मैं जब भी फ़िल्मों की बात करता था तो वे सब शाहरुख को ही ले आते थे।

वे सब कहते थे कि वह शहर सपनों को खा जाता है। मैं चाहता था कि वह शहर मुझे भी खा जाए, जिससे मै उसके पेट में लाखों करोड़ों सपनों के साथ जीता रहूं या मरता रहूं। वे सब कहते थे कि वह शहर बहुत चालाक है और चरित्रहीन भी और ‘वे सब’ के पुरुष रात को सोते थे तो अपनी पत्नियों के वक्षों में चेहरे छिपाकर, आँखें मींचकर उस शहर की लड़कियों के स्वामी होने की कल्पना करते थे। ‘वे सब’ की स्त्रियाँ, पुरुषों के काम पर चले जाने के बाद अपना अकेलापन भगाने के लिए उस शहर के लड़कों के रंगीन चित्रों वाली किताबों के पन्ने पलटती रहती थीं।
वे सब चरित्रवान थे और मैं सच में अपना चरित्र किसी नदी में बहा आना चाहता था।
- तुम इन बातों से कुछ और कहना चाहते हो ना?
- तुम्हें कैसे पता चला?
- देखा, मैं समझ गई। अब जानने लगी हूं तुम्हें।
- नहीं, वह कहने का पुराना तरीका है कि प्रतीकों के माध्यम से कहा जाए।
- तो नया तरीका क्या है?
- कि आँखों में आँखें डालकर वही कहा जाए, जो कहना है।
- तो सब कविताएँ बेकार की हैं?
- शायद हाँ...
- शायद तुम्हारा फ़ेवरेट शब्द है?
- नहीं, मेरा फ़ेवरेट शब्द माँ है....या शायद सपना।
- माँ का फ़ेवरेट शब्द क्या है?
- नहीं।
- यह किसी का फ़ेवरेट कैसे हो सकता है?
- शाहरुख ख़ान किसी का फ़ेवरेट कैसे हो सकता है?
- शाहरुख बीच में कहाँ से आ गया?
- मैं जब भी फ़िल्मों की बात करता था तो वे सब शाहरुख को ही ले आते थे।
- मैं जब भी पी एच डी करने की बात करती थी तो वे सब मेघा को ले आते थे।
- मेघा कौन है?
- उसने अपने बुड्ढ़े गाइड से शादी कर ली थी।
- वे सब रास्ते में आकर इस तरह खड़े हो जाते हैं जैसे बस का इंतज़ार कर रहे हों या शाम के खाने के बाद टहलने निकले हों या फ़ोन पर बात करने के बहाने दोस्तों से दूर निकल कर आ खड़े हुए हों। लेकिन वे सब मेरा रास्ता रोकने के लिए खड़े होते हैं।
- उनके हाथों में क्या होता है?
- काश उनके हाथों में तलवारें होतीं। तब उनसे लड़ा तो जा सकता था।
- तुम परेशान हो?
- हाँ, इतना कि रोना चाहता हूँ तो रोया नहीं जाता।
- तुम्हारे पास कुछ वक़्त है?
- नहीं, जब तुमने पूछा, तब था....जब मैं बता रहा हूं, तब नहीं है...
- कहाँ गया?
- मुझे भूख लगी थी, रोटी खरीदने गया है।
- तुम सामने हो तो भी तुम्हारी याद आ रही है...
- तुम सामने हो तो भी बार बार तुम्हें भूल जाता हूं...
- तुम्हें जीना है तो पागल हो जाना पड़ेगा। तुम्हारे पास और कोई विकल्प नहीं है।
- तुम मुझे जानने लगी हो।
- तुम्हें जानना करवट बदलने जितना आसान है। तुम्हें सोते हुए भी जाना जा सकता है।
- फिर भी हम नहीं सोते...!
- क्योंकि हमारा जागते रहना लिखा है...
- और शाहरुख? उसका क्या लिखा है?
- जो मेघा का लिखा है।
- चरित्रहीन होना?
- झूठ...
- हाँ, झूठ।



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5 पाठकों का कहना है :

Aks said...

Good Job Solanki Dear

अनुराग said...

बहुत खूब........अनूठा स्टाइल....

जितेन्द़ भगत said...

काश उनके हाथों में तलवारें होतीं। तब उनसे लड़ा तो जा सकता था।
बहुत अच्‍छी बात।

बालकिशन said...

adbhut aur kamaal ka lekhan hai.
badhai.

आलोक शंकर said...

Dont know why this reminds me of John galt.