स्त्रियों ने जिन पुरुषों से किया प्रेम

स्त्रियों ने जिन पुरुषों से किया प्रेम,
जुबान पर मिसरी धरकर
वे पुकारती थी उन्हें
पागल कहकर,
पहले तो तुम्हें भी
भला लगता था ना
प्रेम में उन्माद?

मोहल्ले में मौत हो किसी की,
सिलेंडर फटे रसोई में,
कोई छू दे दस हज़ार वोल्ट का तार
या कोई गंगा में डूब मरे,
मच जाए चीख-पुकार
और मैं किसी के आँगन में,
छत पर
या गली में ही
रुदालियों के कंधों पर सिर रखकर
घंटों तक रोता रहूँ।

मुँहअंधेरे
मुझे एक सपना
अक्सर दीखता है
कि धक्के देकर
मुझे घर से बाहर निकाल रहे हैं
माँ-बाबा।

माँ को डर है शायद
कि धर्म बदलकर
जल्दी ही बन जाऊंगा मैं मुसलमान,
बाबा को लगता है शायद
कि फुटपाथ पर नाक पोंछती हुई
कोई लड़की
मैंने छिपा रखी है ज़मीन में
जिसे किसी दिन
ब्याहकर ले आऊँगा अदालत से।

कभी-कभी प्यार से
माँ कहती है
बाबा को पागल,
मुझे नहीं कहती।

तुम्हारे मेरे घर में कोई मौत हो तो
मातम बनाने के बहाने
मिलेंगे,
देर तक रोएँगे
गले मिलकर।
कोई नहीं रोकेगा तब।

जल्दी करो कि
किसी दिन अचानक
चाय पीते-पीते
मैं फेंकने लगूंगा उठा-उठाकर
किताबें, पेन, कप, ज़िन्दग़ी,
बकने लगूंगा गालियाँ,
बुक्का फाड़कर रोने लगूंगा,
पागल हो जाऊँगा।

देख लेना चाहे।



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4 पाठकों का कहना है :

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

सोलंकी जी, आपकी कविताओं से आज पहली बार रूबरू हुआ । आपके लिये आदरणीय बोधित्सव जी की कवितायें अनुकरणीय है पढकर अच्छा लगा साथ ही नई कविताओं के नये कवियों से बडे दिन बाद मुलाकात हुई । मैं कोई साहित्यकार या समीक्षक नहीं हूं सिर्फ अबूझ पाठक हूं । आपमें काफी संभावनायें नजर आती हैं, भावों के डोर को पकडे रहें । हमारी शुभकामनायें ।

महेन said...

दोस्त बहुत अच्छा लिखते हो। मैं तुम्हारा मुरीद हुआ। लम्बे अर्से बाद सन्न कर देने वाली कवितायें पढीं हैं। मगर विनती है ज़्यादा न लिखना जैसा कोई कह रहा था किसी टिप्पणी में। कारखाना न बन जाना कविताओं का बस। राईनेर मारिआ रिल्के की एक किताब है "युवा कवि के नाम पत्र"। चाट जाओ… न मिले तो मुझे बताना, मैं भेज देता हुं।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया- पूरे भाव उड़ेल दिये हो जैसे.

लिखते रहिये, शुभकामनायें.

Rajesh Roshan said...

गौरव हमेशा की तरह अद्भुत रचना. बधाई