एक आदमी बाघ से बचते
हुए मारता बकरी
मैं तोते को बचाता
हुआ एक तस्वीर में
दुनिया वैसी ही ठंडी
आसमान सबका पर मेरी
छत से दिखता थोड़ा
यह गौरव सोलंकी की किताब है। इसमें कुछ चीजें हैं जो कहीं और नहीं हो सकती थीं। आप ऐसा भी समझ सकते हैं कि उन्हें कहीं और जगह नहीं मिली।
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आसमान सबका पर मेरी छत से दिखता थोड़ा |
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बार-बार रोटी |
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बहन का कमरा |
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धूप पर दीवार |
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पेड़ मेरे घर में पर क्या |
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पतंग |
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कि यह इम्तिहान है, स्कूल है, बबूल है दुनिया |
रेशम ना होता तो कितना जीते रेशम के कीड़े?
मेरी नब्ज़ टटोलकर
मुझे दोबारा भरो बाँहों में
या तो मैं ज़िन्दा हूँ या हूँ तुम्हारे पास
ऐसे साँस को दीवार के सहारे खड़ा करके
नापो गुस्सा
मुझे दो शीशे दो
जिन्हें आपस में टकराकर तोड़ूं मैं और आवाज़ हो
पीछे तक जाकर फिर से देखो
कि यह इम्तिहान है, स्कूल है, बबूल है दुनिया
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देर होती |
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देखना आँख से कितना दूर |
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बहुत दिन से टाले हैं बहुत सारे दोस्त |