अधूरा नहीं छोड़ा करते पहला चुम्बन

अधूरा नहीं छोड़ा करते
पहला चुम्बन,
जब विद्रोह करती हों,
फड़फड़ाती हों
निर्दोष होठों की बाजुएँ
नहीं बना करते अंग्रेज़,
नहीं कुचला करते उनकी इच्छाएँ
सन सत्तावन के गदर की तरह।

ऊपर पंखा चलता है।
आओ नीचे हम
रजनीगन्धा के फूलों से
छुरियाँ बनाकर
काट डालें अपने चेहरे,
तुम मेरा
मैं तुम्हारा
या तुम मेरा,
मैं अपना!

सिपाहियों को मिला है आदेश
भीड़ को घेरने का,
बेचारे सिपाहियों ने चला दी हैं
बेचारी छुट्टी भीड़ पर
बेचारी छोटी छोटी गोलियाँ।

फिर मत कहना कि
अपनी मृत्यु का दिन
मालूम होते हुए भी
मैंने नहीं किया था
तुम्हें सावधान कि
तुम अपना खिलंदड़पना छोड़कर
सोच सको
भावुक होने के विकल्प के बारे में भी।

क्या पता कि
अधूरे छूटे हुए पहले चुम्बन
बन जाते हों आखिरी
इसलिए मन न हो, तो भी
अधूरा नहीं छोड़ा करते
किसी का पहला चुम्बन।
नब्बे साल बाद सच होते हैं
मंगल पाण्डे के शाप।



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8 पाठकों का कहना है :

शायदा said...

बहुत सुंदर भई। जल्‍दी लिखो और ।

Pratyaksha said...

कहाँ से कहाँ तक ? बढिया आना जाना ....

Arun Aditya said...

गहन अनुभूति की कविता। ऐसी ही गहन अनुभूति रॉबर्ट ब्राउनिंग की इन पंक्तियों में भी देख सकते हैं। Truth that`s brighter than gem
Trust that`s purer than pearl
Brightest truth, purest trust in the universe
all were for me in the kiss of one girl.
बधाई। लिखते रहो।

Rajesh Roshan said...

गहरी बात, अधूरा नहीं छोड़ा करते पहला चुम्बन

Geet Chaturvedi said...

वाह यार गौरव. तुम तो कमाल हो यार.
एकदम झुगली झिनक झांई.

गौरव सोलंकी said...

शायदा जी, लिखता रहूंगा।
प्रत्यक्षा जी, अरुण जी, राजेश जी और गीत जी...आप सबका आभारी हूं।

चेतना के स्वर said...

gazzab likhte ho dada
shayad seedhe apne dil se likhte ho
isiliye likhawat me smart dikhte ho

चन्दन said...

waah re hero!