आँख में धूप है

सफेद सा
काला सुराख हो गया है दिल में
जो फूलकर कुप्पा हो जाता है
बेमौके,
जैसे किसी मुम्बइया मसाला फ़िल्म को देखते हुए
अचानक रो देना।

तुम हर बात में
ले आते हो रोना,
जैसे समुद्र ले आता है चाँद,
रात ले आती है भूख,
लड़की ले आती है पतंग,
लड़का ले आता है गोल-गोल चरखा,
हवाई जहाज ले जाता है आसमान,
रोटी ले जाती है ज़िन्दग़ी।
ओह!
सब उलझ गया,
कट गई पतंग,
कम्बख़्त आसमान...

आँख में धूप है,
मींच लो,
जल जाएगी आँख
या धूप।
धूप की रात कच्ची है
तभी खट्टी है,
भूसे में रख दो, पक जाएगी
या रो लो शहद
लम्बा-लम्बा।

पगले,
रोना अकर्मक है
और पेड़ पर नहीं लगती रात
कि तोड़कर खाई जा सके
आड़ू, चीकू, अमरूद की तरह।
बहुत साइकेट्रिस्ट हैं इस शहर में,
क्यों नहीं आती नींद ?

फ़िल्मी हीरोइनों की तरह
बेकारी बहुत ख़ूबसूरत होती है,
देखा जा सकता है उसके आर-पार,
सोचा जा सकता है कुछ भी
भद्दा, बेतुका, अटपटा।
सिखाया जा सकता है पतंग उड़ाना,
फाड़े जा सकते हैं पोस्टर,
फोड़ी जा सकती हैं सिर से दीवारें,
दीवाना होकर सड़कों पर भटका जा सकता है,
बिना रिज़र्वेशन करवाए
लावारिस होकर जाया जा सकता है
किसी भी शहर,
लाहौर, कलकत्ता, पूना
या बम्बई भी।



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4 पाठकों का कहना है :

Rajesh Roshan said...

बड़ा ही कोसोमोपोलिटन कविता है

advocate rashmi saurana said...

sundar rachana.likhate rhe.

jj said...

taareef se upar hai ye waali..maine kareeb saal bhar pehle kuch kavitayein padhi thi aapki! ab aap bahut aage badh chuke hain, dil khush ho gaya padh ke

गौरव सोलंकी said...

शुक्रिया जे जे जी, आप इतने लंबे समय से मुझे पढ़ रहे हैं , यह देखकर बहुत अच्छा लगा|
यूं ही भला बुरा बताते रहिए|