मुझे चाँदी के दिन चाहिए...

- कहाँ हो?
- कहीं नहीं।
- कहीं तो होगे ही...बताओ ना!
- चाँदी के दिन में।
- चाँदी के दिन कैसे होते हैं?
- उनकी बहनों का नाम रात नहीं होता।
- उनकी सुबहें सुबह ही रुक जाती हैं क्या, जब हॉकर अख़बार की एजेंसी से गिनकर अपने हिस्से के डेढ़ सौ अख़बार उठा रहा होता है या दूधवाला गाँव से दूध लेकर लौटते हुए पेड़ के सहारे अपनी बिना स्टैंड वाली मोटरसाइकिल खड़ी करके नहर के किनारे पानी मिला रहा होता है? उनमें स्कूल नहीं होते क्या, जिनमें बच्चों में प्रार्थना की घंटी बजाने के लिए लड़ाई हो और फिर प्रार्थना के बाद जन गण मन भी गाना पड़े? दफ़्तर नहीं होते? पोस्ट ऑफ़िस भी नहीं? काम नहीं होता? लंचब्रेक भी नहीं? खाली पीरियड में बच्चे अंताक्षरी भी नहीं खेल पाते?......जल्दी बोलो...मुझसे सब्र नहीं होता.....और इतवार की छुट्टी? रंगोली दिनभर आती रहती है क्या? हेमामालिनी बोलते बोलते थक जाती होगी......नहीं? फिर संगीता बिजलानी को बुलाते होंगे ना....और फिर एक बार बोलने के बाद एक साथ तीन तीन गाने दिखाने लगते होंगे। है ना? और शाम का बचा हुआ हलवा कभी खराब भी नहीं होता होगा। लेकिन जिस इतवार को बाल कटवाने होते होंगे, तब कैसे काम चलता होगा? इतनी सुबह तो दुकानें नहीं खुलती ना? और गंगापुर वाली मौसी तो इतवार की सुबह दस बजे फ़ोन करती है। वह तो फ़ोन के पास दस बजने के इंतज़ार में दिनभर क्रोशिया लेकर बैठी रहती होगी?.....बताओ ना...ऐसे ही होते हैं क्या चाँदी के दिन?
- हाँ, ऐसे ही होते हैं। वे दिन भर सुबह रहकर सुबह की मीठी नींद सोते हैं।
- और मौसी? और अंताक्षरी? और रंगोली?
- तुम्हें सामने वह लाल रोशनी दिख रही है?
- लेकिन मौसी....अंताक्षरी....?
- क्या होगी वह रोशनी?
- ट्रेन तो नहीं।
- क्यों?
- बुद्धू, ट्रेन की लाइट लाल थोड़े ही होती है। लाल होती तो अपनी लाइट देखकर हर जगह रुककर ना खड़ी हो जाती?
- और बरगद का पेड़ भी नहीं।
- क्यों?
- पागल, कभी बरगद के पेड़ पर बल्ब उगा देखा है?
- हो सकता है कि कोई पूजा करने आया हो और उसने लगा दिया हो।
- लेकिन बरगद के पेड़ पर बिजली कहाँ से आई होगी?
- खंभे पर से डोरी डाल दी होगी किसी ने।
- छापा पड़ेगा तो पेड़ जुर्माना कैसे भरेगा? जेल कैसे जाएगा?
- जो लोग पानी चढ़ाते होंगे, वे मिलकर पैसे इकट्ठे करेंगे और मिलकर जेल जाएँगे।
- और उसके बाद पेड़ पर मीटर लग जाएगा क्या?
- नहीं, डोरी हटा दी जाएगी।
- और लाल रोशनी?
- फिर हम कहेंगे कि वे बहुत सारे गुलाब हैं, जो रात की रानी से प्यार करते हैं और इसलिए चमक रहे हैं।
- लेकिन रात को प्यार नहीं करते।
- क्यों?
- गन्दा होता है।
- चाँदी के दिन में रहने वाले तो सुबह सुबह अधसोया सा प्यार कर सकते हैं, लेकिन बाकी लोगों को तो रात में ही प्यार करना पड़ता है।
- तुम्हें चाँदी के दिन चाहिए?
- मुझे चाँदी के दिन चाहिए...हज़ार दिन। नहीं, दो हज़ार।
- मुझे भी...
- लेकिन तुम्हारे पास तो हैं।
- किसी के पास नहीं हैं। उन्हें कोई राजा चुराकर ले गया है....या कोई जादूगर...या कोई तांत्रिक....या कोई लड़की....या कोई सपना।
- अब क्या होगा?
- होना क्या है, हम उन्हीं दिनों में रहेंगे, जिनकी बहनें रात हैं और जल्दी सुबह वाले सपने देखेंगे और फिर दफ़्तर जाते हुए उनके सच होने की राह तकेंगे।
- और उनमें न रह पाए तो? या राह देखते देखते थक गए तो? या दफ़्तर में आग लग गई तो?
- वह बरगद नहीं है।
- फिर क्या है?
- किसी की आँखें हैं, जो रात भर जगने से लाल हो गई हैं...
- या किसी का घाव है जिसमें से लगातार खून रिस रहा है...
- या किसी का कलेजा है जो हफ़्तों तक भूखा रहने से सूज गया है...
- या कोई ठिठुरता हुआ बच्चा है, जो सर्दी की रात में घर के बाहर छूट गया है और पूरा घर सो गया है...
- या उम्मीद है जो बुराइयों के बक्से से छूटकर अकेली भाग आई है...
- या मुस्कुराती हुई लड़की के गाल हैं, जो शर्मा गई है...
- या कुछ भी नहीं है...
- या सब कुछ है....
- हाँ शायद...
- हाँ..पक्का..
- हाँ।



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4 पाठकों का कहना है :

poemsnpuja said...

mujhe bhi chandi ke din chahiye...kya sach me aise din hote honge kahin?

kashish said...

hum sab chandi ke dino me hi to rah rahe hai bhai magar lagta hai dhire dhire sare din khatam ho jayenge kyonki hum dhire dhire patan ki or bhi to kadam badhate je rahe hai. achchhi kahani hai.

महेन said...

चाँद के दिन तो शायद न मिलें, शायद होते ही नहीं हों जैसे कालिगुला का वह चाँद भी नहीं था कभी, मगर वह लाल धब्बा ज़रूर है कहीं।

bhawna....anu said...

उफ़ .....चांदी के दिन.....सबको चाहियें....जब भी लिखते हो लगता ही नहीं के तुम्हारा है.....लगता है सबका है...जो भी पढ़ ले उसी का.........लगता है हम सबकी इच्छाये लिखते हो,लिखते रहो.......