माथा तो नहीं है ना होठ?

नदी के पार कौन है?
या सब इधर ही पड़े हैं
अधमरे से?
किसने फेंका है
अपने घर के सिर पर पत्थर?
किसने बुलाई है पुलिस
खुद को पकड़वाने के लिए?
भोर के तारे को क्या दुख है कि
लाल-लाल रहती हैं उसकी आँखें?
कौन रोया है मेरी छत पर इतना
कि रात भर में उग आई है
मुझसे ऊँची घास?

ग्यारह इंच की दूरी से
किसी ने पिस्टल से मारी है गोली
कि माँ की उंगली की
नोक के आकार का
दिल में हो गया है छेद
जिसकी आँखें रहती हैं भरी-भरी।

सड़क पर चल रही हैं गाड़ियाँ,
एक गाड़ी में तुम,
रेड लाइट, स्पीड ब्रेकर, यू टर्न
नया शहर
जैसे जंगल,
उतर क्यों नहीं जाती तुम
बाँया पैर पहले रखकर
अपशकुन की तरह
कि जहाँ तक नज़र जाए,
हर पैर पर दिखाई दे
तुम्हारा पैर,
मेरा माथा।
जंगल में लग जाए आग।

हम जब महानगर थे
तब भी अपने घुग्घू कस्बे थे।
बहुत मन किया था कि
शगुन के नोट की जगह
गले लगाकर
तुम्हारे माथे पर रख दूं
स्नेह के होठ।
माथा तो नहीं है ना होठ?
माथे पर से तो नहीं होता ना
शरीर के अन्दर तक जाने का
कोई असभ्य रास्ता
जिसे चूमने के लिए
अधिकार होना जरूरी हो...

हाँडी भर खिचड़ी,
कलफ़ लगे कुरते,
अचार के मर्तबानों जैसे दफ़्तर
और मेरे हिस्से का
छटांक भर आसमान भी,
सब बेमानी हो गए हैं।

सुनो,
मिट्टी में मिल जाना
बहुत आराम देता होगा ना?



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6 पाठकों का कहना है :

शायदा said...

हां, बहुत आराम देता है मिट्टी में मिल जाना। क्‍योंकि इससे पहले होंठ और आत्‍मा के तकाज़े ख़त्‍म हो चुके होते हैं। गुम हो गई आत्‍मा को फिर फ़र्क नहीं पड़ता कि घास कितना बढ़ गई है, और कौन रोया है छत पर रातभर।
एक बार फिर अच्‍छा लिखा।

mehek said...

सुनो,
मिट्टी में मिल जाना
बहुत आराम देता होगा ना?


in aakhari panktiyon ne sab kuch puch bhi liya keh bhi diya,mitti mein milna shayad sukun pana ho,bahut achhi lagi rachana.badhai

rose said...

haa...isi ka intzaar hai.mitti me milne ka sukh.khatam hone ka sukh............
bhot achhi abhivyakti hai.badhaai.

बोधिसत्व said...

आप के कहने का अंदाज बहुत अलग है....कहते रहें...

kashish said...

badhiya hai

poemsnpuja said...

kya sach mein aaram deta hai mitti mein mil jaana...ya ek kasak wahan bhi teesti rahti hogi ki kisi ne uske maathe ko chooma nahin