और ओक भर पानी

यह जनवरी का महीना है, जिसमें मेरा मन नहीं लगता। मेरा मरने का मन करता है और जीने का भी। बहुत ज़्यादा मन तो दोनों में से किसी का भी नहीं करता। गाँव मुझे एक नई तरह से विकर्षित करने लगे हैं। मुझे शहर की गति से इश्क़ हो गया है। आमिर-अजय-काजोल-जूही जैसा इश्क़ नहीं, उदास वाला इश्क़। मैं शून्य होता जाता हूं। साथ ही परिवार, समाज, देश और प्रेम के प्रति मेरी आस्थाएँ टूटती जाती हैं और यह दिल्ली का असर नहीं है। महानगर चाहे दिन भर तमाचे मारते रहें, लेकिन यहाँ कुछ असंभव नहीं दिखता। यह बड़ी बात है। फ़िलहाल दिल्ली बेकसूर है।
मैं उसे एस एम एस करता हूं कि मैं दिन-ब-दिन ख़त्म होता जाता हूँ। यह एस एम एस पाना उसका सौभाग्य भी है और दुर्भाग्य भी। वह शायद घबरा जाती है। पूछती है, क्यों? क्या हुआ?
कभी कभी मैं किसी मनोचिकित्सक के पास जाने के बारे में भी बहुत गंभीरता से सोचता हूं। तब अमृता प्रीतम याद आती हैं। ख़त्म होते जाने की बात से शिव कुमार बटालवी याद आते हैं, गुरुदत्त भी। हवाई जहाज देखते हुए वह याद आती है। यह वह जानती है।
मैं एक स्कूल की छत पर हूं। नीचे कोई मैडम किसी बच्चे को पीट रही है। सुबह ही है, लेकिन मेरा सोने का मन करता है। बाहर सड़क पर कोई जुलूस निकल रहा है। अख़बार में मायावती के जन्मदिन की तस्वीरें हैं। मुन्नाभाई चुनाव लड़ रहे हैं। मुझे इस बेशर्मी पर हँसी आती है। मुझे घृणा होती है। शुक्र है कि मैं इस राज्य में नहीं रहता।
जब से आँसुओं की कमी से आँखें दुखने लगी हैं (यह वज़ह पढ़ी लिखी डॉक्टरनी ने बताई है), सोते रहने की मेरी इच्छा बढ़ती जा रही है। मुझे अब बच्चे पसन्द नहीं। कोई प्यारी तस्वीर देखकर मुझे प्यार नहीं आता। अपने आप को टटोलते रहने पर कोई भी बची हुई चाह नहीं मिलती। मैं बस एक फ़िल्म बनाना चाहता हूँ, जिसकी कहानी मेरे दिमाग में दूर दूर तक नहीं है।
मैं किसी स्त्री की गोद में सिर रखकर रोना चाहता हूं। मैंने जिन भी लड़कियों से प्रेम किया, सब अच्छी लड़कियाँ थीं जो मेरे लिए बुरी बन गईं। अपनी आँच में बहुत सारे सोने को मैंने कोयला होते देखा है। इसकी सज़ा में मुझे देशनिकाला भी दिया जा सकता है।
माँ, मैं तुमसे भी प्रेम करता हूँ।
जीवन एक लम्बी थकान है। मुझे निराश रहने दिया जाए। मुझे चाँद नहीं, कुछ नींद की गोलियाँ चाहिए और ओक भर पानी।



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9 पाठकों का कहना है :

अनिल कान्त : said...

सचमुच आपको तो ओक भर पानी की ही जरूरत है ......पढ़कर अच्छा लगा

अनिल कान्त : said...

ओक भर पानी से दवा तो खा लोगे ......लेकिन कुछ मर्ज़ का इलाज नही होता मेरे दोस्त ...लिखते रहो ...अच्छा लगा

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर.....पढकर अच्‍छा लगा।

शिवराज गूजर. said...

udasi jindgi ka nasoor hai dost. iski dava karo. kisi baat se shikva hai, kisi vyastha se shikayat hai to uske khilaft khade ho jao na ki udas ho jao. marne ki baat karo.
hansi ka ek thaka jaroori hai laga lo dost.

सुशील कुमार छौक्कर said...

नि:शब्द...............................

निखिल आनन्द गिरि said...

मुझे चाँद नहीं, कुछ नींद की गोलियाँ चाहिए और ओक भर पानी।

क्या हुआ भाई...चांद से ऊब हो गई....अब नींद की गोलियों पर क्षणिकाएं लिखोगे क्या....अब थोड़ा पॉज़िटिव भी लिखना शुरू कीजिए....
अच्छी डायरी...

निखिल आनन्द गिरि said...

मुझे चाँद नहीं, कुछ नींद की गोलियाँ चाहिए और ओक भर पानी।

चांद से ऊब क्यूं हो गयी....नांद की गोलियों पर कविताएं करेंगे अब???
पानी खूब पिया करें, ओक भर पियेंगे तो यही सब लिखते रहेंगे...

वेद रत्न शुक्ल said...

Bahut Sundar Mitra. Maujooda Samay Logon Ke Bheetar 'Ditatchment' Hi Paida Kar Raha Hai.

gaurav ahuja said...

yaar likha achcha hain ...main bhi kabhi kabar aisa sochta tha par zindagi itni buri nahi...zindagi main kuch mile ya na mile tu muskura...aur woh kar jo man chahen...