जंगल

यह कहानी मार्च की 'कथादेश' में छपी है। पहली तस्वीर'आउटलुक' से और दूसरी एपी की।

हम सब साथ में रिहा हुए थे। मैं सीधा घर गया और चश्मा लगाए हुए सो रहे अपने पिता के पैर छुए। वे मेरे छूने से जाग गए, मुझे देखकर थोड़ा डरे और उठकर बैठ गए। मैं उसी नर्मी से उनके पैरों के पास बैठा रहा और सोचता रहा कि माँ होती तो हम आज कुछ मीठा खा लेते। पिताजी मुझसे कुछ बोले नहीं। कुछ देर बार उठे और पानी का गिलास लेकर आए। मैंने उनसे कहा कि थोड़ा टीवी देखना चाहिए। उन्होंने सिर हिलाकर मना कर दिया। फिर हम उठकर बालकनी में आए और सड़क को देखने लगे। बाहर बहुत ख़ुशी थी और आख़िर मैंने पिताजी से पूछ ही लिया कि क्या वे मुझे कुछ मीठा खाने को देंगे? उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं फिर अन्दर कमरे में आ गया और अपनी अलमारी की ओर बढ़ा। पिताजी पीछे से लपककर आए और मुझे जोर से पकड़ लिया। मैं घबरा गया- ये क्या हुआ?

वे मेरा हाथ पकड़कर मुझे बाथरूम में ले गए और दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया। अन्दर अँधेरा था। मैं लाइट जलाना चाहता था लेकिन उन्होंने मेरा हाथ पक लिया। फिर उन्होंने वॉशबेसिन के नीचे हाथ डालकर कुछ निकाला। एक नोटबुक थी। उन्होंने अपनी पैंट की जेब से पेन निकाला और रोशनदान से आ रही रोशनी की हल्की सी लकीर के सामने ले जाकर कुछ लिखा। फिर उन्होंने खुली हुई नोटबुक मुझे थमा दी। मैं उनकी नकल करता हुआ नोटबुक को उसी लकीर में ले गया जैसे वहीं से सारी उम्मीदें, उजाला और भगवान आएगा।

लिखा था- कैमरे लगे हैं।

मैं कुछ पल अपनी बेवकूफ़ी के बारे में सोचता हुआ वैसे ही खड़ा रहा। फिर मैंने लिखा- कैमरे में तो आपका यह लिखना भी रिकॉर्ड हो गया होगा।

यह उन्होंने मेरे लिखते-लिखते ही पढ़ लिया। उन्होंने लाइट जलाई और अचानक चहकते हुए से ऐसे बोले जैसे शादी वाली फ़िल्मों में समधी बात करते हैं- क्या हाल बना रखा है? पहले अच्छे से नहा धो लो, फिर खाना खाएँगे।

मैं उन्हें देखता रह गया। वे तेजी से बाहर निकल गए और दरवाजा बन्द कर दिया। उन्हें सही सिद्ध करने के लिए अब मुझे नहाने लगना था। मैंने बाथरूम की दीवारों और छत को देखा। मुझे ऐसी कोई ज़गह नज़र नहीं आई, जहाँ कैमरा लगा हो सकता है। मैंने नल खोला और कपड़े उतारने लगा। शर्ट खूँटी पर टाँगते हुए मुझे ध्यान आया कि नहाने के बाद पहनने के लिए तो यहाँ कोई कपड़ा है ही नहीं। मैंने पिताजी वाले उल्लास से ही उन्हें आवाज़ दी- कपड़े तो दे दो कोई।

वे आए तो मैं नंगा नहीं था लेकिन मैंने दरवाजा उतना ही खोला, जितना माँ ने सिखाया था कि नहाते हुए तौलिया माँगने के बाद खोलकर रखना चाहिए।

मैंने सोचा कि पिताजी रोज़ कैसे रहते होंगे? इन कैमरों के सामने नहाते होंगे क्या? क्या उनके नाम का भी कोई एमएमएस बन गया होगा जिसे औरतें एक दूसरी को फॉरवर्ड करती होंगी। नहीं, लेकिन उन्हें नहाते हुए कौन देखना चाहेगा भला?

मैंने झुककर बाल्टी उठाई और जींस पहने हुए ही अपने सिर पर उड़ेल ली। मैंने इस तरह कपड़े बदले कि मेरा एमएमएस कोई देख रहा हो तो मुझे शर्म न आए। मैं डीपीएस वाली लड़की की तरह विदेश जाकर अपना अतीत नहीं भुला सकता था।

मैं बाहर आया तो वे रसोई में कुछ खटपट कर रहे थे। मैं रसोई में पहुँचा तो यह वाकई खटपट ही थी। अब तक उन्होंने कुछ बनाने के लिए नहीं रखा था। स्लैब पर कुछ आलू और एक चाकू रखा हुआ था। उन्होंने बेचारगी से मेरी ओर देखा। उन्हें कुछ भी बनाना नहीं आता था। माँ ने हमेशा उन्हें बच्चों की तरह पाला था। वह उन्हें बिस्तर पर ही खाना देती थी और एक अजीब सी तृप्ति महसूस करती थी। उन्हें बस चाय और खीर बनानी आती थी।

जैसे मैं उन्हें डाँटूंगा, वे आकर मेरे गले से लग गए। मुझे जेल में हमेशा लगता था कि मेरी अनुपस्थिति के इन महीनों में वे बस फलों, कुछ कच्ची सब्जियों और दूध-दही-चाय से काम चला रहे होंगे।

- मैंने मैगी बनानी सीखी।

उन्होंने मेरे कान में कहा। मुझे लगा कि मैं उनका पिता हूँ और जो पास्ट, प्रेजेंट या फ्यूचर टेंस उन्होंने मेरे बार-बार भूलने के बाद भी मुझे बिना किसी गुस्से के बार-बार सिखाए थे, जैसे मैंने उन्हें सिखाए हों। मैंने उनसे कहा कि वे जाकर आराम करें, मैं कुछ बनाकर लाता हूँ। वे मुझसे अलग हुए और मुझे ऐसे देखा जैसे माफी माँग रहे हों- पता नहीं, खाना न बना पाने के लिए या मुझे ऐसी दुनिया में लाने के लिए- और मुड़कर चले गए।

खाना खाते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया है।

- कौनसा विषय?

- इतिहास। (क्या कहीं बच्चे इतिहास का ट्यूशन पढ़ते हैं?)

- आप इतनी मेहनत मत कीजिए। अब कुछ करूँगा मैं।

जिस हाथ से वे खा नहीं रहे थे, उससे उन्होंने मेरा कंधा सहला दिया। मैं कुछ नहीं बोल पाया। खाना खाने के बाद मैंने बर्तन धो दिए। उन्होंने कुछ पैसे लाकर मेरी जेब में रख दिए। मैंने उन्हें मना भी किया लेकिन इतना नहीं कि वे वापस ले लें। इसी बीच उनके ट्यूशन वाले बच्चे आ गए थे। बर्तन धोने के बाद मैं रसोई के दरवाज़े पर खड़ा होकर कुछ देर तक उन्हें तल्लीनता से पढ़ाते हुए देखता रहा और फिर घर से निकल गया। कैमरे लगे होंगे तो उन्होंने चाहा होगा कि मेरा पीछा करें लेकिन चल नहीं पाए होंगे।

मुझे फिर से पुलिस स्टेशन जाना था। यह हर दिन करना था- सुबह आठ से रात के आठ के बीच तीन बार। मैंने साइन किए, कुछ हिदायतें बार-बार सुनीं और बाहर निकल आया। बाहर की दुनिया ख़ुश थी- कपड़ों के नए डिजाइन हर दिन आ रहे थे, हर शुक्रवार नई फ़िल्में रिलीज़ हो रही थीं, मुहूर्त निकलते थे तो एक ही दिन शहर में पचासों शादियाँ होती थीं जिनमें लोग उत्साह से जाते थे और मंत्र सुनते हुए यह दुआ करते थे कि दूल्हा-दुल्हन उम्र भर साथ रहें। बस यही चिंता की बात थी। बाकी तो माशाअल्लाह बारिश उस साल ख़ूब थी और सब लोग आज़ाद-आज़ाद महसूस करते थे।

मुझे निहां से मिलना था। मैं नहीं चाहता था कि कोई पीछा कर रहा हो तो वहाँ तक पहुँचे। मैंने उसे एक पीसीओ से फ़ोन किया। वह मेरी आवाज़ सुनकर रोने को हुई। मैंने कहा कि तुम्हारी आँखों में दो काले समन्दर हैं और फ़ोन काट दिया। इसका मतलब यह था कि वह दो बजे ब्लैक ओशन रेस्त्रां में न मिलकर हैप्पीसिटी में मुझसे मिले। मुझे लगा कि उसके फ़ोन भी ज़रूर टेप हो रहे होंगे और टेप करने वाले लोग भी जासूस किस्म के होंगे। वे ज़रूर ब्लैक ओशन में पहुँचेंगे। शुरू के दिनों में निहां और मेरी मुलाक़ात की दो ही ज़गहें हुआ करती थीं- ब्लैक ओशन और हैप्पी सिटी। मैं जानता था कि निहां मेरा मतलब समझ जाएगी।

मैं रेडिमेड कपड़ों की एक दुकान में घुसा। मैंने ए सस्ती जैकेट, एक जींस और एक टोपी खरीदी। जैकेट और टोपी पहनकर मैं दुकान के पिछले दरवाज़े से बाहर निकल गया। मैं जब हैप्पी सिटी में पहुँचा तो वहाँ हैप्पी सिटी था ही नहीं। बबल्स नाम की एक नई कॉफ़ी शॉप खुल गई थी। मैंने उसके काँच के दरवाज़े तक जाकर भीतर झाँका। निहां शॉल ओढ़े एक कोने में सिर झुकाकर बैठी थी। मैं तेजी से अन्दर घुसा और उस तक पहुँचा। अक्षरा उसकी गोद में थी। हम दोनों मुस्कुराए, गले मिले और फिर आमने-सामने बैठ गए। मैंने जींस का लिफाफा उसकी ओर बढ़ाया। उसने उसे खोलकर देखा। अक्षरा सो रही थी। वह और सुन्दर हो गई थी। इतने समय में उसका अपना एक चेहरा बना था जिसमें शायद मेरा भी कुछ हिस्सा हो। जब मैंने पहली और इससे पहले इकलौती बार उसे देखा था, तब वह सब बच्चों जैसी ही थी और मैं उसे ठीक से याद भी नहीं कर पाता था। मेरा मन किया कि अभी उसे अपनी गोद में लेकर चूम लूँ और किसी वेटर को बुलाकर पूछूँ कि यह किस पर गई है? कोई तो हो, जो कह दे कि इसकी नाक या आँखें हूबहू तुम जैसी हैं। मगर ऐसा कोई नहीं था और मैं वहाँ बैठकर मुस्कुराता रहा।

- मेरी कमर कम हो गई है। तुम्हें साइज तो पूछ लेना चाहिए था।

मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे लगा था कि उसे अच्छा लगेगा। मैंने उससे कहा कि साइज़ बदला भी जा सकता है। उसने कहा कि उसे पता नहीं इतनी फ़ुर्सत मिलेगी भी या नहीं। मैंने कहा कि मैं अक्षरा को प्यार करना चाहता हूँ। उसने उसके कम्बल के साथ ही उसे मुझे दे दिया। मुझे डर था कि मैं उसे गिरा न दूँ इसलिए मैंने ज़्यादा कसकर पकड़ा था। निहां ने थोड़ी कोमलता से पकड़ने को कहा।

- पापा कैसे हैं?

- अच्छे हैं। तुम शायद मिली नहीं बहुत दिन से?

- जगा मत देना इसे। बहुत मुश्किल से सोती है।

मैंने हँसकर कहा- फिर तो ज़रूर जगाऊँगा।

- तुम्हें क्या? सारा दिन मुझे ही परेशान करेगी फिर।

मेरी हँसी रुक गई। - तुम इस तरह क्यों कह रही हो?

- किस तरह? एक बात ही तो कह रही हूँ।

मैंने अक्षरा को चूमा और फिर उसी को पकड़ा दिया। हम दोनों इधर-उधर देखते रहे।

- चाय पियोगी?

- नहीं।

- मैं तो पियूँगा। दिल कर रहा है कि कई दिन त चाय ही पीता रहूँ।

मैंने अपने लिए चाय मँगवाई। मैं तोहफ़ों का ऐसा शौकीन भी नहीं था लेकिन मुझे लगा था कि निहां मेरे लिए कुछ लाएगी। वह जब भी नीचे देखती थी, मुझे लगता था कि अभी शॉल में से कुछ निकालकर देगी।

- सब कुछ बदल गया है बाहर। मैं गया था तो मुझे लगता था कि लोग पागल हो जाएँगे। कुछ नहीं हुआ।

- नौकरी कर लो मेरी तरह..

- कहाँ नौकरी कर रही हो तुम?

- अभी जाना होगा।

उसने ऐसे कहा जैसे जाना एक उत्सव की तरह होगा जिसमें रेस्त्रां में मौज़ूद सब लोग उसकी जाती हुई कार के पीछे चाँदी के सिक्के फेंक रहे होंगे और विदाई के गीत गा रहे होंगे।

वह उठ गई। उसके उठने के साथ अक्षरा भी जग गई। उसने आँखें खोलकर हैरानी से मुझे देखा और कुछ सेकंड बाद ज़ोर से रो पड़ी। निहां चलने लगी, जैसे मैं वहाँ था ही नहीं। मैंने जल्दी से काउंटर पर पैसे दिए और उसके पीछे-पीछे बाहर आ गया। बारिश होने लगी थी। उसने एक ऑटो रुकवा लिया था और उसमें बैठ रही थी। क्या उसे यह लगा था कि मैं इतना अपमानित हो चुका हूँ कि अब कभी किसी अपमान के लिए दुखी नहीं होऊँगा?

ऑटो के चलने से पहले उसने मेरी ओर देखा। उसकी आँखें भर आई थीं। उसने जैसे यह कहा कि हमें इस वक़्त किसी घर में होना चाहिए था, जहाँ हम चाय बना कर पीते और सोच रहे होते कि अबकी बार खिड़कियों के लिए किसी दूसरे रंग के परदे लाएँगे। उसने जैसे यह कहा कि मैंने दुनिया की बेहतरी की अपनी लाउडस्पीकरी ख़्वाहिश में उन दोनों का क़त्ल कर दिया है और इस उम्मीद में हूँ कि वे स्वर्ग में मेरी अहसानमंद हो रही होंगी।

उसने बिना कुछ कहे सिर झुका लिया। मैंने ऑटो वाले से पूछा कि क्या मैं हार गया हूँ और अगर हाँ, तो अब क्या करना होगा?

वह बिना कुछ कहे उसे लेकर चला गया। पीछे की खिड़की से वह मेरी ओर देखकर हाथ नहीं हिला रही थी।

मैं फिर थाने में पहुँचा और बताया कि मैं कहीं नहीं भागा हूँ और आठ बजने से पहले एक बार और आऊँगा। मैं, जो एक अच्छे मेडिकल कॉलेज से अच्छी डिग्री वाला सभ्य डॉक्टर था और चाहता तो उनका अफ़सर हो सकता था, उसे एक चाँटा पड़ा और एक कमरे में डाल दिया गया। मुझे लगा कि यह आख़िरी बार है और अब कभी बाहर जाना नहीं हो पाएगा। मुझे मेरी ग़लती भी नहीं बताई गई, इसलिए मुझे लगता रहा कि यह मेरी उसी होशियारी की वज़ह से है जिसके चलते वे लोग ब्लैक ओशन में मुझे खोजते रहे होंगे और अब उन्हें गुस्सा आ रहा होगा।

इस तरह के तमाचों को आप अदालत में उनके विरुद्ध सबूत की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते। कई बार आप उनके बारे में किसी को बताना भी नहीं चाहते। सच के जुनून के बावज़ूद आपका भी आत्मसम्मान होता है। आपके पीछे चाहे कोई भी न हो, लेकिन आप एक भीड़ का भ्रम पाले रखते हैं और उसे यह नहीं दिखा सकते कि आप इतने कमज़ोर हैं कि कोई सिपाही उठकर आए और आपको थप्पड़ मार दे और आप कहते रहें कि अपनी हरकतों के लिए आप शर्मिन्दा हैं।

पाँच-छ: बजे के करीब मुझे लगा कि पिताजी बाहर हैं और किसी से बहस कर रहे हैं। वे पहली बार थाने में आए थे। मेरी किसी पेशी, किसी कैद में मुझसे मिलने नहीं आए। मैं नहीं चाहता था कि वे इस बेचारी हालत में मुझे देखें। उन्हें लगता था कि यह मेरे बचपन के स्कूल की तरह है, जहाँ के हेडमास्टर के साथ बैठकर वे चाय पिएँगे और फिर मुझे लिवा ले जाएँगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उससे पहले मुझे ईनाम दिया गया है या मैं दो पीरियड तक मुर्गा बना रहा हूँ। वे बुलन्द आवाज़ में नियम-कानून और इंसान-इंसानियत की बातें कर रहे थे। उनसे बहस कर रहे पुलिसवाले को आख़िर गुस्सा आया और उसने उन्हें माँ की गाली दी। दूसरे ने चिल्लाकर कहा कि भाग जाएँ, नहीं तो अभी टाँगें तोड़ दी जाएँगी।

उसके बाद उनकी आवाज़ नहीं सुनाई दी। कुछ देर बाद पुलिसवालों की हँसी सुनाई दी तो मुझे लगा कि वे चले गए होंगे। मैं जानता था कि वे फिर भी सिर उठाकर ही थाने से निकले होंगे और रास्ते में किसी मिलने वाले से उन्होंने यही कहा होगा कि धानमंडी से गेहूँ देखकर आ रहे हैं।

इस उम्र में वे घर में ही एक कैद में थे। यहाँ तो फिर भी दीवारें थीं, थोड़ा अपमान था, जुगुप्सा पैदा करने वाले कुछ चेहरे थे लेकिन वैसा अकेलापन नहीं था और न ही कैमरे।

मुझे लगा कि मुझे किसी ने न्यौता नहीं दिया है और फिर भी सारी दुनिया के लिए मैं अकेला ही लड़ रहा हूँ। जैसे सब कुछ व्यक्तिगत ही रह गया है और समझौते कर लेना इतना भी बुरा नहीं था। जेल में हर शाम मैं इतना ही कमज़ोर पड़ जाता था। लेकिन सुबह उठते ही मुझे लगता था कि ऐसे कम से कम दो-तीन सौ लोग तो और होंगे जो अलग-अलग शहरों की अलग-अलग जेलों में इसी तरह सोच रहे होंगे। शायद हमें अलग-अलग इसीलिए रखा गया था कि हमारा अकेलापन हमें तोड़ दे। हम अदालत में नहीं जाते थे, दो-तीन महीने में जज और वकील हमारी कोठरियों में पाँच-पाँच मिनट के लिए ठहरते थे और पूछते थे कि हम पर कोई शारीरिक अत्याचार तो नहीं हो रहा? मैं कुछ भी बताता, उसकी एक ही प्रतिक्रिया होती थी। मुझे दो-तीन पन्ने दे दिए जाते और उनके नीचे साइन करने को कहा जाता। पहली-दूसरी बार मैंने उन्हें पढ़ना चाहा लेकिन मुझे ज़ोर से डाँट दिया गया। जो वकील मेरा वकील बनकर मिलता था, वह मुझे जज से भी अधिक तटस्थ लगता था। वह कभी मेरे पक्ष में नहीं बोलता था, मुझसे नज़रें नहीं मिलाता था और उस पाँच मिनट के राउंड के अलावा कभी मिलने नहीं आता था। हमें न पेन-कागज़ दिए जाते थे और न ही कोई अख़बार-पत्रिका। हमें बस अपने गुस्से और अपने अनुभवों को अपनी याददाश्त में रखना था और यह वे जानते थे कि याददाश्त की अपनी सीमाएँ होती हैं।

हम चारों जब सुबह छूटे थे, तभी इस डेढ़ साल की अवधि में हमें पहली बार पता चला था कि हम एक ही ज़गह कैद हैं। मैं सोचता था कि अमान या गोविन्द ने मेरे ख़िलाफ़ गवाही दे दी होगी और ख़ुद बाहर होंगे। लेकिन वे भी मेरे साथ ही बन्द थे। गोविन्द की पत्नी रोशनी भी हमारे साथ ही छूटी थी जबकि पूरे समय वे दोनों यह सोचकर निश्चिंत थे कि दूसरा, घर में बच्चों के साथ होगा। हमें बिना किसी भूमिका के छोड़ दिया गया था। न यह बताया गया कि हमारी सज़ा पूरी हो गई है या हम निर्दोष करार दे दिए गए हैं। हमसे कहीं साइन नहीं करवाए गए। दो-चार सौ मीटर तक हमने आपस में कोई बात नहीं की और हमें लगता रहा कि अभी हमें पीछे से गोली मार दी जाएगी। बाहर लोग चाट खा रहे थे, किसी को छोड़कर जा रहे थे, किसी को रिसीव करने आए थे, हमने डेढ़ साल बाद आसमान का रंग देखा था और हम मौत के इंतज़ार में थे।

फिर गोविन्द रो पड़ा था। उसने मुझसे माफ़ी माँगी कि वह डेढ़ साल तक मुझे द्रोही समझता रहा और मेरी मौत चाहता रहा। हम चारों गले लगे, हालाँकि हम गले लगना भूल सा गए थे। फिर हमने तय किया कि अब हम नहीं मिलेंगे। अमान ने कहा कि वह पहाड़ों पर अपने चाचा के पास चला जाएगा और कभी मैदान में नहीं लौटेगा।

- वहाँ अब भी जन्नत है। आदमी, आदमी को आदमी समझता है।

वह चाहता था कि इसमें हम भी हामी भरें लेकिन हम चुप रहे। मैंने गोविन्द से कहा कि उसने जो दस हज़ार दिए थे, वे मुझसे खर्च हो गए थे और अभी मैं नहीं लौटा पाऊँगा। उसने कहा, कोई बात नहीं, भाड़ में जाएँ पैसे और अब कुछ सालों तक हम चाहे इसी शहर में रहें या किसी और में, लेकिन अजनबी बनकर रहेंगे।

एक पूरा दिन भी नहीं बीता था, मैंने अपने घर में सोकर भी नहीं देखा था, मेरे पिता बता भी नहीं पाए थे कि इन अठारह महीनों में वे कहाँ कहाँ भटके और कितनी बार उनका मरने का मन किया और इससे पहले ही मैं फिर उनकी कैद में था। मुझे अक्षरा की याद आई। मुझे थोड़ा भी अन्देशा होता कि आज ही मुझे फिर से पकड़ लिया जाएगा तो मैं निहां की गोद से उसे छीनकर कैसे भी छिपते-छिपाते अमान के साथ पहाड़ों पर चला जाता और वहाँ बस रोटी-कपड़े के लिए ज़िन्दगी भर उसके चाचा की नौकरी करता।

रात के दो बजे दो सिपाहियों ने मेरे घर का दरवाज़ा खटखटाया। बार-बार पूछने के बाद पिताजी ने दरवाज़ा खोला।

- कहाँ है वो?

- कौन?

- भगतसिंह आपका...

- वो तो वहीं है। थाने में..

- आज सुबह छोड़ दिया उसे और घर भी आया था। झूठ और बेईमानी तो तुम्हारे ख़ून में ही है।

फिर वे उन्हें धकेलते हुए घर में घुस गए और सामान उठा-उठाकर गिराने लगे जैसे मैं गैस सिलेंडर या किसी मेज की दराज़ में छिपा बैठा हो सकता हूँ। पिताजी वहीं दरवाज़े पर बैठ गए और उन्हें लगने लगा कि कुछ बहुत बुरा हुआ है। उन्होंने उन दोनों से पूछा कि क्या वे चाय पीना पसंद करेंगे? उनमें से एक कोई पुराना गीत गुनगुनाता रहा। दस मिनट में उन्होंने बिस्तर, किताबें और रसोई के डिब्बे, सब उलट-पुलट कर दिया, जिन्हें ठीक करने में मेरे पिताजी को कम से कम तीन दिन लगते। फिर उन्होंने कहा कि मुझे दिन में तीन बार थाने में हाज़िरी देने को कहा गया था और पहली बार के बाद मैं आया ही नहीं। उन्होंने कहा कि कल सुबह तक मैं नहीं मिलता तो पिताजी को ही मेरी ज़गह अन्दर डाल दिया जाएगा।

- चाय नहीं मिलेगी जेल में अंकलजी।

पहले ने जाते हुए अपना डंडा हल्के से उनके कंधे पर मारते हुए कहा।

निहां शायद किसी बड़े आदमी के यहाँ नौकरी करती थी। सात-आठ बजे वह उसके साथ थाने में आई। पहली बार मुझे बाहर बुलवाया गया। मेरे हाथ बँधे हुए थे। वे दोनों एसआई के सामने कुर्सियों पर बैठे हुए थे। मुझे भी एक कुर्सी दी गई। मैं सिर झुकाकर बैठ गया। लेकिन आप जान लीजिए कि हमेशा से ऐसा नहीं था। अपने पिता की तरह मुझे भी सिर झुकाना पसन्द नहीं था। जब हम कॉलेज में थे तो कुछ और ही समां था। घर में माँ थी, पिताजी ट्यूशन पढ़ाना अपना अपमान समझते थे और बारिश में हमारी गली में घुटनों तक पानी नहीं भर जाता था। फिर जब मैं हॉस्टल से ऐसे लौटा था जैसे लम्बी छुट्टियों के बाद आया हूँ तब वहाँ दूसरे लोग रहते थे। उनकी बेटियाँ ख़ूबसूरत थीं, उनके बेटे कॉलेजों में नहीं जाते थे, उन्हें पैदल चलना और सुबह जगना सख़्त नापसंद था। सब पड़ोसियों समेत हमें वह मोहल्ला छोड़ना पड़ा था, पिताजी की नौकरी और माँ चली गई थीं।

मुझे फिर से छोड़ दिया गया। फिर कहीं साइन नहीं करवाए गए और दिन में तीन बार हाज़िरी देने को फिर से कहा गया। मैं निहां और उस बड़े आदमी के साथ बाहर आया। उसके पास कार थी। निहां सिर झुकाकर चल रही थी।

- तुम्हें कहीं छोड़ दें?

उस आदमी ने मुझसे पूछा। मैंने मुस्कुराकर ऐसे सिर हिला दिया जैसे अभी मुझे लेने गाड़ियों का जुलूस आएगा। मैं जानता था कि निहां मेरे साथ ही रहना चाहती है लेकिन मैंने उससे कुछ भी नहीं कहा, शुक्रिया तक नहीं। वे दोनों कार में बैठकर चले गए। मैंने सोचा कि मैं अपने और निहां के अच्छे दिनों की कोई बात याद करूँ तो थाने के आगे खड़े होकर जो डर लग रहा है, वह थोड़ा कम हो। लेकिन कुछ याद नहीं आया। बारिश में कमरे के दरवाज़े पर खड़े होकर एक-दूसरे को बाहर को धक्का देना या किसी अनजान नम्बर से एक-दूसरे को फ़ोन करके बैंक वालों की तरह बात करना भी याद नहीं आया। मैं वहाँ से भाग लिया, जबकि मुझे दिशाओं के बारे में कुछ ज़्यादा नहीं पता था और इस नए घर का रास्ता ऐसा था कि मैं रात में खोज भी न पाता। उसमें मैं गिनती के दिन रहा था, उससे ज़्यादा आसानी से मैं निहां के घर जा सकता था जहाँ वह अपने मम्मी पापा के साथ रहती थी और रोज़ रात को सोने से पहले टीवी देखते हुए गलती से भी न्यूज़ चैनल लग जाने से डरती थी।

क़रीब आधा घंटा दौड़ने के बाद मैं निहां के घर पहुँचा। उसकी माँ ने दरवाज़ा खोला और वे मुझे देखकर दरवाज़ा वापस बन्द कर देने वाली ही थीं कि मैं उन्हें धकेलकर अन्दर घुस गया। वे चिल्लाईं लेकिन इतना नहीं कि उनका चिल्लाना सुनकर कोई बाहर वाला आए। निहां उन्हीं कपड़ों में बिस्तर पर बैठी थी और अक्षरा को गोद में लेकर सुलाने की कोशिश कर रही थी।

- दो मिनट के लिए मेरे साथ बाहर आ जाओ प्लीज़।

उसकी माँ ने कुछ गालियाँ दीं, लेकिन मैंने उनकी तरफ़ देखा भी नहीं। वह अक्षरा को अपनी माँ को सौंपकर बाहर चलने लगी तो मैंने कहा कि उसे भी ले आए क्योंकि यह हमारे परिवार की बात है। उसकी माँ ने कहा कि मुझे गोबर के समुद्र में डूबकर मर जाना चाहिए। निहां ने अपनी माँ को ज़ोर से डाँटा। वे रोने लगी थीं।

हम तीनों बाहर आ गए। हल्की-हल्की सर्दी थी जिसमें मैंने निहां के गाल पर हल्के से चूमा। मैंने उससे कहा कि मैं अपने अनुभवों पर एक किताब लिखना चाहता हूँ। वह कुछ नहीं बोली। अक्षरा कम्बल में दुबकी हुई थी और हिल भी नहीं रही थी।

- क्या ऐसा हो सकता है कि हम तीनों अभी कहीं भाग चलें? दयाल से बात करेंगे, शायद वह बॉर्डर पार करवा दे?

- तुम इस नन्हीं सी बच्ची को भी अपने साथ गोली मरवाना चाहते हो?

मैंने निहां को बाँहों में भर लिया। अक्षरा हमारे बीच में थी। निहां ने मेरे गाल पर चूमा- डेढ़ साल पहले सोचा गया कोई चुम्बन जो लगातार किसी हताशा और जेल की मार में इसी शहर में जाने कैसे तैरता रहा था और ज़िन्दा बच गया था। उसने मेरे कान में धीरे से कहा कि वह अक्षरा को लेकर मर जाना चाहती थी। वह मेरे आगोश में थी और मेरा आगोश ऐसा नहीं था कि मैं किसी को भी बचा सकता। अभी पुलिस आकर मुझे बेइज़्ज़त करके ले जा सकती थी और मैं अपनी दुबकी हुई बेटी के सामने उनके पीछे पीछे सिर झुकाकर चला जाता।

मैंने निहां से पूछा कि बाकी सब लोग कहाँ हैं? उसने कहा कि स लोग नौकरियाँ कर रहे हैं, सबके अपने बच्चे हैं जिन्हें वे वीकेंड पे फ़िल्म दिखाने ले जाते हैं, ख़ुशी इतनी है कि शहर में नहीं समाती और लड़ाई ऐसे ग़ायब हो गई है जैसे कभी थी ही नहीं।

- क्या ये मुझे मार भी सकते हैं निहां? तुझे क्या लगता है?

वह कह देती कि नहीं मार सकते तो सच कहता हूँ कि मैं सौ साल जीता लेकिन उसने नहीं कहा। उसकी माँ जाली वाले दरवाज़े से लगी खड़ी थी और हमें देख रही थी। मुझे अपनी माँ की याद आई। मैं उसी से गालियाँ सुनना चाहता था और अपने नाकारा होने पर अपमानित होना चाहता था। जाली के पार जो निरीह सी औरत खड़ी थी, उस पर तमाम तरस के बावज़ूद मेरा मन किया कि उसे मार डालूँ। मैं निहां को इस तरह तटस्थ नहीं देख सकता था। मैं उसे अपने बराबर लाकर दिखाना चाहता था कि देखो ऐसी है मेरी ज़िन्दगी, मुझे यहाँ दिमाग में दर्द होता है, मेरा यह हाथ बस कुछ दिन में जाने ही वाला है, मैं इतनी बार नंगा हुआ हूँ कि नहाते हुए मेरा मर जाने का मन करता है। अपनी नज़रों में मैं सोना हूँ निहां, जिसे तुम बचा सकती हो लेकिन नहीं बचाती।

मैं कोई ऐसी जायज़ वज़ह नहीं बता सकता जिससे मुझे इस चोरी जैसी घटना के लिए निर्दोष मान लिया जाए लेकिन मैंने फिर भी अचानक निहां की गोद से अक्षरा को छीना और भाग लिया। यह मेरे लिए आख़िरी मौके की तरह था। मुझे लग रहा था कि मैं उस रात वहाँ से अकेला लौटा तो बच नहीं पाऊँगा। निहां मेरे साथ आ नहीं रही थी और शायद एक-दो बार और कहने के बाद वह मेरे साथ कहीं भी आने के लिए चल देती लेकिन मैंने सारा धीरज जेल में खो दिया था और मैं किसी भी शर्त पर अपनी बेटी के साथ रहना चाहता था।

निहां मेरे पीछे दौड़ी लेकिन मैं दूर निकल आया था। कितना अजीब होता है किसी ऐसे से कुछ ऐसा चुराना जिसे आप बहुत प्यार करते हैं। आप पुराने दिनों मे लौटकर उस दूर भागने को किसी खेल में बदल देना चाहते हैं। आप यह तो नहीं कर पाते लेकिन इतना ज़रूर करते हैं कि इतना धीमा दौड़ें कि पीछे भागने वाला ज़रा भी चाहे तो आपको पकड़ ले। यही निहां ने किया। मैं ज़रा भी भागना चाहता तो अक्षरा को लेकर भाग सकता था। वह जैसे बस दिखाने के लिए ही दौड़ी।

मैं ज़्यादा दूर तक दौड़ भी नहीं सकता था। रात भर सड़कों पर पुलिस की गाड़ियाँ दौड़ती रहती थीं और अगर अक्षरा रोने लगती तो किसी को भी मुझ पर शक़ हो सकता था। वहाँ किसी को यह फ़ुर्सत नहीं होती कि डीएनए टेस्ट करवाकर देखे कि मैं ही उसका पिता हूँ और हम दोनों किसी भी वक़्त कहीं भी घूमने जा सकते हैं। क़रीब एक किलोमीटर निकल आने के बाद मेरे मन में ख़याल आया कि क्या निहां पुलिस को बताएगी?

यह बेवकूफ़ ख़याल था। दुनिया में अगर एक आदमी था जो मुझे पुलिस से बचाने के लिए जान भी दे सकता था तो वह निहां थी। हमने बहुत रातें और उनसे ज़्यादा दिन एक-दूसरे के भरोसे पर साँसें लेते बिताए थे। हम एक-दूसरे का हर डर और उदासी की हर बचपनी वज़ह जानते थे। लेकिन निहां के माँ-बाप तो माँ-बाप थे और उनसे वह झूठ भी नहीं कह सकती थी कि उसने ख़ुशी से अक्षरा को मुझे दिया है। उसकी माँ अपनी बिल्ली जैसी आँखें गड़ाए सब कुछ देख रही थी और हो सकता है कि मेरे भागने पर वह भी तेजी से दरवाज़ा खोलकर भागी हो।

मैं एक गली में मुड़कर एक कार की ओट में छिपकर बैठ गया। वहाँ टुकड़ों में हल्की-हल्की रोशनी आ रही थी। अक्षरा जाग ही रही थी। मुझे नहीं पता कि उसकी माँ ने उसे मेरे बारे में बताया भी था या नहीं। नहीं, मुझे पता था कि निहां ने उसे हर दिन मेरे बारे में हज़ार बातें बताई होंगी ताकि जब वह मुझसे मिले तो मैं उसे उतना ही पिता जैसा लगूँ जितना उसकी हमउम्र पड़ोसन पलक को हर दिन साथ रहने वाले उसके पिता लगते होंगे। वह उसे हर उस तरीके से उसे उछालती होगी जैसे मैं ज़रूर उछालता, उस हर तरीके से उसके साथ हँसती होगी, जैसे मैं हँसता। वे सारी कहानियाँ और तुकबंदियाँ रचती होगी जो मैं जेल में उसके लिए रचता था और सुना नहीं पाता था। मुझे निहां का अभी देखा चेहरा और उसका बोलने का ढंग याद आया और मुझे अचानक लगा कि वह मेरी नकल अक्षरा को दिखाते-दिखाते मुझ जैसी हो गई थी, इतनी पिता, कि अक्षरा शायद उसे ही न पहचानती हो।

अक्षरा मुझे एकटक देख रही थी, पहचान वाले देखने की तरह। मैंने भर आई आँखों के धुंधलके में उसे बार-बार चूमा और अपने सीने से चिपका लिया। उस क्षण मुझे उस रात की पहली ठंड लगी और मुझे लगा कि कहीं अक्षरा भी तो सर्दी की वज़ह से ही चुप नहीं। मैंने अपनी जैकेट उतारी और उसके कम्बल के ऊपर से लपेट दी।

उस रात ढ़ाई बजे, पुलिस की उठापटक के बाद पिताजी बिना ताला लगाए घर से निकले और शहर की सड़कों पर घूमते रहे। जाओ, मैं तुम्हारी परवाह नहीं करता, ऐसा दिखाने की हर आदमी की अपनी एक सीमा होती है और पिताजी की वह सीमा उनके कंधे पर हुए हल्के से वार के साथ टूट गई। उन्होंने जैसे पढ़ाए गए सब ट्यूशनों की मज़बूरी को वहीं घर में बिना ताले के छोड़ दिया ताकि वह बाहर निकलकर भाग जाए। उन्होंने जैसे अपने घुटनों और कमर पर कोई क्रीम लगाई कि वे फिर से छब्बीस साल के हो गए जब उन्होंने तय किया था कि अपने जीते जी वे वह दिन देखेंगे जब पूरे देश में एक भी आदमी भूखा न रहे। वे उसके छ: महीने बाद का वह समय भूल गए थे जब उन्होंने सोचा था कि पहले तो खुद की भूख मिटाने के लिए नौकरी करनी होगी। फिर उन्होंने शादी की थी और साइकिल खरीदी थी। साइकिल का हैंडल उनके हा में चुभता था और वे जब भी साइकिल पर चढ़ते थे, उन्हें दुख होता था क्योंकि अब साइकिल बदली भी नहीं जा सकती थी। फिर उन्होंने दो साल बाद दूसरी साइकिल खरीदी। उसकी चेन बार-बार उतरती थी। फिर मैं पैदा हुआ। मैं बार-बार बीमार पड़ता था।

कई अनजान लोग बताते हैं कि उन्होंने तीन-चार बजे उनके दरवाजे खटखटाए और खोलने पर पूछा कि क्या सब्जियाँ वाकई इतनी महंगी हैं जितनी सब्जी वाले बताते हैं। कुछ लोगों से उन्होंने चाय पिलाने का निवेदन किया और फ़टकार पाई। किसी आख़िरी आदमी से उन्होंने पूछा कि क्या उसने उनके बेटे को देखा है। अपने बेटे का ठीक ठीक चेहरा उन्हें याद नहीं था। उन्हें भ्रम था कि हर आदमी उसे जानता होगा। उस आख़िरी आदमी से उन्होंने कहा कि उनका बेटा डॉक्टर है, एनाटॉमी में उसे गोल्ड मैडल मिला था, उसे आसमान देखना पसंद है और दीवार पर चढ़ने से उसे डर लगता है। लेकिन इनमें से कोई भी खूबी उसका चेहरा-मोहरा नहीं बताती थी। वह आदमी कुछ दूर तक उनके साथ चला। इतने अपनेपन से कि पिताजी को लगने लगा कि वह जासूस है। वे ज़ोर से हँसे। उन्होंने उसे बताया कि वे बस में हमेशा सबसे आगे वाली सीट पर जमकर बैठते हैं और उन्होंने कभी छोटे कैमरे देखे तक नहीं। यह भी कि सुना है कि कई देशों में सरकार ऐसे छोटे छोटे रिकॉर्डर संदिग्ध लोगों के घरों में लगा देती है कि मक्खियों का भिनभिनाना भी रिकॉर्ड हो जाए लेकिन इस देश में यह तकनीक अभी नहीं आई है। उन्होंने कहा कि उन्होंने एक सम्मानित जीवन जिया है और उनके पढ़ाए कई लड़के कलक्टर बने हुए हैं। उस आदमी ने फिर पूछा कि वे अपने बेटे का हुलिया बताएँ तो वह ढूँढ़ने में उनकी मदद करे। वे ठहाका मारकर हँसे और उन्होंने कहा कि उनका कोई बेटा नहीं है। यह तो बस वे वक़्त गुज़ारने के लिए पूछ रहे थे। उन्होंने बताया कि एक बार मुख्यमंत्री ने भी उन्हें सम्मानित किया है और वे एक फ़ोन करके शहर का कोई भी रास्ता बन्द करवा सकते हैं। उस आदमी ने कहा कि वे उनके घर चलकर चाय पी लें लेकिन उन्होंने कहा कि यह उनकी पूजा का वक़्त है। जबकि बारह साल की उम्र के बाद उन्होंने भगवान के अस्तित्व के बारे में सोचा तक नहीं था और माँ को मरने से पहले गंगाजल तक नहीं पीने दिया था।

वे अगर किसी तरह मुझ तक पहुँच जाते, जहाँ मैं सर्दी में ठिठुरता हुआ अपनी सोती हुई बेटी को देखकर साँस ले रहा था तो मैं ज़रूर उनके साथ घर चला जाता। हम चाय बनाकर पीते और रज़ाई में बैठकर अक्षरा को चम्मच से दूध पिलाते। लेकिन वे कहीं और ही थे, यह याद करते हुए कि साइकिल का हैंडल क्या साइकिल को बदले बिना भी बदला जा सकता था? क्या वे सब मोजे, जो फटे हुए थे, इतना पैसा नहीं बचाते थे जितना उनसे अपनी कमज़ोरी का अहसास होता था? क्या मुझे डॉक्टर न बनाकर वे आर्ट्स दिलवाते तो आज मैं किसी अच्छे घर में निहां के साथ की गर्माहट में सो रहा होता और एक सपना होता जिसमें हम सुबह दूधवाले के लिए दरवाज़े खोलते और उससे हँसकर दो बातें करते?

उन्होंने पाँचेक बजे बस अड्डे के पास एक चायवाले से चाय लेकर पी और मुझे उसी तरह सोचा जिस तरह वे पिछले कुछ सालों में लगातार सोचते थे। उन्होंने चायवाले को मेरा वही एनाटॉमी के गोल्डमेडल वाला हुलिया बताया और अपने बचाकर रखे हुए चालीस हज़ार रुपए अपने कोट की जेब में से निकालकर उसे दे दिए। कहा कि मैं जब भी आऊँ, मुझे वे पैसे दे दे और बताया कि पिंटू नाम का कोई आदमी है जो फ़र्ज़ी पासपोर्ट बनवाता है। उन्होंने मुझे देने के लिए एक कागज़ पर पिंटू का पता उसे लिखकर दिया। फिर उन्होंने चाय के दो रुपए भी दिए और चले गए।

अगर आप मुझे एक ख़ुशफ़हमी पालने की छूट दें तो मुझे लगता है कि घर में कभी कैमरे लगे ही नहीं थे, किसी का कोई फ़ोन रिकॉर्ड नहीं होता था, मुझे जिस एसआई और सिपाहियों ने बार-बार पकड़ा था वे भी बाल-बच्चों वाले आदमी थे। उनके जीवन का लक्ष्य मेरा जीना मुहाल करना नहीं था। उनकी भी बेटियों की शादियाँ होती थीं, जिनमें वे रो पड़ते थे। उन्हें भी पेडों की छाँव में बैठना और उगता हुआ सूरज देखना अच्छा लगता था। वे अपनी बेल्ट में पिस्तौल डाले हुए पैदा नहीं हुए थे और भूख लगती थी तो उनका भी रोटी खाने का मन करता था। हो सकता है कि उनमें से किसी को पिताजी ने कभी पढ़ाया भी हो और कॉपियों पर वैरी गुड लिखकर दिया हो।

शुक्र था कि अक्षरा तभी पहली बार जगी जब रात लगभग बीतने ही वाली थी। वह जगी और बहुत रोई। सामने किसी मकान की बालकनी से एक बूढ़ी औरत निकलकर झाँकी और उसने पूछा कि यह बच्चा क्यों रो रहा है? मेरा जी हुआ कि उसे सारी कहानी सुना दूँ और उसके आँचल में शरण माँग लूँ लेकिन मैंने उससे कहा कि रात में मुझे लूट लिया गया है और मेरे पास इतने पैसे भी नहीं कि अपनी बेटी को दूध पिला सकूँ। उसने अन्दर आने को तो नहीं कहा जैसा किसी शहरी को कहना भी नहीं चाहिए क्योंकि कोई भी कभी भी आपकी हत्या कर सकता है और उन दिनों तो टीवी पर हर शाम यह संदेश आता था कि किसी अनजान व्यक्ति को शरण या सहायता न दें, लावारिस वस्तुएँ बम की बनी होती हैं और मृत्यु टिफ़िन या गुड़िया के रास्ते आती है। फिर भी यह उस औरत का बड़प्पन था या वह शायद किसी और दौर मेरी माँ के दौर में पैदा हुई थी कि उसने अक्षरा के लिए गर्म दूध लाकर दिया। अक्षरा दूध पीते-पीते फिर सो गई। वह औरत हमें देखती रही। मैंने उससे कहा कि वह स्वर्ग में जाएगी। उसने कहा कि क्या मुझे किसी घरवाले या रिश्तेदार को फ़ोन करना है? मैंने कहा- हाँ, और वह अन्दर से मोबाइल ले आई। मैंने पिताजी के नम्बर पर फ़ोन मिलाया, जिसे वे खुले हुए घर में छोड़ गए थे। फ़ोन बजता रहा। मैं निहां को फ़ोन करना चाहता था लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैं जानता था कि उसके माँ-बाप ने पुलिस को फ़ोन कर दिया होगा और जैसे ही दिन निकलेगा, पूरे शहर का उजाला जैसे मेरी तलाश में ही भागेगा। मुझे उससे पहले कुछ करना था, कहीं भाग जाना था। बॉर्डर एक सौ अस्सी किलोमीटर था। क़रीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर दयाल के शहर तक बस से जाया जा सकता था। इन दिनों एक भी आदमी अगर उधर जा पाता होगा तो दयाल मुझे ज़रूर पार करवा देगा।

मैं बस अड्डे पर इसलिए नहीं गया क्योंकि मुझे लगा कि वहाँ पुलिस ज़रूर होगी। मैं वहाँ जाता तो हो सकता है कि उसी चायवाले से चाय भी पीता। क्या मालूम, तब वह मुझसे पूछता कि क्या मुझे एनाटॉमी में गोल्ड मेडल मिला है और मेरे हाँ कहने पर वह तुरंत निकालकर नोटों का एक पैकेट मुझे देता और पिंटू के पते पर जाकर नकली पासपोर्ट बनवाने को कहता।

लेकिन मैं वहाँ न जाकर सबसे बाहर वाले जीवन चौक पर गया और पहली ही बस में चढ़ गया। अक्षरा जग गई थी लेकिन उसे शायद घूमना अच्छा लग रहा था इसलिए चुप थी। आगे की सीटें खाली थीं लेकिन हमें पीछे फ़र्श पर ही बैठना था। आगे बैठने के लिए हमें तीन गुना किराया देना पड़ता था। यह तब से था जब हमें पुराने घर को छोड़कर बारिश में पानी से भर जाने वाली गली में आना पड़ा था और नई तरह की बसें बनी थीं। किराए की बात से मुझे याद आया कि मेरे पास तो एक भी कौड़ी नहीं थी। कुछ दूर जाने के बाद ही कंडक्टर ने धकेलकर हमें उतार दिया। वैसे तो वो उदास किस्म का कंडक्टर था और उसकी बीवी को हर दिन कोई अनजान आदमी फ़ोन करता था। उसके कुछ दिन बाद ही एक हादसे में उसे मर भी जाना था।

उतरते ही मुझे और अक्षरा को लगा कि अब हम मरते दम तक इस शहर से बाहर नहीं जा सकेंगे। यह शहर के बाहर फ़ैक्ट्रियों वाला इलाक़ा था। मैं उसे लिए हुए घिसटते से कदमों से वापस लौटने लगा जबकि मैं किसी गाँव में जाकर आश्रय माँग सकता था और थोड़ी आसान ज़िन्दगी शुरू कर सकता था। मैं वापस वहीं लौटा, उसी शहर में, जहाँ हर पल दुनिया ख़त्म होती लगती थी। मैं चलता गया और जब मुझे थोड़ा होश आया तो मैं अपने घर में था। सब सामान अस्त-व्यस्त था। मुझे लगा कि पिताजी बाथरूम में होंगे और मैं आधे घंटे तक उनका इंतज़ार करता रहा। फिर मैंने बाथरूम के किवाड़ धकेले तो वे खुले ही थे। मैं हैरान और बदहवास नहीं हुआ। मैंने अक्षरा को बिस्तर पर लिटाया और उसके लिए दूध गर्म किया। मैं बहुत शांत था जबकि मैं जानता था कि पुलिस या निहां सबसे पहले यहाँ ही आएगी। लेकिन मुझे अपने एक प्रोफ़ेसर की बात याद आई जो हमेशा कहते थे कि जब आपको सौ फ़ीसदी यही लगता है कि वायरस लीवर से बाहर नहीं गया होगा तब बहुत बार यह भी होता है कि वह लीवर के सिवा हर जगह होता है। मैंने बाहर का दरवाज़ा खुला रहने दिया।

अक्षरा फिर से दूध पीते-पीते ही सो गई। मैंने उसे रजाई ओढ़ाई और बाथरूम में घुस गया। मुझे सबसे पहले कम्बख़्त कैमरे ही निकालने थे। बाथरूम का कैमरा उसी रोशनदान पर लगा था जिसमें से आने वाली ज़रा सी रोशनी में पिताजी ने मुझे काग़ज़ पर लिखकर उसके बारे में बताया था। मैंने उसे फ्लश कर दिया। इसके बाद मैं बाहर आया। मैंने मेज पर चढ़-चढ़कर घर के दोनों पंखे देखे। उनमें से एक की मोटर में कैमरा मिला। वह उसी का हिस्सा लग रहा था। मैंने पंखा भी उतारकर एक कोने में फेंक दिया। जब मैं रसोई की टोंटी में लगा कैमरा चाकू से निकाल रहा था, तभी किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। मैं बाहर आया। मेरे पिताजी की उम्र के कोई आदमी थे।

- चीनी मिलेगी बेटा?

मैंने उन्हें अन्दर आने को कहा। वे बिखरे हुए सामान को ताज़्ज़ुब से देख रहे थे। जब मैंने एक कटोरी में चीनी लाकर दी तो उन्होंने पूछा कि क्या मैं मास्टरजी का वही बेटा हूँ जो देशद्रोह के कारण जेल में था। मैंने कहा कि नहीं, वह मेरा बड़ा भाई है। जबकि बाहर इतने बाग और कारें हैं, उसका दिमाग फिर गया है। मैं तो कल ही अपनी नौकरी से लौटा हूँ। उन्होंने पिताजी के बारे में पूछा। मैंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि अब वे कभी वापस आएँगे। उन पर भी इस बात का कोई फ़र्क नहीं पड़ा। फिर वे मेरे कान के पास अपने होठ लाए और उन्होंने कहा कि आज बुधवार है इसलिए रेड पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि रेड में सबसे ज़्यादा किताबें ही पकड़ी जाती हैं और किसी भी तरह की किताब में विद्रोह की पंक्तियाँ हो सकती हैं, इसलिए अगर घर में किसी भी तरह का कोई भी अख़बार या किताब हो तो मैं जला दूँ।

उन्होंने मुझे बाहर आने को कहा। मैं उनके साथ बाहर तक आया और मैंने देखा कि गली में पूरा सन्नाटा है और कुछ घरों से धुआँ उठ रहा है।

मैंने पूछा- ये लोग ऐन वक़्त पर ही किताबें क्यों जला रहे हैं? पहले भी तो जला सकते थे और क्या किताबें पढ़ना इतना ज़रूरी है कि उसके लिए जान मुश्किल में डाली जाए। कोई क्रांति ही करनी है तो बिना पढ़े लिखे भी तो की जा सकती है।

वे हँसकर बोले- ये लोग किताबें नहीं जला रहे। कुछ महीने से एक आदेश आया है कि अगले आदेश तक हम लोग बच्चे पैदा नहीं कर सकते। जो औरतें प्रेगनेंट थी उनका ज़बरदस्ती गर्भपात करवा दिया गया। कुछ औरतें किसी तरह छिपकर बच गईं। अब उनके बच्चे हैं लेकिन उन्हें पता चला तो ये भी मारे जाएँगे।

- लेकिन ये लोग जला क्या रहे हैं?

- ये मुझे नहीं पता।

वे चले गए। मैं अन्दर आ गया। मुझे पता था कि अब तक उन्हें यह भी पता चल गया होगा कि मैं अपनी बच्ची के साथ यहाँ हूँ और यह भी कि मैंने कैमरे निकाल लिए हैं। अक्षरा निहां के पास ही ज़्यादा सुरक्षित रहती लेकिन मुझे लगा कि अब तक वहाँ भी पुलिस का पहरा लग चुका होगा और मैं अब अक्षरा को उसे सौंपकर नहीं आ सकता।

कुछ क्षण के लिए मुझे सचमुच लगा कि मैं किसी नाटक में हूँ। जैसे यह बूढ़ा आदमी बाहर जाकर अपनी विग उतार देगा और निर्देशक से पूछेगा कि उसने कैसी एक्टिंग की, जैसे यह जो धुआँ आ रहा है, यह घरों में रखी इलेक्ट्रिक मशीनों से निकल रहा है, जैसे सो रही अक्षरा किसी की उधार ली गई तबस्सुम है, जैसे निहां इस वक़्त अपने घर में पागलों की तरह छत को नहीं देखे जा रही होगी बल्कि किसी ब्यूटीशियन के पास बैठकर मेकअप करवा रही होगी, जैसे अभी फुसफुसाहट शुरू होगी, आप अपने साथ बैठे चने चबाते दोस्त से कहेंगे कि क्या बात है! धीरे धीरे तालियाँ बढ़ती जाएँगी, आप सब मेरे सम्मान में खड़े होंगे और मुझे बाइज़्ज़त यहाँ से बाहर निकाल लेंगे। फिर मैं अपने घर जाकर अपनी माँ और पिता के गले लगूँगा और बताऊँगा कि मैंने झंडे गाड़े हैं।

मैंने पीठ पर टाँगने वाला एक काला बैग खोजा। रसोई में से एक हथौड़ा खोजा और एक चाकू। फिर मैं रसोई के दरवाज़े से दूसरे कमरे तक जाने वाले दरवाज़े तक गिनकर नौ कदम चला। यह वह ज़गह थी, जहाँ जाने से पहले फ़र्श खोदकर मैंने अपना रिवॉल्वर छिपाया था। खोदना शुरू करने से पहले मुझे बाहर का दरवाज़ा बन्द कर देना चाहिए था लेकिन मैंने किया नहीं। मैं जानता हूँ कि मुझे मिट्टी खोदते देखने के लिए आप यहाँ नहीं हैं इसलिए जब तक मैं खोदूँ, निर्देशक से कहता हूँ कि वह कोई ऐसा संगीत चला दे जिससे आप भी न ऊबें और मेरी अक्षरा की नींद भी न टूटे। इसी संगीत के बीच मैं आपको उन दिनों के बारे में बताना चाहता हूँ जब मेरा सौभाग्य था कि मैं हर दिन कम से कम एक दर्जन लोगों को मरने से बचाता था। मुझे गर्व था कि मैंने ऐसी चीजें पढ़ी हैं कि मैं अपने आप ही दुनिया के किसी भी युद्ध का विलोम हूँ। लोग कहते हैं कि घमंड ज़्यादा दिन तक नहीं टिकता। यदि गर्व घमंड से अलग है तो अपने अनुभव से यही मैं गर्व के बारे में कहना चाहता हूँ। बल्कि आप कहने की इज़ाज़त दें तो सच के बारे में भी मेरा ऐसा ही ख़याल है। बल्कि सच की उम्र तो गर्व या घमंड से भी कम है। आप चाहें तो अपने बच्चों के कान बन्द कर सकते हैं और यह ठीक भी नहीं कि इस उम्र में वे ऐसी बातें सुनें जो उनकी किताबों को गलत बताती हों या उन्हें जीवन के प्रति हताशा से भर सकती हों।

ख़ैर, हम चार दोस्त थे। समय मुश्किल था और हमें अपने साथ पढ़े अठत्तर डॉक्टरों की तरह की नौकरी करना माने यह पूछकर पट्टी बाँधना कि वह कौनसी गली में रहता है, कहाँ पिटता है, इतना क्यों चिल्लाता है - यह मान लीजिए कि दूसरे को नंगा करके अपना बलात्कार करने जैसा लगा। मेरे कहने के तरीके के लिए माफ़ कीजिए। सही कह रहे हैं, एक पढ़े लिखे आदमी को ऐसी तुलनाएँ शोभा नहीं देतीं। इस लाइन को कटा हुआ मान लिया जाए। तो मान लीजिए कि नौकरी करना हमें कुएँ में कूदने जैसा लगा। इसीलिए हम उन गलियों में गए बल्कि आप जानते ही हैं कि हम चारों को अपने परिवारों के साथ उन गलियों में रहने के लिए भेज दिया गया, जहाँ हर तीसरे घर में रोज़ कोई न कोई अपनी एकाध हड्डी तुड़वाकर लौटता था, जहाँ बाद में बच्चे पैदा करना देशद्रोह हो जाने वाला था, जहाँ एक भी क्लीनिक या मेडिकल स्टोर नहीं था और बाहर के क्लीनिक और मेडिकल स्टोर वाले आईकार्ड देखकर दाख़िला या दवाइयाँ देते थे।

जो अठत्तर लड़के लड़कियाँ थे, उनमें से ज़्यादातर भी शरीफ़ लोग थे और कुछ हमारे अच्छे दोस्त भी थे। लेकिन फिर हम चारों ही दोस्त रह गए और वे सब बस हमारे नाम जानने वाले होते गए। वे इतने व्यस्त थे कि हम जब भी फ़ोन करते, वे ऑपरेशन थियेटर में होते जबकि उनमें से कोई भी तब तक सर्जन नहीं बना था। इसी अकेलेपन में हमने अपने आपको अपने काम में खपा दिया। हमारे घरों के बाहर कोई चमकता हुआ बोर्ड नहीं था लेकिन भीड़ हमेशा रहती थी। हम यह भूल गए कि हम बहुत दिल से उन समुद्रतटों पर छुट्टियाँ बिताना चाहते थे जहाँ हमारे ऑपरेशन थियेटर वाले दोस्त अब जाते होंगे। हम यह भूल गए कि हमने कभी सोचा था कि प्यार की बहुत सारी कविताएँ लिखेंगे और अपनी प्रेमिकाओं को बारिश के किसी दिन सुनाएँगे। शायद इसी भूलने ने उन्हें नाराज़ किया। ग़लती उनकी भी नहीं है। हमें कई मौके दिए गए लेकिन हम और भी जवान होते जा रहे थे, हमारे दिनों में तीस-तीस घंटे हो जाते थे और हमें ज़रा भी थकान नहीं होती थी। ऐसे ही किसी दिन वे आक्रमण की तरह नहीं, ईनाम की तरह आए। अपनी तटस्थता के लिए लोकप्रिय एक अख़बार की रिपोर्टर मेरे पास इंटरव्यू के लिए आई। उसने हमारे घर की अलग अलग एंगल से तस्वीरें खींचीं और ढेर सारी उलझी हुई बातें पूछीं। मुझे उनके जवाब नहीं आते थे। लेकिन वह मुझसे मिलकर बहुत ख़ुश हुई। तीसरे दिन मैं जेल में था।

मुझे लग रहा था कि रिवॉल्वर उनके हाथ लग गया होगा लेकिन देखिए, यह निकल आया है। अब संगीत को धीमा करते हुए बन्द कर देना चाहिए।

मैंने रिवॉल्वर को एक गीले तौलिये से पोंछा और उसे अपनी जेब में डाल लिया। फिर मैंने धीरे से अक्षरा को उठाया और उसे उसी काले बैग़ में इस तरह लिटा दिया कि उसे साँस आती रहे लेकिन उसका चेहरा बाहर न दिखे। फिर मैंने बैग अपनी पीठ पर टाँगा और तेजी से घर से बाहर निकल गया। तेज कदमों से चलते हुए मैं क़रीब आधे घंटे बाद अपने पुराने घर के सामने पहुँचा। वहाँ किसी और के नाम का बोर्ड था। मैंने घंटी बजाई। पच्चीस-छब्बीस की उम्र की एक जवान लड़की निकलकर आई। उसके गाल लाल थे। वह शायद नाश्ते के बीच में से उठकर आई थी। यह मैंने उसके हाथ में आधी खाई हुई ब्रेड देखकर जाना। उसने बहुत अदब से मुझसे पूछा कि मुझे किससे मिलना है। मैंने मुस्कुराकर कहा कि मुझे अन्दर आने दीजिए। उसने मेरा नाम पूछा। मैंने उनके घर की नेमप्लेट की ओर इशारा करते हुए कहा कि पहले यहाँ मेरे पिताजी का नाम हुआ करता था। वह थोड़ा घबरा सा गई और दरवाज़ा बन्द करने लगी। अधखुले दरवाज़े से मुझे सामने वह खिड़की दिख रही थी जिसके पास कुर्सी लगाकर मैं सर्दियों में पढ़ा करता था। माँ हर दो-तीन घंटे में मेरे लिए चाय बनाकर लाती थी और मेरे साथ वहीं बैठकर पीती थी।

मैंने अपनी जेब से रिवॉल्वर निकाला और उस लड़की को गोली मार दी। वह वहीं गिर पड़ी, अक्षरा जगकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और इससे पहले कि आसपास के लोग आएँ, मैं दरवाज़ा खोलकर लड़की की तरफ़ बिना देखे हुए उसे लाँघते हुए (किसी को लाँघने से उसका कद बढ़ना बन्द हो जाता है, यह मैं जानता था) अपने घर में घुस गया।

यह अच्छा था कि अन्दर वे सब नाश्ते की टेबल पर ही मिले। ब्रेड के साथ खाई जा सकने वाली हर चीज उस मेज पर थी, यहाँ तक कि अमरूद भी, जिसे कैसे ब्रेड के साथ खाया जा सकता है, यह मैं नहीं जानता था। मेरे पिताजी की उम्र का एक आदमी था, जो शायद घर का मुखिया होगा। उसकी बीवी थी, जो मुझे देखते ही उठने को हुई लेकिन शायद अपने जाम घुटनों के कारण उठ नहीं पाई। उन दोनों का एक बेटा था, जो मुझसे कुछ बड़ा और काफ़ी गोरा था, उसकी पत्नी थी और बहन थी, जो बाहर पड़ी कराह रही थी। मैंने उसके हाथ पर गोली मारी थी।

अक्षरा रोती ही जा रही थी। मैंने उन सबको बैठे रहने को ही कहा और पीठ से बैग उतारकर उसमें से अक्षरा को निकालकर गोद में ले लिया। मैं कुछ देर के लिए उसे उनमें से किसी को सौंप देना चाहता था लेकिन यह मुझे सुरक्षित नहीं लगा। उस लड़की के भाई ने मुझसे पूछा कि मुझे क्या चाहिए। उसकी माँ ने कहा कि मैं उन्हें मारूँ नहीं, चाहे कुछ भी ले जाऊँ।

मैंने उनकी डाइनिंग टेबल से एक कुर्सी खींची और रिवॉल्वर उनकी ओर ताने हुए कुर्सी को उसी खिड़की के पास ले आया जहाँ मेरे पढ़ना शुरू करने से बहुत पहले के दिनों की धूप में माँ मुझे गोद में लेकर बैठती थी और स्वेटर बुनती रहती थी। मैं रोती हुई अक्षरा को गोद में लेकर वहाँ बैठ गया। आप समझदार हैं और आपको बताने की ज़रूरत नहीं कि जो रिवॉल्वर मेरे हाथ में था, मैं उसके साथ नहीं पैदा हुआ था। आप डाइनिंग टेबल पर आँखें फाड़कर बैठे बूढ़े आदमी के बाएँ कान की सीध में जिस कमरे में पहुँचेंगे, वहाँ मार्च की एक दोपहर में मैंने जन्म लिया था। मुझे जन्म देते समय मेरी माँ भी बच्चों जैसी थी और वह सिर्फ़ इसलिए आपकी इस दुनिया में नहीं आई थी कि मुझे जन्म दे या उसकी याद बस स्वेटर बुनने या कबाड़खाने जैसे घर में मरने के दृश्य से होते हुए ही आए। मेरे पिताजी ने इस शहर के हर स्कूल को जाने वाली हर सड़क, बीस साल तक साइकिल से इसलिए नहीं नापी थी कि सर्दी की एक सुबह वे एक नदी को सड़क मानकर उसके भीतर चले जाएँ। यह रिवॉल्वर हममें से किसी ने शौक से खेत में नहीं उगाया था लेकिन वह मेरे हाथ में थी, जो काँप नहीं रहे थे, भले ही मुझे दीवारों पर चढ़ने और उन पर सीधे चलने में डर लगता था।

अक्षरा आपकी तरह किसी जबरदस्त सीन की उम्मीद में चुप हो गई थी और वह कभी बड़ी हुई तो वही आपको बताएगी कि बाद में चाहे कुछ भी हुआ हो, पहले मैंने बहुत विनम्रता से अपना घर माँगा था।


(आज़ादी के बाद भारत में 6 करोड़ से भी अधिक लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं या किए गए हैं। )



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4 पाठकों का कहना है :

संध्या आर्य said...

चलते कदमो के
पदचाप की ध्वनि
धडकनो तक आते आते
रुक जाती है
और सांस घुटने लगती है
जिदगी कुछ ऐसी ही होती है
जो अपने रफ्तार में
विराम लेते हुये
खाली होती जाती है
आंखे निरीह मात्र !!!!!

Jamshed said...

Mere paas shabd nahi hai, bayan karne ke liye... Bus yun samajh lijiye ki maza aa gaya

Ashish Chatar said...

kuch kahte nahi banta...

राहुल पाठक said...

Adbhut aur aditiya,,,sahbad nahi hai gourav bhai.......