जैसे पढ़ते पढ़ते लोग बन जाते हैं किताब,
जैसे नाचते नाचते लोग बन जाते हैं ओडिसी,
जैसे खरीदते खरीदते बाज़ार,
जैसे ठोकते पीटते औजार,
जैसे टीवी देखते देखते चित्रहार,
जैसे ड्राइव करते करते लोग बन जाते हैं कार,
तुम जमकर बन गई हो वनीला आईसक्रीम,
नींद, बेरुखी, फूल
या जैसे उदास सा बिहार।
| [+/-] |
नींद, बेरुखी, फूल |
| [+/-] |
बस एक रात और हाय रब्बा! |
1
छत को गिर जाना है किसी दिन
अचानक टूटकर मेरे ऊपर
और जब रात भर गोल गोल घूमती है धरती
मेले वाले बड़े झूले की तरह
(मैं नहीं मानता गोल गोल घूमना
मगर कोई इसे सिद्ध करने के लिए
फाँसी चढ़ गया था शायद कभी।
एक बलिदान पर सौ झूठ हों सच।
आमीन!)
तो उस अचानकता को बचाए रखने के लिए
यह छत टस से मस नहीं होती।
तुम फ़ोन पर मुझसे कहती हो – अपना ख़याल रखना,
मुझे याद आता रहता है गार्नियर का विज्ञापन।
बहुत सारी तुम भी।
जो टीवी देख सकते हों,
कम से कम उन्हें तो नहीं करना चाहिए था
किसी से प्रेम।
२
आज रात बर्फ़ गिरेगी दिल्ली में,
चाँद जम जाएगा
या कम्बल ओढ़कर करता रहेगा प्यार।
काश कि बर्फ़ न गिरे,
इतनी गर्मी हो कि चाँद आसमान के बिस्तर से उठकर
आ खड़ा हो छत पर,
मैं दूर खेतों में खड़ा झलता रहूं साँसों का पंखा।
चाँद कुँवारा सोए
और कुँवारा जग जाए
बस एक रात और
हाय रब्बा!
| [+/-] |
बीच के लोग रहेंगे देर तक ज़िन्दा |
समय निश्चित रूप से
बौराए हुए आत्मघाती शोर का है
लेकिन सन्नाटा भी लगातार चुन चुन कर
निगल रहा है अपने शिकार।
बीच के लोग रहेंगे
देर तक ज़िन्दा।
रसोई में सजे भगोने में
घूम रही हैं दो मकड़ियाँ,
या शायद एक।
निश्चिंत होकर सो जाना
गाँव से आए ताऊजी के
देर रात दरवाजा पीटने पर
दुबारा आटा गूंथती माँ के मुस्कुराने जितना
अवसाद भरा झूठ है।
न खुलने के सामाजिक अपराध पर
देर रात, सुबह तड़के या भरी दोपहर में
पिटते रहना
दुनिया भर के बन्द दरवाजों की नियति है।
इतना आहिस्ता रोती हो तुम
कि मुझे आती है हँसी,
रोना भी।
इतने गहरे तक पैठा हुआ है
कम्बख़्त मेरी पैदाइश का शहर,
उसके लोग,
उसकी लड़कियाँ
कि उनसे नफ़रत करना चाहूं
तो मर जाने का मन करता है,
प्यार करता रहूं
तो पागल हो जाऊँ।
माँ की एक सहेली थी कक्षा आठ में
जिसका आखिरी इम्तिहान से ठीक पहले ब्याह हो गया था,
जिससे मिलने माँ गई थी
भादो की किसी दूज को शायद
मामा के साथ ताँगे में बैठकर
और लौटते हुए रोती रही थी।
मैंने नहीं देखी माँ की कोई सहेली कभी,
मुझे क्यूं याद आती है वो
सीधी आँख के नीचे के तिल वाले
अपने पूरे चेहरे समेत?
क्यों होता है
मीना कुमारी की तरह
तकिए में चेहरा भींच कर रोते रहने का मन?
कंधे पर रेडियो रखे
एक सफेद कुरते वाला बूढ़ा
रात के अँधेरे में दिख जाता है
हड़बड़ाया, तुड़तुड़ाया, नाराज़, परेशान सा
जैसे सरकारी स्कूल का कोई मास्टर
लड़ आया हो अपने हैडमास्टर से
नाक पोंछते बच्चों के सामने चिल्ला चिल्ला कर,
खिंच गई हों उसके पेट की नसें,
कराहता रहा हो शाम भर
या तबादले के लिए मिलने गया हो एम एल ए से
और उसे मिली हों माँ बहन की गाली,
शायद खड़ा सिर झुकाए हाँ हूँ करता रहा हो,
शायद मुड़ने से पहले फिर से नमस्ते भी की हो,
शायद रोया भी हो घर आकर
और उसकी पत्नी ने अपने बच्चों को न बताया हो
या बस खाट पर पड़ा
सुनता रहा हो रात तक
प्रादेशिक समाचार,
बच्चे खेलते रहे हों क्रिकेट।
नकली घरघराती आवाज़ में
बहुत हँसाया करते थे मेरे पिता
जब कहते थे
”ऐसे बोलो, जैसे मैं रेडियो की तरह बोलता हूँ।“
आखिर पूछ लो ना मुझसे।
कुछ बात है अनकही
जो इतनी भारी है कि
रात भर नहीं बदलती करवट,
चूं भी नहीं करता दुख
कि नाखूनों में फँसा कर उखाड़ लिया जाए।
मेरे नाम से कोई तो रखता होगा व्रत,
नहीं तो दिल्ली में इतने दिन
कैसे ज़िन्दा रह सकता है कोई ख़ामोश नास्तिक आदमी?
| [+/-] |
प्यार, पूर्वाग्रह और लड़कियाँ |
शराब पीकर झूमती हुई लड़की
बेहद मासूमियत से अंग्रेज़ी में कहती है मुझसे
कि मुझसे प्यार करती है वह।
मैं शहर से पूछता हूं कि
क्या किया जा सकता है
तुम्हारी लड़कियों पर भरोसा?
शहर में शोर है,
चुप चुप सा है शहर।
मुझे लगता रहा है कि
इस कमज़ोर सी बेमुरव्वत ज़िन्दगी में
लड़कियों के सहारे पर बड़ी उम्मीदों के पुल बाँधना
अपने आप से किया गया
एक शरारती किस्म का मज़ाक है।
लड़कियाँ होती हैं इतनी अबूझ,
इतनी अनिश्चित
कि अगले ही पल बौखला पड़ने से पहले
वे रुमाल से पोंछ रही होती हैं लिपस्टिक
या गुनगुना रही होती हैं
कोई छद्म रोमांटिक गाना।
लड़कियों को इतनी प्यारी होती है खुशी
कि उसके साथ नहीं जी पाता
प्यार का सनातन दुख।
उन्हें पसंद होते हैं
मज़ाकिया लड़के
मसलन अक्षय कुमार
या वे शायद प्यार कर सकती हैं
डेरीमिल्क से भी
बशर्तें वह हँस सकती हो।
प्यार एक बहुत गंभीर मसला है
और सच में उसके बारे में बात करने पर
ऊबने लगती हैं अधिकांश लड़कियाँ।
उन्हें भले लगते हैं
जादुई सपने,
इन्द्रधनुषी रोमांच,
गुदगुदे बच्चे,
टेडी बियर,
चॉकलेट
और लाल गुलाब।
कभी कभी कुछ और चीजें भी।
आसमान उदास है,
शहर को नहीं है फ़ुर्सत,
शराब पीकर झूमती हुई लड़की
जा चुकी है अकेली अपने घर
और हैं बहुत से पूर्वाग्रह,
लेकिन फिर भी
मेरा जोरों से मन है कि प्यार किया जाए।
मैं सड़क के उस पार बैठी
एक अनजान मासूम सी लड़की से पूछता हूं
कि चलोगी फ़िल्म देखने?
प्यार एक बहुत गंभीर मसला है।
इंटरवल में एक दूसरे के हाथों से
पॉपकॉर्न खाते हुए
हम बात करते रहते हैं
करण जौहर के कालजयी सिनेमा की।
| [+/-] |
हम दोनों अपनी अपनी माँ से इतने नाराज़ थे कि आत्महत्या कर सकते थे |
बावरी सी रात थी, लेकिन इतनी भी बावरी नहीं कि अपने दूध पीते बच्चों को सड़क पर गिराकर अपने कपड़े फाड़कर चिल्लाती हुई भागने लगे। बस इतनी बावरी थी कि अपने आँचल का छोर पकड़कर लटके दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरती हुई कभी रोने लगती थी और कभी हँसने लगती थी। रात को जाने क्या दुख था, क्या खुशी थी!
हमने तय किया था कि रोएंगे नहीं। हम दोनों अपनी अपनी माँ से इतने नाराज़ थे कि आत्महत्या कर सकते थे। उसने अपनी माँ को किसी से प्यार करते देखा था और मैंने अपनी माँ को किसी से प्यार करते नहीं देखा था। माँ से न बोलने की कसम खाने के बाद ज़िन्दा रहना इतना मुश्किल था कि वह मुझ पर दया कर मेरी साँस लेती थी और मैं उस पर प्यार कर उसकी साँस लेता था। जब यह भी कठिन हो गया तो कुछ समय बाद हम दोनों रात को माँ कहने लगे थे। पहले वाली माँओं के गर्भ से जन्म लेते हुए हमने अपने आप को नहीं देखा था, लेकिन हम दोनों ने अपनी आँखों से देखा था, जब रात ने हमें जन्म दिया।
जब हमारी बावरी माँ हँसती रोती थी और हम उसका पल्लू पकड़कर ठगे से खड़े रहते थे, तब हमने निश्चय किया था कि माँ के सामने रोएंगे नहीं। उसने निश्चय किया था कि वह बोलेगी भी नहीं। वह अपनी अनामिका मेरी मध्यमा से छुआ देती थी तो मैं समझ जाता था कि वह उदास है। वह खिड़कियों के परदे बदलने लगती थी या किसी रात जल्दी सोने चली जाती थी या किसी दिन अख़बार पढ़ने लगती थी तो मैं समझ जाता था कि वह उदास है। लेकिन तब भी हमने कभी वह निश्चय नहीं तोड़ा। हम रात में कभी नहीं रोए। मैं उसके दाएँ पैर के अंगूठे का नाखून चबाते हुए सुबह होने की प्रतीक्षा करता रहता और वह अपनी आँखों पर सिर दर्द के बहाने वाली चादर लपेटकर सोने का अभिनय करती रहती। माँ अपने चाँद को लेकर जब चली जाती थी, उसके बाद मैं बाथरूम में जाकर देर तक रोया करता था। फव्वारे के नीचे खड़े होकर रोने पर कोई रोने की वज़ह भी नहीं पूछता था। और वह शायद अपने भीतर जाकर रोती होगी। मैंने उसे उसके बाद रोते हुए नहीं देखा।
उसका बचपन पहाड़ों पर बीता था। जब वह चार साल की थी तो एक देवदार पर उगी हुई मासूमियत तोड़कर चुरा लाई थी। मासूमियत उदासी के साथ मिलकर बहुत ख़ूबसूरत हो जाती थी। मैं जब चार साल का था तो पेड़ों के नीचे गिरी हुई निंबौरियाँ और बेर ढूंढ़ ढूंढ़कर खाया करता था। माँ देख लेती थी तो बहुत मारती थी। किताबों में लिखा होता था कि बच्चों को मारने के बाद माँएं खुद भी बहुत रोती हैं। पिटने के बाद की बचपन की रातों में मैं यही सोचकर अपने आप को सांत्वना दिया करता था कि मेरी माँ भी किसी कोने में जाकर रोती होगी। उसने अपनी माँ के बारे में कभी कुछ नहीं बताया, सिवा इसके कि उसने अपनी माँ को किसी से प्यार करते हुए देखा था।
फिर एक शाम, जब सड़क पर बहुत ट्रैफिक था और लोग एक दूसरे की छाती पर पैर धरकर आगे बढ़ जाना चाहते थे, जब टी वी पर सुपरहिट मुकाबला नहीं आ रहा था और दस साल पुराने प्रोग्राम को याद कर एम टी वी देख रहा मेरा पड़ोसी उदास था, जब नीचे की मंजिल पर अपने दफ़्तरी पति से उकताई सरदारनी पड़ोस के बिल्लू को अपने घर का गीज़र ठीक करवाने ले गई थी, जब सामने परचून की दुकान के बाहर पड़े बेंच पर पैर मोड़कर लेटा एक नौजवान लड़का अपनी बेवफ़ा प्रेमिका को मार डालना चाह रहा था, जब हमारे घर की बालकनी वाले रोशनदान में एक सफेद कबूतर आकर बैठ गया था और फिर उड़ गया था, तब वह चिल्ला चिल्लाकर रोने लगी थी और रात के गहराने तक रोती रही थी। फिर वह खाली हाथ, बिना ताला लगाए घर से निकल गई थी और जब मैं काम से लौटा था तो मुझे उसका कोई संदेश नहीं मिला था। फिर मैं रात भर चुप उसके खाली पलंग के सिरहाने बैठा रहा था। वह फिर कभी नहीं लौटी और हम दोनों को अपना निश्चय तोड़ना पड़ा था। डेढ़-दो बजे उसका फ़ोन आया था और उसने नहीं कहा था, लेकिन मैं समझ गया था कि अब हम दोनों अनाथों को अपनी अपनी साँसें अपने आप लेनी पड़ेंगी। कुछ था, जो बेवज़ह पिघलकर ख़त्म हो गया था...आधा अधूरा सा।
| [+/-] |
कितना बोलती हो सुनन्दा! |
1
कितना बोलती हो सुनन्दा!
फुदक रही हो सुबह से,
तुम्हारे पैरों में बँधी हैं गली के लड़कों की सीटियाँ
चाची के घर तक जाती हो तो
लड़ने लगती हैं सीटियाँ,
सब गुत्थमगुत्था,
तुम अनजान,
मुस्कुराकर माँगती हो उड़द की दाल।
कितना बोलती हो सुनन्दा
जैसे नया नया पढ़ना सीखने के दिनों में
बोल बोलकर अख़बार पढ़ती हो,
दिन में तीन वक़्त आता हो अख़बार।
गली में से गुजरते हुए
सब पूछते हैं तुमसे ही पता
शिक्को हलवाई का,
तुम बताती रहती हो
बिजलीघर से बाएँ,
फिर हनुमान मन्दिर,
फिर नाई की दुकान,
सामने शिक्को हलवाई।
खरबूजे के मौसम में
बीकानेरी रसगुल्लों की तरह
हुलसी फिरती हो,
तुम्हारे लहंगे ने बुहार दिया है
सुबह से पूरा घर।
चौके में से चम्मच
चोंच में दबाकर उड़ गया है कौआ,
तुम दीवार पर कुहनी टिकाकर
हँस-हँसकर बता रही हो
कि कौन आने वाला है!
कहाँ से लाती हो
इतनी किलकारियाँ भरते शब्द
कि सब खरीदकर ले आए हैं डिक्शनरी,
बोलती हो तो
तुम्हारे होठों में पड़ते हैं
डिंपलिया गड्ढे,
कितना बोलती हो सुनन्दा
कि मोहल्ले में अफीम बिकनी
बन्द सी हो गई है।
2
चाँद बहुत दूर है,
बसों की भी हड़ताल है,
कोई कब तक पीता रहे
रूखी आशाएँ?
साल भर ही तो बीता है
जब तीज पर
कलाई तक मेंहदी लगे हाथों से
तुम पोंछ दिया करती थी
गाँव भर के माथे की सलवटें।
कहाँ गया वो जादूगर किराएदार
बिना नोटिस के
तुम्हारी आँखें खाली करके,
भड़ भड़ बजते रहते हैं
खाली चौबारे के किवाड़।
बेसुध सी डगमगाती हुई चलती हो
और उस पर भी ठहर जाती हो
फ़िल्मों के पोस्टर देखकर
उदास पानी की तरह।
भला कहाँ करता होगा कोई इतना प्यार
कि बिछुड़ने की सालगिरह पर
सूजी का हलवा बनाते हुए
गर्मजोशी से गुनगुनाता रहे
'मैं तैनू फेर मिलांगी',
ऊपर वाले शेल्फ में
काँच की डिब्बी में रखा रहे
शांत सा पोटेशियम सायनाइड,
जिस पर चिप्पी लगाकर लिखा हो
मीठा सोडा।
श्श्श्श्श....
| [+/-] |
जब भी सिगरेट जलती है... |
मेरा मन कर रहा है कि सिगरेट पीना शुरु कर दूं। मुझे याद नहीं आता कि फ़िल्म बनाने, कविता लिखने या रोने के अलावा किसी और काम के लिए अचानक इतनी तीव्र इच्छा जगने लगी हो। बचपन में जब घर में फ़्रिज नहीं था तो गर्मियों की शाम में क्रिकेट खेलकर घर लौटने के बाद बर्फ सा जमा हुआ पानी पीने के लिए भी बहुत मन किया करता था। पहली बार प्यार किया था तो उसके होठों को छूने का भी बहुत मन करता था। लेकिन सिगरेट पीने का मन नशे की तरह करता है, जैसे मुझे चखने से पहले से ही नशा होने लगा हो। यह उसी तरह है, जैसे कभी कविता न लिखी हो और कविता लिखने का मन कर रहा हो या कभी फ़िल्म न बनाई हो और तब भी पता हो कि यही वह काम है, जो संतुष्टि देगा।
‘नो स्मोकिंग’ मेरी पसंदीदा फ़िल्मों में से है और ‘कश लगा’ और ‘जब भी सिगरेट जलती है’ आज ही कई बार सुन चुका हूं। इस पोस्ट का मक़सद गाने के बोल देना या गाना सुनवाना तो नहीं था, लेकिन फिर भी दस्तूर है तो जोड़े देता हूं। लिखा गुलज़ार ने है, संगीत विशाल भारद्वाज का है, गाया सुखविंदर सिंह और दलेर मेंहदी ने है।
और कृपया सिगरेट के नुक्सान मत बताइएगा। मुश्किल ही है कि मैं पियूं। हम कहाँ सब कुछ अपने मन का कर पाते हैं?
कश लगा - सुना नहीं है तो यहाँ से सुन लीजिए
कश लगा, कश लगा, कश लगा, कश लगा....
कश लगा, कश लगा, कश लगा - 2
ज़िन्दगी ऐ कश लगा - 2
हसरतों की राख़ उड़ा
ये जहान फ़ानी है, बुलबुला है, पानी है
बुलबुलों पे रुकना क्या, पानियों पे बहता जा बहता जा
कश लगा, कश लगा, कश लगा....
जलती है तनहाईयाँ तापी हैं रात रात जाग जाग के
उड़ती हैं चिंगारियाँ, गुच्छे हैं लाल लाल गीली आग के
खिलती है जैसे जलते जुगनू हों बेरियों में
आँखें लगी हो जैसे उपलों की ढेरियों में
दो दिन का आग है ये, सारे जहाँ का धुंआँ
दो दिन की ज़िन्दगी में, दोनो जहाँ का धुआँ
ये जहान फ़ानी है, बुलबुला है, पानी है
बुलबुलों पे रुकना क्या, पानियों पे बहता जा, बहता जा
कश लगा, कश लगा, कश लगा....
छोड़ी हुई बस्तियाँ, जाता हूँ बार बार घूम घूमके
मिलते नहीं वो निशान, छोड़े थे दहलीज़ चूम चूमके
जो पायें चढ़ जायेंगे, जंगल की क्यारियाँ हैं
पगडंडियों पे मिलना, दो दिन की यारियाँ हैं
क्या जाने कौन जाये, आरी से बारी आये
हम भी कतार में हैं, जब भी सवारी आये
ये जहान फ़ानी है, बुलबुला है, पानी है
बुलबुलों पे रुकना क्या, पानियों पे बहता जा बहता जा
कश लगा, कश लगा, कश लगा....
ज़िन्दगी ऐ कश लगा
हसरतों की राख उड़ा
ये जहान फ़ानी है, बुलबुला है, पानी है
बुलबुलों पे रुकना क्या पानियों पे बहता जा, बहता जा
कश लगा, कश लगा, कश लगा....
| [+/-] |
फुसफुसाना, बोलना या चीख पड़ना बहुत ज़रूरी था |
उन दिनों चुप रहना, ट्रेन में डुगडुगी बजाकर कलाबाजियाँ दिखाने वाले लंगड़े बच्चे की ‘दीदी तेरा देवर दीवाना’ की पैरोडी पर दस मिनट तक हँसने के बाद उसके कटोरा आगे कर देने पर खिड़की के और पास खिसककर ‘गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स’ चेहरे के आगे लगा लेने से भी बड़ा अपराध था। लेकिन जब जब मेरे बोलने से ज़िन्दग़ी की राहें बदल जाने वाली हों, उन सब खुशनसीब मौकों पर हरियाणा रोडवेज़ की दौड़ती बस में चक्कर खाकर गिरी माँ के पास बैठे चार साल के बच्चे की तरह मेरा हकबकाया, कँपकँपाया, रुआँसा मौन रहना ही बदा था।
मेरी माँ ने बचपन में मुझे इशारों पर चुप रहना सिखाया था। मैं माँ के साथ किसी के घर में सामने रखी डिजाइन वाली प्लेट में रखे बेकरी के बिस्कुटों पर आँखों की जुबान फिरा रहा होता और माँ की सख़्त आँखों की ओर देख लेता तो वहीं बुत बनकर बैठ जाता था और फिर मेरी जुबान न बोलने के लिए खुलती थी, न खाने के लिए। अपनी इस ट्रेनिंग और स्टाइल पर माँ कई सालों तक गर्व करती रही। थोड़ा बड़ा होने पर मैं जानने लगा कि सब माँएं इसी तरह अपने बच्चों को तीन साल की उम्र में चुप रहना सिखा देती हैं और बाद में जब बोलना आज़ाद होने जितना ज़रूरी होता है तो सबकी जुबान को काठ मार जाता है।
उन दिनों अन्दर धूप की धुकधुकी गर्मी रहती थी और बाहर धूप का धुंधला निकट दृष्टिदोष। मेरी आत्मा को स्किज़ोफ्रीनिया हो गया था। एक अजनबी सी लाचारी उस पहचाने से उन्माद पर नंगी लेटी रहती थी। कभी अपने असाधारण होने का घमंड छा जाता था और कभी अतिसाधारण होने की विवशता। एक ऐसी बेचैनी थी, जो आराम माँगती थी। एक ऐसी संतुष्टि थी, जिसमें भूख ही भूख थी।
लिखने से पलायन करती हुए अय्याशी की बू आती थी। सोचता था तो इच्छाओं के लिजलिजे साँप शरीर पर यहाँ वहाँ लोटने लगते थे। फुसफुसाना, बोलना या चीख पड़ना बहुत ज़रूरी था, लेकिन मैं उस वक़्त तक चुप रहा, जिसके बाद बोल देने का अर्थ सड़क पर से बाइक पर गुजरते हुए गर्दन घुमाकर शिवमन्दिर के सामने सिर झुका देने से ज़्यादा कुछ नहीं था।
शायद क्रमश:
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मैं जब भी फ़िल्मों की बात करता था तो वे सब शाहरुख को ही ले आते थे। |
वे सब कहते थे कि वह शहर सपनों को खा जाता है। मैं चाहता था कि वह शहर मुझे भी खा जाए, जिससे मै उसके पेट में लाखों करोड़ों सपनों के साथ जीता रहूं या मरता रहूं। वे सब कहते थे कि वह शहर बहुत चालाक है और चरित्रहीन भी और ‘वे सब’ के पुरुष रात को सोते थे तो अपनी पत्नियों के वक्षों में चेहरे छिपाकर, आँखें मींचकर उस शहर की लड़कियों के स्वामी होने की कल्पना करते थे। ‘वे सब’ की स्त्रियाँ, पुरुषों के काम पर चले जाने के बाद अपना अकेलापन भगाने के लिए उस शहर के लड़कों के रंगीन चित्रों वाली किताबों के पन्ने पलटती रहती थीं।
वे सब चरित्रवान थे और मैं सच में अपना चरित्र किसी नदी में बहा आना चाहता था।
- तुम इन बातों से कुछ और कहना चाहते हो ना?
- तुम्हें कैसे पता चला?
- देखा, मैं समझ गई। अब जानने लगी हूं तुम्हें।
- नहीं, वह कहने का पुराना तरीका है कि प्रतीकों के माध्यम से कहा जाए।
- तो नया तरीका क्या है?
- कि आँखों में आँखें डालकर वही कहा जाए, जो कहना है।
- तो सब कविताएँ बेकार की हैं?
- शायद हाँ...
- शायद तुम्हारा फ़ेवरेट शब्द है?
- नहीं, मेरा फ़ेवरेट शब्द माँ है....या शायद सपना।
- माँ का फ़ेवरेट शब्द क्या है?
- नहीं।
- यह किसी का फ़ेवरेट कैसे हो सकता है?
- शाहरुख ख़ान किसी का फ़ेवरेट कैसे हो सकता है?
- शाहरुख बीच में कहाँ से आ गया?
- मैं जब भी फ़िल्मों की बात करता था तो वे सब शाहरुख को ही ले आते थे।
- मैं जब भी पी एच डी करने की बात करती थी तो वे सब मेघा को ले आते थे।
- मेघा कौन है?
- उसने अपने बुड्ढ़े गाइड से शादी कर ली थी।
- वे सब रास्ते में आकर इस तरह खड़े हो जाते हैं जैसे बस का इंतज़ार कर रहे हों या शाम के खाने के बाद टहलने निकले हों या फ़ोन पर बात करने के बहाने दोस्तों से दूर निकल कर आ खड़े हुए हों। लेकिन वे सब मेरा रास्ता रोकने के लिए खड़े होते हैं।
- उनके हाथों में क्या होता है?
- काश उनके हाथों में तलवारें होतीं। तब उनसे लड़ा तो जा सकता था।
- तुम परेशान हो?
- हाँ, इतना कि रोना चाहता हूँ तो रोया नहीं जाता।
- तुम्हारे पास कुछ वक़्त है?
- नहीं, जब तुमने पूछा, तब था....जब मैं बता रहा हूं, तब नहीं है...
- कहाँ गया?
- मुझे भूख लगी थी, रोटी खरीदने गया है।
- तुम सामने हो तो भी तुम्हारी याद आ रही है...
- तुम सामने हो तो भी बार बार तुम्हें भूल जाता हूं...
- तुम्हें जीना है तो पागल हो जाना पड़ेगा। तुम्हारे पास और कोई विकल्प नहीं है।
- तुम मुझे जानने लगी हो।
- तुम्हें जानना करवट बदलने जितना आसान है। तुम्हें सोते हुए भी जाना जा सकता है।
- फिर भी हम नहीं सोते...!
- क्योंकि हमारा जागते रहना लिखा है...
- और शाहरुख? उसका क्या लिखा है?
- जो मेघा का लिखा है।
- चरित्रहीन होना?
- झूठ...
- हाँ, झूठ।
| [+/-] |
सपनों का मर जाना सामाजिक हर्ष का विषय है |
सपनों का मर जाना
खिड़कियों से नहीं झाँकता
कि उसे झिड़ककर भेजा जा सके भीतर
या लगाए जा सकें परदे,
सपनों का मर जाना
बाहर नेमप्लेट पर नाम के नीचे
एमए एलएलबी की तरह
नंगा खुदा रहता है।
मरे हुए सपनों वाले आदमी
रात भर व्हिस्की पीकर भी
नाक की सीध में चल सकते हैं
कई किलोमीटर तक सीधे,
मरे हुए सपनों वाली औरतें
बच्चा जनने के दर्द में भी
नहीं बकती ओछी गालियाँ।
मरे हुए सपनों वाले शहर में होते हैं
बहुत से स्कूल, मन्दिर, अस्पताल और शराब के ठेके।
मरे हुए सपनों वाली कुँवारी लड़कियाँ
नहीं भागती आवारा लड़कों के साथ,
मरे हुए सपनों वाली ब्याहताएँ
अपनी पंखुड़ियों की खुशबू
तिजोरी में संभालकर रखती हैं
सिर्फ़ अपने पतियों के लिए।
मरे हुए सपनों वाले बच्चे
अच्चे बच्चे होते हैं,
मरे हुए सपनों वाले ग्रेजुएट
बनते हैं अच्छे क्लर्क, अच्छे नागरिक।
सपनों का मर जाना
सामाजिक हर्ष का विषय है।
इस दिन को
सदियों से मनाती आई हैं माँएं
संतानों के समझदार हो जाने के दिन के रूप में।