ब्लू फ़िल्म

यह अब से लगभग दो साल पहले लिखी गई कहानी है, लेकिन मुझे बहुत पसन्द है और शायद आपमें से कुछ साथी इसे पढ़ना चाहें।

जिस तरह ज़रूरी नहीं कि चाट पकौड़ियों की सब कहानियाँ करण-जौहरीय अंदाज़ में चाँदनी चौक की गलियों से ही शुरु की जाएँ या बच्चों की सब कहानियाँ एक बार की बात है से ही शुरु की जाएँ या गरीबी की सब कहानियाँ किसानों से ही शुरु की जाएँ या कबूतरों की सब कहानियाँ प्रेम-पत्रों से ही शुरु की जाएँ, उसी तरह ज़रूरी नहीं कि सच्चे प्रेम की सब कहानियाँ सच से ही शुरु की जाएँ। इसीलिए मैंने रागिनी से झूठ बोला कि वही पहली लड़की है, जिससे मुझे प्यार हुआ है। ऐसा कहने से तुरंत पहले वह अपने विश्वासघाती प्रेमी की कहानी सुनाते सुनाते रो पड़ी थी। तुम रोते हुए बहुत सुन्दर लगती हो, यह कहने से मैंने अपने आपको किसी तरह रोक लिया था। फिर मैंने उसके लिए एक लैमन टी मँगवाई थी। मैंने सुन रखा था कि लड़कियों को खटाई पसन्द होती है, खाने में भी और रिश्तों में भी।

उसे कोई मिनर्वा टाकीज पसन्द था। मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह इमारत दुनिया के किस कोने में है। वह देर तक उसके साथ वहाँ बिताए हुए ख़ूबसूरत लम्हे मुझे सुनाती रही। बीच में और एकाध बार मैंने दोहराया कि वही पहली लड़की है, जिससे मुझे प्यार हुआ है। मेरी आँखें उसकी गर्दन के आसपास कहीं रहीं, उसकी आँखें हवा में कहीं थीं। मैंने सुन रखा था कि लड़कियों के दिल का रास्ता उनकी गर्दन के थोड़ा नीचे से शुरु होता है। मैं उसी रास्ते पर चलना चाहता था। वैसे शायद सबके दिल का रास्ता एक ही जगह से शुरु होता होगा। सबका दिल भी एक ही जगह पर होता होगा। मैंने कभी किसी का दिल नहीं देखा था, लेकिन मैं फिर भी इस बात पर सौ प्रतिशत विश्वास करता था कि दिल सीने के अन्दर ही है। हम सब को इसी तरह आँखें मूँद कर विश्वास करना सिखाया गया था। हम सब मानते थे कि जो टीवी में दिखता है, अमेरिका सच में वैसा ही एक देश है। यह भी हो सकता है कि अमेरिका कहीं हो ही न और किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिए कोई बड़ा सैट तैयार किया गया हो, जिसे अलग अलग एंगल से बार बार हमें दिखाया जाता रहा हो। जो लोग अमेरिका का कहकर यहाँ से जाते हों, उन्हें और कहीं ले जाकर कह दिया जाता हो कि यही अमेरिका है और फिर इस तरह एमिरलैंड अमेरिका बन गया हो। क्या ऐसा कोई वीडियो या तस्वीर दुनिया में है, जिसमें किसी देश के बाहर ‘अमेरिका’ का बोर्ड लगा दिखा हो? लेकिन टीवी में देखकर विश्वास कर लेना हमारी नसों में इतने गहरे तक पैठ गया था कि कुछ लोग अमेरिका न जा पाने के सदमे पर आत्महत्या भी कर लेते थे। ऐसे ही कुछ लोग प्रेम न मिलने पर भी मर जाते थे, चाहे प्रेम सिर्फ़ एक झूठी अवधारणा ही हो।
लेकिन डॉक्टर समझदार थे। कभी किसी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में नहीं लिखा गया कि अमुक व्यक्ति प्यार की कमी से मर गया। यदि दुनिया भर की आज तक की सब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखी जाएँ तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि दुनिया में हमेशा प्यार बहुतायत में रहा। लोग सिर्फ़ कैंसर, पीलिया, हृदयाघात और प्लेग से मरे।
वह एक पुराना शहर था जिसे अपने पुराने होने से उतना ही लगाव था जितना वहाँ की लड़कियों को अपने पुराने प्रेमियों से। रागिनी ने मुझे समझाया कि लड़के कभी प्यार को नहीं समझ सकते। मैंने सहमति में गर्दन हिलाई। गर्दन के थोड़ा नीचे मेरे दिल तक जाने वाला रास्ता भी उसके साथ हिला। फिर हम एक मन्दिर में गए, जिसके दरवाजे पर कुछ भूखे बच्चे बैठे हुए थे। अन्दर एक आलीशान हॉल में सजी सँवरी श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने वह सिर झुकाए कुछ बुदबुदाती रही। मैं इधर उधर देखता रहा। जब हम लौटे तो भूखे बच्चे भूखे ही बैठे थे। उनमें से एक ने दूसरे को एक भूखी गाली दी, जिस पर भड़ककर दूसरे ने पहले के पेट पर एक भूखा घूंसा मारा। और बच्चे भी लड़ाई में आ मिले। वहाँ भूखा झगड़ा होता रहा। अपने में खोई रागिनी ने यह सब नहीं देखा। मैंने जब उसे यह बताया तो उसने कहा कि भूख बहुत घिनौना सा शब्द है और कम से कम मन्दिर के सामने तो मुझे मर्यादित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। यह सुनकर मेरा एक भूखा सपना रोया। मैं हँस दिया।
वहीं पास में एक सफेद पानी की नदी थी जो दूध की नदी जैसी लगती थी। सर्दियों की रातों में जब उसका पानी जमने के नज़दीक पहुँचता होगा तो वह दही की नदी जैसी बन जाती होगी। उस नदी के ऊपर एक लकड़ी का पुल था जिस पर खड़े होकर लोग रिश्ते तोड़ते थे और दो अलग अलग दिशाओं में मुड़ जाते थे। उस पुल का नाम रामनाथ पुल था। मुझे लगता था कि रामनाथ बहुत टूटा हुआ आदमी रहा होगा।
हम उस पुल के बिल्कुल बीच में थे कि एकाएक रागिनी रुककर खड़ी हो गई। रिश्ते टूटने वाला डर मुझे चीरता हुआ निकल गया। वह पुल के किनारे की रेलिंग पर झुकी हुई थी। फिर उसने कुछ पानी में फेंका, जो मुझे दिखा नहीं।
मैंने कहा- रागिनी, तुम ही दुनिया की एकमात्र ऐसी लड़की हो, जिससे प्यार किया जा सकता है।
वह गर्व से मुस्कुराई। वह मुस्कुराई तो मुझे अपने कहने के तरीके पर गर्व हुआ।
वह एक ख़ूबसूरत शाम थी, जिसमें एक अधनंगी पागल बुढ़िया पुल पर बैठकर ढोलक बजा रही थी और विवाह के गीत गा रही थी। कॉलेज में पढ़ने वाले कुछ लड़के वहाँ तस्वीरें खिंचवा रहे थे। रागिनी ने अपना दुपट्टा हवा में उड़ा दिया जो सफेद पानी में जाकर गिरा। उसका ऐसा करना उन लड़कों ने अपने कैमरे में कैद कर लिया। चार लड़कों वाली फ़ोटो के बैकग्राउंड में दुपट्टा उड़ाती रागिनी।
उन चारों लड़कों को उससे प्यार हो गया था। वे जीवन भर वह तस्वीर देखकर उसे याद करते रहे। उन्होंने एक दूसरे को यह कभी नहीं बताया।
फिर रागिनी ने अपना मुँह मेरे कान के पास लाकर धीरे से कहा कि वह मुझे कुछ बताना चाहती है। उसके कहने से पहले ही मैंने आँखें बन्द कर लीं। उसने हाथ हवा में उठाकर कोई जादू किया और उसके हाथ में शादी का एक कार्ड आ गिरा। वह जादू जामुनी रंग का था जिस पर लिखा था, ‘रागिनी संग विजय’।
यह बहुत पहले ही किसी ने तय कर दिया था कि सब शादियों के निमंत्रण पत्र गणेश जी के चित्र से ही शुरु किए जाएँ। कहानी यहीं से आरंभ हुई।
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मार्च की बारह तारीख को उन दोनों की शादी हो गई। मार्च की बारह तारीख को बृहस्पतिवार था। मैं उदास था। मेरा मन नहीं लगता था। मैंने कोई नौकरी कर लेने की सोची। साथ ही मैंने सोचा कि नौकरी करके आज तक कोई करोड़पति नहीं बना इसलिए नौकरी वौकरी में कुछ नहीं रखा है। मेरा एक बार कश्मीर घूम आने का मन था, थोड़ी सी जल्दी भी थी। अख़बार में रोज युद्ध की संभावना की ख़बरें आती थीं और मैं कश्मीर के उस पार या आसमान के पार चले जाने से पहले उसे एक बार देख लेना चाहता था। मेरे पास पैसे नहीं थे। मेरे पिता स्कूल मास्टर थे। वे धरती का स्वर्ग नामक पाठ पढ़ाते हुए कश्मीर का बहुत अच्छा वर्णन करते थे लेकिन मुझे लगता था कि उन्होंने कभी कश्मीर के बारे में सोचा नहीं होगा। अशोका पास बुक्स वाले उन्हें हर कक्षा की एक ऑल इन वन उपहार में दे जाते थे तो उन्हें बहुत खुशी होती थी। लेकिन वे जोर से नहीं हँसते थे। उनके पेट में दर्द रहने लगा था। जब हम छोटे थे तो वे कभी कभी गुस्से में बहुत चिल्लाते थे। माँ कहती थी कि उस चिल्लाने की वज़ह से ही उनके पेट में दर्द रहने लगा है। डॉक्टर उसे अल्सर बताते थे। डॉक्टरों को लगता था कि वे सब कुछ जानते हैं। माँ को भी अपने बारे में ऐसा ही लगता था।
डॉक्टर बनने के लिए बहुत सालों तक चश्मा नाक पर टिकाकर मोटी मोटी किताबें चाट डालनी पड़ती थीं। हमारे राज्य में उन दिनों पाँच मेडिकल कॉलेज थे जिनमें छ: सौ सीटें थीं। जनरल के लिए कितनी सीटें थीं, यह पता लगाने के लिए बहुत हिसाब किताब करना पड़ता था। अधिकांश लोग जनरल ही थे। बाकी लोगों में से कोई खुलकर अपनी जाति नहीं बताता था इसलिए भी ऐसा लगता होगा कि अधिकांश लोग जनरल ही थे। ब्राह्मण दोस्त के सामने कुम्हार दोस्त कुछ दबा सा रहता था लेकिन फिर भी अपना कुम्हार होना, अपने चमार होने जितना शर्मनाक नहीं लगता था। बनिया होना परीक्षा में मुश्किल से पास होना था लेकिन फिर भी बनिया होना खुलकर स्वीकार किया जाता था।
हमारे कस्बे में एक बहुत विश्वसनीय अफ़वाह थी कि उस परीक्षा की तैयारी करते करते एक लड़की पागल भी हो गई थी। उस लड़की का नाम किसी को नहीं पता था। किसी को पता होता तो मैं उससे एक बार मिलना चाहता था। वह लड़की किस जाति की थी, यह भी पता नहीं चल पाता था।
माँ कानों के हल्के से कुंडलों और चाँदी की घिसी हुई पायलों के अलावा कोई गहना नहीं पहनती थी। माँ को गहने न पहनने का शौक हो गया था। मुझे सिनेमा न जाने का शौक हुआ था और मेरी बहन लता को अचानक नए कपड़े न खरीदने का शौक हो गया था। उसकी उम्र तेईस साल थी। वह एम एस सी करके घर बैठी थी और ब्यूटी पार्लर का काम सीख रही थी। कुछ न कुछ करते रहना एक ज़रूरी नियम था। वह पच्चीस तरह से साड़ी बाँधना सीख गई थी। मुझे एक ही तरह से पैंट पहननी आती थी। कभी कभी उसमें भी टाँगें देर तक फँसी रहती थीं। मैं बीएड कर चुका था और नई सरकार के इंतज़ार में था। मुझे उम्मीद थी कि नई सरकार आएगी तो थर्ड ग्रेड की खूब भर्तियाँ निकलेंगी। विधांनसभा चुनाव होने में एक साल बाकी था। मुझे लगता था कि पिताजी चाहते होंगे कि तब तक मैं किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा लूं लेकिन उन्होंने ऐसा कभी कहा नहीं था। माँ को अख़बार पढ़ना बहुत अच्छा लगता था लेकिन हमने घर में अख़बार नहीं लगवा रखा था। पिताजी कभी कभी स्कूल से पिछले दिन का अख़बार उठा लाते थे। उस शाम हम सब को बहुत अच्छा लगता था। हालांकि पिताजी के स्कूल में राजस्थान पत्रिका आती थी और माँ को भास्कर ज़्यादा पसंद था।
किसी किसी इतवार को मैं सुबह घूमकर लौटते हुए अड्डे से भास्कर भी खरीद लाता था। बाकी दिन का डेढ़ रुपए का और शनिवार, इतवार का ढ़ाई रुपए का आता था। उन दो दिन साथ में चिकने कागज़ वाले चार रंगीन पन्ने होते थे।
माँ कभी कभी बहुत बोलती थी और कभी कभी बहुत चुप रहती थी। स्कूल के टाइम को छोड़कर माँ हमेशा घर में होती थी इसलिए घर में रहो तो माँ के होने का ध्यान नहीं रहता था। बाहर जाकर माँ की बहुत याद आती थी। मैं सोचता था कि आज घर लौटकर उसे बताऊँगा कि तेरी याद आई, लेकिन घर आने पर फिर उसके होने का ध्यान चला जाता था। रागिनी कहीं नहीं होती थी इसलिए उसकी याद दिन भर आती थी। मुझे लगता था कि वह भी घर में रहने लगती तो चार छ: महीने बाद उसकी याद भी बाहर आती और घर में उसे भूल जाया करता।
पिताजी बोर्ड की परीक्षा की खूब सारी कॉपियाँ मँगवाते थे। हर उत्तरपुस्तिका को जाँचने के दो रुपए मिलते थे। मई और जून में मैं, माँ और लता उनके साथ मिलकर पूरी दोपहर कॉपियाँ जाँचते थे। किसी किसी कॉपी में सिर्फ़ एक पत्र मिलता था जो जाँचने वाले अज्ञात गुरुजी के नाम होता था। अक्सर वह गाँव की किसी तथाकथित लड़की द्वारा लिखा गया होता था जो घरेलू कामों में फँसी रहने के कारण ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाई होती थी और जिसकी सगाई का सारा दारोमदार उसके दसवीं पास कर लेने पर ही होता था। आखिर में आदरणीय गुरुजी के पैर पकड़कर निवेदन किया गया होता था और कभी कभी दक्षिणास्वरूप पचास या सौ का नोट भी आलपिन से जोड़कर रखा होता था। माँ उन रुपयों को मंदिर में चढ़ा आती थी। मैं और लता ऐसी कॉपियों पर बहुत हँसते थे। पिताजी ऐसी पूरी खाली उत्तरपुस्तिकाओं में किसी पन्ने पर गोला मारकर अन्दर सत्रह लिख देते थे।
रागिनी एक दिन लाल किनारी वाली साड़ी में बाज़ार में दिखी थी। वह कार से उतरी थी। कार में उसका पति बैठा होगा। मैं काले शीशों के कारण उसे नहीं देख पाया। रागिनी ने मुझे देखा और उसकी नज़र एक क्षण के लिए भी मुझ पर नहीं ठहरी। ऐसा करने के लिए मानसिक रूप से बहुत मजबूत होने की आवश्यकता थी। मैं ऐसा कभी नहीं हो सकता था। फिर वह सुनार की दुकान में घुस गई। कार का नम्बर ज़ीरो ज़ीरो ज़ीरो चार था। मुझे बहुत दुख होता था। मुझे दुख का शौक हो गया लगता था। मैं भिंडी खरीद रहा था जिसका भाव सोलह रुपए किलो था। वह सोना खरीद रही थी जिसका भाव मुझे नहीं मालूम था। उसे भी भिंडी का भाव नहीं मालूम होगा। मैंने तराजू में से दो तीन खराब भिंडी छाँटकर अलग की और आधा किलो के सात रुपए दिए। सब्जी वाला बहुत मोटा आदमी था और उसकी एक आँख नहीं खुलती थी। वह हँसता भी नहीं था। रागिनी तुरंत ही बाहर निकल आई। शायद लॉकेट वगैरह बनना दिया होगा जो बना नहीं होगा। इस बार उसने मेरी ओर नहीं देखा। कार का दरवाजा खुला। ड्राइविंग सीट पर एक पीली टी शर्ट वाला आदमी दिखा। रागिनी उसकी बगल में ही बैठ गई थी। फिर उसने ऊपर लगा शीशा कुछ ठीक किया और दरवाजा बन्द कर लिया।
उस रात मुझे कई सपने दिखे। एक में मैं जादूगर था। मैं लड़की को बीच में से आधा काटने वाला जादू दिखाने ही वाला था कि लड़की मेरे हाथ से माइक छीनकर मेरे जादू की असलियत दर्शकों को बताने लगी। दर्शक एक एक करके उठकर चले गए और पूरा हॉल खाली हो गया। फिर वह लड़की जोर से हँसी। फिर उस लड़की में मुझे रागिनी का चेहरा दिखा, फिर कुछ देर बाद माँ का, फिर कुछ देर बाद लता का।
दूसरे सपने में मैं ट्रक ड्राइवर था। मेरी एक आठ नौ साल की बेटी थी। मैं रोज रात को देर से घर आता था। तब तक मेरी बेटी सो जाती थी। सुबह उसके उठने से पहले मैं निकल जाता था। कई बार बहुत दिन में घर आना होता था। बहुत दिन का सपना एक ही रात में एक साथ दिख गया था। मैं दिन भर बहुत गालियाँ देता था और बहुत गालियाँ खाता था। मेरा रोने का मन होता था तो हाइवे पर किसी ढाबे वाले को कहकर लड़की का इंतज़ाम करवा लेता था। लड़की हर दुख की दवा थी। मुझे मेरी बेटी की भी बहुत याद आती थी। उसकी आवाज सुने हफ़्तों बीत जाते थे। एक ही सपने में हफ़्ते भी दिख गए थे। एक दिन मैं घर लौटा तो मेरी पत्नी ने मुझे एक कागज़ दिया जो रात को सोने से पहले मेरी बेटी ने उसे मेरे लिए दिया था। टूटी फूटी लिखाई में दो लाइनें लिखी थीं।
नदी किनारे बुलबुल बैठी, दाना चुगदी छल्ली दा।
पापा जल्दी घर आ जाओ, जी नहीं लगदा कल्ली दा।
फिर मैं बहुत रोया और जग गया। सच में रागिनी की बहुत याद आती थी। सोने का भाव दस हज़ार के आस पास कुछ था।
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लता ने कहा - वहाँ देखो, कितने जाले लगे हैं।
और माँ दौड़कर मेज उठा लाई और उस पर चढ़कर फूलझाड़ू से जाले उतारने लगी।
मैंने कहा- मुझे और भूख लगी है।
माँ दौड़कर रसोई में गई और आटा छानकर गूंथने लगी।
पिताजी ने कहा- मैं आज खाना नहीं खाऊँगा।
माँ ने उनकी रोटियों पर थोड़ा ज़्यादा घी चुपड़ दिया। वैसे घी पश्चिमी चिकित्साशास्त्र का दुश्मन था, जो किसी भी रोग में सबसे पहले बन्द करवा दिया जाता था।
मैंने देखा कि मेरी तीन माँएं हैं, एक रोशनदान पर टँगी हुई, एक आटा छानती हुई, एक घी चुपड़ती हुई।
मैंने लता को दिखाया- देख लता। तीन तीन माँ।
- हाँ।
उसने भी देखा।
मैं दौड़कर बरामदे में बैठे पिताजी के पास गया। - देखो पिताजी, तीन तीन माँएं।
- हाँ।
उन्होंने भी देखा।
मैंने लता से पूछा- क्या टाइम हुआ है?
- साढ़े दस।
- फिर तो एक माँ स्कूल में भी गई होगी।
- यानी हमारी चार माँ हैं?
- और एक को सुबह मैंने कपड़े धोते हुए भी देखा था।
- मतलब पाँच हैं?
- हाँ।
- यानी घर में हम आठ लोग हैं?
पिताजी ने बीच में कहा- नहीं, चार ही हैं।
- पिताजी आपका पेट दर्द कैसा है?
पिताजी बीच में बोले तो मुझे याद आया।
- खाना खाने के बाद हल्का हल्का होता है। आजकल जी कुछ ठीक नहीं रहता।
पिताजी अपना पेट पकड़कर सहलाने लगे। लता उनके लिए पानी लाने चली गई। मैंने कहा कि मेरे भी सीने में बहुत दर्द रहता है। उन्होंने सुना नहीं। लता ने रसोई में से ही सुन लिया था। वह दो गिलास पानी लेकर आई। स्टेनलेस स्टील के गिलास थे जिनपर लता का नाम खुदा हुआ था।
मैंने उससे पूछा, पानी पीने से दर्द ठीक हो जाता है?
पिताजी ने कहा, नहीं, दवा खाने से भी नहीं होता।
मैंने कहा, आजकल नकली दवाइयाँ बहुत बनने लगी हैं।
मेरी इस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। हम दोनों ने पानी पी लिया।
तकलीफ़ के बदले तकलीफ़ देना प्यार के बदले प्यार देने से ज़्यादा ज़रूरी लगता था। रागिनी एक लड़की का नाम था जिसके दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो कान, दो वक्ष, एक नाक, एक माथा, एक सिर था। रागिनी पहली लड़की नहीं थी, जिससे मुझे प्यार हुआ, और न ही आखिरी थी। वह सब लड़कियों जैसी थी। अब मुझे लगता था कि वह बुरी थी। जिन जिन लड़कियों से मैंने प्यार किया था वे बेहद स्वार्थी लड़कियाँ थीं। उनमें और लड़कियों से अलग कुछ भी नहीं था इसलिए मुझे सब लड़कियाँ बुरी लगने लगी थीं। लेकिन ऐसा सबको नहीं लगता था। ऐसा सबको नहीं लगता था इसलिए इसे खुलकर कहना फ्रस्ट्रेशन कहा जाता।
लेकिन ऐसा था। ऐसा था तो लता भी बुरी लड़की होगी। मेरी अच्छी बहन बुरी लड़की लता गिलास लेकर चली गई।
लता जाते जाते बोली- आज यस बॉस आएगी।
हम सबने अनसुना कर दिया। पिताजी अख़बार उठाकर पढ़ने लगे। मैं उठकर अपने जूते पॉलिश करने चल दिया। लता एक पुराना और एक कम पुराना गाना गुनगुनाने लगी। ऐसे जैसे कि गीत की किसी पंक्ति को गलत सुनकर आज यस बॉस आएगी समझ लिया गया हो।
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जबान पर...
और नया गाना चालू सा था। वह उसने कुछ मन्द आवाज़ में गाया।
आज अभी इसी वक़्त ही मुझको पता चला है...कि मुझे प्यार प्यार प्यार हो गया है...
हमारे घर में बुश कंपनी का एक पुराना टीवी था जिसमें चित्र कभी स्थिर नहीं रहते थे। वे ऊपर से नीचे नदी की तरह लगातार बहते रहते थे। टीवी पर आगे लगी चार घुंडियों में से एक पर वी. होल्ड लिखा हुआ था जिसका अर्थ हममें से किसी को नहीं पता था। उसको घुमाने से नदी का प्रवाह धीमा और तेज होता था और एक सीमा के बाद प्रवाह की दिशा भी उलट जाती थी। हम उसको झटके से लगातार दोनों तरफ ऐसे घुमाते थे जिससे पर्दे पर दृश्य लगभग स्थिर दिखता रहे। यह बहुत मेहनत और धैर्य का काम था। इसके लिए एक व्यक्ति को टीवी के बराबर में बैठे रहना पड़ता था। सब टीवी देख रहे होते थे तो मैं और लता बारी बारी से यह ज़िम्मेदारी संभालते थे। अकेले टीवी देखना बहुत मुश्किल काम लगता था। हम बड़े होते गए तो हमारा टीवी देखना कम होता गया। हमें टीवी न देखने का शौक हो गया था। यस बॉस लता की फ़ेवरेट फ़िल्म थी जो उसने कभी नहीं देखी।
मैं और पिताजी शाम को घूमने गए। ऐसा कई सालों बाद हुआ था कि हम बिना काम के एक साथ घर से बाहर निकले हों। मैं लाल दरवाजा, रामनाथ पुल, श्रीकृष्ण मन्दिर, गोल बाज़ार, शहद की छतरी और शहर की और भी बहुत सारी जगहों से बचता था। जिन जिन जगहों पर रागिनी की यादें चिपकी हुई थीं, उन जगहों के पास जाते ही आत्महत्या के ख़याल आते थे। मूंगफली खाना भी मर जाने जैसा लगने लगा था। मुझे लगने लगा था कि मैंने एक बार और प्यार किया तो इस छोटे से शहर में मेरे जाने को कोई जगह नहीं बचेगी। मुझे लगता था कि इसीलिए ज़्यादातर लोग नौकरियों के बहाने से अपने बचपन और जवानी का शहर छोड़ देते होंगे। नए शहरों में नए प्रेम होते होंगे। फिर कुछ साल बाद पैसे देकर तबादला करवाना पड़ता होगा। जिनके पास तबादले के पैसे नहीं होते होंगे, उन्हें खुदकुशी के ख़याल के साथ जीना पड़ता होगा। मैंने अपने पिता की ओर देखा। वे बीस साल से इसी शहर में थे। उनके चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ रही थीं। वे और दुबले होते जा रहे थे।
- पिताजी आपने कभी कछुआ देखा है?
- नहीं।
- आप पढ़ाते तो थे कि बहुत धीरे धीरे चलता है कछुआ।
- रोज़गार समाचार देखता रहता है ना?
- हाँ पिताजी। हरियाणा में वेकेंसी निकली हैं।
- वहाँ तो पैसा चलता है बस।
- पैसा कैसे चलता होगा? कछुए की तरह धीरे धीरे तो नहीं ना?
उन्हें नहीं सुना।
आधी बातें बिना सुने भी जीवन उसी तरह जिया जा सकता था। वैसे भी हमारे शहर में सुनने को ज़्यादा बड़ी बातें नहीं होती थीं। दो पड़ोसी एक कीकर के पेड़ को लेकर सालों तक झगड़ते रहते थे और फिर अगली पीढ़ी जवान होकर लड़ने लगती थी। लड़के अनजान लड़कियों के लिए झगड़ बैठते थे और हॉकी स्टिक और लाठियाँ लेकर आ जाते थे। अनजान बुरी लड़कियों को अक्सर ख़बर भी नहीं होती थी और ख़बर हो जाती थी तो यह गर्व का विषय होता था। लड़के बसों की यात्रा मुफ़्त करवाने के लिए कभी कभार स्कूल कॉलेजों में दस बीस दिन की हड़ताल भी कर देते थे। किसी दिन सरकारी स्कूल का कोई शिक्षक अपने ही छात्रों के हाथों पिट भी जाता था। बसें और सिनेमाहॉल जी भर के तोड़े जाते थे। कोल्ड ड्रिंक की बोतलें उठाकर भाग जाना होता था। पुलिस आँसू गैस छोड़ती थी। आँसू गैस नाइट्रस ऑक्साइड नहीं थी। नाइट्रस ऑक्साइड हँसाने वाली गैस थी लेकिन कुछ भी करवाने वाली गैस का नाम पूछा जाए तो नाइट्रस ऑक्साइड का नाम ही दिमाग में सबसे पहले आता था। नाइट्रस ऑक्साइड की दुनिया में भारी कमी हो गई लगती थी। पुलिस हँसाने वाली गैस छोड़ती तो शायद दुनिया ज़्यादा बेहतर बन सकती थी।
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घर के बाहर भीड़ लगी थी। तीन लड़के लता का पीछा करते हुए घर तक आए थे। लता ने तेजी से अन्दर घुसकर माँ को बाहर बुला लिया था और बताया था कि कई दिन से ये लड़के ब्यूटीपार्लर से घर तक उसके पीछे आते हैं। माँ उन लड़कों को रोककर गालियाँ देने लगी थी। वे लड़के भी हँस-हँसकर जवाब दे रहे थे। आस पड़ोस के और राह चलते लोग आ जुटे थे। अच्छा खासा तमाशा बन गया था।
पिताजी कुछ देर से बाहर आए। तब तक माँ अकेली बोलती रही। उसने लता को अन्दर भेज दिया। मैं घर में नहीं था। मैं यादव के घर में पड़ा रागिनी को याद कर रहा था। कोई पड़ोसी कुछ बोल नहीं रहा था। माँ चिल्लाती चिल्लाती रोने को हो गई थी। लड़के खड़े बेशर्मी से हँसते रहे थे।
पिताजी चश्मा लगाते हुए बाहर निकले। उन्होंने सफेद कुरता पायजामा पहन रखा था। उनके चेहरे पर कुछ था कि उनका अध्यापक होना पहली नज़र में ही पता चल जाता था। ऐसा लगता था कि उन्हें मारो तो वे सिर्फ़ धमकाएँगे, मार नहीं सकेंगे। उन तीन लड़कों में जो लड़का मुख्य लड़का था, वह गली की एक बूढ़ी औरत को बुला लाया। वह उसके उस दोस्त की माँ थी, जिससे मिलने वे तीनों रोज़ शाम को आते थे। उस बूढ़ी औरत ने चिल्ला चिल्लाकर इस बात को सत्यापित किया। पिताजी चुप रहे। हो सकता है कि पिताजी कुछ बोले भी हों मगर वह किसी को सुना नहीं। भीड़ और बढ़ गई थी जैसे शाहरुख़ ख़ान की कोई फ़िल्म चल रही हो। फ़िल्म होती तो उस दृश्य में मेरे पिताजी को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया जाता। सब मुख्य लड़के की मुस्कुराहट पर तालियाँ बजाते। मैं और लता भी हॉल में बैठकर ऐसी कोई फ़िल्म देख रहे होते तो पिताजी को खलनायक ही समझते। वैसे वे पूरी फ़िल्म के खलनायक या नायक कभी नहीं बन सकते थे क्योंकि वे अध्यापक थे। उनका एक ही सीन होता।
पिताजी ने थोड़ी तेज आवाज़ में उन्हें चले जाने को कहा तो भीड़ को सुना। भीड अब पहले से धीरे फुसफुसाने लगी। यह उन लड़कों को अपमानजनक लगा। मुख्य लड़के ने हँसना बन्द कर दिया। उसके पीछे पीछे बाकी दोनों लड़के भी गंभीर हो गए। सब वहीं खड़े रहे। फिर अचानक मुख्य लड़का तैश में आ गया और उसने पिताजी को गाली दी।
वह एक लम्बी गली थी, जिसमें हमारा घर था। उस गली के दोनों कोनों पर खड़े आदमियों ने वह गाली सुनी। हमारे घर के पचास मीटर के दायरे में ही साठ सत्तर लोग होंगे। घरों में बैठे लोगों और छत से देख रहे लोगों के साथ गाय, भैंसों, कुत्तों, चिड़ियों, कबूतरों, मेंढ़कों और चूहों के कानों को जोड़कर ठीक ठीक हिसाब लगाया जाए तो करीब दो हज़ार कानों ने वह गाली सुनी। मेरी जानकारी में पिताजी को ऊँचा तो नहीं सुनता था, लेकिन और कौनसी वज़ह हो सकती है कि पिताजी ने पूछा, क्या?
यह क्या उन लड़कों को किसी चुटकुले सा लगा और वे हँस दिए। भीड़ चुप, जैसे भीड़ को अजगर सूंघते हों। दो क्षण के लिए भीड़ का सिर झुका और फिर उठ गया। आँखें तीर की तरह हमारी देहरी पर। माँ, जिसे कभी कभी ऊँचा सुनता था, उसने अपनी बाटा की चप्पल उतारी और लड़के के मुँह पर दे मारी। माँ का निशाना इतना अच्छा नहीं था लेकिन लड़का बचने के प्रयास में नीचे झुक गया तो चप्पल सीधे उसकी नाक पर लगी। भीड़ हँसी, भीड़ फुसफुसाई, अजगर सूंघता हुआ लड़कों के पास आ खड़ा हुआ। लड़के स्तब्ध से कुछ क्षण खड़े रहे और फिर चले गए। पिताजी भीड़ के पार से गली के दूसरे मोड़ को देखते रहे। माँ ने नाली के पास पड़ी अपनी चप्पल उठाई और एक चप्पल पैर में पहने, एक हाथ में लिए भीतर चली गई। भीड़ भी छँट गई।
उस रात माँ ने राजमा की सब्जी बनाई। मैं उसी के साथ रोटियाँ खा रहा था, जब माँ ने मुझे शाम की पूरी घटना सुनाई। मुझे लगा कि उस घटना को सुनकर मुझे ज़ोरों से गुस्सा आना चाहिए था, जो नहीं आया। मैंने और दिनों की अपेक्षा आधी रोटी ज़्यादा ही खाई होगी। माँ बीच बीच में रोने लगती थी। मुझे दुख होता था। लता अन्दर बैठी किसी पत्रिका का बुनाई विशेषांक पढ़ रही थी। उस रात पिताजी मुझे नहीं दिखे, हालांकि वे घर में ही थे।
शाम को मैं यादव के घर में पड़ा रहा था। मैं रागिनी के गीत गाता रहा था और वह उकताकर अपना ब्लू फ़िल्मों का कलेक्शन उठा लाया था। उसके पिता का ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस था। उनके घर वी.सी.आर. था।
- इसके कितने सही हैं ना यार! बस ऐसे मिल जाएँ एक बार...
- फिर क्या करेगा?
- फिर तो वही बताएगी कि क्या किया?
उसने ऐसा चेहरा बनाया कि उसके दिमाग में बना चित्र मुझे साफ साफ दिख गया। मुझे हँसी आ गई। मैं उठकर बैठ गया और यादव की तरह टकटकी बाँधकर टीवी देखने लगा।
वह ख़ुशी नहीं थी, जो हमें उन फ़िल्मों को देखकर मिलती थी। या तो वह उम्र ऐसी थी या वह समय, या वह शहर, कि हमारा रोने का मन करता था तो भी हम ब्लू फ़िल्में देखते थे, गुस्सा आता था तो भी, प्यार के बिना जीना असंभव लगने लगता, तो भी...
हमारी आँखों की कोरों में इतनी बेचैनी भरी पड़ी थी कि उन दिनों वे फ़िल्में न होती तो हम आत्महत्या कर लेते। उन देशी विदेशी नीली फ़िल्मों ने हमें जिलाए रखा। वे फ़िल्में हमारी भगवान थीं।
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लता कम्प्यूटर सीखने लगी थी। उसकी नई चीजों को सीखने की ललक देखकर मुझे अचरज होता था। मुझ पर तो पुरानी बातों और यादों का बोझ ही इतना बढ़ता जाता था कि मैं ठीक से जीता रहूं, यही मुझे काफ़ी लगने लगा था। वह अब शाम को एक घंटा और देर से आती थी। तब तक अँधेरा होने लगता था। माँ-पिताजी मुझे उसे लेने जाने के लिए कहते थे, लेकिन मेरा मन नहीं करता था। मैं चुप अँधेरे में पड़ा रहता। माँ पिताजी बूढ़े होते जा रहे थे। मैं उनके लिए भी चिंतित होता था, लेकिन कुछ नहीं कर पाता था। नई सरकार आने में अभी वक़्त था।
लता पड़ोस के चार पाँच बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी। कभी कभी मुझे लगता था कि वह मुझे अपमानित करने के लिए ऐसा कर रही है। उस पर वह दिनभर झूठा लाड़ भी दिखाती थी तो मुझे गुस्सा आता था। वह रात को सोने से पहले मेरे लिए दूध लेकर आती तो मैं उसे डाँट देता था। वह रूआँसी हो जाती और दूध रखकर चुपचाप चली जाती। हमारे घर में दो कमरे थे। एक में मैं सोता था और एक में माँ, पिताजी और लता। मुझे अक्सर बहुत देर में नींद आती थी।
एक दिन रागिनी का फ़ोन आया। फ़ोन माँ ने उठाया। अमूमन मेरे लिए कोई फ़ोन नहीं आता था, इसलिए मैं फ़ोन के बिल्कुल पास भी बैठा होता तो भी फ़ोन नहीं उठाता था। हमारी कई माँएं थीं, इसलिए एक माँ बाहर आँगन धो रही होती थी तो दूसरी दौड़कर फ़ोन उठाने आती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। माँ बहुत अच्छे स्वभाव की थी लेकिन शक्की थी। कोई लड़की मुझे फ़ोन करेगी, यह सोचकर ही वह काँप जाती होगी। रागिनी ने मुझे बुलाने के लिए कहा तो माँ ने ढेर सारे सवालों की झड़ी लगा दी।
.....कौन हो, कहाँ से हो, किसकी बेटी हो, क्या काम है.....
उसने नाम बताया और अगले सवाल पर फ़ोन काट दिया। वैसे उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। फ़ोन काटना ही था तो बिना नाम बताए काटती। माँ ने मुझसे पूछा कि रागिनी कौन है? मैंने कहा कि मैं किसी रागिनी को नहीं जानता। ऐसा कहते हुए मैंने विशेष ध्यान रखा कि मेरी नज़रें माँ की नज़रों से मिली रहें। उसके बाद दिनभर माँ चुप-चुप खोई खोई सी रही। मैं जानता हूं कि माँ के ख़यालों में एक चित्र बना होगा जिसमें मैं एक सुन्दर लड़की के होठ चूम रहा हूंगा। बैकग्राउंड में हरियाली होगी या दस बाई दस का छोटा सा कमरा। बहुत संभावना है कि माँ ने बैकग्राउंड पर या मुझे पर ध्यान ही नहीं दिया होगा। माँ ने लड़की की आँखें-नाक-कान जाँचे होंगे। कल्पना के चित्र में अच्छे नैन-नक्श वाली लड़की ही आई होगी, इसलिए माँ को हल्की सी संतुष्टि मिली होगी। माँ ने सोचा होगा कि चित्र में कहीं कोने में लड़की की जाति भी लिखी रहती तो अच्छा रहता।
फिर शाम को मैंने यादव के घर से रागिनी को फ़ोन किया। उन दिनों दिनभर मेरी आँखें दुखती थीं। मेरी दृष्टि धुंधली होती जा रही थी। मुझे डर लगने लगा था कि कहीं मैं जल्दी ही अंधा न हो जाऊँ। यह डर दुनिया के सबसे बड़े डर की तरह लगता था। रागिनी फ़ोन पर देर तक रोती रही। उसने मुझे बताया कि वह विजय से प्यार नहीं करती और उसके साथ बहुत दुखी है। उसने कहा कि उसे मेरी बहुत याद आती है। उसका रोना और ख़ासकर रोने का कारण मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं खुशी से चिल्लाना चाहता था। मैंने उसे बताया कि मैं उसे कितना प्यार करता हूँ। यह मैंने इतना बताया कि सुनते सुनते वह चुप हो गई और फिर खिलखिलाकर हँसने भी लगी। उसने कहा कि मेरी माँ की बातें सुनकर लगता है कि वह मुझसे बहुत प्यार करती है। मैंने कहा कि हाँ। उसने कहा कि वह मुझसे मिलना चाहती है। मैंने उसे याद दिलाया कि हमने उस दिन सुनार की दुकान के बाहर एक दूसरे को देखा था। उसने कहा कि उस दिन विजय उसके साथ था। मैंने कहा कि हाँ। उसने कहा कि वह शकरकंद खा रही है। मैंने उसे कहा कि मुझे भी खिलाए। उसने पूछा, फ़ोन में से कैसे खिलाऊँ?
यह हम पहले भी बहुत बार एक-दूसरे से पूछते थे और हँसते थे। फिर मैंने उसे अपनी आँखें बताई। उसने मुझे जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाने की हिदायत दी।
वे बरसात के दिन थे, जब मैंने चलना सीखा था। जब मैंने संसार को ठीक से देखना सीखा था, वे भी बरसात के ही दिन थे। बरसात की ही एक शाम में मैंने रागिनी को पहली बार देखा था। उस फ़ोन के बाद हम बारिश के ही एक दिन मिले। उसने बताया कि वह उसकी एक सहेली शिल्पा का घर था। शिल्पा अकेली रहती थी। सामान से भरे उसके घर को देखकर ऐसा लगता नहीं था, लेकिन रागिनी ने मुझे यही बताया। उस दिन शिल्पा अपने घर की चाबी रागिनी को देकर चली गई थी। हर शहर में इस तरह की आपसी सहयोग की बहुत व्यवस्थाएँ होती थी।
मैं जब पहुँचा तो वह मेरा ही इंतज़ार कर रही थी। उसने हल्की नीली जींस और किसी गहरे रंग का टॉप पहन रखा था। उसके बाल खुले थे। दरवाज़ा खोलते ही वह मुस्कुराई। ड्रॉइंग रूम में टीवी चल रहा था, जिसके चित्र लहरों की तरह नहीं बहते थे। ड्रॉइंग रूम की छत पीली और दीवारें हरी थीं। एक फ़ानूस भी लटक रहा था। मुझे लगा कि मैंने उसे गले लगा लिया है, लेकिन जब उसने सोफे पर बैठने को कहा तो मेरी तन्द्रा टूटी। मैं बैठ गया। वह ख़ुश थी। मैं भी। वह मेरे पास आकर बैठ गई। उसकी जींस मेरी जींस को छू रही थी।
हमारी जान-पहचान के शुरु के दिनों में हम एक साइबर कैफ़े में मिला करते थे। वह पहले जाती थी। मैं क़रीब दस मिनट बाद घुसता था। हम एक ही केबिन में बैठते थे। मैं जब भी जाता, साइबर कैफे वाला मुझे देखकर मुस्कुराता था। मुझे अच्छा लगता था। गर्वीला अच्छा। मुझे कम्प्यूटर के बारे में उतना ही मालूम था, जितना अंटार्कटिका के बारे में था। अंटार्कटिका में बर्फ़ ही बर्फ़ थी, जो वायुमण्डल का तापमान बढ़ते जाने से साल दर साल पिघल रही थी। ओज़ोन परत में एक छेद था जो इसके लिए उत्तरदायी था। फ़्रिज़ से कोई हानिकारक गैस निकलती थी। समुद्रों में पानी का स्तर बढ़ता ही जा रहा था। अंटार्कटिका में लोग नहीं रहते थे। बस इतना ही।
वह केबिन इतना छोटा होता था कि हम न भी चाहते तो भी सटकर बैठना पड़ता और हम चाहते थे, इसलिए और भी सटकर बैठते थे। उसके घर में भी कम्प्यूटर था, इसलिए वह काफ़ी कुछ जानती थी। वह एक दो वेबसाइट भी खोलती थी। वह अपना ईमेल मुझे दिखाती। उसे हमेशा कई लड़कों के प्यार के प्रस्ताव वाले मेल आते थे। वह मुझे पढ़वाती थी। मैं उसकी हथेली और कसकर पकड़ लेता था। हमारी हथेलियाँ पसीज जाती थीं। हम मेल पढ़ते पढ़ते हँसते थे। फिर वह मेरे घुटने पर अपना हाथ रखती थी, अक्सर घुटने से कुछ ऊपर। उसका अर्थ जाने क्या होता था! लेकिन जो भी होता हो, मुझे उत्तेजना होती थी। वह बाल खोल लेती थी। वह बताती थी कि उसने बाल आज ही धोए हैं। मुझे लगता था कि वह रोज़ बाल धोती होगी। मैं यह उससे पूछता था तो वह मेरी नादानी पर हँसती थी। वह मुझे अपने बाल छूकर उनका गीलापन देखने के लिए कहती थी। मैं उसके बालों में उंगलियाँ फिराने लगता था। वह जैसे सर्दी में थरथराती थी और उसकी आँखें बन्द होने लगती थी। उसका चेहरा मेरे चेहरे के क़रीब आता जाता था। मैं दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़कर उसे बेतहाशा चूमने लगता था। उसके होठ, उसकी नाक, माथा, बन्द आँखें, उसके बड़े बड़े कान, गर्दन की नीली नसें, उसकी ब्यूटी बोन और ब्यूटी बोन का गड्ढ़ा। वह मेरे हाथ पकड़कर अपनी छातियों तक ले जाती थी। मैं पागल हो जाता था। वह बार बार बुदबुदाती थी कि मैं बहुत बुरा हूं। मैं उसे इतना देखना चाहता था कि मेरी आँखें कभी बन्द नहीं होती थीं।
वह उन दिनों बहुत सारे वादे करती थी मसलन मेरे बिना वह मर जाएगी और मर भी गई तो भी मुझे भूल नहीं पाएगी। उसके हर वादे पर मुझे लगने लगता था कि अब वह ज़ल्दी ही मुझे छोड़ने वाली है। मैं उसके होठों पर हाथ रख देता था। हम बस में साथ साथ बैठकर पास के शहर तक जाया करते थे और चाय पीकर लौट आते थे। उसे मूँगफलियाँ बहुत पसन्द थीं और मुझे वह।
उस दिन, जब उसकी जींस मेरी जींस को छू रही थी, वह मेरे कंधे पर सिर रखकर सुबकने लगी। उसके बाल मेरे गालों को छू रहे थे। मैंने उससे पूछा कि यह कौनसा हेयर स्टाइल है? उसने भर्राए गले से कहा- लेयर स्टेप। उसने कहा कि उसे अपने पापा की बहुत याद आती है और मेरी भी। उसने बताया कि उसके पापा तीन महीने पहले एक कार दुर्घटना में चल बसे थे। मुझे दुख हुआ। मेरा मन हुआ कि मैं कुछ भी करके उसका दुख मिटा दूं। मैंने उससे कहा कि मैं अभी ज़िन्दा हूं, इसलिए कम से कम मुझे याद करके तो उसे रोना नहीं चाहिए। मैंने कहा कि उसके पापा यदि उसे कहीं से देख रहे होंगे तो उसे रोते हुए तो नहीं देखना चाहेंगे ना!
यह दिलासा देने का बहुत पुराना तरीका था। इस समझाइश ने काम नहीं किया। वह बदस्तूर रोती रही। मैंने कुछ मनगढंत बातें यह कहकर कही कि ऐसा गीता में लिखा है। वे बातें सुनकर वह कुछ शांत होने लगी। मैंने उससे कहा कि मैं उससे बहुत प्यार करता हूं और उसे हमेशा खुश देखना चाहता हूं और उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं। मुझे अपनी बातें कुछ बाज़ारू सी भी लगीं लेकिन मैंने उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर, उसकी आँखों में आँखें डालकर ऐसा कहा। वह चुप हो गई और उसने अपने आँसू पोंछ लिए।
मेरे लौटने से पहले हमने मूंगफलियाँ खाईं, चाय पी और एक दूसरे को चूमा। उसने कहा कि वह मुझमें समा जाना चाहती है, लेकिन उसके लिए पहले विजय को अपनी ज़िन्दगी से दूर करना चाहती है। मैंने कहा कि मैं इंतज़ार करूंगा। उसने कहा कि इंतज़ार के अलावा कुछ और भी है, जो मैं उसके लिए कर सकता हूँ। मैंने पूछा, क्या?
उसने कहा कि क्या मैं उसे पच्चीस हज़ार रुपए दे सकता हूं? उसे तलाक़ की कार्रवाई के लिए इन रुपयों की ज़रूरत थी। ऐसा उसने मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर, मेरी आँखों में आँखें डालकर पूछा।
मैंने कहा कि हाँ।
जबकि मैं बेरोज़गार था और मेरे पिता की तनख़्वाह सात हज़ार रुपए महीना थी, माँ की डेढ़ हज़ार और लता ट्यूशन से बारह सौ रुपए कमाने लगी थी, मैंने उसके सिर पर हाथ रखकर यह वचन दिया।
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ज़िंदगी ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं हो सकती थी। लता अस्वस्थ रहने लगी थी। वह नींद से अचानक चौंककर जग जाती और चिल्लाने लगती। कभी मेरा नाम लेकर, कभी माँ का, कभी बिल्ली, कभी दीवार, कभी छाया। शुरु में हमने सोचा कि कोई डरावना सपना देख लेती होगी। लेकिन फिर उसका पसीने में भीगकर चिल्लाते हुए जगना हर रात होने लगा तो हमें चिंता हुई। अब वह जागने के बाद भी डरी रहती और हममें से किसी को नहीं पहचानती। हम पास जाने की कोशिश करते तो डरकर और चीखती। माँ कमरे का दरवाज़ा कसकर बन्द कर देती थी कि कहीं पड़ोसी न सुन लें। अगर माँ उसके साथ किसी रात अकेली होती और वह चिल्लाती तो माँ उसे थामने से पहले दरवाज़े की ओर भागती। कई बार हड़बड़ी में दरवाज़ा जल्दी से बन्द नहीं होता था और पड़ोसी कुछ न कुछ सुन ही लेते थे। वैसे दरवाज़े इतने भी बढ़िया नहीं थे कि आवाज़ को रोक पाते। कभी कभी तो वे हवा को भी नहीं रोक पाते थे। बंद दरवाज़े के बाहर खड़े होकर फूंक मारो तो उसका थोड़ा हिस्सा दूसरी तरफ भी महसूस होता था। यह वहम भी हो सकता था।
दस पन्द्रह मिनट बाद लता सामान्य हो जाती थी और भोलेपन से पूछती थी कि तुम सब आधी रात में बैठकर मुझे क्यों घूर रहे हो? कई दिन तक तो हम उसे कुछ नहीं बताते थे। मैं अपने कमरे में जाकर पड़ जाता। माँ उसे अपने पास खींचकर लाड़ से थपथपाकर सुलाती थी। हर रात हम अपने अपने बिस्तर पर पड़े नींद की नहीं, उसके जागने की प्रतीक्षा करते रहते थे। माँ पानी का एक गिलास और रामायण सिरहाने के पास मेज पर रखकर सोती थी। उसके सोने के बाद एक चाकू उसके तकिये के नीचे सरका देती थी, लेकिन सब बेअसर रहता था। हम हर दिन और चुप, और चिंतित, और निराश होते जाते थे।
एक रात उसके जागने के इंतज़ार में हम तीनों को ही नींद आ गई। पिताजी की आँख अचानक खुली तो उन्होंने लता के पलंग की ओर देखा। वह वहाँ नहीं थी। कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था। वे हड़बड़ाकर उठे और माँ को उठाया। माँ ने मुझे आवाज़ लगाई। तब तक पिताजी आँगन में पहुँच चुके थे। मैं और माँ दौड़कर उनके पीछे पहुँचे तो देखा कि वह मेन गेट वाली दीवार पर चढ़कर बिल्कुल सीधी खड़ी है। गली की ट्यूबलाइट की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। वह एकटक हमारी ओर देख रही थी। हम भीतर तक काँप गए। वह शुद्ध डर था, जो एक बार महसूस हो जाने के बाद जीवन भर सुख-दुख के हर क्षण में याद रहता है। लता की फ़िक्र भी उस डर के कई क्षण बाद हमारे ज़ेहन में आई।
वह दीवार करीब बारह फ़ुट ऊँची होगी। वह उस तरफ गिरती तो पक्के चबूतरे पर गिरती और इस तरफ़ गिरती तो पक्की ईंटों के फ़र्श पर। पिताजी दौड़कर लोहे के दरवाज़े पर से चढ़ने की कोशिश करने लगे। माँ दीवार के सहारे उसके बिल्कुल नीचे जाकर बाँहें फैलाकर खड़ी हो गई और मुझे कुछ भी नहीं सूझा। मैं बुत बना उसे देखता रहा। वह उस लता की तरह नहीं थी, जो मुझे हर साल राखी बाँधती थी और पैसे माँगती थी। उसकी दृष्टि का आत्मविश्वास मेरे सोने वाले कमरे में टँगी तस्वीर में कलेक्टर के हाथों ईनाम लेती लता से कई गुना अधिक था। वह बहुत भयंकर थी और बेबस भी। मैं आकर अपने बिस्तर पर लेट गया। मुझे पहली बार इतना हीन होने का अहसास हुआ। मैं जैसे कुछ भी नहीं था। मेरी अच्छी बहन लता किसी भी क्षण मर सकती थी। मुझे उसे दीवार से उतारकर अन्दर लाने में माँ-पिताजी की मदद करनी चाहिए थी, लेकिन मैं वह भी नहीं कर पाया। मैं निष्क्रियता की हद तक उदास था। यदि उस रात मेरी मौत का फ़रमान मुझे सुनाया जाता तो मैं उससे शत-प्रतिशत सहमत होता।
जब माँ और पिताजी उसे अन्दर लेकर आए तो मुझे रागिनी की बहुत याद आ रही थी। मैं उसी समय उससे बात करना चाहता था। फ़ोन मेरे कमरे में होता तो शायद कर भी लेता। लेकिन उसने अपना नम्बर मुझे नहीं दिया था। मैं पहले शिल्पा के घर तीन बार घंटी बजाता और यदि वह जग रही होती और इशारा समझ जाती तो रागिनी को फ़ोन करके मुझसे बात करने के लिए कहती। मगर इतनी रात को यह सब होना बहुत मुश्किल था और वह भी तब, जब फ़ोन दूसरे कमरे में रखा हो।
माँ रोती जाती थी, लता बेहोश थी, पिताजी उसका माथा मल रहे थे और मैं एक लड़की को याद कर रहा था, जो अपने पति के बिस्तर पर आराम से सो रही होगी। मैं यह भी सोच रहा था कि किसका हाथ कहाँ होगा और किसके पैर कहाँ? लेकिन मैं बुरा नहीं था, मज़बूर था। बहुत कमज़ोर भी।
आख़िर मैं उठकर दूसरे कमरे में गया। बल्ब की पीली रोशनी में पिताजी और भी बूढ़े नज़र आ रहे थे। लता के माथे पर तेजी से चलती उनकी उंगलियाँ कहीं ठहरकर रो लेना चाहती थीं। मेरे मन में आया कि जब तक नई सरकार नहीं आती, मुझे किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ा लेना चाहिए। मैंने पिताजी से लेट जाने के लिए कहा। उन्होंने रुककर मेरी ओर देखा और उठकर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गए। मैं लता के सिरहाने बैठकर उसका सिर दबाता रहा। माँ रोती रही।
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जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था, मुझे पूजा से प्यार हुआ था। वह मेरे साथ वाले बेंच पर बैठती थी, लता के साथ। वह प्यार भी बिना कुछ कहे-सुने जल्दी ही बुझ सा गया था, लेकिन तब से ही मुझे पूजा की याद लगातार आती थी। मैंने चौथी की कॉपियाँ किताबें अब तक सँभालकर रखी थी। एक दिन जब बहुत याद आई तो संदूक की तली से उन्हें ही निकालकर पढ़ने लगा। उन पर चढ़ी हुई अख़बारों की ज़िल्द पढ़ता रहा। उन साधारण सी ख़बरों में मेरे बचपन की खुशबू थी। मैंने सोचा कि तेरह साल पहले भी रोज़ मैं इन्हीं ज़िल्दों को पढ़ता होऊंगा।
एक तरफ़ सार्वजनिक निर्माण विभाग, बीकानेर के अधिशाषी अभियंता ने निविदाएँ आमंत्रित की थी। उसके ऊपर लिखा था- पॉलीथिन का करो बहिष्कार, यही है प्रदूषण का उपचार। फ़ेमस फ़ार्मेसी का विज्ञापन था, जिसमें कमज़ोर मर्दों से शर्म-संकोच छोड़ने के लिए कहा गया था। कच्ची बस्तियों की नियमन दरों का समाचार था। रेलवे की किसी भर्ती का परिणाम था, जिसमें सामान्य, ओबीसी, एससी और एसटी श्रेणियाँ थीं। अख़बार ग्यारह मई का था। उसके कुछ दिन बाद स्कूल बन्द हो गया था। जब दुबारा स्कूल खुले तो वह नहीं आई थी। प्रार्थना गाते हुए मेरा गला भर्रा जाता था।
ग्यारह मई को उसका जन्मदिन भी था। उसने क्लास में टॉफियाँ बाँटी थीं। जब वह मुझे टॉफ़ी देने लगी तो मैंने उसकी कलाई पकड़ ली थी। वह मुस्कुराई थी।
डॉक्टर ने लता के लिए कुछ दवाइयाँ दी थी। माँ किसी बाबा से मंत्र बुझी राख लाई थी, जो उसे चटा दी गई थी। माँ और लता सुबह-शाम नियमित रूप से पूजा भी करने लगी थी। हर तीसरे दिन डॉक्टर अकेले में आधा घंटा उसे कुछ समझाया करता था। मैं लता से पूछता कि क्या डॉक्टर उसे क्या समझाता है तो वह कहती कि ज़्यादा समय तो वही बोलती है। वह उससे उसके सपने सुना करता था- सोने वाले भी और जागने वाले भी। मेरे सपने कोई नहीं सुनता था। मुझे लगता था कि उसे सपनों की ही कोई बीमारी है और उस इलाज़ से वह ठीक भी होने लगी थी। माँ-पिताजी ने आस पड़ोस में किसी को कुछ नहीं बताया था और अब उन्हें उसकी शादी की चिंता भी सताने लगी थी। मैं चाह कर भी उनकी चिंताओं का साझेदार नहीं बन पाता था।
शिल्पा अकेली रहती थी लेकिन मैं उसे फ़ोन नहीं करता था, रुक रुक कर तीन बार घंटी ही बजाता था। ऐसा रागिनी ने कह रखा था। वे घंटियाँ अक्सर खाली ही लौटती थी। रागिनी का जब मन होता, वह तभी फ़ोन करती। उसकी आवाज़ मुझे पागल कर देती थी। मेरा अपने आप पर से नियंत्रण ख़त्म होने लगता था। प्यार मुझे असहाय बनाता था। मैं उससे कुछ नहीं पूछता था, फ़ोन न करने पर झगड़ता भी नहीं था। उसे फिर से खो देने के डर से मैं सिर्फ़ उसे हँसाता था। सब लड़कियों की तरह उसे भी हँसना बहुत पसन्द था और हँसाने वाले लड़के। मैं उसे अपने दोस्तों के चटपटे किस्से सुनाता, उसकी बेतुकी बेदिमागी बातों पर ठहाके मारकर हँसता। उसे लगता था कि मैं बहुत ख़ुश हूँ। मुझे लगता था कि उसने मेरी उदासी देख ली तो वह मुझसे दूर भागेगी। मैं अपनी बेकारी पर भी हँसता था, अपनी बहन की बीमारी पर भी और रागिनी की शादी पर भी। वह भी बेशर्मी से हँसती थी और अपनी शादी की रात की बातें फुसफुसाकर सुनाती थी। यह क्रूरता अक्षम्य थी।
कभी कभी आँखें इतनी दुखती थी कि मैं रात रात भर अपने बिस्तर पर पड़ा रोता रहता था। मैं कहीं भाग जाना चाहता था। मुझे हरे रंग के सपने आते थे या जलते हुए लाल रंग के। बाढ़ में बहते हुए शहर, जलते हुए घर, राख होते पेड़, काला आसमान।
एक दिन मैंने उससे कहा- मैं ख़त्म होता जा रहा हूं रागिनी।
- ख़त्म मतलब?
क्या यह किसी विदेशी भाषा का शब्द था या ख़त्म होना उसकी संस्कृति में ही नहीं था?
- ख़त्म मतलब ख़त्म....
- तुम्हें पता है, इस रंग का नाम क्या है?
- मुझे कुछ नहीं पता। मेरे भीतर आग सी लगी रहती है।
- मेजेंटा...
- हाँ?
- इस कलर का नाम।
मैं चुप रहा। वह तर्जनी से होती हुई अनामिका तक पहुँची। बीच में एक बार सिर उठाकर उसने मुझे देखा। मेरी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। मुझे जिस्म याद आई और जॉन अब्राहम।
मैंने पूछा- तुमने जिस्म देखी है?
- ना...
- तुमने ब्लू फ़िल्म देखी है कभी?
वह रुक गई, मुस्कुराई और चुप रही।
मैंने फिर पूछा- देखी है?
- नहीं।
वह मुस्कुराती रही। मुझे चिढ़ होती थी कि कोई अचानक इतना दुखी और तीसरे ही दिन इतना ख़ुश कैसे दिख सकता है!
- चलो मेरे साथ। हम शादी करेंगे।
उसे छटांक भर भी फ़र्क नहीं पड़ा। उसके होठ खूबसूरती से फैले रहे। उस कमरे में आमिर ख़ान का एक बड़ा सा पोस्टर चिपका था, जिसकी निगाह हर समय रागिनी की ओर ही रहती थी। मैं खड़ा हुआ और नाखूनों से वह पोस्टर खुरचने लगा। वह अब भी कुछ नहीं बोली। दीवार के पास रखी प्लास्टिक की कुर्सी मैंने हवा में फेंककर मारी। वह सामने की दीवार पर अपने अपमान के निशान छोड़ते हुए नीचे जा गिरी। मेरी साँसें दौड़ रही थीं। मैं खड़ा उसे देखता रहा। वह लेट गई। मुझे पता था कि वह लेट जाएगी।
तहलका डॉट कॉम उन दिनों सुर्खियों में थी। उन्होंने देश को शर्ट के बटन में लग सकने वाले वीडियो कैमरों से परिचित करवाया था। मेरी सफेद शर्ट के सबसे ऊपर वाले बटन पर जो कैमरा लगा था, यादव ने मुझे दिया था। वह दिल्ली से यह कैमरा लाया था। उसने मेरे हाथ में कैमरा पकड़ाते हुए रागिनी का वीडियो बनाने की सलाह दी थी तो मुझे बहुत गुस्सा आया था।
- तुम लोग साले कभी प्यार को समझ ही नहीं सकते...
मैं बौखला कर बोला तो वह हँस दिया था।
- मेरे देखने के लिए थोड़े ही बनाने को कह रहा हूं यार।
- मुझे नहीं चाहिए यह....
- फिर से भाग जाएगी तो पछताएगा कि फ़िल्म बना ली होती तो अच्छा रहता।
- वो प्यार करती है मुझसे....और तू चाहता है कि मैं उसे ब्लैकमेल करूं?
- तुझसे प्यार करती है, तभी तो उसके साथ सोती है। क्या नाम है उसका? ....हाँ, विजय।
यह कोई बॉलीवुड की फ़िल्म होती तो मैं उसका गिरेबान पकड़ लेता और हमारे बीच में एक दरार बनी आती, जिस पर इंटरमिशन लिखा होता। लेकिन वह मेरे बचपन का दोस्त था और सच बोल रहा था और मैं शाहरुख़ ख़ान नहीं था। यह सच इतना भारी था कि फिर कुछ देर तक कमरे में चुप्पी छाई रही। फिर उसने अपने टेपरिकॉर्डर पर मोहम्मद रफ़ी के गाने चला दिए और अख़बार पढ़ने लगा। गुलाबी आँखें जो तेरी देखी के पहले अंतरे के बाद मैं निकल आया था।
मुझे दुख था कि मैं शाहरुख खान नहीं था। मेरी उम्र के सब लड़कों को यही दुख था। मैं न उतना खुशमिजाज था और न ही उतना हाज़िरजवाब। मैं मद्धम होते सूरज और जलते हुए चाँद के बीच के किसी समय में रागिनी को पहाड़ या रेगिस्तान पर ले जाकर नहीं चूम सकता था। मैं भीड़ भरी सड़कों पर चिल्ला चिल्लाकर उसे नहीं पुकार सकता था। मेरे पास उसे तोहफ़े देने के पैसे नहीं थे। मैं बेरोज़गार था और निराश भी और मेरे बाल सफेद होने लगे थे। मैं अंग्रेज़ी बोलना भी नहीं जानता था। मेरे पास मोटरसाइकिल भी नहीं थी। रागिनी को बस में उल्टियाँ लगती थी और चक्कर आते थे।
मैंने उस शाम लता को यह सब बताया और उसकी गोद में सिर रखकर लेटा रहा। वह मेरी बन्द आँखों पर अपनी ठंडी हथेलियाँ रखे बैठी रही। मैं उसके या माँ के पास होता था तो अपने साधारण होने की हीनता कुछ देर के लिए कम हो जाती थी। मैंने उससे कहा कि मैं बहुत कमज़ोर हूं और डरकर कहीं भाग जाना चाहता हूं। मैंने उसे अपने जले हुए लाल रंग के अंगारों वाले सपनों के बारे में बताया।
बहुत शोर था और मुझे कुछ सुनाई नहीं देता था। पढ़ने या टीवी देखने से मेरी आँखें दुखने लगती थीं, ब्लू फ़िल्म देखने से भी। सब बताते थे कि बहुत रोशनी है और मुझे कोई रास्ता नहीं सूझता था। मुझसे रंभाती हुई गायों और भौंकते हुए कुत्तों की बेबसी नहीं देखी जाती थी। लता ने मुझसे कहा कि मेरे पैरों की उंगलियों के नाखून बहुत बढ़ गए हैं। मैंने उससे कहा कि मेरा उन्हें काटने का मन नहीं करता।
बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर उन दिनों व्यस्त रहिए मस्त रहिए और जीत आपकी जैसी किताबों की भरमार थी। मैं सब बुक स्टॉलों को जला देना चाहता था।
मैं निराश नहीं था, केवल उदास था और अकेली रागिनी ही इसके लिए उत्तरदायी नहीं थी। कुछ और भी था जो हममें से किसी को पता नहीं चलता था। हम सब कनफ्यूज़ थे। लता ने बताया कि उसे उस पीछा करने वाले लड़के से प्यार हो गया है। मैं उतना नहीं चौंका। मैंने उसे रागिनी के वीडियो के बारे में भी नहीं बताया, जो मैंने उस दोपहर बनाया था। मैं रोना चाहता था।
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पिताजी किसी का उधार चुकाने के लिए बैंक से बीस हज़ार रुपए निकलवाकर लाए थे। शायद किसी बाहर के आदमी को भनक लग गई होगी। उस दोपहर मैं अकेला घर में था, जब दो लड़के घर में घुस आए। बाहर का दरवाज़ा खुला छूट गया था। एक के हाथ में देसी कट्टा था। उसने मेरी कनपटी पर उसे रख दिया और बीस हज़ार रुपए माँगे। मैं डर गया। मैंने अन्दर जाकर बक्से में से रुपए लाकर उसे दे दिए। वे चले गए। मैं उनके जाने के बाद चिल्लाया। गली में उस वक़्त कोई नहीं था, इसलिए किसी ने उन्हें देखा भी नहीं होगा।
यह कहानी मैंने माँ और पिताजी के आने पर सुनाई। उनके चेहरे, आँखों और शरीर की जो प्रतिक्रिया थी, उसे विशेषणों का इस्तेमाल करके नहीं समझाया जा सकता। उसे वह व्यक्ति कुछ कुछ समझ सकता है, जिसने आठ सौ रुपए महीना कमाने वाले स्कूल मास्टर के बच्चों को तनख़्वाह वाली शाम घर की छत पर खड़े होकर पिता की बाट जोहते देखा हो। वह कुछ और अधिक समझ सकता है जिसने उनकी लकड़ी जैसी टाँगों और खुरदरे हाथों पर भी ग़ौर किया हो। वे भी कुछ कुछ समझ सकते हैं जिन्होंने जीवविज्ञान के प्रेक्टिकल में बेहोश मेंढ़क काटते हुए ग़लती से उसकी आँखों में देख लिया हो या जो जेठ की गर्मी में घर्र घर्र करते टेबल फैन के आगे चौथे नम्बर की खाट पर सोए हों और उमस भरी काली रात हो, जिसमें तारे न दिखाई देते हों।
मुझे महसूस होता था कि मैं जंगल के किसी छोटे पेड़ पर बने घोंसले में बैठा नीला कबूतर हूं और पेड़ के तने के पास बहुत सारी जंगली बिल्लियाँ बैठी हैं। मैं उनसे प्रेम करता हूं और उन्हें भूखा मरते नहीं देख सकता, इसलिए उन्हें दूसरे कबूतरों का पता बता देता हूं। दूसरे कबूतर सफेद हैं, जिन्हें शाँति की झूठी तलाश में उड़ाया गया है। बिल्लियाँ लड़कियों जैसी थी।
कुछ दिनों तक रागिनी मुझसे ज़्यादा बातें करने लगी थी। उन दिनों हमने बर्फ़ से ढके ऊँचे सफेद पहाड़ों पर तिकोनी छत वाली झोंपड़ियों में हनीमून के सपने देखे। उन सपनों में हमने एक दूसरे की कसमें खाई और चिकोटियाँ काटीं। हमने आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर एक दूसरे को ढूंढ़ने छूने का खेल खेला, जिसमें मैं बार बार हारा। मैंने उससे कहा कि मेरी आँखें ठीक हो जाएँगी तो मैं जीतूंगा। उसने सुना और वह भूल गई। उसने मुझसे यह भी कहा कि मैंने पहले उसे आँखों की तकलीफ़ के बारे में क्यों नहीं बताया? मैंने कहा कि मैंने बताया था। उसने कहा, नहीं। मुझे भी ऐसा याद आ गया कि मैंने नहीं बताया था। हम हँसे, मुस्कुराए।
हम साइकिल पर बैठकर निकलते और वह किसी ढलान वाली सड़क पर से मुझे गहराई तक ले जाती। हम अकेले पवित्र पेड़ों पर लाल चूनरें बाँधते और उनके नीचे सो जाते। सपने में सो जाना, सोते हुए सपने देखने का उल्टा था। जागने के सपनों में सो जाना दुविधा में डाल देता था कि सो रहे हैं या जाग रहे हैं? नींद के सपनों में सोना दो बार सोना था। इस तरह दो बार जागना नहीं हो सकता था। जागना एक ही बार होता। फिर भी जागना सोने से लम्बा खिंच जाता था।
मैंने एक रात सोते हुए सपने में लता को उस लड़के के साथ देखा जो उसके पीछे आता था और जिससे वह प्रेम करने लगी थी। मैं लता से उसका नाम भी पूछना भूल गया था, इसलिए वह सपने में बिना नाम के ही दिखा। मैंने लता को लगभग निर्वस्त्र देखा और चौकंकर जग गया। दुनिया का वह हिस्सा, जिसे हम अक्सर फास्ट फॉरवर्ड करके अपनी आँखों के आगे से हटा देना चाहते हैं, वही केकड़े की तरह हमारी पुतलियों पर चिपककर बैठ जाता है और हर समय दिखाई देता है। आँखें बन्द कर लेने पर भी। मैं न चाहते हुए भी उसके रिश्ते के प्रति असहज था। अपना ध्यान बाँटने के लिए मैंने कुछ और चीजों के बारे में सोचना शुरु कर दिया, जैसे कश्मीर समस्या का क्या हल निकल सकता है या गोल्फ़ सच में कोई खेल है या नहीं? मैंने अख़बार में गोल्फ़ खेलने वाले लोगों के बारे में पढ़ा ज़रूर था, लेकिन मैं एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं जानता था जिसे गोल्फ़ खेलना आता हो। यादव के पिता अमीर थे और उनके घर में फ़्रिज़ भी था, लेकिन वह भी किसी ऐसे आदमी को नहीं जानता था। कुछ साल पहले तक मैं समझता था कि यह किसी जानवर का नाम है।
मैंने एक दोपहर लता से पूछा, तुम्हारा लौंग और इलायचियों के बारे में क्या ख़याल है?
घर में हम दोनों ही थे। वह अपनी डायरी में कुछ लिख रही थी।
- ख़याल मतलब क्या?
- मतलब तुम क्या सोचती हो?
वह हँस पड़ी- कोई लौंग इलायची के बारे में क्या सोचेगा भला?
- हम अपने शब्दों को खाते जा रहे हैं। मुझे लगता है कि बीस साल बाद मैं तुमसे लौंग और इलायची के बारे में पूछूंगा तो शायद तुम इनका नाम भी सालों के बाद सुन रही होगी...तुम चौंक जाओगी।
यह और बात थी कि मैं बीस साल नहीं जिया।
वह कुछ सेकंड रुककर मुझे देखती रही और फिर लिखने लगी।
- क्या लिख रही हो?
- कम्प्यूटर के नोट्स हैं...
- मुझे चिढ़ सी है कम्प्यूटर से।
- क्यों?
उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।
- यूं ही। बहुत सी चीजों से है...बिना वज़ह...
- तुम्हें थोड़ा आध्यात्मिक हो जाना चाहिए।
- और बादाम के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है?
- हम उसे भी खाते जा रहे हैं। है ना?
- तुम कुछ नया नहीं सोच सकती। मुझे याद नहीं कि मैंने बादाम कब खाए थे?
- मैंने तो कभी नहीं खाए। मुझे याद है।
- अगर हम अपने दरवाज़े के बाहर...दहलीज़ पर खड़े होकर या बेहतर होगा कि किसी ऊँचे पत्थर पर खड़े होकर चिल्लाकर यही बात कहें तो क्या लोग हमारा यक़ीन करेंगे?
- मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा चिल्लाऊँगी। चिल्लाने का मौका मिले तो मेरे पास इससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी बातें हैं कहने के लिए...
- मैं चिल्लाना चाहता हूं लता।
- मैं सही कह रही हूं कि तुम्हें थोड़ा धार्मिक हो जाना चाहिए।
- पहले तुमने आध्यात्मिक कहा था।
- मुझे तो दोनों एक से ही लगते हैं।
- कौन दोनों?
- तुम और बादाम।
ऐसा कहकर वह ज़ोर से हँसी। मैं मुस्कुरा उठा।
- नाम क्या था उस लड़के का?
- किस... (किस पर उसका और उसकी हँसी का अचानक रुकना मुझे अच्छा नहीं लगा। मुझे उस वक़्त यह नहीं पूछना चाहिए था।) लड़के का?
- जिसने पिताजी को गाली दी थी।
वह चुप हो गई और चुप ही रही। मैं हमेशा बातों को गलत ढंग से शुरु करता था। मैं अक्सर वह सिरा पकड़ता था, जिसके बाद संवाद की संभावनाएँ ही समाप्त हो जाती थीं।
मैंने कहा- माँ बूढ़ी हो रही है। माँ के घुटनों में दर्द रहता है।
- माँ ने कहा तुमसे?
- नहीं, वह कहेगी नहीं।
- देखो तुम उन्हें बताना मत प्लीज़।
- तुम भाग तो नहीं जाओगी?
- मुझे नहीं पता...
- हमारे पास कैमरा होता तो मैं तुम्हारी फ़ोटो खींचकर रख लेता।
मैं चाहता था कि वह कह दे कि इसकी क्या ज़रूरत है? मैं कहीं भागी नहीं जा रही। लेकिन उसने ऐसा नहीं कहा।
मैं बोला- मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे।
- यह सब मत सोचा करो। यह डर सबको लगता है।
- बड़ी बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम ख़ुद उन्हें जलाएँगे लता। मुझे जलाना होगा...
- अच्छा अब चुप हो जाओ बस...
- माँ की आँखें भी जल जाएँगी लता...माँ के बाल...माँ की हथेलियाँ।
जाने क्या हो रहा था! मैं बेचैन हो उठा। यदि वह फ़िल्म का दृश्य होता तो लता मेरे लिए पानी लेकर आती। पानी पीकर मैं कुछ बेहतर महसूस करता।
- उसका नाम वीरेन्द्र है।
हम बहुत सी चीजों के बारे में कभी बात नहीं करते ना लता? जैसे हम मुर्गों और माँसाहारियों के बारे में बात नहीं करते, हम मरने और जन्म की बातों से भी कतराते हैं। हमने स्त्री और पुरुष के रिश्ते पर भी कभी बात नहीं की। मैं तुम्हें सारे सपने भी नहीं सुना सकता। मैं वे सब बातें भी नहीं बता सकता, जो मुझे दिन रात कचोटती हैं। हम सब ट्रेन में अचानक मिल गए अजनबियों या दो सभ्य साथी कर्मचारियों की तरह ही उम्र भर बात करते हैं। हम कभी शरीर की बात नहीं कर पाते, न ही आत्मा की। दार्शनिक होने का बहुत मन होता है तो भगवान की बात करने लगते हैं। मैं तुम्हारे लिए जो सोचता हूं और जो अपरिभाषित सा स्नेह मेरे पास है, वह मैं नहीं बता सकता। वीरेन्द्र या कोई और तुम्हारे जीवन के बड़े अंश पर अधिकार कर लेगा, यह सोचकर ही मैं काँप जाता हूं। यह पाप या पागलपन नहीं है। यह गंगा या सती सीता जितना पवित्र है, लेकिन तुम्हें कहूंगा तो पाप जैसा बन जाएगा। अह अस्पष्ट और असहज है लता, जिसे कहना और सुनना ही हमें नहीं सिखाया गया। सबका ज़ोर हमें मुहावरे, लोकोक्तियाँ व्याकरण और कविताओं की सप्रसंग व्याख्याएँ सिखाने पर रहा है। एक समझदार साज़िश के तहत हमें यह विकल्प बताया ही नहीं गया कि कविताएँ गढ़ी भी जा सकती हैं। तुम नहीं जानती लता...इस सदी के सबसे महान कवियों की कविताएँ उनकी आँखों से खून बनकर टपकी हैं और तुम विश्वास नहीं करोगी, जब उन्हें पागलखानों में ले जाया जा रहा थ तो उनका गर्म ख़ून सड़कों पर कविताएँ लिखता हुआ चला। बाद में इन्होंने उन सड़कों को तोड़कर चिकने राजमार्ग बना दिए लता, जिन पर हम फर्राटे से गाड़ियाँ दौड़ाते हुए बड़े बड़े शहरों से और बड़े बड़े शहरों की ओर जाते हैं। स्कूल की किताबों में मैंने और तुमने उन कविताओं को कभी नहीं पढ़ा। हमने साखियाँ पढ़ी और उनके ऊपर आधी छुट्टी में परांठे रखकर खाए। हम सब एक गहरे अँधेरे में हैं लता और यह पहला या आखिरी अंधकार नहीं है। हमने बड़ी बड़ी लाइटें जला ली हैं और हम अपनी अपनी रोशनी के लिए खुश हैं। हम इतने डरपोक हैं कि आँखें बन्द करते हैं तो डर जाते हैं। मैं ये लैम्प, ट्यूबलाइटें, बल्ब, दिए और मोमबत्तियाँ तोड़कर उस लम्बे गहन अँधेरे में आँखें खोलकर सीधा तनकर खड़ा हो जाना चाहता हूं, जैसे हम स्कूल में प्रार्थना में हुआ करते थे और उसके बाद जन-गण-मन गाते थे। मुझमें प्रेम ख़त्म होता जा रहा है लता और मैं सच में तुम पर कोई आरोप नहीं लगाना चाहता, लेकिन इसकी दोषी तुम भी हो। मैं नहीं समझा सकता कि मेरा जीना कितना भयानक है? हम धर्मशालाओं में शादियाँ करेंगे लता, हमें रातों में किसी अकेले कमरे में छिपकर बच्चे पैदा करने होंगे और हम अपने पिताओं को जलाते जाएँगे। यह दुनिया मेरी नहीं है लता। मैं यहाँ नहीं रहना चाहता...मैं थूकता हूं इसके अस्तित्व पर।
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मैं नहीं जानता था कि रागिनी उन बीस हज़ार रुपयों का क्या करेगी? पहले तो वह बुटीक खोलना चाहती थी। लेकिन वह एक इच्छा पर इतने दिन टिकने वाली नहीं थी और टिकती भी तो बीस हज़ार रुपयों में बुटीक कैसे खोला जा सकता था?
मैं जानता था कि उसे तलाक़ की कार्रवाई के लिए उन पैसों की ज़रूरत नहीं है। वह तलाक़ चाहती ही नहीं थी। हम दोनों में शायद एक ही बात कॉमन थी कि हम दोनों कश्मीर जाना चाहते थे। यह भी हो सकता था कि वह उन पैसों से कश्मीर जाना चाहती हो, विजय के साथ या अकेले ही। उसे बच्चे भी बहुत पसन्द थे लेकिन बच्चे पैदा करने के लिए तो पैसों की ज़रूरत नहीं होती। उसे लालकिला भी अच्छा लगता था लेकिन वह भी बिकाऊ नहीं था और बिकाऊ होता भी तो बीस हज़ार में नहीं बिकता। हम दोनों ने एक बार साथ में लालकिला देखा था। लालकिले से लौटते हुए हम एक दूसरे किले में रुक गए थे। उस छोटे वीरान किले में एक बड़ा सा तालाब था, जिसमें सूखे पेड़ थे। मैं पत्थरों के बीच बैठा था। वह सामने इस तरह खड़ी थी कि उसका सिर थोड़ा सा हिलता था तो मुझे दोपहर का सूरज दिखाई देता था। मैंने तालाब में पत्थर फेंकते हुए उससे कहा था कि मैं उससे प्यार करता हूं। वह मेरी और लगातार देखती रही थी और मुस्कुराई थी। कम्बख़्त सूरज की वज़ह से मैं उसकी आँखें भी नहीं पढ़ पाया था। उसे अच्छा लगा था। ऐसा उसने कहा था। क्या वह उन बीस हज़ार में कहीं से यह अच्छा लगना खरीदना चाहती थी?
नहीं, पिताजी ने मुझे बताया था कि अच्छा लगना दुनिया के किसी बाज़ार में नहीं मिलता। यदि मिलता होता तो वे एक-दो ट्यूशन पढ़ाकर माँ के लिए थोड़ा अच्छा लगना खरीद लाते।
यादव ने भी रागिनी से यही पूछा कि उसने उन बीस हज़ार रुपयों का क्या किया? वह घर में अकेली थी और उसके लिए चाय बनाकर लाई थी। उससे पहले यादव ने कहा था, बहुत सामान है तुम्हारे घर में।
वह पीली छत, हरी दीवारों और फ़ानूस वाला ड्रॉइंग रूम था- रागिनी का ड्रॉइंग रूम। वह खुश हुई थी और उसने कहा था कि बस ज़रूरत भर की चीजें हैं। फिर उसने टीवी ऑन कर दिया था। मैं या लता वैसा टीवी देखते थे तो हमें बहुत अजीब लगता था। हमारी आँखें ऊपर से नीचे चलते हुए फ़्रेम की आदी हो चुकी थी।
फिर वे दोनों दो बहनों की कहानी वाले एक धारावाहिक की बात करने लगे। उन दोनों बहनों के चेहरे एक जैसे थे। यादव ने कहा, हमशक्ल। मैं बचपन में यह शब्द बहुत मुश्किल से सीख पाया था। मुश्किल चीजें हमेशा याद रहती हैं। इसी तरह ज़िप वाले नेकर मुझे बहुत कष्ट देते थे। यादव ने उसे बताया कि उसे सनी देओल की फ़िल्में बहुत पसन्द हैं और एक लड़की लगभग उसके बिस्तर पर आ गई थी, जिसे छोड़कर वह पाँचवीं बार गदर देखने पहुँचा था। रागिनी हँसी। मुझे उसका हँसना बहुत अच्छा लगता था और उसे हँसना बहुत अच्छा लगता था और इस तरह अच्छा लगना बहुत आसान था। मेरा मन करता था कि मैं उस अच्छा लगने का कम से कम आधा हिस्सा माँ को दे दूं। लेकिन माँ को अपने गाँव वाला अच्छा लगना चाहिए था। उसके लिए हमें माँ को उसके मायके छोड़कर आना पड़ता, जहाँ सांय सांय करता एक उजाड़ घर था। वहाँ भी उसे बुरा ही लगता। माँ को अच्छा लगने के लिए कम से कम चालीस साल पहले जाना पड़ता, जहाँ वह बच्ची होती। उस स्थिति में पिताजी को भी फिर से जवान होना पड़ता। इसमें यह भी फ़ायदा होता कि उनका पेट ठीक हो जाता। फिर वे कभी नहीं चिल्लाने की कसम भी खा लेते। इस तरह सबको मौके मिलने चाहिए थे कि लोग अपनी गलतियाँ सुधार सकें। गलतियों का अहसास होना और उन्हें सुधारने के लिए अतीत में न लौट पाना, गलतियाँ करने से भी बुरा था।
माँ और पिताजी की उम्र चालीस साल कम होने पर मुझे और लता को पिछले जन्म में लौटना पड़ता। लौटते हुए रास्ते में जब वह आठ साल की होती तो स्कूल के कमरे की ढहती हुई छत का पत्थर अपने सिर पर गिरने से भी बचा सकती थी। वह पहले ही दौड़कर आसमान के नीचे आ जाती और छत टूटने को देखने का इंतज़ार करती रहती। कोई और बच्चा भी उधर से गुज़र रहा होता तो वह उसे आवाज़ लगाकर उधर जाने से रोक लेती। बच्चा उसकी बात न मानता तो वह उसे बातों में लगा लेती। बचपन से ही उसे दुनिया भर की बातें आती थी। वह बच्चा मैं भी हो सकता था, लेकिन मैं होता तो बातों में लगने के लालच के बिना भी चुपचाप उसकी बात मान लेता। इस तरह उसके सिर पर पत्थर का गिरना और उसका एक घंटे तक दर्द से बिलबिलाना टल जाता और बरसों बाद की उसकी बीमारी, सपने, बेहोशी और कभी कभी का पागलपन भी। वैसे माँ के अनुसार पागलपन तो हमारे खून में था।
पिछले जन्म में हम कुछ भी हो सकते थे। हो सकता है कि लता लड़का होती और मैं लड़की और हम भाई-बहन भी न होते। वैसे मुझे विकल्प दिया जाता तो मैं कोई पक्षी बनना चाहता जैसे साइबेरियन सारस। विकल्प होने पर लता खरगोश बनना चाहती और रागिनी लड़की। उसे लड़की होना बहुत पसन्द था। पिताजी लेखक बनना चाहते और माँ डॉक्टर। यादव, यादव ही रहना चाहता। उनके घर में कार थी।
हाँ, मैं मर गया था। आँखें बहुत दुख रही थी, इसलिए मैंने मरने से पहले रसोई में से एक कपड़ा ढूंढ़कर उसे ठंडे पानी में भिगोकर आँखों पर बाँध लिया था। बेकारी में मरने वाले लोग आमतौर पर सस्ती रस्सियों और छोटी लाइन की रेलगाड़ियों का इस्तेमाल करते होंगे। वैसे रेलगाड़ी खरीदनी नहीं पड़ती इसलिए बड़ी लाइन की गाड़ी के आगे कटकर भी मरा जा सकता है। सस्ती रस्सियाँ कई बार टूट जाती होंगी। दूसरी रस्सी खरीदने के पैसे नहीं बचते होंगे इसलिए कुछ आत्महत्याएँ स्थगित भी हो जाती होंगी। वैसे मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहता कि मैं क्यों और कैसे मरा? मुझे सहानुभूति और स्पष्टीकरणों से बेहद चिढ़ थी।
वह कैमरा और उसमें बनी फ़िल्म यादव के पास ही रह गई थी। उसने उसे एडिट करके फ़ालतू दृश्य काट दिए थे। अब वह सोलह मिनट सैंतीस सेकंड की आदर्श ब्लू फ़िल्म बन गई थी। उसके अपने परिष्कृत रूप में तैयार हो जाने के बाद उसने रागिनी से सम्पर्क किया और क़ीमत माँगी। क़ीमत एक लाख थी और उसी के लिए वह उसके घर आया था, जब वे दोनों हमशक्ल बहनों वाले धारावाहिक की चर्चा कर रहे थे। यादव ने फिर से उससे पूछा कि उसने उन बीस हज़ार रुपयों का क्या किया?
लता ज़िद पर अड़ गई थी कि वह वीरेन्द्र से ही शादी करेगी। पिताजी चुपचाप अख़बार पढ़ते रहे थे जिसमें मतदान के दौरान आठ ज़गहों पर बूथ कैपचरिंग का समाचार था। माँ उसे डाँटती और रोती रही थी। माँ हौद में से पानी निकालकर पूरे घर में बाल्टियों से फेंक रही थी। फ़र्श को लग रहा होगा कि बारिश आ रही है और सब छतें चूने लगी हैं। छतों को लग रहा होगा कि गली का पानी घर में भर रहा है। माँ कहती थी कि जो इंसान अपने माँ बाप से प्यार नहीं कर सकता, वह किसी से नहीं कर सकता। लता कहती थी कि वह वीरेन्द्र से इतना प्यार करती है कि अपनी कलाई की नस भी काट सकती है।
वे डर गए। वे इतना डरे कि माँ ने रोना और पानी गिराना बन्द कर दिया। पिताजी तुरंत फ़िल्म वाला पन्ना पढ़ने लगे जिसमें बिपाशा बसु की कोई बात थी। फिर अगले दिन पिताजी वीरेन्द्र के घर गए। उस सुबह से ही उनकी कमर में दर्द था और उन्हें झुककर चलना पड़ रहा था। वे चलते चलते सड़क पर ही बैठ जाते थे और बैठते नहीं थे तो गिर जाते थे। एक दो बार ऐसा भी लगा कि कोई बस उनके ऊपर से निकल जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ।
वीरेन्द्र के पिता एक भले आदमी थे और सज्जन पुरुष थे और अच्छे स्वभाव के थे। वे कलफ़ लगे हुए कोरे सफेद कुरते पहनते थे और मुस्कुराते रहते थे। वे नगरपालिका अध्यक्ष बनने का सपना रखते थे। उन्होंने पिताजी से उनकी कमर के बारे में पूछा और चिंता जताई। उन्होंने कहा कि एक अध्यापक का जीवन बहुत संघर्षमयी होता है और उन्हें अध्यापकों और भिखारियों पर बहुत तरस आता है। वे एक दयालु इंसान भी थी। कुछ मिनट बाद जब पानी आया तो उन्होंने भिखारियों वाला कथन दोहराते हुए उसके लिए क्षमा भी माँगी। उनका स्वभाव अत्यंत विनम्र था। उन्होंने पिताजी से कहा कि वे सिगरेट पीना चाहते हैं और क्या वे मेज पर से लाइटर उठाकर उन्हें पकड़ा सकते हैं? वे तख़्त पर अधलेटे थे। पिताजी ने उठकर लाइटर पकड़ा दिया। वीरेन्द्र के पिता को अपनी धन-दौलत का ज़रा भी घमंड नहीं था। उन्होंने सिगरेट सुलगाते हुए, लाइटर पकड़ाने में पिताजी को हुए कष्ट के लिए माफ़ी भी माँगी। वे बाकी अधेड़ लोगों की तरह प्रेम को सामाजिक बुराई भी नहीं मानते थे। उन्होंने ख़ुद कहा कि वीरेन्द्र लता से बहुत प्यार करता है। वे समाज के दुख-दर्द को अपना मानने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने बताया कि वे लता की बीमारी के बारे में जानते हैं और रोग तो किसी के शरीर में भी हो सकता है। उन्होंने ईमानदारी से स्वीकार किया कि उन्हें ख़ुद मधुमेह है। वे सत्यवादी व्यक्ति थे। विवाह सात लाख में तय हुआ। वीरेन्द्र भी लता से बहुत प्यार करता था।
फिर रागिनी यादव को अपनी शादी की एलबम दिखाने लगी थी। वह हर फ़ोटो में मुस्कुरा रही थी। शुरु की एक फ़ोटो में उसे सिर्फ़ मेंहदी से रचे हाथ कैमरे के सामने रखने थे और उसने दोनों हाथों के बीच अपना मुस्कुराता हुआ चेहरा भी रख दिया था। विदाई के समय भी वह रो नहीं पाई थी, इसलिए फ़ोटोग्राफर ने बाद में एक और लड़की को दुल्हन बनाकर तस्वीरें खींची थी और उन्हें ही एलबम में लगाया था।
यादव ने कहा कि वह सौदा नब्बे हज़ार में तय कर सकता है, यदि रागिनी यह बता दे कि उसने उन बीस हज़ार रुपयों का क्या किया? यह जानने के लिए वह बहुत उत्सुक था। वह मुस्कुराई और अलमारी में से एक अख़बार उठाकर लाई। यादव ने उसकी तारीख पर ध्यान नहीं दिया। रागिनी ने बताया कि इस दिन विजय का जन्मदिन था और वह उसे कोई सरप्राइज़ गिफ्ट देना चाहती थी। इसलिए उसने दैनिक भास्कर के स्थानीय संस्करण के तीसरे पन्ने पर बड़ा बड़ा आई लव यू विजय छपवाया था। उसने कहा कि उसने अपने पूरे शरीर पर चार ज़गह उसके नाम का टैटू भी गुदवाया है। पूरा खर्च छब्बीस-सत्ताईस हज़ार रुपए हो गया था।
वह कुछ बड़ा सोच रहा था। उसे निराशा हुई। उसे दस हज़ार जाने का दुख भी हुआ। वह वे टैटू भी देखना चाहता था, लेकिन उसने ऐसा कहा नहीं। उसने अपने बैग में से एक सीडी निकाली। रागिनी अन्दर वाले कमरे में गई और पैसे ले आई। यादव ने कहा कि वह चाहे तो सीडी चलाकर चेक भी कर सकती है। उसने कहा, नहीं। यादव ने भी बिना गिने नोट अपने बैग में रख लिए। सब नोटों पर कहीं कहीं नीली स्याही भी लगी हुई थी। चलते चलते यादव ने कहा कि वह बहुत सुन्दर है। उसने शुक्रिया कहा।
यादव ने पैंतालीस हज़ार रुपए मेरे माँ और पिताजी को दे दिए। उस सीडी की उसने कई कॉपी बना रखी थी, जिनमें से कुछ उसके पिता के ट्रांसपोर्ट के बिज़नेस के ज़रिए नेपाल में ले जाकर बेच दी गई। वहाँ से वे भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी बिकी। मेरा मृत्यु के बाद के जीवन में बहुत विश्वास नहीं था, फिर भी मैं चाहता था कि उस फ़िल्म के आख़िर में क्रेडिट लिखे आते, जिनमें मेरे नाम के आगे स्वर्गीय लिखा होता। ज़िन्दा लोगों को ब्लू फ़िल्म का एक फ़ायदा यह भी था कि आप अपनी पीठ को पहचानना सीख सकते थे। नहीं तो हो सकता है कि किसी दिन कोई आपकी पीठ उठाकर ले जा रहा हो और आप शांत रहकर उसे देखते रहें।
उस ब्लू फ़िल्म से होने वाली कमाई का आधा हिस्सा यादव रॉयल्टी की तरह पिताजी को देता रहा। उसने कहा कि इसे वे मेरी अमानत समझकर रख लें। वे रखते रहे। छ: महीने बाद जब लता की शादी हुई तो उन्हें जीपीएफ से सिर्फ़ एक लाख निकलवाने पड़े।
ज़िन्दगी भी एक ब्लू फ़िल्म थी जिसके सुखांत के लिए हम सब नंगे हो गए थे। सुखांत सबको पसन्द थे, ख़ासकर माँ और रागिनी को।



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6 पाठकों का कहना है :

Vimlesh Tripathi said...

Gaurav ye tumhari behtreen kahaniyn me se ek hai.... Abhar...

संध्या आर्य said...

दरवाज़े के पीछे की
शोरगुल से
कुंडी बेचैन हो
खट्क जाती और
माँ बिस्तर में
बुरे सपने में पाती की
उसे प्यास लगी है
और वह अंधेरे में
चलने की कोशिश में
दरवाजे को खोल देती और
असहाय था
दरवाजे के पीछे का दृश्य
जिसमे सब सांस ले रहे थे और
कांप भी !!

संध्या आर्य said...

तपती दोपहरी में
आंखे रेगिस्तान थी
कई कैक्टस निकल आये थे
जिस्म के सतही हिस्सो में
जिसे घण्टो नोचते हुये
गुजर जाता था
दृश्यो का भूख
जिसमे सारा जहान
गीला होता था
आंखे सुखी और भूखी !!

Vijay Kumar Sappatti said...

boss, hats off to you .. maine apne jeevan me itni acchi kahani bahut kam hi padhi hai.. salaam kabul kare..

my first book said...

Behtareen........aapki ab tak sarvasreshth kriti hai

nazish said...

superb GAORAV! kya kya likha hai tumne... 4-5 maaein, computer k bahane sath bathna. choomna.sabse badhkar ragini ki phone par awaz sunakr maa ki aankhon ki me image ka banna jisme ragini ko kiss karna hare ghaas wale backgrond k sath,ya 8'10 k kamre me.fir image me iss baat ki khwahish bhi karna ki kash! caste pta chl jati hai. sch bilkul sch... behtreen