उन दिनों चुप रहना, ट्रेन में डुगडुगी बजाकर कलाबाजियाँ दिखाने वाले लंगड़े बच्चे की ‘दीदी तेरा देवर दीवाना’ की पैरोडी पर दस मिनट तक हँसने के बाद उसके कटोरा आगे कर देने पर खिड़की के और पास खिसककर ‘गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स’ चेहरे के आगे लगा लेने से भी बड़ा अपराध था। लेकिन जब जब मेरे बोलने से ज़िन्दग़ी की राहें बदल जाने वाली हों, उन सब खुशनसीब मौकों पर हरियाणा रोडवेज़ की दौड़ती बस में चक्कर खाकर गिरी माँ के पास बैठे चार साल के बच्चे की तरह मेरा हकबकाया, कँपकँपाया, रुआँसा मौन रहना ही बदा था।
मेरी माँ ने बचपन में मुझे इशारों पर चुप रहना सिखाया था। मैं माँ के साथ किसी के घर में सामने रखी डिजाइन वाली प्लेट में रखे बेकरी के बिस्कुटों पर आँखों की जुबान फिरा रहा होता और माँ की सख़्त आँखों की ओर देख लेता तो वहीं बुत बनकर बैठ जाता था और फिर मेरी जुबान न बोलने के लिए खुलती थी, न खाने के लिए। अपनी इस ट्रेनिंग और स्टाइल पर माँ कई सालों तक गर्व करती रही। थोड़ा बड़ा होने पर मैं जानने लगा कि सब माँएं इसी तरह अपने बच्चों को तीन साल की उम्र में चुप रहना सिखा देती हैं और बाद में जब बोलना आज़ाद होने जितना ज़रूरी होता है तो सबकी जुबान को काठ मार जाता है।
उन दिनों अन्दर धूप की धुकधुकी गर्मी रहती थी और बाहर धूप का धुंधला निकट दृष्टिदोष। मेरी आत्मा को स्किज़ोफ्रीनिया हो गया था। एक अजनबी सी लाचारी उस पहचाने से उन्माद पर नंगी लेटी रहती थी। कभी अपने असाधारण होने का घमंड छा जाता था और कभी अतिसाधारण होने की विवशता। एक ऐसी बेचैनी थी, जो आराम माँगती थी। एक ऐसी संतुष्टि थी, जिसमें भूख ही भूख थी।
लिखने से पलायन करती हुए अय्याशी की बू आती थी। सोचता था तो इच्छाओं के लिजलिजे साँप शरीर पर यहाँ वहाँ लोटने लगते थे। फुसफुसाना, बोलना या चीख पड़ना बहुत ज़रूरी था, लेकिन मैं उस वक़्त तक चुप रहा, जिसके बाद बोल देने का अर्थ सड़क पर से बाइक पर गुजरते हुए गर्दन घुमाकर शिवमन्दिर के सामने सिर झुका देने से ज़्यादा कुछ नहीं था।
शायद क्रमश:
| [+/-] |
फुसफुसाना, बोलना या चीख पड़ना बहुत ज़रूरी था |
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मैं जब भी फ़िल्मों की बात करता था तो वे सब शाहरुख को ही ले आते थे। |
वे सब कहते थे कि वह शहर सपनों को खा जाता है। मैं चाहता था कि वह शहर मुझे भी खा जाए, जिससे मै उसके पेट में लाखों करोड़ों सपनों के साथ जीता रहूं या मरता रहूं। वे सब कहते थे कि वह शहर बहुत चालाक है और चरित्रहीन भी और ‘वे सब’ के पुरुष रात को सोते थे तो अपनी पत्नियों के वक्षों में चेहरे छिपाकर, आँखें मींचकर उस शहर की लड़कियों के स्वामी होने की कल्पना करते थे। ‘वे सब’ की स्त्रियाँ, पुरुषों के काम पर चले जाने के बाद अपना अकेलापन भगाने के लिए उस शहर के लड़कों के रंगीन चित्रों वाली किताबों के पन्ने पलटती रहती थीं।
वे सब चरित्रवान थे और मैं सच में अपना चरित्र किसी नदी में बहा आना चाहता था।
- तुम इन बातों से कुछ और कहना चाहते हो ना?
- तुम्हें कैसे पता चला?
- देखा, मैं समझ गई। अब जानने लगी हूं तुम्हें।
- नहीं, वह कहने का पुराना तरीका है कि प्रतीकों के माध्यम से कहा जाए।
- तो नया तरीका क्या है?
- कि आँखों में आँखें डालकर वही कहा जाए, जो कहना है।
- तो सब कविताएँ बेकार की हैं?
- शायद हाँ...
- शायद तुम्हारा फ़ेवरेट शब्द है?
- नहीं, मेरा फ़ेवरेट शब्द माँ है....या शायद सपना।
- माँ का फ़ेवरेट शब्द क्या है?
- नहीं।
- यह किसी का फ़ेवरेट कैसे हो सकता है?
- शाहरुख ख़ान किसी का फ़ेवरेट कैसे हो सकता है?
- शाहरुख बीच में कहाँ से आ गया?
- मैं जब भी फ़िल्मों की बात करता था तो वे सब शाहरुख को ही ले आते थे।
- मैं जब भी पी एच डी करने की बात करती थी तो वे सब मेघा को ले आते थे।
- मेघा कौन है?
- उसने अपने बुड्ढ़े गाइड से शादी कर ली थी।
- वे सब रास्ते में आकर इस तरह खड़े हो जाते हैं जैसे बस का इंतज़ार कर रहे हों या शाम के खाने के बाद टहलने निकले हों या फ़ोन पर बात करने के बहाने दोस्तों से दूर निकल कर आ खड़े हुए हों। लेकिन वे सब मेरा रास्ता रोकने के लिए खड़े होते हैं।
- उनके हाथों में क्या होता है?
- काश उनके हाथों में तलवारें होतीं। तब उनसे लड़ा तो जा सकता था।
- तुम परेशान हो?
- हाँ, इतना कि रोना चाहता हूँ तो रोया नहीं जाता।
- तुम्हारे पास कुछ वक़्त है?
- नहीं, जब तुमने पूछा, तब था....जब मैं बता रहा हूं, तब नहीं है...
- कहाँ गया?
- मुझे भूख लगी थी, रोटी खरीदने गया है।
- तुम सामने हो तो भी तुम्हारी याद आ रही है...
- तुम सामने हो तो भी बार बार तुम्हें भूल जाता हूं...
- तुम्हें जीना है तो पागल हो जाना पड़ेगा। तुम्हारे पास और कोई विकल्प नहीं है।
- तुम मुझे जानने लगी हो।
- तुम्हें जानना करवट बदलने जितना आसान है। तुम्हें सोते हुए भी जाना जा सकता है।
- फिर भी हम नहीं सोते...!
- क्योंकि हमारा जागते रहना लिखा है...
- और शाहरुख? उसका क्या लिखा है?
- जो मेघा का लिखा है।
- चरित्रहीन होना?
- झूठ...
- हाँ, झूठ।
| [+/-] |
सपनों का मर जाना सामाजिक हर्ष का विषय है |
सपनों का मर जाना
खिड़कियों से नहीं झाँकता
कि उसे झिड़ककर भेजा जा सके भीतर
या लगाए जा सकें परदे,
सपनों का मर जाना
बाहर नेमप्लेट पर नाम के नीचे
एमए एलएलबी की तरह
नंगा खुदा रहता है।
मरे हुए सपनों वाले आदमी
रात भर व्हिस्की पीकर भी
नाक की सीध में चल सकते हैं
कई किलोमीटर तक सीधे,
मरे हुए सपनों वाली औरतें
बच्चा जनने के दर्द में भी
नहीं बकती ओछी गालियाँ।
मरे हुए सपनों वाले शहर में होते हैं
बहुत से स्कूल, मन्दिर, अस्पताल और शराब के ठेके।
मरे हुए सपनों वाली कुँवारी लड़कियाँ
नहीं भागती आवारा लड़कों के साथ,
मरे हुए सपनों वाली ब्याहताएँ
अपनी पंखुड़ियों की खुशबू
तिजोरी में संभालकर रखती हैं
सिर्फ़ अपने पतियों के लिए।
मरे हुए सपनों वाले बच्चे
अच्चे बच्चे होते हैं,
मरे हुए सपनों वाले ग्रेजुएट
बनते हैं अच्छे क्लर्क, अच्छे नागरिक।
सपनों का मर जाना
सामाजिक हर्ष का विषय है।
इस दिन को
सदियों से मनाती आई हैं माँएं
संतानों के समझदार हो जाने के दिन के रूप में।
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उसका बहुत मन करता था कि वह आँखों में तितली या गुब्बारा या माउथ ऑरगन लगाकर सोए। |
डर लगाकर सोने के सपनों में उसकी आवाज़ कुछ ज़्यादा मीठी हो जाती थी और रीढ़ हल्की सी मुड़ जाती थी। बीमार होकर वह जल्दी मर न जाए, इस डर से वह सुबह जल्दी उठने के सपनों में प्राणायाम करता था। दुनिया में कुछ बड़ा हो और कहीं उसे पता ही न चले, इस डर से शाम को साढ़े आठ बजे के सपने में टी वी पर समाचार देखता था। उसकी पत्नी उसे छोड़कर न चली जाए, इस डर से रात सवा दस बजे के सपने में उसे नियम से उसी तरह प्यार करता था, जिस तरह उसकी पत्नी को पसंद था। डर लगाकर सोने के सपनों में बीमे की किश्त और बैंक के खातों के नम्बर भी घूमते रहते थे।
उसका बहुत मन करता था कि वह आँखों में तितली या गुब्बारा या माउथ ऑरगन लगाकर सोए। एक दिन एक तितली उसकी बन्द आँखों में आकर सो गई थी तो उसे बहुत मीठी नींद आई थी, जिसमें बारिश से पहले के सात इन्द्रधनुष थे। लेकिन जब चार बजे का अलार्म सुनकर वह उठा और आँखें खोलकर उसने अपनी पत्नी से चाय बनाने के लिए कहा तो तितली नाराज़ होकर भागती हुई उड़ गई। उस दिन से वह अख़बार के बच्चों वाले पन्ने से तितलियों की तस्वीरें काटकर अपनी सफेद शर्ट की जेब में इकट्ठी करने लगा, लेकिन एक दिन उसकी पत्नी ने घर में रद्दी बढ़ जाने के बाद जगह कम पड़ जाने के डर से उन तितलियों को बेच दिया। उसके बाद रात के सवा दस बजे पत्नी ने उसे उस तरह प्यार किया, जैसे उसे पसन्द था और उसे समझाया कि तितलियाँ बढ़ती जातीं तो एक दिन घर में सिलाई मशीन, आटे के कनस्तर, साइकिल और पलंगों को रखने की जगह नहीं बचती। उसकी पत्नी ने उसे कहा कि उसे तितलियों से डरना चाहिए और गुब्बारों से भी, क्योंकि उनमें पागल कर देने वाला नशा होता है जिसमें आदमी को करणीय-अकरणीय और नैतिक-अनैतिक का भेद भी याद नहीं रहता। उसके बाद उसकी पत्नी ने उसकी छाती के बालों को सहलाते हुए उसके कंधे को चूमा था और वह आँखों में डर लगाकर सो गया था। उसने जो चादर ओढ़ रखी थी, सोने के दौरान उसमें एक भी सलवट नहीं बढ़ी थी।
| [+/-] |
मुझे चाँदी के दिन चाहिए... |
- कहाँ हो?
- कहीं नहीं।
- कहीं तो होगे ही...बताओ ना!
- चाँदी के दिन में।
- चाँदी के दिन कैसे होते हैं?
- उनकी बहनों का नाम रात नहीं होता।
- उनकी सुबहें सुबह ही रुक जाती हैं क्या, जब हॉकर अख़बार की एजेंसी से गिनकर अपने हिस्से के डेढ़ सौ अख़बार उठा रहा होता है या दूधवाला गाँव से दूध लेकर लौटते हुए पेड़ के सहारे अपनी बिना स्टैंड वाली मोटरसाइकिल खड़ी करके नहर के किनारे पानी मिला रहा होता है? उनमें स्कूल नहीं होते क्या, जिनमें बच्चों में प्रार्थना की घंटी बजाने के लिए लड़ाई हो और फिर प्रार्थना के बाद जन गण मन भी गाना पड़े? दफ़्तर नहीं होते? पोस्ट ऑफ़िस भी नहीं? काम नहीं होता? लंचब्रेक भी नहीं? खाली पीरियड में बच्चे अंताक्षरी भी नहीं खेल पाते?......जल्दी बोलो...मुझसे सब्र नहीं होता.....और इतवार की छुट्टी? रंगोली दिनभर आती रहती है क्या? हेमामालिनी बोलते बोलते थक जाती होगी......नहीं? फिर संगीता बिजलानी को बुलाते होंगे ना....और फिर एक बार बोलने के बाद एक साथ तीन तीन गाने दिखाने लगते होंगे। है ना? और शाम का बचा हुआ हलवा कभी खराब भी नहीं होता होगा। लेकिन जिस इतवार को बाल कटवाने होते होंगे, तब कैसे काम चलता होगा? इतनी सुबह तो दुकानें नहीं खुलती ना? और गंगापुर वाली मौसी तो इतवार की सुबह दस बजे फ़ोन करती है। वह तो फ़ोन के पास दस बजने के इंतज़ार में दिनभर क्रोशिया लेकर बैठी रहती होगी?.....बताओ ना...ऐसे ही होते हैं क्या चाँदी के दिन?
- हाँ, ऐसे ही होते हैं। वे दिन भर सुबह रहकर सुबह की मीठी नींद सोते हैं।
- और मौसी? और अंताक्षरी? और रंगोली?
- तुम्हें सामने वह लाल रोशनी दिख रही है?
- लेकिन मौसी....अंताक्षरी....?
- क्या होगी वह रोशनी?
- ट्रेन तो नहीं।
- क्यों?
- बुद्धू, ट्रेन की लाइट लाल थोड़े ही होती है। लाल होती तो अपनी लाइट देखकर हर जगह रुककर ना खड़ी हो जाती?
- और बरगद का पेड़ भी नहीं।
- क्यों?
- पागल, कभी बरगद के पेड़ पर बल्ब उगा देखा है?
- हो सकता है कि कोई पूजा करने आया हो और उसने लगा दिया हो।
- लेकिन बरगद के पेड़ पर बिजली कहाँ से आई होगी?
- खंभे पर से डोरी डाल दी होगी किसी ने।
- छापा पड़ेगा तो पेड़ जुर्माना कैसे भरेगा? जेल कैसे जाएगा?
- जो लोग पानी चढ़ाते होंगे, वे मिलकर पैसे इकट्ठे करेंगे और मिलकर जेल जाएँगे।
- और उसके बाद पेड़ पर मीटर लग जाएगा क्या?
- नहीं, डोरी हटा दी जाएगी।
- और लाल रोशनी?
- फिर हम कहेंगे कि वे बहुत सारे गुलाब हैं, जो रात की रानी से प्यार करते हैं और इसलिए चमक रहे हैं।
- लेकिन रात को प्यार नहीं करते।
- क्यों?
- गन्दा होता है।
- चाँदी के दिन में रहने वाले तो सुबह सुबह अधसोया सा प्यार कर सकते हैं, लेकिन बाकी लोगों को तो रात में ही प्यार करना पड़ता है।
- तुम्हें चाँदी के दिन चाहिए?
- मुझे चाँदी के दिन चाहिए...हज़ार दिन। नहीं, दो हज़ार।
- मुझे भी...
- लेकिन तुम्हारे पास तो हैं।
- किसी के पास नहीं हैं। उन्हें कोई राजा चुराकर ले गया है....या कोई जादूगर...या कोई तांत्रिक....या कोई लड़की....या कोई सपना।
- अब क्या होगा?
- होना क्या है, हम उन्हीं दिनों में रहेंगे, जिनकी बहनें रात हैं और जल्दी सुबह वाले सपने देखेंगे और फिर दफ़्तर जाते हुए उनके सच होने की राह तकेंगे।
- और उनमें न रह पाए तो? या राह देखते देखते थक गए तो? या दफ़्तर में आग लग गई तो?
- वह बरगद नहीं है।
- फिर क्या है?
- किसी की आँखें हैं, जो रात भर जगने से लाल हो गई हैं...
- या किसी का घाव है जिसमें से लगातार खून रिस रहा है...
- या किसी का कलेजा है जो हफ़्तों तक भूखा रहने से सूज गया है...
- या कोई ठिठुरता हुआ बच्चा है, जो सर्दी की रात में घर के बाहर छूट गया है और पूरा घर सो गया है...
- या उम्मीद है जो बुराइयों के बक्से से छूटकर अकेली भाग आई है...
- या मुस्कुराती हुई लड़की के गाल हैं, जो शर्मा गई है...
- या कुछ भी नहीं है...
- या सब कुछ है....
- हाँ शायद...
- हाँ..पक्का..
- हाँ।
| [+/-] |
मैं जिनके लिए नहीं लिखता, वे मुझ पर अपना वक़्त बर्बाद न करें |
यह सब लिखने में वक़्त क्यों गँवाना पड़ा, यह जानने के लिए इन दो लिंक को देख लीजिए।
http://merasaman.blogspot.com/2008/07/blog-post_22.html
http://bal-kishan.blogspot.com/2008/07/blog-post_22.html
शायद जयशंकर प्रसाद ने ही एक बार कहा था कि मैं रिक्शे वालों के लिए नहीं लिखता। मैं न ही जयशंकर प्रसाद हूं, न ही बन सकता हूं और न ही बनना चाहता हूं। लेकिन गौरव सोलंकी नामक साधारण व्यक्ति होते हुए भी मुझे पूरा अधिकार है कि मैं कठोरता से कहूं कि मैं किसके लिए लिखता हूं और किसके लिए नहीं और सबसे पहले, मैं कम से कम उन बालकिशनों या बालमुकुन्दों के लिए नहीं लिखता जिनके लिए कविता चाय में डुबोकर या बिना डुबोए खाई जा सकने वाली डबलरोटी से ज्यादा कुछ नहीं है। मैं किसी को अपना लिखा पढ़ने का न्यौता नहीं दे रहा और मैं भी किसी को जाकर पढ़ता हूं तो बिना न्यौते के जाता हूं। पसन्द आता है तो बार बार बिना बुलाए जाता हूं और पसन्द नहीं आता तो भी दर्ज़नों लोगों के ब्लॉग पर जाकर नहीं लिखता कि कविता या साहित्य के नाम पर लगातार बकवास क्यों लिख रहे हो? और न ही उन तीस बुद्धिजीवी प्रशंसक टिप्पणीकारों से कहता हूं कि तारीफ़ करके बदले में कमेंट पा लेने से क्या हो जाएगा?
जो लोग ऐसा लिख रहे हैं और झूठी वाहवाही पाकर अपनी पत्नी, बच्चों या रिश्तेदारों को अपनी रचनाओं पर आई टिप्पणियों की संख्या दिखाकर खुश हो रहे हैं, मैं नहीं जानता कि उनके जीवन अथवा लेखन का उद्देश्य क्या है। लेकिन मुझे अपने लेखन और जीवन, दोनों के उद्देश्य बहुत अच्छे से मालूम हैं और मैं नहीं चाहता कि डबलरोटी वाले लोग उन्हें छूकर भी गुजरें।
बालकिशन, आपको मेरा लिखा समझ में नहीं आता तो आपकी गलती नहीं है। मैं बता सकता हूं कि आपको और क्या क्या नहीं समझ आएगा। आपको सलमान रश्दी या विनोद कुमार शुक्ल का लिखा समझ नहीं आएगा, आपको सत्यजीत रे की फ़िल्में समझ में नहीं आएंगी, आपको मक़बूल फ़िदा हुसैन के चित्र समझ में नहीं आएंगे, अनुराग कश्यप की ‘नो स्मोकिंग’ या इस साल का ऑस्कर जीतने वाली ‘नो कंट्री फॉर ऑल्ड मैन’ भी आपको समझ नहीं आएगी। लेकिन आपको समझ में न आने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि वे लोग भी आपके लिए नहीं बना रहे हैं। उन्हें देखने पढ़ने समझने वाले अलग लोग हैं, जो लाफ़्टर चैलेंज के चुटकुले नहीं सुनते सुनाते।
मुझे भी दुनिया की लाखों करोड़ों चीजें समझ नहीं आती। हर व्यक्ति की अपनी अलग सीमाएँ होती हैं, इसलिए आपकी भी हैं। बेहतर होता है कि बिना किसी के कहे और बिना किसी के सामने फ़जीहत करवाए समय रहते उन सीमाओं को पहचान लिया जाए और उन्हें पार करने की कोशिश न की जाए।
मैं जो भी, जैसा भी लिखता हूं, ब्लॉग उन चीजों के लिए बहुत अच्छी जगह नहीं है और यदि मैं माँग और उत्पादन के सिद्धांत को मानूं तो मुझे ब्लॉग लिखना बन्द कर देना चाहिए। लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं, जिनके लिए और सबसे ज्यादा अपने लिए लिख रहा हूं। मैं समाजसेवी नहीं हूं कि औरों के लिए लिख पाऊं। अगर किसी को भी मेरा लिखा समझ नहीं आता तो मुझ पर अपना कीमती वक़्त बर्बाद न करे। यदि आपके लिए साहित्य उस डबलरोटी से हल्का सा भी ज्यादा कुछ है तो ऊपर लिखा कुछ भी आपके लिए नहीं है। आप मुझे पढ़िए और भला बुरा जैसा भी लगे, बताइए।
Peace
| [+/-] |
और जीते रहना इतना आसान है कि |
जीते रहना इतना आसान था
कि जब हमारी माँओं ने
हमारी डायरियाँ कबाड़ में डालते हुए
छातीपीट पश्चाताप से कहा
कि पैदा होते ही क्यों नहीं घोट दिया तुम्हारा गला
तो हम अपनी बाग बाग गलियों के किनारे पर
दिनभर बेशर्मी से खड़े रहने वाले
फक्कड़ दोस्तों को बक आए माँ-बहन की गालियाँ
और वे मुस्कुराकर डाले रहे गलबहियाँ,
आशीर्वाद देते रहे
कि जीते रहो।
जीते रहना इतना आसान था
कि हर इतवार को देखी हमने
बेदिमागी फ़ीलगुड फ़िल्में,
उससे पहले देखी
उनके मुँह पर हाथ रखकर जबरदस्ती कुचल देने की सीमा तक उत्तेजित करने वाली
ढेर सारी लड़कियाँ,
(उनका शुक्रिया। वे जिएँ सौ बरस सुरक्षित, खुश, स्वच्छंद।)
उससे पहले मारी सड़क के एक निर्दोष पत्थर को ठोकर,
उससे पहले चिढ़ गए पूरा चाँद देखकर,
बीच में कहीं रुक रुककर रोते रहे
बेवज़ह।
हम सब रोते हैं।
जीते हैं हमारे माँ पिता
लेकिन क्यों अनाथों जैसी हैं हमारी दहाड़ें?
हमें मरना है
लेकिन फिर से एक जन्म की संभावना सोचकर
ठहर जाते हैं हमारे कदम।
हम सब रोते हैं जोर जोर से
कि कहीं
तुम डर न जाओ सन्नाटे में।
शहर में अँधेरा है,
इतना कि चावल बीनते हुए
रोशनी के लिए
रह रहकर जला देती हो तुम मेरी आँखें।
अपनी नाप के जूतों से सिर ढककर
सो गए हैं सब
और जिन्हें बनानी हैं
या खरीदनी हैं टोपियाँ,
उन्हें पागल होना पड़ा है।
जिनको जाना था शिकार पर,
वे पढ़ रहे हैं शिकार की किताबें।
आईने में ऐब है
कि आत्मविश्वास खोकर शिकारी बनाते हैं
दफ्तरों में बहीखाते।
बीच बरसात में कोई गाता है राग मल्हार,
बच्चे बजाते हैं ताली,
बुढ़ियाएँ नाक भौं सिकोड़ती हैं,
बहुएँ चढ़ा देती हैं दाल की पतीली तुरत फुरत,
भीगती हैं मनियारी वाले की बैंगनी चूड़ियाँ,
फिसल जाता है गली के मोड़ पर एक स्कूटर,
देखने के लिए सब बाहर
तुम अकेली घर के अन्दर,
उठाती हो फ़ोन
और रख देती हो,
फिर आसमान को देखती हो,
फिर काटने लगती हो छौंक के लिए प्याज,
सलाद के लिए खीरे
और जीते रहना इतना आसान है कि
उस न की जा सकने वाली फ़ोन कॉल को भुलाकर
प्रायश्चित में रात का खाना खाए बिना
और एक भी क्षण सोए बिना
सुबह भीगे हुए बाल तौलिए में लपेटकर
खिले हुए गुलाब की सी ताज़गी से
बनाई जा सकती है
दो लोगों की चाय।
| [+/-] |
तुम यूं लिखना कि सुन्दर लगे, अश्लील न लगे |
- तुम यूं लिखना कि सुन्दर लगे, अश्लील न लगे।
- अश्लील भी तो सुन्दर हो सकता है।
- हाँ, लेकिन स्वीकार्य नहीं।
- मैं कहाँ स्वीकार्य बनाना चाहता हूं?
- तो क्या बनाना चाहते हो तुम?
- नदी के बीचों बीच ज़मीन...
- यानी?
- यानी पसीने से सनी आस्तीन और उसमें बैठे साँप के खाने भर लायक मोतीचूर...
- तो नदी फिर नदी नहीं रह जाएगी, द्वीप बन जाएगी ना?
- पेट भर जाएगा तो साँप भी कहाँ साँप रह जाएगा?
- और आस्तीन?
- उसमें मेहनत है, इसलिए मैली है।
- द्वीप पर तो जहाज ठहरा करेंगे, कप्तान उतरकर अमरूद तोड़ेगा, लोग फुटबॉल खेला करेंगे और नदी रोया करेगी।
- नदी में नाव चलती है, जहाज नहीं।
- नदी में द्वीप होते हैं?
- हाँ।
- नदी को जो कह दो, उसे होना पड़ता है......द्वीप भी।
- नदी बाढ़ ले आए तो सब कुछ डुबो भी सकती है।
- नदी की आँखें बार-बार सूख जाती हैं।
- मैं तुमसे प्यार करता हूं।
- झूठ...
- सच, तुम्हारी कसम।
- सब सफेद झूठ।
- आस्तीन रोती है।
- और साँप?
- उसे रोना नहीं आता।
- तुम्हें आता है?
- टिटहरी बोल रही है।
- क्या? मुझे तो नहीं सुनता, जबकि मेरे इतना पास है कि बता नहीं सकती।
- तुमने कानों में चूड़ी भर ली है...और बिन्दी भी।
- तुम इतने बेशर्म हो गए हो कि भोले लगने लगे हो।
- मुझे तुम्हारा नाम याद है और फिर भी तुम्हें पुकारता हूं तो कुछ और कहता हूं।
- क्या?
- टिटहरी।
- तो कहते रहो। मैं बुरा नहीं मानूंगी।
- सब बुरा मानते हैं।
- सब बुरे हैं।
- तुम्हारी पलकें मुँदने लगी हैं।
- अख़बार में छपा है क्या?
- अख़बार में तो झूठ छपता है।
- तुम्हारी आस्तीन कहाँ गई?
- अपने कमरे में जाकर सो गई।
- और साँप?
- अब मैं नया अख़बार छापा करूंगा।
- तुम यूं लिखना कि सुन्दर लगे, अश्लील न लगे।
- अश्लील भी तो सुन्दर हो सकता है।
- हाँ, लेकिन स्वीकार्य नहीं......
| [+/-] |
रातें उन दिनों की चालाक प्रेमिकाएं थीं। वे रतियाए हुए खूबसूरत दिन थे... |
वे नारंगी सपनों और लाल सुर्ख़ नारंगियों के दिन थे। वे जवान लड़कों और मदहोश कर देने वाली लड़कियों के दिन थे। वे लम्बी गाड़ियों, ऊँची इमारतों और गाँधी की तस्वीर वाले कड़कड़ाते नोटों के दिन थे। वे अख़बारी वर्ग-पहेलियों और शॉपिंग करती सहेलियों के दिन थे। वे ‘राम जाता है’, ‘सीता गाती है’, ‘मोहन नहीं जाता’, ‘मोहन नहीं जाता’ के जुनूनी पढ़ाकू दिन थे। वे हफ़्ते भर सप्ताहांतों के दिन थे। वे उत्सवों के दिन थे, रतजगों के दिन थे, जश्न के दिन थे। वे कसरती बदन वाले जवान लड़कों और उंगलियों में धुएँ के छल्ले पहने हुई नशीली नर्म लड़कियों के दिन थे।
वे डाबर हनी के दिन थे लेकिन जाने कैसे कस्बाई बरामदों में शहद के छत्ते अनवरत बढ़ते ही जाते थे और गाँवों में कंटीले कीकर के पत्ते भी...
रातें उन दिनों की चालाक प्रेमिकाएं थीं। वे रतियाए हुए खूबसूरत दिन थे, लेकिन न जाने क्यों हमने अपने फेफड़ों में दहकते हुए ज्वालामुखी भर लिए थे कि हमारी साँसें पिघले सीसे की तरह गर्म थी, कि हमारी आँखों से लावा बरसता था, कि हमारे हाव-भाव दोस्ताना होते हुए भी भयभीत कर देने की सीमा तक आक्रामक थे, कि हम आवाज में रस घोलकर रूमानी होना चाहते थे तो भी हम शर्म से सिर नीचा कर देने वाली गालियाँ बकते थे।
मैं उसके मोबाइल पर फ़ोन करता हूं। पहली बार में फ़ोन नहीं उठाया जाता। मुझे मजबूर किया जाता है कि मैं देर तक उसकी हैलो ट्यून का ‘ये दूरियाँ अब हैं कहाँ? ये फ़ासले ना दरमियाँ’ सुनता रहूं। दूसरी बार में उसका पति फ़ोन उठाता है और मैं काट देता हूं। मैं दिन के साथ बीतता हुआ दोपहर होता हूं और फिर फ़ोन करता हूं। इस बार गाना बदल गया है। उसे बदलने के लिए एक एस एम एस करना पड़ा है, जिसके पन्द्रह रुपए लगे हैं। उसका पति महीने के पन्द्रह हज़ार कमाता है और वह उसके ऑफिस जाने से पहले गिनकर पन्द्रह बार मुस्कुराती है। उसकी अँगूठी की उंगली से खेलता हुआ पति फिर फ़ोन उठाता है और मैं काट देता हूं।
.... मैं उसके नोकिया 6600 - एयरटेल मोबाइल पर अपने नोकिया 1100 – बी एस एन एल से पन्द्रह बार फ़ोन करता हूं और उसका पति ही फ़ोन उठाता है....
मैं दीदी को फ़ोन करता हूं तो जीजाजी फ़ोन उठाते हैं। वे बहुत खुश हैं, आज उनका प्रमोशन हुआ है, वे मुझे छुट्टी लेकर आने को कहते हैं, फिर याद आता है तो मेरा हाल-चाल पूछते हैं, गर्लफ्रैंड का हाल-चाल पूछते हैं – मैं चुप रहता हूं, पूछते हैं कि वहाँ भी बारिश है क्या, वीकेंड पर कौनसी फ़िल्म देखी.....
और दीदी रसोई में मटर पनीर बना रही हैं।
माँ, मैं उदास हूं।
माँ, ये तुम्हारे रेशमी बालों के सफेद सन होने के दिन हैं। मैं तुम्हारे मोबाइल पर फ़ोन करता हूं और इस संभावना से काँप जाता हूं कि फ़ोन पापा उठाएँगे। दो घंटियाँ बजती हैं और मैं फ़ोन काट देता हूं। मैं इस उम्मीद की हत्या नहीं करना चाहता कि तुम्हें फ़ोन करूंगा तो तुम ही उठाओगी। तुम घर में आराम से पैर पसारकर ‘कसम से’ देख रही हो।
- छोड़ो भी अब। कहने लगते हो तो जाने क्या क्या कहते रहते हो...
- आज तुमने क्यों नहीं उठाया फ़ोन?
- तुम भी जानते हो कि अब सब पहले जैसा नहीं रह गया है।
- पहले भी कुछ अच्छा कहाँ था कि उसके न रहने पर कुछ न रहना लगे।
- रात को ठीक से सोए नहीं शायद। आँखें लाल हैं तुम्हारी।
- नहाते हुए साबुन लगाकर आँखें बन्द नहीं कर पाया था।
वह छलकते हुए दूध की तरह हँस देती है।
- इस बार क्या चाहिए जन्मदिन पर?
- कि तुम्हीं फ़ोन उठाया करो।
- उंहूं.....
वह मुँह बनाती है और बनाकर फेर लेती है। मेरा मन करता है कि वह अभी वहाँ से गायब होकर आकाश में कहीं खो जाए या खो न सके तो तारा ही बन जाए।
वह मेरे लिए चाय बनाने जाती है और मैं सोचता हूँ कि उबलती चाय उसके पैरों की गुलाबी उंगलियों पर गिर जाए या उसके सिर पर ऊपर से हमाम-दस्ता गिरे और उसे मरने से पहले बहुत दर्द हो। मैं सोचता हूं कि रसोई की मेज के पैरों पर लगी दीमक उसके भीतर घर कर लें और उसे खाती जाएँ।
मैं उससे बहुत प्यार करता हूं, अपने जीवन-दर्शन-पैशन से भी ज्यादा। लेकिन जाने कैसे कलमुँहे अजीब दिन आ गए हैं कि मैं उसे चूमता हूं तो काट लेता हूं। वह मुझे चूमती है तो अगले ही पल पलटकर सुबक सुबक रोने लगती है। मैं उसे सोचता हूँ तो दुर्घटनाएं सोचता हूँ। वह मुझे सोचती है तो घर-मोहल्ला-दुनिया-परम्पराएं सब कुछ सोचती है, सिवाए मेरे।
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तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं और नॉस्टेल्जिया |
मेरा मन है कि मैं उसे कहानी सुनाऊँ। मैं सबसे अच्छी कहानी सोचता हूं और फिर कहीं रखकर भूल जाता हूं। उसे भी मेरे बालों के साथ कम होती याददाश्त की आदत पड़ चुकी है। वह महज़ मुस्कुराती है।
फिर उसका मन करता है कि वह मेरे दाएँ कंधे से बात करे। वह उसके कान में कुछ कहती है और दोनों हँस पड़ते हैं। उसके कंधों तक बादल हैं। मैं उसके कंधों से नीचे नहीं देख पाता।
- सुप्रिया कहती है कि रोहित की बाँहों में मछलियाँ हैं। बाँहों में मछलियाँ कैसे होती हैं? बिना पानी के मरती नहीं?
मैं मुस्कुरा देता हूं। मुस्कुराने के आखिरी क्षण में मुझे कहानी याद आ जाती है। वह कहती है कि उसे चाय पीनी है। मैं चाय बनाना सीख लेता हूं और बनाने लगता हूं। चीनी ख़त्म हो जाती है और वह पीती है तो मुझे भी ऐसा लगता है कि चीनी ख़त्म नहीं हुई थी।
- तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं?
- मुझे तुम्हारे कंधों से नीचे देखना है।
- कहानी कब सुनाओगे?
- तुम्हें कैसे पता कि मुझे कहानी सुनानी है?
- चाय में लिखा है।
- अपनी पहली प्रेमिका की कहानी सुनाऊँ?
- नहीं, दूसरी की।
- मिट्टी के कंगूरों पर बैठे लड़के की कहानी सुनाऊँ?
- नहीं, छोटी साइकिल चलाने वाली बच्ची की। और कंगूरे क्या होते हैं?
- तुम सवाल बहुत पूछती हो।
वह नाराज़ हो जाती है। उसे याद आता है कि उसे पाँच बजे से पहले बैंक में पहुँचना है। ऐसा याद आते ही बजे हुए पाँच लौटकर साढ़े चार हो जाते हैं। मुझे घड़ी पर बहुत गुस्सा आता है। मैं उसके जाते ही सबसे पहले घड़ी को तोड़ूंगा।
मैं पूछता हूं, “सुप्रिया और रोहित के बीच क्या चल रहा है?”
- मुझे नहीं पता...
मैं जानता हूं कि उसे पता है। उसे लगता है कि बैंक बन्द हो गया है। वह नहीं जाती। मैं घड़ी को पुचकारता हूँ। फिर मैं उसे एक महल की कहानी सुनाने लगता हूं। वह कहती है कि उसे क्रिकेट मैच की कहानी सुननी है। मैं कहता हूं कि मुझे फ़िल्म देखनी है। वह पूछती है, “कौनसी?”
मुझे नाम बताने में शर्म आती है। वह नाम बोलती है तो मैं हाँ भर देता हूं। मेरे गाल लाल हो गए हैं।
उसके बालों में शोर है, उसके चेहरे पर उदासी है, उसकी गर्दन पर तिल है, उसके कंधों तक बादल हैं।
- कंगूरे क्या होते हैं?
अबकी बार वह मेरे कंधों से पूछती है और उत्तर नहीं मिलता तो उनका चेहरा झिंझोड़ने लगती है।
मैं पूछता हूं - तुम्हें तैरना आता है?
वह कहती है कि उसे डूबना आता है।
और मैं आखिर कह ही देता हूं कि मुझे घर की याद आ रही है, उस छोटे से रेतीले कस्बे की याद आ रही है। मैं फिर से जन्म लेकर उसी घर में बड़ा होना चाहता हूं। नहीं, बड़ा नहीं होना चाहता, उसी घर में बच्चा होकर रहना चाहता हूं। मुझे इतवार की शाम की चार बजे वाली फ़िल्म भी बहुत याद आती है। मुझे लोकसभा में वाजपेयी का भाषण भी बहुत याद आता है। मुझे हिन्दी में छपने वाली सर्वोत्तम बहुत याद आती है, उसकी याद में रोने का मन भी करता है। उसमें छपी ब्रायन लारा की जीवनी बहुत याद आती है। गर्मियों की बिना बिजली की दोपहर और काली आँधी बहुत याद आती है। वे आँधियाँ भी याद आती हैं, जो मैंने नहीं देखी लेकिन जो सुनते थे कि आदमियों को भी उड़ा कर ले जाती थी। अंग्रेज़ी की किताब की एक पोस्टमास्टर वाली कहानी बहुत याद आती है, जिसका नाम भी नहीं याद कि ढूंढ़ सकूं। मुझे गाँव के स्कूल का पहली क्लास वाला एक दोस्त याद आता है, जिसका नाम भी याद नहीं और कस्बे के स्कूल का एक दोस्त याद आता है, जिसका नाम याद है, लेकिन गाँव नहीं याद। वह होस्टल में रहता था। उसने ‘ड्रैकुला’ देखकर उसकी कहानी मुझे सुनाई थी। उसकी शादी भी हो गई होगी...शायद बच्चे भी। वह अब भी वही हिन्दी अख़बार पढ़ता होगा, अब भी बोलते हुए आँखें तेजी से झिपझिपाता होगा। लड़कियों के होस्टल की छत पर रात में आने वाले भूतों की कहानियाँ भी याद आती हैं। दस दस रुपए की शर्त पर दो दिन तक खेले गए मैच याद आते हैं। शनिवार की शाम का ‘एक से बढ़कर एक’ याद आता है, सुनील शेट्टी का ‘क्या अदा क्या जलवे तेरे पारो’ याद आता है। शंभूदयाल सर बहुत याद आते हैं। उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम क्रिएटिव हो और मैं उसका मतलब जाने बिना ही खुश हो गया था। एक रद्दीवाला बूढ़ा याद आता है, जो रोज़ आकर रद्दी माँगने लगता था और मना करने पर डाँटता भी था। कहीं मर खप गया होगा अब तो।
वह कंगूरे भूल गई है और मेरे लिए डिस्प्रिन ले आई है। उसने बादल उतार दिए हैं। मैंने उन्हें संभालकर रख लिया है। बादलों से पानी लेकर मेरी बाँहों में मछलियाँ तैरने लगी हैं। हमने दीवार तोड़ दी है और उस पार के गाँव में चले गए हैं।
कुछ देर बाद वह कहती है – मिट्टी के कंगूरों पर बैठे लड़के की कहानी सुनाओ।
मैं कहता हूं कि छोटी साइकिल चलाने वाली लड़की की सुनाऊँगा। वह पूछती है कि तुम्हें कौनसी कहानी सबसे ज़्यादा पसन्द है?
मैं नहीं बताता।