मैं घर जाना चाहता हूं

और जबकि चारों तरफ़ अँधेरा है और सीलन और ग्लानि और दुख और संगीत और उन सब को यकीन है कि यह मेरा ही घर है, मुझे लगता है कि यह स्टेशन है और कोई लम्बे ओवरकोट वाला आदमी अपना सूटकेस मुझे सँभलवा कर पानी या चाय पीने गया है। फिर मुझे लगता है कि ओवरकोट सिर्फ़ कहानियों में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है और हकीकत में यह किसी चीज का नाम नहीं है। मेरा मन होता है कि मैं जीवन में कम से कम एक बार ओवरकोट ज़रूर पहनूं।
रसोई में टप टप पानी टपकता रहता है। मेरी दादी बताती थी कि यहाँ पहले दूर तक नदी के खेत होते थे। मुझे लगता है कि इसी तरह कहीं मछुआरों के खेत भी होते होंगे। न जाने क्यों, नदी का नाम लेते ही मछुआरे याद आते हैं जबकि ऐसा समुद्र के नाम के साथ होना चाहिए। मैंने कभी समुद्र भी नहीं देखा। मुझे लगता है कि मैं समुद्र देखे बिना ही मरूंगा और यह डर की तरह नहीं लगता। समुद्र को देखने की कीमत पर कभी नहीं मरना, यदि ऐसा हो जाए...यह विचार मुझे बहुत डराता है। माँ मेरे पागल होने से पहले मेरी शादी करना चाहती है। मैं मानता हूं कि विवाह में संभावनाएँ हैं, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा, पागलपन मुझे लुभाता है।
सब कुछ मेरी नज़र की तरह खोता जाता है। मैं कबूतरों के बीच में किसी की फ़ोटो देखता हूं और मुझे ईर्ष्या होती है। मैं कुछ दिन के लिए ऑटो रिक्शा चलाना चाहता हूं, कुछ दिन के लिए स्टेशन पर किताबों की दुकान खोलना चाहता हूं, कुछ दिन के लिए स्त्री होना चाहता हूं, कुछ दिन के लिए मुसलमान, कुछ दिन पतंग उड़ाना सीखना चाहता हूं, कुछ दिन थियेटर करना चाहता हूं, कुछ दिन लगातार सोना चाहता हूं, नेपाल भी जाना चाहता हूं, पटियाला भी। मैं किसी वेश्या से प्रेम करके कष्ट और प्रेम पाना चाहता हूं। मैं दुनिया की सबसे बुरी गाली किसी को देना चाहता हूं।
ओवरकोट वाला आदमी लौट आया है। वह चने लेकर आया है और उन्हें चबाते हुए मुस्कुरा रहा है। मुस्कुराना अच्छी परंपरा है। सामने दो बहनें अपने अपने पतियों के अपमान पर झगड़ रही हैं और तब भी, जब यह स्टेशन नहीं - जैसा उन सबको यकीन है जो यहाँ हैं - मेरा घर है, मैं उन्हें नहीं रोक पाता।
ऐसा डर लगता है कि हम जब आखिरी ट्रेन से घर लौटेंगे तो हमारा शहर युद्ध या दंगे में उजड़ चुका होगा। लम्बी शांति, जिसमें दूर कहीं प्रेशर कुकर की सीटी बजती है, मुझे बचपन की याद दिलाती है। मेरी रस्सियाँ खोलो, मैं घर जाना चाहता हूं।



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4 पाठकों का कहना है :

सुशील कुमार छौक्कर said...

क्या कहूँ गौरव जी, आपकी लिखने की अदा का जादू तो हमारे पर चला हुआ हैं।
सब कुछ मेरी नज़र की तरह खोता जाता है। ...............................मैं दुनिया की सबसे बुरी गाली किसी को देना चाहता हूं।

ये "मैं" कौन हैं? ये मैं...।

प्रशांत मलिक said...

माँ सही चाहती है
और क्या कहूँ :)

gaurav ahuja said...

bahut achcha likha hain..is baat main tune har kisis ki ek chippi hui ichcha ko kafe achche tarah se likha jab hum kafi tarah ke logon se prabhavit hote hain aur unhi ki tarah kuch samay rehna chahta hain..samundar jaroor dekhiyo...maine bhi abhi 15 din pehle hi dekha hain jab mumbai jana hua tha....:)

KK Yadav said...

Very nice..keep it up.