सुखान्त

वे,
जिनके चेहरे हमें दिखाई नहीं देते,
हमारे शासक हैं।
उन्होंने हमारी रीढ़ से बेसबॉल खेलते हुए
हमें आटा देने का वचन दिया है।
हमें चढ़ती है ठंड,
हमारे अँधेरे घरों में
टेलीविजन पर दिखाया जाता है सूरज
और हमारी जीवनी पर खेले जा रहे
मार्मिक नाटक में हमारा प्रवेश प्रतिबंधित है।

जब जब परदा गिरेगा,
शराब पीने लगेंगे थके हुए अभिनेता
और उठकर चले जाएँगे रसिक दर्शक,
खदेड़े गए जंगलों से
हम बार बार लौटेंगे मंच पर
और अंत बदलेंगे।

यह हँसने जैसा होगा।



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8 पाठकों का कहना है :

मीत said...

सही है. ये हमेशा से हँसने जैसा ही रहा है .... Know what ? There's this great degree of satisfaction we derive in the inertia of rest, that we are so used to. We're cynics .. as a people. I hate, and I refrain from being judgemental... may it be deemed that it's only a statement of a judgement on my own self.

वेद रत्न शुक्ल said...

Shashkon ka chehra itna vidroop hai ki use na hi dekhen to theek. UTTAM...

अनिल कान्त : said...

भाई वाकई काबिले तारीफ रचना .... तुम्हारी सोच कितनी गहरी है ....

सुशील कुमार छौक्कर said...

कुछ चंद शब्दों से आप बहुत कुछ कह जाते हो या फिर यूँ कहूँ कि कुँए में बहुत गहरे उतर जाते हो।

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर....

विनय said...

बहुत सुन्दर

---आपका हार्दिक स्वागत है
गुलाबी कोंपलें

gaurav ahuja said...

bahut sundar...ummid hain kisi din tera kuch vyangya ya alag tarah ka ras padne ko milega..:)

विक्षुब्ध सागर said...

अच्छा है !

कविता की ऐसी समझ आजकल कम ही नज़र आती है !

अपने कवि के लिए मेरी शुभकामनाएं !