जीते रहना इतना आसान था
कि जब हमारी माँओं ने
हमारी डायरियाँ कबाड़ में डालते हुए
छातीपीट पश्चाताप से कहा
कि पैदा होते ही क्यों नहीं घोट दिया तुम्हारा गला
तो हम अपनी बाग बाग गलियों के किनारे पर
दिनभर बेशर्मी से खड़े रहने वाले
फक्कड़ दोस्तों को बक आए माँ-बहन की गालियाँ
और वे मुस्कुराकर डाले रहे गलबहियाँ,
आशीर्वाद देते रहे
कि जीते रहो।
जीते रहना इतना आसान था
कि हर इतवार को देखी हमने
बेदिमागी फ़ीलगुड फ़िल्में,
उससे पहले देखी
उनके मुँह पर हाथ रखकर जबरदस्ती कुचल देने की सीमा तक उत्तेजित करने वाली
ढेर सारी लड़कियाँ,
(उनका शुक्रिया। वे जिएँ सौ बरस सुरक्षित, खुश, स्वच्छंद।)
उससे पहले मारी सड़क के एक निर्दोष पत्थर को ठोकर,
उससे पहले चिढ़ गए पूरा चाँद देखकर,
बीच में कहीं रुक रुककर रोते रहे
बेवज़ह।
हम सब रोते हैं।
जीते हैं हमारे माँ पिता
लेकिन क्यों अनाथों जैसी हैं हमारी दहाड़ें?
हमें मरना है
लेकिन फिर से एक जन्म की संभावना सोचकर
ठहर जाते हैं हमारे कदम।
हम सब रोते हैं जोर जोर से
कि कहीं
तुम डर न जाओ सन्नाटे में।
शहर में अँधेरा है,
इतना कि चावल बीनते हुए
रोशनी के लिए
रह रहकर जला देती हो तुम मेरी आँखें।
अपनी नाप के जूतों से सिर ढककर
सो गए हैं सब
और जिन्हें बनानी हैं
या खरीदनी हैं टोपियाँ,
उन्हें पागल होना पड़ा है।
जिनको जाना था शिकार पर,
वे पढ़ रहे हैं शिकार की किताबें।
आईने में ऐब है
कि आत्मविश्वास खोकर शिकारी बनाते हैं
दफ्तरों में बहीखाते।
बीच बरसात में कोई गाता है राग मल्हार,
बच्चे बजाते हैं ताली,
बुढ़ियाएँ नाक भौं सिकोड़ती हैं,
बहुएँ चढ़ा देती हैं दाल की पतीली तुरत फुरत,
भीगती हैं मनियारी वाले की बैंगनी चूड़ियाँ,
फिसल जाता है गली के मोड़ पर एक स्कूटर,
देखने के लिए सब बाहर
तुम अकेली घर के अन्दर,
उठाती हो फ़ोन
और रख देती हो,
फिर आसमान को देखती हो,
फिर काटने लगती हो छौंक के लिए प्याज,
सलाद के लिए खीरे
और जीते रहना इतना आसान है कि
उस न की जा सकने वाली फ़ोन कॉल को भुलाकर
प्रायश्चित में रात का खाना खाए बिना
और एक भी क्षण सोए बिना
सुबह भीगे हुए बाल तौलिए में लपेटकर
खिले हुए गुलाब की सी ताज़गी से
बनाई जा सकती है
दो लोगों की चाय।
| [+/-] |
और जीते रहना इतना आसान है कि |
| [+/-] |
तुम यूं लिखना कि सुन्दर लगे, अश्लील न लगे |
- तुम यूं लिखना कि सुन्दर लगे, अश्लील न लगे।
- अश्लील भी तो सुन्दर हो सकता है।
- हाँ, लेकिन स्वीकार्य नहीं।
- मैं कहाँ स्वीकार्य बनाना चाहता हूं?
- तो क्या बनाना चाहते हो तुम?
- नदी के बीचों बीच ज़मीन...
- यानी?
- यानी पसीने से सनी आस्तीन और उसमें बैठे साँप के खाने भर लायक मोतीचूर...
- तो नदी फिर नदी नहीं रह जाएगी, द्वीप बन जाएगी ना?
- पेट भर जाएगा तो साँप भी कहाँ साँप रह जाएगा?
- और आस्तीन?
- उसमें मेहनत है, इसलिए मैली है।
- द्वीप पर तो जहाज ठहरा करेंगे, कप्तान उतरकर अमरूद तोड़ेगा, लोग फुटबॉल खेला करेंगे और नदी रोया करेगी।
- नदी में नाव चलती है, जहाज नहीं।
- नदी में द्वीप होते हैं?
- हाँ।
- नदी को जो कह दो, उसे होना पड़ता है......द्वीप भी।
- नदी बाढ़ ले आए तो सब कुछ डुबो भी सकती है।
- नदी की आँखें बार-बार सूख जाती हैं।
- मैं तुमसे प्यार करता हूं।
- झूठ...
- सच, तुम्हारी कसम।
- सब सफेद झूठ।
- आस्तीन रोती है।
- और साँप?
- उसे रोना नहीं आता।
- तुम्हें आता है?
- टिटहरी बोल रही है।
- क्या? मुझे तो नहीं सुनता, जबकि मेरे इतना पास है कि बता नहीं सकती।
- तुमने कानों में चूड़ी भर ली है...और बिन्दी भी।
- तुम इतने बेशर्म हो गए हो कि भोले लगने लगे हो।
- मुझे तुम्हारा नाम याद है और फिर भी तुम्हें पुकारता हूं तो कुछ और कहता हूं।
- क्या?
- टिटहरी।
- तो कहते रहो। मैं बुरा नहीं मानूंगी।
- सब बुरा मानते हैं।
- सब बुरे हैं।
- तुम्हारी पलकें मुँदने लगी हैं।
- अख़बार में छपा है क्या?
- अख़बार में तो झूठ छपता है।
- तुम्हारी आस्तीन कहाँ गई?
- अपने कमरे में जाकर सो गई।
- और साँप?
- अब मैं नया अख़बार छापा करूंगा।
- तुम यूं लिखना कि सुन्दर लगे, अश्लील न लगे।
- अश्लील भी तो सुन्दर हो सकता है।
- हाँ, लेकिन स्वीकार्य नहीं......
| [+/-] |
रातें उन दिनों की चालाक प्रेमिकाएं थीं। वे रतियाए हुए खूबसूरत दिन थे... |
वे नारंगी सपनों और लाल सुर्ख़ नारंगियों के दिन थे। वे जवान लड़कों और मदहोश कर देने वाली लड़कियों के दिन थे। वे लम्बी गाड़ियों, ऊँची इमारतों और गाँधी की तस्वीर वाले कड़कड़ाते नोटों के दिन थे। वे अख़बारी वर्ग-पहेलियों और शॉपिंग करती सहेलियों के दिन थे। वे ‘राम जाता है’, ‘सीता गाती है’, ‘मोहन नहीं जाता’, ‘मोहन नहीं जाता’ के जुनूनी पढ़ाकू दिन थे। वे हफ़्ते भर सप्ताहांतों के दिन थे। वे उत्सवों के दिन थे, रतजगों के दिन थे, जश्न के दिन थे। वे कसरती बदन वाले जवान लड़कों और उंगलियों में धुएँ के छल्ले पहने हुई नशीली नर्म लड़कियों के दिन थे।
वे डाबर हनी के दिन थे लेकिन जाने कैसे कस्बाई बरामदों में शहद के छत्ते अनवरत बढ़ते ही जाते थे और गाँवों में कंटीले कीकर के पत्ते भी...
रातें उन दिनों की चालाक प्रेमिकाएं थीं। वे रतियाए हुए खूबसूरत दिन थे, लेकिन न जाने क्यों हमने अपने फेफड़ों में दहकते हुए ज्वालामुखी भर लिए थे कि हमारी साँसें पिघले सीसे की तरह गर्म थी, कि हमारी आँखों से लावा बरसता था, कि हमारे हाव-भाव दोस्ताना होते हुए भी भयभीत कर देने की सीमा तक आक्रामक थे, कि हम आवाज में रस घोलकर रूमानी होना चाहते थे तो भी हम शर्म से सिर नीचा कर देने वाली गालियाँ बकते थे।
मैं उसके मोबाइल पर फ़ोन करता हूं। पहली बार में फ़ोन नहीं उठाया जाता। मुझे मजबूर किया जाता है कि मैं देर तक उसकी हैलो ट्यून का ‘ये दूरियाँ अब हैं कहाँ? ये फ़ासले ना दरमियाँ’ सुनता रहूं। दूसरी बार में उसका पति फ़ोन उठाता है और मैं काट देता हूं। मैं दिन के साथ बीतता हुआ दोपहर होता हूं और फिर फ़ोन करता हूं। इस बार गाना बदल गया है। उसे बदलने के लिए एक एस एम एस करना पड़ा है, जिसके पन्द्रह रुपए लगे हैं। उसका पति महीने के पन्द्रह हज़ार कमाता है और वह उसके ऑफिस जाने से पहले गिनकर पन्द्रह बार मुस्कुराती है। उसकी अँगूठी की उंगली से खेलता हुआ पति फिर फ़ोन उठाता है और मैं काट देता हूं।
.... मैं उसके नोकिया 6600 - एयरटेल मोबाइल पर अपने नोकिया 1100 – बी एस एन एल से पन्द्रह बार फ़ोन करता हूं और उसका पति ही फ़ोन उठाता है....
मैं दीदी को फ़ोन करता हूं तो जीजाजी फ़ोन उठाते हैं। वे बहुत खुश हैं, आज उनका प्रमोशन हुआ है, वे मुझे छुट्टी लेकर आने को कहते हैं, फिर याद आता है तो मेरा हाल-चाल पूछते हैं, गर्लफ्रैंड का हाल-चाल पूछते हैं – मैं चुप रहता हूं, पूछते हैं कि वहाँ भी बारिश है क्या, वीकेंड पर कौनसी फ़िल्म देखी.....
और दीदी रसोई में मटर पनीर बना रही हैं।
माँ, मैं उदास हूं।
माँ, ये तुम्हारे रेशमी बालों के सफेद सन होने के दिन हैं। मैं तुम्हारे मोबाइल पर फ़ोन करता हूं और इस संभावना से काँप जाता हूं कि फ़ोन पापा उठाएँगे। दो घंटियाँ बजती हैं और मैं फ़ोन काट देता हूं। मैं इस उम्मीद की हत्या नहीं करना चाहता कि तुम्हें फ़ोन करूंगा तो तुम ही उठाओगी। तुम घर में आराम से पैर पसारकर ‘कसम से’ देख रही हो।
- छोड़ो भी अब। कहने लगते हो तो जाने क्या क्या कहते रहते हो...
- आज तुमने क्यों नहीं उठाया फ़ोन?
- तुम भी जानते हो कि अब सब पहले जैसा नहीं रह गया है।
- पहले भी कुछ अच्छा कहाँ था कि उसके न रहने पर कुछ न रहना लगे।
- रात को ठीक से सोए नहीं शायद। आँखें लाल हैं तुम्हारी।
- नहाते हुए साबुन लगाकर आँखें बन्द नहीं कर पाया था।
वह छलकते हुए दूध की तरह हँस देती है।
- इस बार क्या चाहिए जन्मदिन पर?
- कि तुम्हीं फ़ोन उठाया करो।
- उंहूं.....
वह मुँह बनाती है और बनाकर फेर लेती है। मेरा मन करता है कि वह अभी वहाँ से गायब होकर आकाश में कहीं खो जाए या खो न सके तो तारा ही बन जाए।
वह मेरे लिए चाय बनाने जाती है और मैं सोचता हूँ कि उबलती चाय उसके पैरों की गुलाबी उंगलियों पर गिर जाए या उसके सिर पर ऊपर से हमाम-दस्ता गिरे और उसे मरने से पहले बहुत दर्द हो। मैं सोचता हूं कि रसोई की मेज के पैरों पर लगी दीमक उसके भीतर घर कर लें और उसे खाती जाएँ।
मैं उससे बहुत प्यार करता हूं, अपने जीवन-दर्शन-पैशन से भी ज्यादा। लेकिन जाने कैसे कलमुँहे अजीब दिन आ गए हैं कि मैं उसे चूमता हूं तो काट लेता हूं। वह मुझे चूमती है तो अगले ही पल पलटकर सुबक सुबक रोने लगती है। मैं उसे सोचता हूँ तो दुर्घटनाएं सोचता हूँ। वह मुझे सोचती है तो घर-मोहल्ला-दुनिया-परम्पराएं सब कुछ सोचती है, सिवाए मेरे।
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तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं और नॉस्टेल्जिया |
मेरा मन है कि मैं उसे कहानी सुनाऊँ। मैं सबसे अच्छी कहानी सोचता हूं और फिर कहीं रखकर भूल जाता हूं। उसे भी मेरे बालों के साथ कम होती याददाश्त की आदत पड़ चुकी है। वह महज़ मुस्कुराती है।
फिर उसका मन करता है कि वह मेरे दाएँ कंधे से बात करे। वह उसके कान में कुछ कहती है और दोनों हँस पड़ते हैं। उसके कंधों तक बादल हैं। मैं उसके कंधों से नीचे नहीं देख पाता।
- सुप्रिया कहती है कि रोहित की बाँहों में मछलियाँ हैं। बाँहों में मछलियाँ कैसे होती हैं? बिना पानी के मरती नहीं?
मैं मुस्कुरा देता हूं। मुस्कुराने के आखिरी क्षण में मुझे कहानी याद आ जाती है। वह कहती है कि उसे चाय पीनी है। मैं चाय बनाना सीख लेता हूं और बनाने लगता हूं। चीनी ख़त्म हो जाती है और वह पीती है तो मुझे भी ऐसा लगता है कि चीनी ख़त्म नहीं हुई थी।
- तुम्हारी बाँहों में मछलियाँ क्यों नहीं हैं?
- मुझे तुम्हारे कंधों से नीचे देखना है।
- कहानी कब सुनाओगे?
- तुम्हें कैसे पता कि मुझे कहानी सुनानी है?
- चाय में लिखा है।
- अपनी पहली प्रेमिका की कहानी सुनाऊँ?
- नहीं, दूसरी की।
- मिट्टी के कंगूरों पर बैठे लड़के की कहानी सुनाऊँ?
- नहीं, छोटी साइकिल चलाने वाली बच्ची की। और कंगूरे क्या होते हैं?
- तुम सवाल बहुत पूछती हो।
वह नाराज़ हो जाती है। उसे याद आता है कि उसे पाँच बजे से पहले बैंक में पहुँचना है। ऐसा याद आते ही बजे हुए पाँच लौटकर साढ़े चार हो जाते हैं। मुझे घड़ी पर बहुत गुस्सा आता है। मैं उसके जाते ही सबसे पहले घड़ी को तोड़ूंगा।
मैं पूछता हूं, “सुप्रिया और रोहित के बीच क्या चल रहा है?”
- मुझे नहीं पता...
मैं जानता हूं कि उसे पता है। उसे लगता है कि बैंक बन्द हो गया है। वह नहीं जाती। मैं घड़ी को पुचकारता हूँ। फिर मैं उसे एक महल की कहानी सुनाने लगता हूं। वह कहती है कि उसे क्रिकेट मैच की कहानी सुननी है। मैं कहता हूं कि मुझे फ़िल्म देखनी है। वह पूछती है, “कौनसी?”
मुझे नाम बताने में शर्म आती है। वह नाम बोलती है तो मैं हाँ भर देता हूं। मेरे गाल लाल हो गए हैं।
उसके बालों में शोर है, उसके चेहरे पर उदासी है, उसकी गर्दन पर तिल है, उसके कंधों तक बादल हैं।
- कंगूरे क्या होते हैं?
अबकी बार वह मेरे कंधों से पूछती है और उत्तर नहीं मिलता तो उनका चेहरा झिंझोड़ने लगती है।
मैं पूछता हूं - तुम्हें तैरना आता है?
वह कहती है कि उसे डूबना आता है।
और मैं आखिर कह ही देता हूं कि मुझे घर की याद आ रही है, उस छोटे से रेतीले कस्बे की याद आ रही है। मैं फिर से जन्म लेकर उसी घर में बड़ा होना चाहता हूं। नहीं, बड़ा नहीं होना चाहता, उसी घर में बच्चा होकर रहना चाहता हूं। मुझे इतवार की शाम की चार बजे वाली फ़िल्म भी बहुत याद आती है। मुझे लोकसभा में वाजपेयी का भाषण भी बहुत याद आता है। मुझे हिन्दी में छपने वाली सर्वोत्तम बहुत याद आती है, उसकी याद में रोने का मन भी करता है। उसमें छपी ब्रायन लारा की जीवनी बहुत याद आती है। गर्मियों की बिना बिजली की दोपहर और काली आँधी बहुत याद आती है। वे आँधियाँ भी याद आती हैं, जो मैंने नहीं देखी लेकिन जो सुनते थे कि आदमियों को भी उड़ा कर ले जाती थी। अंग्रेज़ी की किताब की एक पोस्टमास्टर वाली कहानी बहुत याद आती है, जिसका नाम भी नहीं याद कि ढूंढ़ सकूं। मुझे गाँव के स्कूल का पहली क्लास वाला एक दोस्त याद आता है, जिसका नाम भी याद नहीं और कस्बे के स्कूल का एक दोस्त याद आता है, जिसका नाम याद है, लेकिन गाँव नहीं याद। वह होस्टल में रहता था। उसने ‘ड्रैकुला’ देखकर उसकी कहानी मुझे सुनाई थी। उसकी शादी भी हो गई होगी...शायद बच्चे भी। वह अब भी वही हिन्दी अख़बार पढ़ता होगा, अब भी बोलते हुए आँखें तेजी से झिपझिपाता होगा। लड़कियों के होस्टल की छत पर रात में आने वाले भूतों की कहानियाँ भी याद आती हैं। दस दस रुपए की शर्त पर दो दिन तक खेले गए मैच याद आते हैं। शनिवार की शाम का ‘एक से बढ़कर एक’ याद आता है, सुनील शेट्टी का ‘क्या अदा क्या जलवे तेरे पारो’ याद आता है। शंभूदयाल सर बहुत याद आते हैं। उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम क्रिएटिव हो और मैं उसका मतलब जाने बिना ही खुश हो गया था। एक रद्दीवाला बूढ़ा याद आता है, जो रोज़ आकर रद्दी माँगने लगता था और मना करने पर डाँटता भी था। कहीं मर खप गया होगा अब तो।
वह कंगूरे भूल गई है और मेरे लिए डिस्प्रिन ले आई है। उसने बादल उतार दिए हैं। मैंने उन्हें संभालकर रख लिया है। बादलों से पानी लेकर मेरी बाँहों में मछलियाँ तैरने लगी हैं। हमने दीवार तोड़ दी है और उस पार के गाँव में चले गए हैं।
कुछ देर बाद वह कहती है – मिट्टी के कंगूरों पर बैठे लड़के की कहानी सुनाओ।
मैं कहता हूं कि छोटी साइकिल चलाने वाली लड़की की सुनाऊँगा। वह पूछती है कि तुम्हें कौनसी कहानी सबसे ज़्यादा पसन्द है?
मैं नहीं बताता।
| [+/-] |
बहुत देर होने के ठीक बाद |
- बहुत देर हो गई है।
वह एक बार में ही ऐसे बोली, जैसे दस बार बोल रही हो।
उसका घर हमेशा भरा रहता था और देर कुछ जल्दी ही हो जाती थी। इतना भीड़ भड़क्का कि मैं वहाँ साँस भी लेता था तो जैसे सबको मेरी घुटन महसूस हो जाती थी और सब आँखें फाड़ फाड़कर मुझे देखने लगते थे। कई बार तो मेरे पहुँचने से पहले ही देर का होना हुआ मिलता था। मैं मिन्नतें करके देर को किसी तरह आगे बढ़वाता रहता था और हर बार लौटते हुए मुझे लगता था, जैसे मैं बहुत सारे अहसानों के बोझ तले दबा हूं।
- बहुत देर हो गई है...
उसने फिर से कहा।
- तो?
- मुझे खाना भी बनाना है।
- दो ही तो लोग हो...
इतनी भीड़ उन दो की ही थी या उस अकेली की ही। बाकी बहुत सारा सामान भी था। लेकिन हर समय ऐसा लगता था कि घर में दर्जन भर लोग तो हैं ही..और दो चार बच्चे भी।
- हम जिनसे प्यार करते हैं, उनके जाने के बाद भी उनका एक हिस्सा हमेशा के लिए हमारे पास रह जाता है।
एक बार वह किसी पत्रिका में पढ़ कर मुझे बता रही थी और मैं झट से पूछ बैठा था कि तुम्हारे घर में इतनी भीड़ क्यों है?
- कल से ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ ख़त्म होने वाला है...
मैंने कहा तो वह चौंकी नहीं। वह चौंकना चाहती थी, मगर नहीं चौंक पाई।
- सब कुछ क्या?
- मुझे लगता है कि किसी दिन उसका तबादला हो जाएगा और तुम उसके साथ अचानक यह घर छोड़कर कहीं भी चली जाओगी। ऐसी जगह, जहाँ मैं तुम्हें खोज भी न पाऊँ....
उसने नहीं कहा कि ऐसा नहीं होगा। मुझे लग रहा था कि ऐसा होने वाला है।
तभी उसे लगा कि बाहर कोई है। जब मैं वहाँ होता था तो वह अपने कान दरवाजे पर रख आती थी और आँखें गली के मोड़ पर। इसीलिए तो जब मैं चिल्लाता था तो उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आ पाता था। वह शायद मुझे देख भी नहीं पाती थी। एक दिन मैं जा नहीं पाया और अगले दिन गया तो वह कहती रही कि कल तुम जो नीली शर्ट पहनकर आए थे, वह अच्छी नहीं लग रही थी। मैं आश्चर्य से उसकी सूनी आँखें पढ़ने की कोशिश करता रहा था। मुझे लगा था कि वह मेरे जाने के बाद उसके आने पर भी मुझसे ही बात करती रहती होगी।
वह दौड़कर गई और दरवाजे पर देखकर फिर लौट आई।
- मैं लेट जाऊँ?
- नहीं...
उसके मना करने पर भी मैं लेट गया था। अब वह अपने बिस्तर पर नहीं बैठी, खड़ी रही।
उस नर्म बिस्तर पर लेटते ही मेरे अन्दर दुख की एक लहर सी उठी और मैं अचानक उठकर खड़ा हो गया। शायद वह जानती थी कि ऐसा होगा, इसीलिए उसने मुझे वहाँ लेटने से मना किया होगा।
मैं बिना कुछ कहे ही बाहर निकल आया और देर तक, दूर तक दौड़ता रहा। मैं उस दिन सच में पलायन करना चाहता था, कहीं दूर जाकर छिप जाना चाहता था। मैं इतना निराश हो गया था कि कुछ घंटों के लिए भगवान को भी मानने लगा था।
अगले दिन सूरज नहीं उगा। दिन भर पूरे शहर की सड़कों पर मर्करी बल्ब जलते रहे। उस दिन करवा चौथ होनी थी, लेकिन दूर से भागकर सीधी अमावस आ गई थी। मैं उसका घर भूल गया था। अँधेरे में किसी तरह ढूंढ़कर मैं उसके घर तक पहुँचा तो ताला लटक रहा था। उसकी आँखें वहीं दरवाजे की चौखट के ऊपर रखी थी। मैंने उन्हें उठाकर अपनी आँखों में रख लिया। उसने एक बात का दिया जलाकर अपनी दहलीज पर रख छोड़ा था। वह बात दुनिया की अकेली बची हुई बात थी। बाकी सब बातें निरर्थक होकर मर गई थीं।
उसके बाहर वाले कमरे की अलमारी के किवाड़ पर एक शाम मैंने पेंसिल से एक कविता लिखी थी...
...... बहुत देर हो जाने से ठीक पहले
तुम मुझे पुकारकर बुलाने के लिए
मुझे याद कर रात भर रोना
और मैं नहीं आ पाऊँ तो
बहुत देर होने के ठीक बाद
सफ़र के लिए पूरियाँ बनाना
और आलू की सूखी सब्जी भी
और चली जाना बस में बैठकर
गृहशोभा पढ़ते हुए।
| [+/-] |
जैसे चाँद को देखा करते थे |
- क्या खाओगे तुम?
और मेरे कुछ कहे बिना ही उसने ऑर्डर देने के लिए फ़ोन उठा लिया।
- दो जूस और दो बटर टोस्ट।
गर्मी की दुपहरी में वह कम से कम बटर टोस्ट खाने का तो टाइम नहीं था, चाहे ए सी चल रहा हो और बटर टोस्ट मुझे कितना भी पसन्द हो। माँ वहाँ होती तो आँखें जरूर तरेरती।
माँ, उसके साथ होता था तो मुझे तुम सबसे ज्यादा याद आती थी।
- मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए...बस कभी कभी तुम्हारी गोद में लेटकर रोने का मन होता है...
कुछ नहीं चाहने के बाद वाली बात मैं शायद माँ से भी एकाध बार कह चुका हूं। पक्का तो याद नहीं कि कहा है या नहीं, लेकिन कहने का मन बहुत बार किया है।
वह डर सा गई।
- अभी मत रोना...
और उसने अपने पैर समेट लिए जो मेरे पैरों के पास ही थे।
- नहीं, मुझे पता है कि लड़कों को किसी के सामने नहीं रोना चाहिए।
- और जो मेरे सामने रोया करते थे...
- गोद में कहाँ लेटता था?
वह चुप हो गई। दीवार पर एक चित्र टँगा था, जिसमें आग थी, लड़की थी, बिल्ली थी, मिट्टी थी और पानी नहीं था।
- तुम्हारा सौन्दर्य-बोध अच्छा हो गया है...
मैं चित्र में डूब गया और जब डूबता रहा तो मर जाने का मन किया, लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़कर बचा लिया। बटर टोस्ट और जूस आ गया था।
हममें बहुत छीना-झपटी हुई ब्रेड खाने के लिए.....टुकड़े टुकड़े करके हम आधे घंटे तक चार स्लाइस खाते रहे।
- स्कूल में हिन्दी की क्लास में जब चतुर्वेदी सर तुम्हें खड़े होकर पाठ पढ़ने को बोलते थे तो मुझे बहुत अच्छा लगता था।
- क्यों?
मैं मुस्कुरा दिया।
- तुम्हारा बोलना मुझे अच्छा लगता था...तुम नदी की तरह बहते हुए पढ़ते थे। मैं तुम्हारी नकल करने की भी कोशिश किया करती थी। करके दिखाऊँ?
हिन्दी का कोई अख़बार वहाँ नहीं था। उसने कहीं से टाइम्स ऑफ इंडिया ढूंढ़ निकाला और जोर जोर से एक आर्टिकल मेरी तरह पढ़ने की कोशिश करने लगी। दो चार लाइन पढ़कर वह समझ गई कि वह मेरी तरह पढ़ना भूल गई है। उसने मुस्कुराकर अख़बार मुझे थमा दिया। मैं पढ़ने लगा....
मैं उसके हेयर क्लिप से खेल रहा था, जिसके दो तीन दाँत मैं तोड़ चुका था और जब भी खट से कोई दाँत टूटता था तो वह मुझे डाँट देती थी।
वह सामने बैठी थी। क्लिप उसके बालों में नहीं था।
- कभी कभी मन करता है कि शादी कर लूं...
वह बोली और मुझे हँसी आ गई। वह भी हँसने लगी।
- क्यों हँस रहे हो?
वह पूछती रही, मगर मैंने नहीं बताया।
- तुम्हारा भी मन करता है कभी कभी?
- हाँ...कभी कभी करता है...
अब हम बराबरी पर थे।
- जानती हो...मैंने अमेरिका के एक रेडियो चैनल पर कविता पढ़ी...
- तुम इतने फ़ेमस हो गए हो?
उसने औपचारिकता के लिए पूछा और फिर जवाब भी नहीं सुनना चाहा, जैसे मैं झूठ बोल रहा हूं या इसमें कुछ बड़ी बात ना हो। मुझे उसका ऐसा करना अच्छा लगा।
- मेरी एक कविता सुनोगे...
उसने अंग्रेज़ी में चार पंक्तियाँ सुनाईं। मुझे अच्छी लगी लेकिन उसे लगा कि उसका मन रखने के लिए मैंने प्रशंसा की है। उसका चेहरा उतर गया। मेरा मन किया कि उस उतरने को अपनी हथेली से उतार दूं लेकिन मैं वैसे ही, वहीं बैठा रहा। अब सोचता हूं कि उसके अपराध में मुझे जेल भी भेज दिया जाता तो भी मुझे उसकी उदासी उतारने के लिए कुछ करना चाहिए था।
- यह क्लिप तुम ही ले जाना, खेलते रहना।
वह अचानक बोली। मैं उठकर चलने को हुआ और क्लिप भूल गया।
- ‘जाने तू या जाने ना’ देखने चलोगे?
- हाँ..
- लेकिन मैं तो अगले हफ़्ते जा रही हूँ।
- फिर कैसे देखेंगे?
- अलग अलग देख लेंगे एक ही वक़्त पर...
- जैसे चाँद को देखा करते थे?
- हाँ, जैसे चाँद को देखा करते थे...और तुम डूबते हुए सूरज को चाँद समझ कर देखते रहते थे...
- तुम्हें याद है?
- नहीं, मैं पिछले साल भूल गई थी।
- मैंने चाँद देखना सीख लिया है...
- तुम खुश रहा करो।
- नहीं रहूंगा।
- जानते हो, तुममें और मुझमें बहुत कुछ एक सा है...
- जितनी बार मिलते हैं, यह एक सा और बड़ा हो जाता है।
वह चुप रही।
- तुम ओशो ज्यादा पढ़ने लगी हो?
- नहीं, साल भर से पढ़ा ही नहीं।
मैं न चाहते हुए भी क्लिप को भूलता जा रहा था।
- अब तुम्हें चलना चाहिए।
- मैं बहुत ज़िद्दी हूं...
- तो...
वह मुस्कुराई।
- जा रहा हूं।
विदा होते हुए हम गले नहीं मिले, जैसे मिलते तो आसमान टूट पड़ता।
उसके दरवाजे के बाहर भी एक चित्र लगा था, जिस में पानी था, आग थी, लड़का था, शहर था और ईश्वर नहीं था।
| [+/-] |
आँख में धूप है |
सफेद सा
काला सुराख हो गया है दिल में
जो फूलकर कुप्पा हो जाता है
बेमौके,
जैसे किसी मुम्बइया मसाला फ़िल्म को देखते हुए
अचानक रो देना।
तुम हर बात में
ले आते हो रोना,
जैसे समुद्र ले आता है चाँद,
रात ले आती है भूख,
लड़की ले आती है पतंग,
लड़का ले आता है गोल-गोल चरखा,
हवाई जहाज ले जाता है आसमान,
रोटी ले जाती है ज़िन्दग़ी।
ओह!
सब उलझ गया,
कट गई पतंग,
कम्बख़्त आसमान...
आँख में धूप है,
मींच लो,
जल जाएगी आँख
या धूप।
धूप की रात कच्ची है
तभी खट्टी है,
भूसे में रख दो, पक जाएगी
या रो लो शहद
लम्बा-लम्बा।
पगले,
रोना अकर्मक है
और पेड़ पर नहीं लगती रात
कि तोड़कर खाई जा सके
आड़ू, चीकू, अमरूद की तरह।
बहुत साइकेट्रिस्ट हैं इस शहर में,
क्यों नहीं आती नींद ?
फ़िल्मी हीरोइनों की तरह
बेकारी बहुत ख़ूबसूरत होती है,
देखा जा सकता है उसके आर-पार,
सोचा जा सकता है कुछ भी
भद्दा, बेतुका, अटपटा।
सिखाया जा सकता है पतंग उड़ाना,
फाड़े जा सकते हैं पोस्टर,
फोड़ी जा सकती हैं सिर से दीवारें,
दीवाना होकर सड़कों पर भटका जा सकता है,
बिना रिज़र्वेशन करवाए
लावारिस होकर जाया जा सकता है
किसी भी शहर,
लाहौर, कलकत्ता, पूना
या बम्बई भी।
| [+/-] |
माथा तो नहीं है ना होठ? |
नदी के पार कौन है?
या सब इधर ही पड़े हैं
अधमरे से?
किसने फेंका है
अपने घर के सिर पर पत्थर?
किसने बुलाई है पुलिस
खुद को पकड़वाने के लिए?
भोर के तारे को क्या दुख है कि
लाल-लाल रहती हैं उसकी आँखें?
कौन रोया है मेरी छत पर इतना
कि रात भर में उग आई है
मुझसे ऊँची घास?
ग्यारह इंच की दूरी से
किसी ने पिस्टल से मारी है गोली
कि माँ की उंगली की
नोक के आकार का
दिल में हो गया है छेद
जिसकी आँखें रहती हैं भरी-भरी।
सड़क पर चल रही हैं गाड़ियाँ,
एक गाड़ी में तुम,
रेड लाइट, स्पीड ब्रेकर, यू टर्न
नया शहर
जैसे जंगल,
उतर क्यों नहीं जाती तुम
बाँया पैर पहले रखकर
अपशकुन की तरह
कि जहाँ तक नज़र जाए,
हर पैर पर दिखाई दे
तुम्हारा पैर,
मेरा माथा।
जंगल में लग जाए आग।
हम जब महानगर थे
तब भी अपने घुग्घू कस्बे थे।
बहुत मन किया था कि
शगुन के नोट की जगह
गले लगाकर
तुम्हारे माथे पर रख दूं
स्नेह के होठ।
माथा तो नहीं है ना होठ?
माथे पर से तो नहीं होता ना
शरीर के अन्दर तक जाने का
कोई असभ्य रास्ता
जिसे चूमने के लिए
अधिकार होना जरूरी हो...
हाँडी भर खिचड़ी,
कलफ़ लगे कुरते,
अचार के मर्तबानों जैसे दफ़्तर
और मेरे हिस्से का
छटांक भर आसमान भी,
सब बेमानी हो गए हैं।
सुनो,
मिट्टी में मिल जाना
बहुत आराम देता होगा ना?
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बहुत अनरोमांटिक हूँ मैं |
कंचनजंघा की छत पर
मेरे उबले हुए होठों की भाप से
सेक रहे थे हम
तुम्हारी हथेलियों की गुदगुदी
और हमारे हिस्से नहीं आए
गाँव वाले खेत को जाने वाली पगडंडी
आसमान तक खड़ी हो गई थी,
चलो, अपनी लड़खड़ाहट
इस रास्ते पर बोते हुए
टहलते हुए नीचे चलेंगे,
तुमने कहा था
और मैं कहता रहा था
कि कूद जाते हैं।
तुम सुनहरे रंग की हो
क्योंकि
तुम्हारे बनाए जा सकते हैं जेवर,
तुम्हें पहना जा सकता है,
तुम्हें रखा जा सकता है
तुम्हारे पति की शादी के बाद के
दिखावे के सामान में
सबसे आगे।
काजू, बादाम, किशमिश,
तुम प्लेट में सजे हुए
सूखे मेवों के रंग की भी हो,
जाने क्यों...
हमारे लौटने के बाद
गिलहरियों ने कुतर खाई थी
सारी पगडंडी
और हमारी बची हुई जूठी शराब पीकर
एक गिलहरी रात भर
आसमान से पूछती रही थी
उसके नीले रंग का कारण।
आधे बादामी,
आधे बावरे रंग के बदनाम गिरगिट
मैंने देखे हैं सड़क पर।
समझाओ ना उन्हें
कि ढूंढ़ लें कोई नौकरी
दस से पाँच की
और सीने की फाँकें काटकर
सुबह नाश्ते में खाया करें
ब्रेड बटर के साथ।
कूद ही जाते हैं,
मेरे इस प्रस्ताव पर
बौखला जाती हो तुम
और मेरी आँखों से
दो बूँद खून लेकर
मेरे माथे पर लिख देती हो
मेरा असंवेदनशील होना।
कौनसी रिंगटोन है ये
कि हाथ से कूदकर
धरती पर गिरने को होता है मोबाइल,
ओह!
तुम्हें आया है फ़ोन किसी का,
तुम्हें जल्दी है जाने की
इतनी कि
पिछले मिनट में पाँव रखकर
दौड़ जाना चाहती हो।
छूटते हुए तुम
उस झुनझुने पर
अपनी गुदगुदाती हथेली रखकर
लगभग मेरी ओर मुड़कर
कह ही देती हो
कि बहुत अनरोमांटिक हूँ मैं
और रात अचानक हो जाती है।
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स्त्रियों ने जिन पुरुषों से किया प्रेम |
स्त्रियों ने जिन पुरुषों से किया प्रेम,
जुबान पर मिसरी धरकर
वे पुकारती थी उन्हें
पागल कहकर,
पहले तो तुम्हें भी
भला लगता था ना
प्रेम में उन्माद?
मोहल्ले में मौत हो किसी की,
सिलेंडर फटे रसोई में,
कोई छू दे दस हज़ार वोल्ट का तार
या कोई गंगा में डूब मरे,
मच जाए चीख-पुकार
और मैं किसी के आँगन में,
छत पर
या गली में ही
रुदालियों के कंधों पर सिर रखकर
घंटों तक रोता रहूँ।
मुँहअंधेरे
मुझे एक सपना
अक्सर दीखता है
कि धक्के देकर
मुझे घर से बाहर निकाल रहे हैं
माँ-बाबा।
माँ को डर है शायद
कि धर्म बदलकर
जल्दी ही बन जाऊंगा मैं मुसलमान,
बाबा को लगता है शायद
कि फुटपाथ पर नाक पोंछती हुई
कोई लड़की
मैंने छिपा रखी है ज़मीन में
जिसे किसी दिन
ब्याहकर ले आऊँगा अदालत से।
कभी-कभी प्यार से
माँ कहती है
बाबा को पागल,
मुझे नहीं कहती।
तुम्हारे मेरे घर में कोई मौत हो तो
मातम बनाने के बहाने
मिलेंगे,
देर तक रोएँगे
गले मिलकर।
कोई नहीं रोकेगा तब।
जल्दी करो कि
किसी दिन अचानक
चाय पीते-पीते
मैं फेंकने लगूंगा उठा-उठाकर
किताबें, पेन, कप, ज़िन्दग़ी,
बकने लगूंगा गालियाँ,
बुक्का फाड़कर रोने लगूंगा,
पागल हो जाऊँगा।
देख लेना चाहे।