ग्यारहवीं ए के लड़के



हम वही देखते हैं, जो हम देखना चाहते हैं


मैं भी सनकी था। जैसे सपना भी यह दिखता था कि दो दोस्तों के साथ सिनेमाहॉल में फिल्म देखने गया हूं और जब वे दोनों कतार में मुझसे आगे लगे हुए मेरा टिकट भी लेकर अन्दर घुस गए हैं तब मुझे याद आया है कि मैं अपनी चप्पल पीछे ही कहीं सीढ़ियों पर छोड़ आया हूं. मैं दौड़कर चप्पलों के लिए वापस लौटता हूं. जबकि चप्पल तीन साल पहले खरीदे जाने के वक्त सौ रुपए की थी और अब ज़्यादा से ज़्यादा पचास रुपए की रही होगी. पचास में भी कोई दुकान वाला नहीं लेगा, इसकी मैं शर्त लगा सकता हूं. और टिकट सत्तर रुपए की है.

वापस भीड़ को चीरते हुए मैं सीढ़ियों पर दौड़ रहा हूं, उस रिक्शा की तरफ जिसे मैं किसी सरकारी कॉलोनी से चलाकर यहां लाया था और मेरे दोस्त मेरे पीछे बैठे थे. (मैं आपको बता दूं कि सपने में भी मैं रिक्शे वाला नहीं था. हमें एक रिक्शा सड़क पर खड़ा मिला था. हमारे पास वक़्त कम था और चोरी की नीयत ज़्यादा)

तो रिक्शे की तरफ दौड़ते हुए मुझे स्कूल का कोई पुराना दोस्त मेरे पुराने नाम से पुकारता है. वह सरदार है. उसका अमरजीत जैसा कोई नाम था. उसकी दाढ़ी बेनहाए रूप से उलझी हुई है. वह पढ़ाई में होशियार था और इतने साल बाद भी सफेद शर्ट के साथ स्कूल की यूनिफ़ॉर्म की खाकी पेंट पहने हुए है.
मेरा ख़याल है कि कहानी अब शुरु की जानी चाहिए.

यदि मर्द ख़ूबसूरत हो सकते हैं तो वह तब ख़ूबसूरत था. हम लाख चाहते थे कि उसकी दाढ़ी-मूंछ और बाल काटकर उसे शाहिद कपूर बना दें लेकिन ऐसा नहीं कर पाते थे. उन्हीं दिनों उसके बड़े भाई की शादी हुई. बड़े भाई का बलजीत जैसा कोई नाम था. वह कोई काम नहीं करता था, दिन में तीन बार नियम से शराब पीता था और उसका मानसिक संतुलन या तो बिगड़ा हुआ था या कुछ ज़्यादा ही दुरुस्त. अमरजीत की भाभी का नाम रानी था. सबके एक-एक जोड़ी माता-पिता भी थे.

यदि चाँद पर दोपहर होती होगी तो सर्दी की दोपहर भी निश्चित रूप से होती होगी. रानी को देखकर लगता था कि वह उसी दोपहर से आई है. हम सब दोस्तों के लिए रानी भाभी ऐसा पटाखा थी जिसे हम अपनी छाती पर और बाकी ज़गहों पर फोड़ना चाहते थे. अमरजीत के सामने ही हम उनके स्तनों के कसीदे पढ़ते हुए मदहोश हुआ करते थे और अपनी फैंटेसियाँ सुनाया करते थे. अमरजीत पढ़ाकू किस्म का लड़का था और आई ए एस बनना चाहता था. वह कामुक गालियाँ नहीं दे पाता था और आखिर में अपनी किताबें उठाकर चला ही जाता था. ऐसा भी नहीं था कि बाकी लड़कों या अपनी ही भाभियों के बारे में हमारे इरादे कुछ पवित्र हों लेकिन रानी की बात ही कुछ और थी. मस्तराम की कहानियों में पच्चीस साल की शादीशुदा लड़की का कोई भी नाम हो, उन्हें पढ़ते हुए हमारे ज़ेहन में रानी की कलर्ड तस्वीर ही होती थी. हम तब ग्यारहवीं में पढ़ते थे और हमें लगता था कि जल्दी ही ऐसा कोई दिन आएगा, जब धरती सूरज को छोड़कर हमारे चारों ओर घूमेगी. रानी भाभी ही क्या, मल्लिका शेरावत भी उन दिनों हमें दूर की कौड़ी नहीं लगती थी. हम एक अनजानी तरह से पत्थर होते जा रहे थे. हमारे आसपास या हमारे ख़यालों में भी जो नर्मी थी, उसे जब तक नहीं कुचल देते, हम परेशान रहते.

मेरे अलावा तीन और लड़कों ने रसीली बातें बनाने की सीमा लाँघकर रानी पर ट्राई मारी. उनमें से एक ही उनके घर की वह सीमा लाँघ पाया जहाँ अमरजीत की मोटी माँ सरबजोत दिन भर चारपाई पर बैठी रहती थी. दिन के अधिकांश समय वह स्वेटर बुनती या फिर ऊँघती रहती. तब, जब बलजीत धुत्त होकर पड़ा होता, सरबजोत की चारपाई घर के इकलौते दरवाजे के सामने सरबजोत रेखा बनी होती. उसने अपनी बाकी की जिंदगी शायद इसी मिशन पर लगा दी थी कि उसके बेवकूफ शराबी बेटे के अलावा कोई उसकी सुन्दर बहू की सुन्दरता को उस तरह से न देख पाए.

लेकिन जिस तरह हर सेनापति की अपनी कमजोरियाँ होती हैं उसी तरह सरबजोत का मोटापा उसके मिशन का दुश्मन था. अन्दर या चौबारे पर ज़रा भी हलचल होने पर वह उठकर बैठ जाती और रानी, रानी चिल्लाती रहती लेकिन रानी उस समेत घर में किसी से बोलती तक नहीं थी और हलचल के घटना स्थल तक पहुँचने में सरबजोत को कम से कम पाँच-छ: मिनट लगते. और आप तो जानते ही होंगे कि ग्यारहवीं के लड़के पाँच-छ: मिनट में क्या क्या कर सकते हैं.

मेरे अलावा उस घर में दाख़िल होने वाला इकलौता लड़का सुखपाल था. वह सरदार था और रानी भाभी को सिख लड़के सख़्त नापसंद थे. वह कई बार उनके लिए बाज़ार से दस-दस किलो सामान लाया, उनके बालों में कंघी की, ज़रूरत पड़ने पर तीन-तीन सौ रुपए तक उधार दिए और भूल गया, केबल की कुंडी लगाई (एक बार तो उस वक़्त, जब केबल वाले ने चोरों से बचने के लिए तार में करंट दौड़ाया था और पौन सेकंड के अंतर से श्री सुखपाल बचे थे). मैं स्वीकार करता हूं कि सुखपाल उससे मेरी अपेक्षा कहीं ज्यादा प्यार करता था. इतना कि एक बार उन्होंने उसे अपने प्रेग्नेंसी टेस्ट की रिपोर्ट लेने भेजा था और वह ख़ुशी-ख़ुशी लाया था (जबकि उसने रानी को दो बार बस चूमा भर था और वह जानता था कि गर्भ का यह भय उसकी मेहरबानी नहीं है)

सुखपाल प्रेम में कमोबेश उतना महान था ही, जितना सतरह-अठारह साल के किसी लड़के की औकात होती है. बस उसकी दाढ़ी-मूँछ और केश उसकी कमज़ोरी थे जिन्हें वह हर शाम कटवाने की सोचता और सुबह तक सच्चे बादशाह से इजाजत न ले पाता. सुखपाल की कहानी इतनी जरूरी नहीं इसलिए मुझे पहले अमरजीत और शायना के बारे में आपको बता देना चाहिए.

शायना मेरी हमउम्र बहन थी और ग्यारहवीं बी में पढ़ती थी. ग्यारहवीं बी में क्लास की सारी लड़कियाँ और कुछ भाग्यशाली तथा *** किस्म के लड़के थे. अमरजीत हमारी क्लास का सबसे होनहार लड़का था और सब मास्टरों को लगता था कि वह किसी दिन कुछ बड़ा उखाड़ेगा. उसे भी ग्यारहवीं बी में रहने की विशेष सुविधा दी गई थी. लेकिन जिस तरह बहुत ख़ूबसूरत लड़कियाँ कई बार घुटनों में दिमाग लिए पैदा होती हैं और बहुत दिमागदार कई बार दुनिया की सबसे बदसूरत नाक लिए, सेनापति अमरजीत के घर की आर्थिक तंगी उसकी कमज़ोरी थी. उसे किसी चीज का शौक नहीं था लेकिन जब वह अपनी जरूरत की कोई किताब भी नहीं खरीद पाता था तो डिप्रेशन में चला जाता था. यह वज़ह मुझे डिप्रेशन में जाने के लिए दुनिया की आख़िरी वज़ह के भी बाद की वज़ह लगती थी. ख़ैर, जैसे अहिल्या का उद्धार करने राम आए, उससे कुछ अलग तरह से शायना अमरजीत की ज़िन्दगी में आई.

शायना ने ही मुझे पहली बार अमरजीत के चेहरे की चॉकलेटी बॉय वाली संभावनाओं के बारे में बताया था. यह भी क्लास की लगभग सभी लड़कियाँ अमरजीत पर इस हद तक फ़िदा हैं कि उसके साथ एक रात बिताने के लिए एक साल फेल होने की कीमत भी उन्हें टॉफी जितनी लगती है. मैं हैरान था. उस पूरी रात मुझे नींद नहीं आई. मैं हर तरह से अमरजीत का विलोम-शब्द था और अपनी क्लास की सब लड़कियों की ऐसी घटिया पसंद इसके बाद ग्यारहवीं के लड़कों को पहले गहरी चिंता और बाद में अमरजीत-विरोधी भावनाओं से भर देने वाली थी. इसी के बाद हम उसके सामने उसकी भाभी को लेकर इतने बेशर्म हुए थे.

शायना ने कुछ दिन बाद मुझे बताया कि वे जो फेल होने को टॉफी समझने वाली लड़कियाँ थीं, उनमें शायना का नाम पहले नम्बर पर था. मेरी सगी बहन की पसंद ऐसी थी, शायद इसी तथ्य ने मुझे यह मान लेने के लिए प्रेरित किया कि ईश्वर नहीं होता. क्या होगा ऐसी दुनिया का, जहाँ माल लड़कियाँ अवकलन की किताब में ज़िन्दगी तलाश रहे बिल्कुल घटना-विहीन, यहाँ तक कि हादसा-विहीन लड़कों पर फ़िदा होती हैं?

सरबजोत उस दोपहर दरवाजे के आगे अपनी चारपाई लगाकर सो रही थी. दरवाजा खुला ही रहता था और कभी-कभी उसकी हमउम्र पड़ोसनें आते-जाते उससे पूछ लिया करती थीं कि वह ज़िन्दा है क्या? वह स्वेटर बुनते हुए ही सोई थी और ऊन के फन्दों में उलझी हुई सलाइयाँ उसके चेहरे पर पड़ी थीं.

मैं उसे लाँघकर भीतर घुसा. वह मेरी रानी से पहली मुलाक़ात थी. मैं उसकी इस बात से बहुत प्रभावित था कि वह घर में अचानक घुस आए अनजान लड़कों को देखकर चीखती नहीं थी. मैंने उसे बताया कि मैं सुखपाल की तरह के प्यार पर थूकता हूँ. इस पर वह खूब हँसी. मैंने बताया कि मैं न केबल के तारों में उलझूँगा, न दालें खरीदकर लाने में. यह एक तरह से मेरा परिचय था. मैं किसी नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाता तब भी कुछ इसी तरह अपने बारे में बताता. रानी ने कहा कि वह देखना चाहती है कि मैं कितना बड़ा हो गया हूँ. मैंने कहा- अगली बार- और मैं बादशाहों की तरह लौटने लगा.

मैं बिल्कुल स्लो मोशन में सरबजोत को लाँघ रहा था कि मेरा पैर लगने से उसके ऊन के गोले हिले, उनसे आधी बुनी स्वेटर में फँसी सलाइयाँ और वे बिल्कुल एक तरह से उसकी दोनों आँखों में जा घुसीं.

उसके चीखने और खून की धार निकलने के बीच ही मैं भागा. मुझे एक पड़ोसन ने घर से निकलते हुए देखा और उसी समय सरबजोत की चीख सुनकर वह मुस्कुराई.

सरबजोत अंधी हो गई. उसके पति की हल बनाने की दुकान थी. उसके बाद सरबजोत के लिए वह हल के स्पर्श की दुकान हो गई. टीवी के सारे प्रोग्राम टीवी का आकार बन गए. उसकी जितनी भी यादें थीं, उनमें उदास हरा रंग भर गया. वह यहाँ तक कहने लगी कि गुलाब और गेंदे के फूलों का रंग हरा होता है. वह हवा की गति से पहचानती थी कि दरवाजे के सामने खड़ी है या दीवार के. वह वैल्डिंग की गंध से अपने पति को पहचानती थी, शराब की गंध से बलजीत को और किताबों की गंध से अमरजीत को. रानी के शरीर की कोई गंध उसे नहीं मिलती थी और चूंकि रानी किसी से बोलती भी नहीं थी इसलिए कुछ दिनों के बाद सरबजोत रानी को मरा मान बैठी. उसे लगने लगा कि जो चोर उसकी आँखों में सलाइयाँ घुसाकर भागा था, उसने उससे पहले भीतर रानी की हत्या कर दी थी. यह उसके दिमाग को इतना जमा कि उसने कभी इसकी पुष्टि की जरूरत भी नहीं समझी. शुरु के दो महीने उसकी बहन उसके पास आकर रही तो वह दिनभर यही सोचकर हैरान रहती थी कि साठ पार की उसकी बहन पूरे घर को कैसे सँभाल पा रही है जबकि वह उसके पास से भी कभी नहीं हटती.
जिस दिन बहन जा रही थी, सरबजोत ने उससे पूछा कि अब इस घर को कौन सँभालेगा?
बहन ने कहा- अब तक भी रब ने सँभाला है, आगे भी वही सँभालेगा.

अगले ही दिन चाय का कप पकड़ते हुए सरबजोत का हाथ रानी के हाथ से छू गया. उसे लगा कि यह रब का हाथ है. उसके हाथ से चाय का कप छूट गया (जिसके छींटों ने रानी के नए सलवार पर वे दाग लगाए, जिन्हें बाद में मैंने उतारा) और उसने रानी के सामने हाथ जोड़ लिए. आँसुओं की धार उसकी हरी फ़िल्म वाली आँखों से बह निकली.
-         प्रभ जी, माफ़ करो मुझ पापिन को और मुझे अपने साथ ले चलो.

रानी ने बदले में उसके सिर पर हाथ फेरा. इसके बाद रानी ने सरबजोत की ज़िन्दगी में वह ज़गह पा ली जो पैंतालीस साल पहले उसके पहले प्रेमी ने साढ़े तीन मिनट के लिए पाई थी- आप ही मेरे सब कुछ हो वाली ज़गह.

अगले दिन से जैसे ही उसे रानी के आसपास होने का आभास होता, वह अपने सारे पाप उसे बताने लग जाती जैसे इस तरह प्रायश्चित हो जाएगा. उसने रानी को अपने सब प्रेमियों के बारे में बताया, यह जोड़कर कि उसने कभी भी एक समय में एक पुरुष से प्यार नहीं किया. वह यह बताते हुए फूट-फूटकर रोई कि जब उसकी माँ का हाथ घास काटने वाले गंडासे में आकर कट गया था और ज़्यादा खून बह जाने से वह वहीं मर गई थी, तब वह पीछे अनाज वाले कमरे में घास काटने के लिए रखे गए लड़के के कपड़े उतार रही थी. उसने बताया कि कैसे बहन की शादी के दिन ही उसने गले लगते हुए अपनी बहन की सोने की चेन उतार ली थी, कैसे उसने अपनी गूँगी हो गई सास को एक हफ़्ते तक न अन्न दिया था, न पानी.

मेरी गंध से सरबजोत बेहोश हो जाती थी लेकिन जब मैं रानी के आगोश में होता तो उसे मेरे होने का पता भी नहीं चलता था. तब मैं ईश्वर का अंश होता था- ख़ुदा का बच्चा.

एक दिन, जब उसकी चारपाई के नीचे मैं और रानी गुत्थमगुत्था थे, तब सरबजोत ने पन्द्रह साल के उस लड़के के बारे में बताया जो बलजीत का दोस्त होने के नाते बीस साल पहले उनके घर में आता था और जिसे सरबजोत ने दिखाया था कि औरत कैसी होती है.

          मुझे रानी ने यह दिखाया और समझाया. काश कि मेरे पास ऐसे शरीफ़ शब्द होते जिनमें मैं रानी की मेहरबानियाँ आपसे साझा कर सकता!
          इस बीच मैंने और शायना ने तय किया था कि हम एक-दूसरे की मदद करेंगे. वह अमरजीत को एक किताब खरीदकर देने के बदले उसके कुछ घंटे माँगती थी और इस तरह मुझे और रानी को एकांत मिल जाता था. बलजीत का तो होना, न होना ऐसा था कि मैंने बहुत बार उसके सामने रानी को चूमा और इस पर वह खिलखिलाकर हँसा. वह मुझसे अक्सर विज्ञान की पहेलियाँ पूछा करता था. ऐसे सवाल कि सूरज क्यों उगता है, मौसम क्यों बदलते हैं और तारे दिन में कहाँ जाते हैं? वह दिन-ब-दिन इतना भोला होता जा रहा था कि उससे किसी को कोई ख़तरा हो ही नहीं सकता था. या तो उसके सवालों के जवाब देकर हम उसे चुप करवा देते या नहीं दे पाते तो उसे कमरे में बन्द कर देते. तब वह ग़ुलाम अली की ग़ज़लें सुनता और धीमे-धीमे रोता. उसने शराब पीना भी अपने आप ही छोड़ दिया था. मुझसे किया यह वादा भी उसने कभी नहीं तोड़ा कि मेरे वहाँ आने के बारे में वह किसी को नहीं बताएगा. इन सब चीजों का असर यह हुआ कि मुझे उस पर तरस आने लगा. वह पैंतीस साल का हट्टा-कट्टा आदमी मुझे और रानी को सिर्फ़ चार-छ: झापड़ मारकर ठीक कर सकता था लेकिन उसने हमसे कभी ऊँची आवाज़ में भी बात की हो, मुझे याद नहीं आता. रानी को भी उस पर प्यार आने लगा था. एक दोपहर जब मैं पहुँचा, वह उसका सिर अपनी गोद में रखकर उसे सुलाने की कोशिश कर रही थी.
-         यह हमारा बच्चा है...
-रानी ने मुस्कुराकर मुझसे कहा और बलजीत का माथा चूम लिया.
-
इसके बाद हम उसके सामने ऐसी-वैसी हरकत करने से बचने लगे. हममें एक नैतिकता सी जाग गई थी. हम उसके जागने के दौरान एक-दूसरे को छूते भी नहीं थे. वह उसके लिए खाने की अच्छी-अच्छी चीजें बनाती थी और मैं उसके लिए कॉमिक्स और घरेलू चीजों से जादू सीखें जैसी किताबें लाता था. वह अपने छोटे भाई जितनी तल्लीनता से ही पढ़ने लगा था और जादू भी सीखने लगा था.
कुछ दिन उसने हमें ताश के पत्तों वाले जादू दिखाए. फिर वह अंगूर या अमरूद को गायब करने लगा. फिर उसने चम्मच को कटोरी और कटोरी को चम्मच में बदलना शुरु किया. फिर एक दिन जब मैं सरबजोत की चारपाई के पास से गुज़रा तो वह उठ बैठी और मुझे देखकर बोली- ओए लड़के, कहाँ घुस रहा है?

मैं वापस दरवाज़े की ओर भागा और बाहर निकल गया. मेरे बाहर आते ही बलजीत दौड़ा-दौड़ा आया- डरो मत, मैं दिन में दो मिनट के लिए उसकी आँखों की रोशनी ला सकता हूँ. अभी इससे ज़्यादा नहीं हो पा रहा...और वह रोशनी वापस खोते ही तुम्हें देखने वाली बात भूल जाएगी. अन्दर आ जाओ.

मैं अन्दर गया तो वह चारपाई पर लेटकर सो रही थी. क्या रोशनी वापस आने के दो मिनटों में मेरी गन्ध और उससे बेहोश होना भी भूल गई थी? हालांकि मेरे और रानी के चक्कर के लिए घातक था लेकिन मैंने चाहा कि उसकी आँखें ठीक हो जाएँ.

मैंने बलजीत को शाबासी दी और अब थोड़ी और महंगी किताबें उसके लिए लाने लगा. हम दोनों भाई-बहन अपने पैसे उन दोनों की भाइयों की किताबों पर ही खर्च कर रहे थे और बदले में मालूम भी नहीं कि कुछ पा भी रहे थे या नहीं. मैं तो शायद सुखपाल की तरह बनता जा रहा था, उसका हश्र पता होने के बावज़ूद. अब मुझे रानी के शरीर को पाने की कोई जल्दी नहीं रहती थी और मुझे उससे बातें करना अच्छा लगता था. कभी-कभी बहुत देर तक बातें करने के बाद मुझे लगता था कि मैं उससे ऐसे विषयों पर बातें कर रहा था जिन पर लड़कीनुमा लड़के करते हैं. हम टीवी सीरियलों और कपड़ों के डिजाइन पर भी बातें करते थे. मैं बिना कहे घर के कामों में उसकी मदद करने लगा था. सब्जियां खत्म होती देख खुद ही ला देता और पैसे कभी न लेता. इसी तरह एक दिन जब वह बहुत बीमार थी, मैंने उनके बाथरूम में अपने आपको उसका वही सलवार धोते पाया, जिस पर ईश्वर से पहले साक्षात्कार के दिन सरबजोत ने चाय गिरा दी थी.

मैं सुखपाल को मक्खी की तरह बाहर की नाली में डाले जाते देख चुका था और ऐसा होने के लिए यहाँ तक नहीं आया था. मैंने तय किया कि मुझे लौटकर वही बनना होगा- ग्यारहवीं का लड़का. उसी दिन घर लौटने पर मैंने शायना को अमरजीत के साथ अपने कमरे में बन्द पाया. इससे पहले भी दसियों बार मैं अपने घर में उसके होने को अनदेखा करता रहा था लेकिन उस दिन खिड़की आधी खुली थी और मेरा मन किया कि अन्दर झाँककर देखूं.

           वह अमरजीत नहीं रह गया था. उसके बाल मुझ जितने छोटे हो गए थे और मेज़ पर शीशा उसके सामने रखकर शायना प्यार से उसकी दाढ़ी बना रही थी. मुझे जलन हुई. पता नहीं क्यों? मैं अपने कमरे में आकर लेट गया और शाम के खाने के वक़्त भी नहीं निकला.

           हमारे माता-पिता ऐसी नौकरियाँ टाइप कुछ करते थे कि पापा मंगल और बुध को ही घर आते थे और मम्मी सोम-मंगल को. बाकी चार दिन मैं और शायना रहते थे, पचास साल के नौकर गोपाल के साथ जिसे हमारी हिन्दी समझ नहीं आती थी. बस वह खाना लाज़वाब बनाता था.
           
ग्यारहवीं के लड़के किसी भी उम्र की औरत को मसलने के पैमाने पर ही जाँचते थे. रानी नि:संदेह 10 नंबर वाली थी और कई लड़के मेरी सफलता को देखकर जलते भी थे. प्यार में पड़ना ग्यारहवीं के किसी भी लड़के के लिए ज़हर खाकर, गले में पुल से बाँधा हुआ फन्दा डालकर नदी में कूद जाने की सज़ा के बराबर अपराध था. ऐसा किसी ने किया नहीं था लेकिन सुन्दर शरीरों को पाने के लिए किसी को मार देना भी ग्यारहवीं के संविधान के विरुद्ध नहीं था. मैंने ख़ुद को यह सब याद दिलाया लेकिन उससे पहले ही अमरजीत और बलजीत के पिता सरदार मलकीत सिंह मूलपुरा वालों की दुकान पर एक गुमनाम चिट्ठी आई, जिसमें मेरे और रानी के सम्बन्ध का सचित्र और सविस्तार वर्णन था. उन्होंने मुझे सड़क पर रोककर खूब मारा और जान से मारने की धमकी दी. मैंने भी पिटते पिटते कहा कि देख लूँगा.

           अगले दिन, जब घायल मैं, रानी और बलजीत उनके घर में थे (सरबजोत भी, गुरु ग्रंथ साहिब के दोहे जपती और रोती हुई), तभी बलजीत ने कहा कि उसने नया जादू सीखा है. फिर उसने आँखें बन्द करके अपना हाथ हवा में आगे किया. एक मिनट बाद सरदार मलकीत सिंह उसके सामने खड़े थे.

- खाना खाओगे पापाजी या दुकान में खा लिया?
बलजीत ने आदर से पूछा. उन्होंने पानी पीने की इच्छा ज़ाहिर की. फिर कहा कि आजकल पीछे से लोहा खराब आ रहा है और लोग उन्हें गालियाँ देते हैं. रानी पानी लाई तो उन्होंने वहीं खड़े-खड़े पानी पी लिया. मेरी तरफ़ उन्होंने देखा भी नहीं.

             फिर बलजीत ने उनसे पूछा कि क्या वे वापस दुकान जाना चाहेंगे? उन्होंने थके से स्वर में हाँ कहा. बलजीत ने फिर आँखें बन्द कीं और हाथ हवा में आगे किया. सरदार मलकीत सिंह गायब हो गए. बाद में पता चला कि वे दुकान पर तो पहुँचे ही नहीं. उस दिन के बाद वे कभी दिखाई नहीं दिए. शायद उनकी गन्ध वहाँ तैरती रही क्योंकि सरबजोत कई बार उनका नाम ले-लेकर अपने घुटने के दर्द के बारे में कहती दिखाई देती थी.

बलजीत के जादू सीखने में कोई कमी रह गई थी. मलकीत सिंह को उसने गायब करके रवाना तो कर दिया लेकिन दूसरी तरफ रिसीव करने वाला कोई नहीं था. पुलिस में दर्ज रिपोर्ट में लिखवाया गया कि वे दोपहर में घर से पानी पीकर निकले और दुकान पर नहीं पहुँचे.
कुछ लोगों ने उन्हें फव्वारे वाले मोड़ तक तो देखा लेकिन उसके बाद देखने वाला कोई गवाह नहीं मिला.

मलकीत सिंह के गायब होने के बाद मूलपुरा वालों की लोहे की दुकान बलजीत और अमरजीत को संभालनी थी. पति के लापता होने के बाद सरबजोत अचानक कुछ ज़्यादा ही मुक्त और ख़ुश हो गई थी. अगले ही दिन जैसे वह अपने अंधे होने को भूल गई और चारपाई से उठकर पहले से कई गुना तेजी से पूरे घर में घूमने लगी. वह किसी सामान या दीवार से भी नहीं टकराती थी. वह सबके चेहरे की ओर देखकर इस तरह बात करती थी, जैसे सब कुछ दिखता हो. मुझे लगने लगा था कि बलजीत ने उनकी आँखों पर कोई स्थायी जादू कर दिया है. मैं दो-तीन दिन तक उनके दरवाजे से ही लौटता रहा.

            सरबजोत ने बलजीत को आदेश दिया कि वह दुकान सँभाले. दुकान पर काम करने वाले तीनों लड़के सरबजोत के सामने इस तरह सिर झुकाए खड़े थे जैसे मलकीत सिंह की गुमशुदगी में उन्हीं का हाथ हो. बलजीत ने नेताओं की तरह अपना हाथ हवा में हिलाया और कहा कि उसके लिए जादू अधिक महत्वपूर्ण है. दुनिया का यही इकलौता काम है जिसमें उसे संतुष्टि मिलती है. सरबजोत के लिए रानी मर चुकी है इस तथ्य का भी उसने अपने पक्ष में इस्तेमाल किया. उसने कहा कि उसकी न बीवी है, न बच्चे और न ही होंगे. तब वह क्यों लोहे में सर खपाए?

            बीवी के न होने वाली बात पर गोपीराम नामक लड़के ने उसे टोकना चाहा लेकिन तब तक सरबजोत अमरजीत से मुखातिब हो चुकी थी.
- अब तुझे ही दुकान सँभालनी है और अपने निकम्मे बाप का सारा कर्ज़ा उतारना है. अगली उन्नीस को तेरा ब्याह होगा.
अमरजीत सिर झुकाकर खड़ा रहा और फिर तीनों लड़कों को लेकर दुकान पर चला गया. उसने सारी किताबें एक बैग में भरकर रख दीं और शायना को फ़ोन करके कहा कि अब उसके लिए कोई किताब न खरीदे. हो सके तो अगली उन्नीस को उसकी शादी में कोई ठीक सा तोहफ़ा लेकर पहुँच जाए. उसने कहा कि वह शादी में शायना की पसंद की कम से कम एक मिठाई ज़रूर बनवाना चाहता है इसलिए वह सोचकर अगली बारह तक कम से कम एक मिठाई का नाम ज़रूर बता दे. शायना ने फ़ोन पटक दिया.

           गायब करने वाले जादू की असफलता ने बलजीत को एक नए जुनून से भर दिया था. अब वह रात में बस दो घंटे ही सोता और बाकी वक़्त पढ़ने और प्रयोग करने में ही लगा रहता. इन्हीं प्रयोगों में घर की चीजें भी गायब होने लगीं. उनमें से आधी कभी नहीं लौटीं. एक रात जब मैं और रानी प्यार कर रहे थे, हमारे पीछे वाली दीवार गायब हो गई और हमने अपने आपको गली में पाया. हमने जल्दी-जल्दी कपड़े पहने. मैं भाग आया और रानी चादर ओढ़कर सो गई. अगली शाम तक दीवार लौट आई थी.

          सरबजोत अपनी बहुएँ छाँटकर लाती थी, चाहे उसकी आँखें हों या न हों. परी अपने नाम के अनुरूप रानी से इक्कीस ही थी. शायना ने उस पूरी रात अपनी सहेलियों के साथ तबाह हुए लड़कों के स्टाइल में शराब पी और प्रण लिया कि मूलपुरा वालों का सर्वनाश करके ही रहेगी. शायना की पसंद के पेड़े उस शादी में बने, जिन्हें हम खा नहीं पाए.

उन शराब पी हुई लड़कियों में से एक से मैंने उस रात कहा कि मैं उससे प्यार करता हूँ. माहौल कुछ ऐसा था कि उसने मेरी बात को सीरियसली ले लिया. उसका नाम पायल था. उसके परिवार में सबने प्रेम-विवाह किया था और वह भी करने के लिए उतावली हुई जा रही थी. दो दिन बाद एकादशी को उसने माँग में मेरे नाम का सिंदूर भरा और करवाचौथ का व्रत रखा. उसके घरवाले इस पर बहुत खुश हुए.

         मगर मेरी निगाह परी पर थी. कुछ ही दिन बाद उसने दुकान के एक हिस्से में दीवार खिंचवाकर परी ब्यूटी पार्लर खोल लिया. ऑटो मार्केट में भला ब्यूटी पार्लर कितना चलता? लेकिन वे दोनों ज़्यादा से ज़्यादा वक्त साथ गुज़ारना चाहते थे. उन्हें ज़िन्दगी प्यार के लिए छोटी लगती थी. अजीब बंडल लोग थे. वह और अमरजीत साथ-साथ जाते और साथ लौटते. इस किस्म के जोड़ों से मुझे कोफ़्त होती थी. वे सारे शहर के सामने जैसे हर पल सिद्ध करना चाहते थे कि हमारी पूजा करो क्योंकि हम दो शरीर एक आत्मा टाइप लोग हैं.

परी के ब्यूटी पार्लर खोलने के बाद सर्बजोत फिर पुरानी पापिन, गुरु ग्रंथ साहिब और रोना वाली स्थिति में जाने वाली ही थी, तभी उसे याद आया कि उसे जादूगर बलजीत से भी बदला लेना है. एक दोपहर जब रानी परी के ब्यूटी पार्लर में फेशियल करवा रही थी और बलजीत छत पर प्रयोग कर रहा था कि दिन में सूरज को कैसे बुझाया जा सकता है, सरबजोत ने घर की सारी किताबें एक जगह इकट्ठा कीं और उनमें आग लगा दी. फिर उसने चिल्लाकर कहा- अब तेरा जादू ख़तम बलजीते!
           बलजीत लपटें देखकर छत से कूद गया. आँगन में एक बैग और उससे निकली किताबें पड़ीं जल रही थीं. उसके पैर की हड्डी टूट गई थी लेकिन उन किताबों में जादू की किताबें न पाकर वह ख़ुशी से चिल्लाया और अपनी माँ को एक अश्लील गाली दी. तब सरबजोत को लगा कि उसने अमरजीत की ही किताबें जलाई हैं. वह गिर पड़ी और पुरानी स्थिति में लौट गई.

           फिजिक्स की किताबें उस आग में नहीं जली. बलजीत को लगा कि इसमें कोई संदेश छिपा है. उसने उस दिन से जादू के साथ-साथ फिजिक्स पढ़ना भी शुरु कर दिया. जब उसका पैर ठीक हुआ तो उसने अपनी माँ को कई लातें जमाईं. वह खाट पर पड़ी विनती करती रही कि उसे सच्चे बादशाह की शरण में भेज दिया जाए.

           कुछ दिन बाद, जब एक रात बलजीत अपने कमरे में थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी पढ़ रहा था और रानी उसके सिर पर तेल की मालिश कर रही थी, तब उनके कमरे की आधी छत गिर गई. यह जादू से नहीं हुआ था. बलजीत उस समय अपने प्रयोग कर रहा होता तो सबका शक उसी पर जाता. कई घंटों तक बलजीत ने कोशिश की लेकिन छत के टुकड़े जादू से वापस अपनी जगह नहीं लगे. हताशा में उसने देर तक दुनिया भर के जादूगरों को गालियाँ दीं और तीन दिन तक जादू से दूर रहने की कसम खाई. उसकी पढ़ने की गति इतनी बढ़ती जा रही थी कि उन तीन दिनों में उसने फिजिक्स की कम से कम आठ किताबें पूरी कर दीं. चौथे दिन वह मेरे पास आया. उसके पास जादू और फिजिक्स की किताबों की एक सूची थी- कम से कम पैंतीस किताबें. अगर एक किताब औसतन पाँच सौ रुपए की भी हो तो सतरह हजार पाँच सौ रुपए की किताबें. मैंने हाथ खड़े कर दिए. वह वहीं लेटकर ज़मीन पर पैर पटक-पटककर रोने लगा. आख़िर में शायना ने उससे कहा कि हम कोई रास्ता ढूँढ़ निकालेंगे. वह अगले दिन आने का कहकर चला गया. शायना ने उसके जाने के बाद मुझे जो रास्ता बताया, उसे सुनकर मुझे लगा कि शायना को ग्यारहवीं में होना चाहिए था.

लेकिन हमने सही मौके का इंतज़ार किया. उन दिनों मेरा रानी से मिलना कम हो गया था. मैंने अमरजीत से दोस्ती बढ़ा ली थी और दिन के कई घंटे उसकी दुकान पर बिताता था. वह अक्सर चुपचाप बैठा कुछ सोचता रहता. काम करने वाले लड़कों के लिए भी वह मालिक का एक प्रतीक भर था जो हर सवाल के जवाब में हाँ बोलता था और ग्राहक से पैसे लेकर गल्ले में रख लेता था. जब परी के पार्लर में कोई ग्राहक नहीं होती थी तो वह दोनों दुकानों के बीच की दीवार पर लगी छोटी सी खिड़की में से अमरजीत को देखती रहती. एक दिन मैं उठकर उस खिड़की तक गया और ख़ुद ही अपना परिचय दिया- मैं अमरजीत का बहुत पुराना दोस्त हूँ. शादी में आ नहीं पाया था लेकिन आप बहुत ख़ूबसूरत हैं.
खिड़की बन्द हो गई. गोपीराम मेरी ओर देखे बिना हँसा.
          
मैं तुरंत रानी के पास चला गया. उसका रंग साँवला पड़ता जा रहा था, आँखें छोटी लगने लगी थीं. अब वह सरबजोत के पास बैठकर उससे बातें भी करती थी. सरबजोत के सामने एक और रहस्योद्घाटन हुआ था कि ईश्वर दरअसल एक औरत है. कभी-कभी उसका यह बात चिल्ला-चिल्लाकर सबको बताने का मन भी होता था लेकिन उसे लगता था कि यह उसकी तपस्या और कष्टों के बाद मिली उपलब्धि है इसलिए किसी को मुफ़्त में बताना ठीक नहीं.

मैं गया तो रानी उठकर अपने कमरे में आ गई. छत की मरम्मत कर दी गई थी. बलजीत शायद रोकर सोया था. हम दोनों ने ही बेमन से प्यार किया. उसके बाद वह चाय बनाकर लाई.
- मैं पेट से हूँ..
- ओह!
मुझे समझ में नहीं आया कि और क्या कहूँ. मैं राहुल या प्रदीप को यह बात बताता तो वे पूरी क्लास को बताकर मुझ पर हँसते. माशूका का प्रेगनेंट होना किस्मत के कागज़ पर हथौडों का पड़ना था. कोई ज़िम्मेदारी पड़ जाने वाला डर हमें परेशान नहीं करता था. हमारे पास पचासों रास्ते थे जिनसे होकर हम ऐसे बच निकलते थे जैसे इस लड़की को कभी देखा तक नहीं. वैसे भी कोई कुंवारी लड़की तो बच्चे को जन्म देने की हिम्मत करती नहीं थी और विवाहिताओं के पास देने को पिता का एक स्थायी नाम था ही. हमें दुख यह था कि लड़की के माँ बन जाने के बाद हमें न उसे भोगने की कोई चाह रह जाती थी और न ही उसे पटाना उपलब्धि होता था. हमारा बस चलता तो बच्चे पैदा करने को दुनिया का सबसे जघन्य अपराध घोषित कर देते.

- आज तक जितने भी लड़के मेरी ज़िन्दगी में आए हैं उनमें तुम सबसे अलग हो. तुम्हारे जैसा कभी कोई और नहीं था.
             मैं ऊबने लगा था. ऐसी बातें तो फिल्मों तक ठीक है
-         हाँ हाँ...
- तुम अभी छोटे हो और मैं कोई बोझ नहीं डालना चाहती. बस मेरे लिए ऐसे ही रहना...

मुझे लगा कि अभी कुछ दिन और इसे पटाए रखना चाहिए. कम से कम तब तक, जब तक परी
लाइन देना शुरु नहीं करती. मैंने रानी को प्यार से बाँहों में भरा और उसके माथे को चूमा. उसकी
आँखों से आँसू छलक आए. उसके बाद वह सामान्य हो गई और लड़कियों वाली बातों से उसने
मुझे देर तक बोर किया.

             मैंने उस रात राहुल को अपने अब तक के जीवन का निचोड़ सुनाया- आख़िर में सब औरतें एक सी ही होती हैं बॉस. वही बारिश, चाँद, बाज़ार और बिन्दी-टिक्कियों की बातें. मेन पॉइंट तक आने में सालों लगा देती हैं और जब आती हैं, तब तुम किसी और के मेन पॉइंट पर पहुँचना चाहते हो.
राहुल ने ईर्ष्या से कहा- पर तुझे तो ड्रीम औरत मिली है...
            मैं हँसा जैसे सफल लोगों को कम सफल लोगों द्वारा मिली तारीफ़ पर हँसना चाहिए.

प्रेगनेंसी वाली बात मैंने किसी को नहीं बताई. मगर उसके बाद रानी सुखपाल की तरह का प्यार करने लगी. जो लड़के ऐसा प्यार झेलते थे, मुझे उन पर तरस आता था. सारा दिन इमोशनल होकर पड़े रहो और महीने में किसी एक दिन किस पा लो. इससे अच्छा तो कुत्ते बन जाओ.

           और अब रानी मुझे भी कुत्ता यानी सुखपाल बनाना चाहती थी. लेकिन उनकी एक पारिवारिक कमज़ोरी - पैसा सब भावनाओं पर भारी पड़ी.

           बलजीत की किताबों की दुबारा की फ़रियाद से पहले रानी ने पूरे हक़ से मुझसे पाँच सौ रुपए माँगे. उसने कहा कि दुकान से थोड़ी-बहुत कमाई आती है लेकिन वह अमरजीत से कुछ माँगना नहीं चाहती. मैंने तुरंत प्रेमी वाला चोला उतार दिया और काम की बात पर आ गया. मैंने उसे कहा कि एक काम है, उसे करोगी तो फिर किसी के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे.

काम बताने से पहले ही वह नीली सी पड़ने लगी. उसने मुझे हमारी पहली मुलाक़ात याद दिलाई जब उसके चेहरे की चमक से चौंधियाकर मेरी आँखें बार-बार बन्द हो रही थीं. वे दुपहरियाँ, जब बच्चों की सी उत्सुकता से मैं उसके अंगों और उनके कपड़ों से खेलता था. फिर बलजीत आकर मेरे पैरों पर गिर पड़ा. उसे लगता था कि वह जल्द ही कोई बहुत बड़ी खोज कर देने वाला है. उसने कहा कि वह जादू को वास्तविकता से जोड़ने वाला ऐसा समीकरण बनाने वाला है जिसके बाद असलियत जादू में और जादू असलियत में बदला जा सकेगा. बस उसे कुछ किताबों की जरूरत थी. उसने कहा कि उसे जब भी पुरस्कार मिला करेंगे, वह स्टेज पर मेरा नाम ज़रूर लिया करेगा. वह रोने लगा और रानी माँ की तरह उसे चुप करवाने लगी.
  फिर मुझे शायना की बात याद आई- यह सुनने में ही इतना गन्दा लगता है. बाद में वे हमारा अहसान मानेंगे.
             मैंने रानी और बलजीत को अपने पैरों से हटाया और इस तरह पीठ फेरकर बोलने लगा जैसे पुरानी फ़िल्मों में अभिनेता कैमरे की ओर चेहरा करके बोलते थे.
- मैं तुम्हें धन्धा करने को नहीं कहने वाला, इसलिए पहले तो रोना बन्द करो. मेरे पास एक नया बिजनेस प्लान है. जिस तरह कुछ लोग पढ़ाते हैं, कुछ लोहा बेचते हैं, कुछ घर बनाते हैं, यह काम भी उसी तरह का है. आज कुछ लोग इसे बुरा मान सकते हैं लेकिन लोग तो कहानियाँ लिखने को भी अच्छा काम नहीं मानते.
- लेकिन काम है क्या?
- तुम लोगों ने अख़बार में चटपटी बातें, गरमागरम बातें वाले एड देखे होंगे?
- हाँ...
- उनमें विदेशों के फ़ोन नम्बर होते हैं. हम यहाँ के नम्बर पर वही सुविधा देंगे.
बलजीत तुरंत नहीं समझ पाया लेकिन रानी समझ गई. वह जानती थी कि कैसी बातें करनी हैं.

हमने एक बैंक अकाउंट खोला और दो मोबाइल फ़ोन खरीदे. मैं और शायना बिजनेस के मालिक थे और रानी हमारी कर्मचारी. एक फ़ोन मेरे पास रहता था और एक रानी के. अख़बार के विज्ञापन में हम मेरा नम्बर देते थे. फिर जो फ़ोन पर लड़की से बातें करना चाहता था, उसे हमारे खाते में डेढ़ हज़ार रुपए ज़मा करवाने होते थे. पैसे ज़मा होने पर मैं उसे रानी का नम्बर देता था. इस तरह हमने भारत के नम्बर पर काम करने वाली पहली फ़ोन फ्रैंडशिप सर्विस खोली.

          पहले हफ़्ते दस लोगों ने पैसे ज़मा करवाए. पन्द्रह हज़ार में से मैंने ढ़ाई हज़ार रानी को दिए. मैंने उससे कहा कि यदि वह परी को मेरे लिए पटवा दे तो अगली बार से उसे दुगुने पैसे मिला करेंगे. पहले हफ़्ते के बाद ही मैं और शायना हवा में थे जबकि रानी के पेट में मेरा बच्चा था जो दिन भर हिन्दी और पंजाबी में अपनी माँ की वे बातें सुनता था.

उन सारे पैसों से रानी ने बलजीत के लिए कुछ किताबें मँगवाईं. वह उसे पढ़ते हुए उसी तरह मुग्ध होकर देखती थी, जैसे पांडु यदि जीवित रहते तो अर्जुन को धनुर्विद्या सीखते हुए देखते. दिन भर उनके कमरे की अजीब स्थिति रहती. पूरे कमरे में रसोई के बर्तन बिखरे हुए रहते जिन पर बलजीत चुम्बक और बिजली के तारों से प्रयोग करता रहता. उसका कहना था कि दुनिया में ऐसी कोई आकृति नहीं जो रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तनों में न हो. उसके इर्द-गिर्द मुस्कुराती हुई रानी टहलती रहती और एक के बाद एक कस्टमर से फ़ोन पर हर संभव और असंभव आसन में संभोग करती. कुछ बेवकूफ़ आदमी प्यार-मोहब्बत की तुम मेरे दिल, मेरी आँखों में रहती हो जानेमन जैसी बातों के लिए भी डेढ़ हज़ार रुपए और कॉल का खर्चा बर्बाद करते थे. उन प्यारे किस्म के लोगों में से एक रानी के नम्बर से मेरे पते तक भी आ पहुँचा था और कह रहा था कि उससे शादी किए बिना नहीं लौटेगा. यह और बात थी कि उसे लौटाने के लिए एक थप्पड़ ही काफ़ी रहा.

           लेकिन अब रानी मुझसे प्रोफेशनल व्यवहार करती. काम के अलावा एक भी इधर-उधर की बात नहीं. मैं उसे छूता तो मेरा हाथ झटक देती. साथ ही उसने सीधे कस्टमर भी बनाने शुरु कर दिए थे जिनका पता मुझे बहुत बाद में चलना था.

           उसने बच्चा भी गिरा दिया. पहले मुझसे पूछा या बताया भी नहीं. यह मैं कह तो ऐसे रहा हूँ जैसे वह मेरे जिगर का टुकड़ा था और उसके मरने की बात जानकर मेरा आत्महत्या करने का मन हुआ. खैर! तब उसने तीन दिन तक छुट्टी रखी. सरबजोत को कुछ बुरे की गंध आती रही और खाने के वक़्त वह अमरजीत से बार-बार पूछती रही कि क्या उसके पिता लौट आए हैं?

           रानी ने परी को पटाने वाली बात पर ज़रा भी काम नहीं किया. यह मुझे अपनी हार लगी. फ़ोन वाले बिजनेस को शुरु हुए चार हफ़्ते हुए थे और इस हफ़्ते हमने बत्तीस हज़ार रुपए कमाए थे. रानी के चेहरे पर लाली लौटने लगी थी और बलजीत की ज़रूरत की आधी किताबें तो आ ही गई थीं. अब मेरी और रानी की मुलाक़ात सिर्फ़ उसे पैसे देने के लिए ही होती थी. हमारे पेपर नज़दीक आ रहे थे और मैं पढ़ाई छोड़कर फुलटाइम यही बिजनेस करने के फ़ैसले से कुछ घंटे की दूरी पर ही था. तभी मुझे लगा कि रानी को उसकी औकात दिखानी चाहिए. मैं उसे अपने बिजनेस से अलग करना चाहता था. लेकिन मैं जानता था कि अब वह अकेले भी यह कर सकती है और मेरे पास दूसरा विकल्प भी नहीं था. मतलब मुझे उसकी ज़्यादा ज़रूरत थी.

          एक दिन मैंने थोड़ी हिम्मत जुटाकर शायना से कहा कि अगर हम दोनों ही इसमें हिस्सेदार रहें तो ज़्यादा मुनाफ़ा होगा. उसने कहा कि वह तो शुरु से ही यही सोच रही थी. मैंने पूछा कि क्या वह रानी जितनी क्रिएटिव हो पाएगी? उसने कहा- तुम मुझे जानते ही कितना हो?
और हम ख़ूब हँसे.

          लेकिन उसने एक शर्त रखी जो मेरे भी फ़ायदे की थी. मुझे मूलपुरा वालों के सर्वनाश के उसके संकल्प को पूरा करने में उसकी मदद करनी थी. इस बार मैं थोड़ा हिचका लेकिन फिर उसने मुझे याद दिलाया कि हम इससे बड़े-बड़े काम निडर होकर कर चुके हैं. हमें अपने आप पर गर्व हुआ और बहुत दिन बाद हमने रात का खाना टीवी देखते हुए नहीं खाया.

          उनकी दुकान के आस-पास ज़्यादातर दुकानें स्पेयर पार्ट्स की ही थीं. वहाँ ग्रीस से सने हुए कपड़ों में काम कर रहे मैकेनिक शायना को आकर्षक लगते थे. उन्हें दिन की रोशनी में देखने का मोह छोड़कर शायना मेरे साथ अँधेरा होने पर मूलपुरा वालों की दुकान पर गई. यह वह वक़्त था जब लड़के चले जाते थे और अमरजीत और परी जाने की तैयारी कर रहे होते थे.

          मैंने आपसे पहले ही कहा है कि हमें कुछ असंभव नहीं लगता था. हमें दुनिया खिलौनों की दुकान लगती थी जिनके पुर्जों से हम बलजीत की तरह खेलते और प्रयोग करते रहते थे. मौत फिल्मों के दृश्यों की तरह थी जो कई बार रिहर्सल के बाद ठीक से आती थी और फ़िल्म पूरी होने के बाद लौट जाती थी. पाप और पुण्य, प्यार की तरह बेवकूफ़ लोगों के लिए ही थे. हमें न गधों की तरह पढ़ने, काम करने वाले लोगों का दर्शन समझ आता था और न दुखी होने की अवधारणा. मैं और शायना इन सतरह सालों में कभी उदास नहीं हुए थे. अपमान और गर्व हमें महसूस होता था, लेकिन स्नेह और वियोग हमें नौटंकी के लिए रची गई भावनाएँ लगती थीं.

         अमरजीत नाटक के किरदार की तरह उदास बैठा था. परी अपने ब्यूटी पार्लर में किसी की आईब्रो बना रही थी. हम दोनों ने अमरजीत से हाथ मिलाया. उसने शायना से माफ़ी माग़ी. उसने कहा कि उसका जीवन निरुद्देश्य हो गया है क्योंकि अब वह चाहकर भी आईएएस नहीं बन सकता.

शायना ने कहा कि अगर वह चाहता होता तो यह नामुमकिन था कि वह न बन पाता.
उसने कहा कि तुम सुविधाओं में पले हुए लोग हो, तुम नहीं समझोगे.
शायना ने पूछा कि क्या फिर से दाढ़ी और बाल बढ़ाते हुए अच्छा लग रहा है?
उसने कहा- नहीं, लेकिन यही होना था इसलिए यही हो रहा है.

शायना ने उठकर थूका और उसका हाथ पकड़कर दुकान के भीतरी हिस्से की ओर चली. वह उठकर उसके पीछे-पीछे चल दिया. शायना ने लाइटें बुझा दीं. तभी आईब्रो बनवाने वाली लड़की परी की दुकान से बाहर निकली, जैसे उसे लेखक ने इसी क्षण निकलने को कहा हो. उसकी नज़रें मुझसे टकराईं. वह पायल थी. मुझे देखते ही वह दौड़कर आई. उसने शर्माने की कोशिश की लेकिन नाक़ामयाब रही. मुझे लगा कि मेरे चेहरे पर कीलें उग आई हैं. यह लोहे की दुकान का असर नहीं था.

- तुम कल शाम फ़्री हो?
मैंने उससे पूछा. उसने कहा- हाँ
- हमारे घर आ जाना और बताकर आना कि सुबह लौटोगी.
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उसकी माँ से शादी की बात कर दी हो. वह अपने चारों ओर एक दैवीय पवित्रता का भ्रम लिए फिरती थी जिसे मैंने बिना छुए तोड़ दिया. वह भाग गई, यह चाहती हुई कि उसकी भवें फिर से बेतरतीब हो जाएँ, शहर में बेहाली छा जाए, ईश्वर काले कपड़ों में आए और दुनिया को एक बूँद पानी में डुबोकर ख़त्म कर दे.

           मैं लेखक के कहने पर ब्यूटी पार्लर में घुसा और दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया. परी तुरंत खिड़की से चिल्लाई- अमरजीत...लेकिन वह शायना के सामने अन्दर स्टोर में अनुयायियों की तरह खड़ा था. मैंने खिड़की बन्द कर दी.

           उसी रात बलजीत ने वह समीकरण खोज लिया जो जादू को यथार्थ से जोड़ता था. उसके अनुसार जादू और यथार्थ एक ही घटना के रूप थे और हर क्षण साथ-साथ घटते थे. किसी भी रूप को यथार्थ समझा जा सकता था और बाकी हर रूप को जादू. जैसे सरबजोत यदि उठकर कमरे की ओर चलती है तो वह कमरे के दरवाज़े को देख भी रही है और नहीं भी देख रही. एक रूप में तो वह चल भी नहीं रही. किसी और रूप में सरबजोत कभी जन्मी ही नहीं और इसलिए बलजीत भी नहीं जन्मा और यह समीकरण किसी और ने रचा है.

           यदि दो संभावनाओं की ही बात करें तो राम कह सकता है कि सरबजोत का दरवाज़े को देखना जादू है जबकि श्याम उसी आत्मविश्वास से कह सकता है कि अगर वह नहीं देख पा रही तो यह जादू है. बलजीत का कहना था कि क्या देखना है, यह या तो हम अपनी सुविधा के हिसाब से तय करते हैं या हमारी परवरिश और दिमाग की सीमाएँ यह तय करती हैं. हममें से ज़्यादातर लोग किसी भी घटना का एक हिस्सा ही देख रहे होते हैं और बाकी अनंत हिस्सों पर यक़ीन ही नहीं करना चाहते. कोई और उन्हें सच कहे तो हम लड़ने को भी तैयार बैठे रहते हैं.

           इस समीकरण की स्थापना के साथ ही बलजीत ने सिद्ध किया कि उसके पिता मलकीत सिंह गायब भी थे और दिखते भी थे. उसने चार पेज में यह प्रमाण द्वारा सिद्ध किया कि वे हर सुबह नहाकर दुकान जाते हैं और शाम को घर लौटते हैं. यह लिखने के बाद उसने अपना पेन और कॉपी एक तरफ़ रख दिए और रानी को पुकारा. रानी एक मारवाड़ी ग्राहक से बात कर रही थी. बलजीत के पुकारे जाने का ढंग इतनी ख़ुशी से भरा था कि उसने फ़ोन ऑफ़ करके उसका सिम बाहर निकालकर फेंक दिया और आकर बलजीत से लिपट गई.

           बलजीत ने उसे बताया कि वह यह समीकरण अगर दुनिया को दिखा दे तो उसे नोबेल पुरस्कार भी मिल सकता है लेकिन तब भी, जैसा यह समीकरण कहता है, ऐसे बहुत से लोग होंगे जो देख रहे होंगे कि बलजीत अब भी तीन वक़्त शराब पीता है और उसकी बीवी दूसरे मर्दों के साथ सोती है.
           रानी ने उसके होठों पर हाथ रख दिया और बताया कि उसने बच्चा गिरा दिया है. बलजीत ने कहा- नहीं, तुम्हारा बच्चा तो मैं हूँ. चाहे लोग इस पर यक़ीन न करें.
           जब रोती हुई परी घर लौटी और उसने बताया कि उसका बलात्कार हुआ है और अमरजीत को मार दिया गया है, तब सरबजोत ने छाती पीटते हुए कहा आज मेरे पिताजी ज़िन्दा होते तो दुनिया का रंग ही कुछ और होता और लेटकर मर गई. 


           
बलजीत ने रानी से कहा कि वह चाहे तो इन घटनाओं पर भरोसा कर सकती है लेकिन उसका कोई फ़ायदा नहीं है. एक अच्छा विकल्प यह है कि माँ की आँखों की रोशनी वापस आ गई है और परी ने एक नाटक में हिस्सा लिया है, जिसकी तैयारी वह घर में इस तरह कर रही है.
           रानी जाकर खाना बनाने लगी और रोती हुई परी से उसने पूछा कि वह कितनी रोटियाँ खाएगी?

(यह कहानी मई, 2011 की नया ज्ञानोदय में छपी है। ये तीनों तस्वीरें Michale Haneke की फ़िल्मों की हैं। पहली Benny's Video से, दूसरी Funny Games से और तीसरी Cache से। पहली और दूसरी में अभिनेता Arno Frisch हैं।)