सपनों का मर जाना सामाजिक हर्ष का विषय है

सपनों का मर जाना
खिड़कियों से नहीं झाँकता
कि उसे झिड़ककर भेजा जा सके भीतर
या लगाए जा सकें परदे,
सपनों का मर जाना
बाहर नेमप्लेट पर नाम के नीचे
एमए एलएलबी की तरह
नंगा खुदा रहता है।

मरे हुए सपनों वाले आदमी
रात भर व्हिस्की पीकर भी
नाक की सीध में चल सकते हैं
कई किलोमीटर तक सीधे,
मरे हुए सपनों वाली औरतें
बच्चा जनने के दर्द में भी
नहीं बकती ओछी गालियाँ।
मरे हुए सपनों वाले शहर में होते हैं
बहुत से स्कूल, मन्दिर, अस्पताल और शराब के ठेके।

मरे हुए सपनों वाली कुँवारी लड़कियाँ
नहीं भागती आवारा लड़कों के साथ,
मरे हुए सपनों वाली ब्याहताएँ
अपनी पंखुड़ियों की खुशबू
तिजोरी में संभालकर रखती हैं
सिर्फ़ अपने पतियों के लिए।
मरे हुए सपनों वाले बच्चे
अच्चे बच्चे होते हैं,
मरे हुए सपनों वाले ग्रेजुएट
बनते हैं अच्छे क्लर्क, अच्छे नागरिक।

सपनों का मर जाना
सामाजिक हर्ष का विषय है।
इस दिन को
सदियों से मनाती आई हैं माँएं
संतानों के समझदार हो जाने के दिन के रूप में।



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15 पाठकों का कहना है :

bhawna....anu said...

सपनों का मर जाना
सामाजिक हर्ष का विषय है।
इस दिन को
सदियों से मनाती आई हैं माँएं
संतानों के समझदार हो जाने के दिन के रूप में।
kya keh rahe ho.....sapno ke marne ka dard maao ko bhi hota hai....ektarfa socha tumne.....

महेन said...

सपनों का मरना या सपनों का सांचे में ढलना? हम जिस समाज में जीते हैं वह हमें ठोंक-पीटकर हमें एक प्रतिमूर्ति बना देना चाहता है।

पाश का कहा याद आ रहा है:
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

गौरव सोलंकी said...

महेन जी,
लिखते हुए मेरे भीतर भी पाश की आवाज़ गूँजती रही थी..

Rakesh Kaushik said...

main bas yahi kehna chahunga ki poora lekh kafi bhavnatmak hai.
vishay par poori trah kendarit rehte hue bhut achcha lika hai.

Rakesh Kaushik

Cyril Gupta said...

दो छंटाक डिप्रेशन मेरी तरफ से भी.

सपनों का मर जाना ही ज़िंदगी कि शुरुआत है
क्योंकि जब तक सपने जीते हैं तब तक सिर्फ उनका ही वजूद है
जब सपने मर जाते हैं, तो फिर हम सचमुच घर जाते हैं
फिर हम पहचान लेते हैं बाबूजी की थकान को, बहन की ऊब को, और मां की मजबूरी को
सपने एक गहरे रंग की चादर की तरह हैं
वो ढांप लेते हैं हर उस सच को जिससे हमें होना है दो-चार
जब सपने मर जाते हैं तो संसार नंगा हो जाता है
और इस नंगई में ही हम अपने जीवन का कोना तलाश लेते हैं
और बैठ जाते हैं, सिमटकर, थककर, क्योंकि अब हमें वहीं रहना है

जितेन्द़ भगत said...

nice poem

poemsnpuja said...

सपनों का मर जाना सिर्फ़ समाज मनाता है क्योंकि इसे एक और इकाई मिल जाती है, जो इसके वर्षों पुराने रूढियों की मदद से फ़िर किसी के सपनो का दम घोंटने चल देती है. माएं जानती हैं बच्चो के सपनो को उनके मरने से खुश नहीं होती...पर चूँकि माँ ने बहुत कुछ देखा हुआ होता है वह जानती है कि घर पे सब जियें इसलिए जरूरी है सपनो का मर जाना.

विश्व दीपक ’तन्हा’ said...

bahut dinon ke baad tumhaari kavita ka har ek shabd mujhe samajh aaya hai.

ya to main seekh raha hoon ya tum :)

- VD

Himanshu Saini said...

dost,I think i am right
sapne kabhi mara nhi kerte mer jati hai insan ki soch
sapne bo nhi hate jo ham sote samy dekh te hai sapne bo hote jo hame sone nhi dete.....

bharat bhushan said...

complete poetry of paash in hindi is available at my blog http://paash.wordpress.com

Anonymous said...

...please where can I buy a unicorn?

Anonymous said...

hi all
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राकेश कौशिक said...

सोचने और समझने के लिए बहुत है इस रचना में विशेषकर इन पंक्तियों में
"सपनों का मर जाना
सामाजिक हर्ष का विषय है।
इस दिन को
सदियों से मनाती आई हैं माँएं
संतानों के समझदार हो जाने के दिन के रूप में"

Anonymous said...

Il semble que vous soyez un expert dans ce domaine, vos remarques sont tres interessantes, merci.

- Daniel

navneet kr singh said...

sapno ka marna meri maut hai