फुसफुसाना, बोलना या चीख पड़ना बहुत ज़रूरी था

उन दिनों चुप रहना, ट्रेन में डुगडुगी बजाकर कलाबाजियाँ दिखाने वाले लंगड़े बच्चे की ‘दीदी तेरा देवर दीवाना’ की पैरोडी पर दस मिनट तक हँसने के बाद उसके कटोरा आगे कर देने पर खिड़की के और पास खिसककर ‘गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स’ चेहरे के आगे लगा लेने से भी बड़ा अपराध था। लेकिन जब जब मेरे बोलने से ज़िन्दग़ी की राहें बदल जाने वाली हों, उन सब खुशनसीब मौकों पर हरियाणा रोडवेज़ की दौड़ती बस में चक्कर खाकर गिरी माँ के पास बैठे चार साल के बच्चे की तरह मेरा हकबकाया, कँपकँपाया, रुआँसा मौन रहना ही बदा था।
मेरी माँ ने बचपन में मुझे इशारों पर चुप रहना सिखाया था। मैं माँ के साथ किसी के घर में सामने रखी डिजाइन वाली प्लेट में रखे बेकरी के बिस्कुटों पर आँखों की जुबान फिरा रहा होता और माँ की सख़्त आँखों की ओर देख लेता तो वहीं बुत बनकर बैठ जाता था और फिर मेरी जुबान न बोलने के लिए खुलती थी, न खाने के लिए। अपनी इस ट्रेनिंग और स्टाइल पर माँ कई सालों तक गर्व करती रही। थोड़ा बड़ा होने पर मैं जानने लगा कि सब माँएं इसी तरह अपने बच्चों को तीन साल की उम्र में चुप रहना सिखा देती हैं और बाद में जब बोलना आज़ाद होने जितना ज़रूरी होता है तो सबकी जुबान को काठ मार जाता है।
उन दिनों अन्दर धूप की धुकधुकी गर्मी रहती थी और बाहर धूप का धुंधला निकट दृष्टिदोष। मेरी आत्मा को स्किज़ोफ्रीनिया हो गया था। एक अजनबी सी लाचारी उस पहचाने से उन्माद पर नंगी लेटी रहती थी। कभी अपने असाधारण होने का घमंड छा जाता था और कभी अतिसाधारण होने की विवशता। एक ऐसी बेचैनी थी, जो आराम माँगती थी। एक ऐसी संतुष्टि थी, जिसमें भूख ही भूख थी।
लिखने से पलायन करती हुए अय्याशी की बू आती थी। सोचता था तो इच्छाओं के लिजलिजे साँप शरीर पर यहाँ वहाँ लोटने लगते थे। फुसफुसाना, बोलना या चीख पड़ना बहुत ज़रूरी था, लेकिन मैं उस वक़्त तक चुप रहा, जिसके बाद बोल देने का अर्थ सड़क पर से बाइक पर गुजरते हुए गर्दन घुमाकर शिवमन्दिर के सामने सिर झुका देने से ज़्यादा कुछ नहीं था।

शायद क्रमश:



आप क्या कहना चाहेंगे? (Click here if you are not on Facebook)

11 पाठकों का कहना है :

Namita said...

As usual very nice poem(?) Gaurav.

Pratyaksha said...

बढ़िया ..

शोभा said...

अच्छा लिखा है. बधाई.

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

Lekhni men nayi kiran si tajgi hai. Badhayi.

Shastri said...

काफी अच्छा मनन है. इसे कुछ और व्यवस्थित तरीके से लिखें तो पाठक और अच्छी तरह से आस्वादन कर सकेंगे!!



-- शास्त्री जे सी फिलिप

-- समय पर प्रोत्साहन मिले तो मिट्टी का घरोंदा भी आसमान छू सकता है. कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर उनको प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)

bhawna....anu said...

कभी अपने असाधारण होने का घमंड छा जाता था और कभी अतिसाधारण होने की विवशता। एक ऐसी बेचैनी थी, जो आराम माँगती थी। एक ऐसी संतुष्टि थी, जिसमें भूख ही भूख थी।
......bahut sunder. ab apne standard ka likh hai.keep it up.

Prashant said...

badhiya likha hai
last line samajh nahi aayi.
phir bhi sabadhiya vahi lagi..

विश्व दीपक ’तन्हा’ said...

लिखते रहो ऎसे हीं।

कभी-कभार कुछ समझ आ जाता है :)

vijaya said...

very nice...........keep writing...........:)

सतीश सक्सेना said...

माँ की आँखों वाला उदाहरण बहुत अच्छा लगा, अच्छी पकड़ है ! इसी आत्मविश्वास और हिम्मत के साथ लिखते रहे, तारीफ़ करने वाले अपने आप साथ आ जायेंगे ! शुभकामनाएं !

Manuj Mehta said...

Hello Gaurav
aapke yeh shabd ander tak choo gaye, aapke vichar aur use shabdon mein dhalne ke is anokhe dangh se mein prabhavit hua hoon. sach mein kitna kuch to hai humare ander, kabhi kabhi to lagta hai ki hum akele hi confuse hain, yah vicharon ke is mayajaal mein phanste jate hain, par jab baat ki jaye to kai hum jaise pagal ya yun kahoon ki guumshuda log mil jate hain. jayada to aapse nahi mil paya hoon, par koshish jaroor rahegi ki apne hi jaise gumshuda se ghanishtta ho sake.
Manuj Mehta
9868072313