था और पूछना था
कि हम समेटकर अपने तमाशे
क्यों नहीं ख़त्म कर सके दुनिया समय रहते?
नहीं की तो क्यों बुलाया उन बच्चों को यहाँ
जैसे मेला होगा, मिलेगी ईदी और पिचकारियाँ
हाँ, जो ज़मीन मुझे दी गई थी
मैं नहीं बो सका उसे ठीक
जो लोग मेरे सामने थे,
मैंने आख़िर तक नहीं पूछी उनकी ख़ैरियत
प्यार लुटाने को आतुर भली लड़कियों से जैसे,
वैसे बहुत क़रीबी शब्दों से मैं हमेशा बचा कविता में
फिर भी जो अंत आया, वह आम था
मरने के अलावा मरने का कोई और तरीका नहीं है
