ऑर्कुट पर एक कम्युनिटी है- वी हेट एकता कपूर अर्थात ‘हम एकता कपूर से नफ़रत करते हैं’। उसके करीब सत्तर-अस्सी हज़ार सदस्य हैं और कल तक मैं भी उनमें से एक था। कल एक अलग दृष्टिकोण से सोचा और अब मैं एकता कपूर से घृणा नहीं करता। कारण है एक और चैनल- मेरा ‘वी’ महान!
हाँ, यही इस महान चैनल का नया महान सूत्रवाक्य है। चैनल वाले सुबह से शाम तक गला फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि हम महान हैं और आप भी जानते हैं कि कलयुग में सौ बार कहा गया झूठ सच हो ही जाता है। देशभक्ति के इस नारे का एक विदेशी बाज़ारू चैनल बीच पर नाचती बालाओं के द्वि अथवा त्रिअर्थी गानों के बीच बहुत अभिमान के साथ दुरुपयोग कर रहा है और फिर स्क्रीन पर उसी अमेरिकन बेशर्मी और बदतमीजी के अन्दाज़ में लिखा आता है- कृपया mind कीजिए। मतलब है कि आपको जो उखाड़ना है, उखाड़ लीजिए। हम तो आपकी संस्कृति का इसी तरह चीरहरण करते रहेंगे।
आप पूछेंगे कि इन के पास इतना साहस आया कहाँ से? ये आया है स्वयं को डी.जे. कहलवाने वाले ‘दिलजीतों’ और प्रिटी कहलवाने वाली ‘प्रीतियों’ से। आपको खबर हुई हो या न हुई हो, लेकिन इण्डिया और भारत बिल्कुल अलग अलग हो ही चुके हैं। जो भारत में हैं, वे यही ‘वी’ और ‘एम टी वी’ देखकर, अंग्रेज़ी गाने सुनकर, सिडनी शेल्डन के चलताऊ उपन्यास पढ़कर किसी भी कीमत पर इण्डिया का वीज़ा पाना चाहते हैं और जो इण्डिया में हैं, उन्हें भारत से उतनी ही घृणा है, जितनी महानगर में बसे अहंकारी अमीर भाई को अपने कस्बाई गंवार भाई से हो सकती है। कुल मिलाकर इस भारत नाम के देश में जो हैं, वे बेचारे मजबूरी में हैं और जैसे ही मौका मिलेगा, निकल लेंगे।
तभी तो ‘वी’ आज का युवाओं का चैनल है और बात सिर्फ़ एक चैनल की नहीं है, टी.वी. पर यही भोंडा नाच चल रहा है। बच्चों के कार्टून नेटवर्क पर जाओ तो वहाँ अंग्रेज़ी लहजे में हिन्दी बोलती असामान्य आकृतियां मिलती हैं। ऐसे में मुझे पोटली बाबा की, मोगली और सिन्दबाद बहुत याद आते हैं।
अपने ‘वी’ वाले ‘कैम्पस स्टार’ नाम से कोई प्रतियोगिता भी आयोजित करवा रहे हैं और मुझे उसका भी विज्ञापन देखने का सौभाग्य मिला।
उसका नारा है- कौन फाड़ेगा, किसकी फटेगी? अब इसके बाद सरकार यदि टीवी पर निगरानी कमेटी बिठाती है तो मैं भी साथ हूं। यह केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है या हमें वाकई निगरानी की जरूरत है?
अब आप कहेंगे कि इन सबके बीच एकता कपूर कहाँ से आ गई?
मैं मानता हूं कि एकता कपूर के तमाम धारावाहिक विकर्षित करती नाटकीयता, घिसी-पिटी कहानी और मनमर्ज़ी की स्पेलिंग वाले नामों के होते हैं और मैं उन्हें नहीं देख पाता। लेकिन क्या इस दौर में यही काफ़ी नहीं है कि टीवी पर कुछ तो है, जिसके किरदार हिंग्लिश या इंग्लिश की बजाय हिन्दी में बातें करते हैं। उसके धारावाहिकों की सजी संवरी अमीर महिलाएं चाहे कुछ और काम न करती हों, लेकिन संस्कारों और संस्कृति की बातें तो करती हैं। भारतीय त्यौहार तो उन धारावाहिकों में मनाए जाते हैं।
कल तक मैं माँ को उन ‘क’ नाम वाले धारावाहिकों को पसन्द करने पर उलाहना दिया करता था, लेकिन अब लगता है कि मेरी विशुद्ध भारतीय माँ के पास उससे बेहतर कोई विकल्प छोड़ा ही नहीं गया है और ऐसे में मैं एकता कपूर को ह्रदय से धन्यवाद देता हूं कि टीवी पर भारत कहीं तो ज़िन्दा है। आज हमारे पास ‘हम लोग’, ‘तलाश’ और ‘नुक्कड़’ तो नहीं हैं और न ही हम बना पा रहे हैं तो एकता कपूर जो थोड़ा बहुत कर रही हैं, उन्हें तो करने दीजिए।
मैं अब भी उनकी रचनात्मकता को पसन्द नहीं करता, लेकिन अब मैं एकता कपूर से चिढ़ता भी नहीं हूं।
एकता, मैं आपका आभारी हूं। ‘वी’ का कुछ बिगाड़ने की तो शायद हम भारतीयों में कुव्वत नहीं बची।
| [+/-] |
मेरा [V] महान बनाम एकता कपूर! |
| [+/-] |
जाने कैसा जुनून है! |
जब ये निर्मम दीवारें
सह नहीं पाती
मेरे सिर के दर्दनाक आघात
बार-बार
और इन पर लिखने लगता हूं
पसीना मिले खून की लाल स्याही से
वो एक शब्द
तो जानती हो अम्मा,
दीवारें टूटकर बिखर जाती हैं
काँच के मर्तबान की तरह,
जब भाग्य मुस्कुराता है व्यंग्य से
और अकड़ता है मूंछें तानकर,
तब ये डगमगाते कदम
नि:शब्द बढ़ते रहते हैं
अंगूठे पर रखकर भाग्य की मूंछें,
और हर अबोध सफ़र
पढ़ता है वही एक शब्द कायदे में
तो जानती हो अम्मा,
वही बड़ा सा आसमान सिमट आता है
इन्हीं दो हथेलियों में,
जब जब जुड़ता है ज़िन्दग़ी की रेलगाड़ी में
पराजय का एक और कूपा
और सब झंडियाँ
लाल रंग दी जाती हैं,
तब तब मैं बावरा होकर
उस शब्द की हरी पत्तियों से
रंगता फिरता हूं
झंडे, सड़कें, सपने, आँखें
और जानती हो अम्मा,
जाने कैसा 'जुनून' है!
कुछ भी नामुमकिन नहीं होता अब
सच...
| [+/-] |
विरासत |
हम बना रहे हैं
एक शहर,
जिसकी हर दीवार के
उखड़े पलस्तर के ऊपर
हमने पोत दिया है
झूठे उड़नखटोलों का चमकीला पेंट,
जहाँ हमने
दुपहरी को सुबह
और सुबह को आधी रात कह दिया है,
और जिसकी शामों-रातों में
हम अपने आईने तोड़कर
झूमते हैं,
हमने सब ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर
चूस लिया है उनका खून
और काट फेंकी हैं
पेड़ों की
या अपनी ही जड़ें,
किस्मत बदलने को
हमने अपने नाम के अक्षर
उलट पलट दिए हैं,
अलग अलग मौकों पर
अपनी पहचान की तरह,
हमने काट फेंकी है
अपनी माँ की जबान बेरहमी से
और अक्सर
कुचलते हैं उस जबान को
अमरीकी जूतों तले
क्योंकि उसकी माँग नहीं है बाज़ार में,
धुंए से काली हुई गलियाँ
फेयर एंड लवली लीपकर
खूबसूरत बना दी गई हैं
और अपनी बेटियों के कपड़े छीनकर
हमने उन्हें
उन गलियों में बेच दिया है,
हमने 'उच्छृंखलता' को
शब्दकोश में 'स्वतंत्रता' लिख दिया है,
मॉल बनाने के लिए
चार झापड़ मारकर
गिरा दी हैं हमने कमजोर सपनों की रेहड़ियां,
आज हम सब आज़ाद हैं,
तोड़ डाली हैं हमने
सब पुरानी 'कंज़र्वेटिव' बेड़ियां,
हमने एक और पीढ़ी के
गीतों पर प्रतिबन्ध लगाकर
उन्हें सिखा दिए हैं
आटे-दाल-तेल के मुहावरे,
हमने एक और पीढ़ी बना दी है
उपनिवेशवाद की,
ग़ुलामी की,
नपुंसक युवाओं की,
नौकरों की।
एक घने कोहरे की सुबह
मेरे मजबूर पिता ने
मेरी मासूम मुट्ठी खोलकर
थमा दिया था एक ऐसा ही शहर,
एक ऐसी ही सुबह
मैं भी अपने निर्दोष बेटे को
सौंप जाऊंगा
खूबसूरत गलियों का
एक नाचता हुआ शहर
वैसा ही...
| [+/-] |
जुनून-2 |
जो पढ़ने वाले जुनून-1 नहीं पढ़ पाए थे, वे उसे यहाँ पढ़ सकते हैं। यह दूसरा जुनून सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि बाद में लिखा गया...बाकी यह जुनून कहीं से भी कम नहीं है...
सवाल नहीं सुनता,
थामे नहीं थमता,
बहुत बेअदब हूं,
ऐसे बढ़ता हूं
कि उम्र बन जाता हूं,
बाँधे नहीं बँधता,
आकाश की छाती पर पाँव धरकर
ऐसे उड़ता हूं
कि अब्र बन जाता हूं,
एक घूंट में पीकर सारी ज़िन्दगी
गंवारों की तरह पोंछता हूं
जोश से सना चेहरा,
ऐसी प्यास हूं
कि सूखा हलक बन जाता हूं,
इतना करीब हूं
कि छूने में नहीं आता,
इतना विशाल हूं
कि फैलकर फलक बन जाता हूं,
खर्च होता हूं
और ख़त्म नहीं होता,
इतना अनंत हूं
कि प्रीत बन जाता हूं,
पाट दी हैं मैंने
हथेलियों की सब रेखाएँ,
इतना विश्वस्त हूं
कि जीत बन जाता हूं,
रात भर जागकर
उनींदे ख़्वाबों को खिलाता हूं
पींग भरती दावतें,
ऐसा रईस हूं
कि शौक बन जाता हूं,
सब पूर्वानुमान झुठलाकर
फाड़ फेंकता हूं इतिहास,
ऐसे चूसता हूं नियति का लहू
कि जोंक बन जाता हूं,
गोद ले लिया है मुझे
जुनून ने,
जुनून ही माँ है,
जुनून ही पिता,
मैं जागता हूं,
भागता हूं,
झूमता हूं,
नाचता हूं
और गिरता हूं ठोकरें खाकर
फिर बार बार
माँ की गोद में -
जुनून की गोद में...
| [+/-] |
6 दिसम्बर 1992 : कोई सोए तो कैसे सोए? |
पाँच और छ: दिसम्बर के बीच की रात मैं देर तक सो नहीं पाया। कोई कारण नहीं था, लेकिन बिस्तर पर पड़ा पड़ा देर तक कारणों को तलाशता रहा। अचानक तारीख पर आकर दिमाग की सब कोशिशें थम गईं। छ: दिसम्बर आ गई थी। सब कुछ सामान्य था, सिवा इसके कि पन्द्रह साल पहले इसी दिन ने अगले बहुत दिनों तक हज़ारों बेकसूरों की जान बहुत बेरहमी से ले ली थी। अब ऐसे नरभक्षी दिन मैं सो कैसे पाता? बहुत देर तक 6 दिसम्बर, 1992 ही सोचता रहा।
उसी साल अप्रैल में सत्यजित रे भारतीय फ़िल्मों को अपना सब कुछ थमाकर दूसरी दुनिया की ओर रवाना हो गए थे और यह वह समय था जब हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास की सबसे निरर्थक फ़िल्में बनाई जा रही थीं, मसलन- आज का गुंडाराज, इंसाफ़ की देवी, मैं हूँ गीता, मैं हूँ शेरनी, इंसान बना शैतान, पुलिस और मुजरिम आदि आदि...। कुछ फ़िल्में ठीक ठाक भी थीं जैसे दीवाना, रोज़ा, ख़ुदा गवाह आदि आदि...। ख़ुदा गवाह अमिताभ बच्चन के ऊपर से हीरो का चोला उतारने के शुरुआती कदमों में से थी।
उसी साल एक मधु सप्रे नाम की लड़की मिस इंडिया बनी थी, जिसने बाद में मिलिंद सोमन के साथ निर्वस्त्र होकर और बहुत बाद में बूम(2003) में हमारी सदी के उन्हीं 'ख़ुदा गवाह' वाले महानायक बच्चन साहब के साथ बहुत 'नाम' कमाया।
लेकिन 6 दिसम्बर से इस सब बकवास का क्या लेना देना?
मैं भी क्या क्या सोचने लगता हूँ, क्या क्या कहने लगता हूं?
नहीं, लेना देना है। वह नंगेपन का साल था और सब दिशाओं में हम अपने आवरण उतार रहे थे, नंगे हो रहे थे या हो चुके थे।
उस साल के क्रिकेट विश्व कप में भारत पहले दौर के आठ मैचों में से पाँच हारकर और एक बरसात की मेहरबानी से ड्रॉ करके बाहर हो गया था।
जहाँ भी ग्लैमर था, सब नंगे हो रहे थे तो वो आखिरी महीने का पहला हफ़्ता कैसे बच सकता था?
मैं उस वक़्त क्या कर रहा था? सोचता हूँ....
सर्दियों की सामान्य सी सुबह थी। देश में तब भी इंटरनेट का प्रयोग करने वाले 1000 लोग थे परंतु तब हम राजस्थान के एक छोटे से गाँव में रहते थे, जहाँ आकाशवाणी और दूरदर्शन अपनी और बिजली की मिलीजुली मर्ज़ी से ख़बरें पहुँचाया करते थे। लेकिन मुझे किसी खबर से क्या फ़र्क पड़ता? मैं तो स्कूल से बचने के बहाने ढूंढ़ता रहता था।
जब अयोध्या में 3 लाख कारसेवक जुटने शुरु हुए होंगे, तब शायद माँ ने मुझे खाने पीने की चीजों के लालच देकर नींद से जगाया होगा। जब आडवाणी और उमा भारती ने उन रामभक्तों को ललकारा होगा, तब शायद मुझे स्कूल के लिए तैयार किया जा रहा होगा। जब रामलला के नारे लगाकर ढाँचे पर पहले वार किए जा रहे होंगे, तब शायद मैं स्कूल की प्रार्थना सभा में खड़ा 'इतनी शक्ति मुझे देना दाता' गा रहा हूंगा। जब सब ध्वस्त किया जा रहा होगा, तब मैं इस टूटे हुए देश की नींव बनने की तैयारी में पहाड़े याद कर रहा हूंगा।
जितना चाहा था, सब तोड़ दिया गया था। आडवाणी कुछ और चाहते तो वो भी तोड़ दिया जाता। अगले बहुत दिनों तक देश भर में हज़ारों लोग मरे, जाने कितने बलात्कार हुए। बांग्लादेश में बेचारे बेकसूर हिन्दू मरे, जिनमें से अधिकांश को पता भी नहीं था कि अयोध्या कहाँ है, आडवाणी कौन है?
बचपन में मेरा एक दोस्त था, मुस्लिम था । उसका नाम शायद 'माजिद' होगा, ऐसा मैं अब अनुमान लगाता हूँ, लेकिन वो अपना नाम हमेशा 'मंजीत' बताया करता था। मैं बड़ा हुआ तो सोचा कि मुस्लिम धर्म में तो ऐसा नाम नहीं रखा जाता। फिर उसे क्या जरूरत थी नाम छिपाने की? या फिर उसका नाम यही था तो उसके पिता ने ऐसा नाम क्यों रखा? उसके भाई का तो कोई ऐसा नाम था ही नहीं, बस सब उसे सोनू-वोनू जैसा कुछ कहकर बुलाते थे।
शायद इस 6 दिसम्बर का ही उन मजबूर से नामों के पीछे कुछ हाथ हो....मैं आज भी यही सोचता हूँ और देर रात तक सो नहीं पाता।
तब से मैं हर दिन अपने भारत को थोड़ा सा जोड़ता हूँ और शाम तक कोई न कोई आडवाणी, बुखारी, मोदी उसे उससे ज्यादा तोड़ चुका होता है। कोई सोए तो कैसे सोए?
| [+/-] |
तस्लीमा, तुमने माफ़ी क्यों माँगी? |
शिकायत है कि तस्लीमा इस्लाम के ख़िलाफ़ लिखती है। माँग है कि तस्लीमा को ज़िन्दा जला देना चाहिए। तस्लीमा कहती है - मोहम्मद साहब पैगम्बर नहीं थे, पैगम्बर होने का नाटक कर रहे थे। इस्लाम हमेशा से राजनीति का धर्म था, प्रभुत्व के लिए स्थापित किया गया धर्म था।
| [+/-] |
कुछ क्षण : कुछ क्षणिकाएँ |
तुझ बिन
एक शहर,
चौंसठ मोहल्ले,
चौबीस हज़ार आठ सौ इकत्तीस घर,
दो लाख दस हज़ार आठ लोग,
तुझ बिन सब मुर्दे,
सब घर शमशान।
हँसी का साल
वो साल
हँसी का था शायद,
हम इतना हँसते थे
कि उड़ने लगते थे
पंखों के बिना।
माँ
माँ की गोद में छिपकर
रो लिया करता हूँ,
कौन कहता है कि
गंगा नहाने से ही पाप धुलते हैं?
किस्सा
कैसा अजीब किस्सा था,
साथ सुना दोनों ने,
वो खिलखिलाकर हँसा
और मैं फूट-फूटकर...
प्रतीक्षा
वो देखती है मेरी बाट
घंटों अमराई में,
ये कहाँ उलझा बैठा हूँ,
कम्बख़्त
वक़्त ही नहीं मिलता।
बेशर्म
पिछले बरस
इसी दिन
मैं मर गया था,
बहुत बेशर्म हूँ,
फिर ज़िन्दा हूँ इस साल।
पुनश्च
दिल की आग से
पलकों पर सुखाता हूँ
गीले ख़्वाब बार-बार,
कोई फिर से जाता है,
यहाँ फिर से बारिश
प्यास
कैसे पीता उसे,
जिसे पूजा था ईश्वर की तरह,
उसे शिकायत रही सदा –
हमारे बीच कभी
प्यास क्यों नहीं जगती?
विश्वास(घात...)
कभी-कभी
भरोसे संभालना
इतना मुश्किल हो जाता है,
जैसे किसी ने
दिल पर पहाड़ उगा दिया हो
और पहाड़ पर काँटे
विदाई
मुआ काजल
याद न करने लगे मुझे
बेमौके,
तुम विदा होना
तो रोना मत।
भूख
हलक में डालकर खुद को
निगल जाता हूँ मैं अक्सर,
ताकि भूख न लगे,
ताकि गिरूँ नहीं।
तेरी मेहरबानियाँ
तेरी मेहरबानियों के मारे
कैसे जी पाते होंगे
बेचारे,
जो कवि नहीं हो पाते
चाँद
सुनो,
चाँद रिटायर होने वाला है,
तुम नौकरी के लिए
अर्ज़ी क्यों नहीं दे देती?
| [+/-] |
महफ़िलों को जिया मंदिरों की तरह |
पुरानी कविता है। आज याद आ गई तो सोचा सबके साथ फिर से बाँट लूँ। यह मेरी सबसे ज्यादा पसंद की गई कविताओं में से थी। आज ढूँढ़ा तो डायरी में तो मिली पर कम्प्यूटर पर नहीं। मैंने सोचा कि कौन टाइप करने की मेहनत फिर से करे? मैंने ओर्कुट पे ढूंढ़ा तो कुल 9 रिज़ल्ट आए। मुझे बहुत अच्छा भी लगा। मैं जानता था कि जब पिछले साल मैंने ये कविता अपने ओर्कुट प्रोफाइल में लिखी थी तो बहुत लोगों ने मेरा पूरा प्रोफ़ाइल ही कॉपी कर लिया था।
कई बार चोरी होने पर भी अच्छा ही लगता है।
डायरी में कविता के साथ कुछ और पंक्तियाँ भी लिखी थीं। वे भी लिख रहा हूँ।
21-10-2006
लोग कहते हैं, आज दीवाली थी, मगर मेरी दीवाली जाने क्यों आती ही नहीं? उसके इंतज़ार में कब से बेतुकी सी बातें लिखे जा रहा हूँ...
बुलबुलों में रहा पिंजरों की तरह,
रास्तों पर चला मंजिलों की तरह,
मैं नशे में भी होश ना खो सका
महफ़िलों को जिया मंदिरों की तरह,
सपने हकीकत सब बेकार थे
इस सजा को जिया शापितों की तरह,
शौक था एक ही बस बगावत का
फ़ौजियों में रहा बागियों की तरह,
नाम था या थी ये सब बदनामियाँ
खबरों में रहा हादसों की तरह,
ठहरे पानी सा ही यूं तो ठहराव था
नफ़रतों में चला गोलियों की तरह,
हरेक का यहाँ कोई खरीददार था
मैं फ़ेरियों में बिका फ़ुटकरों की तरह,
इश्क़ को क्यों इबादत कहते हैं लोग
खाइयों में गिरा आशिक़ों की तरह,
दूंद ली भीड़ में भी मैंने तनहाइयां
शादियों में रहा मातमों की तरह,
हार को चूमा हर बार बहुत प्यार से
हौसलों से मिला मुश्किलों की तरह,
दर्द की वजह बस एक इन्तज़ार था
हर घड़ी से मिला दुश्मनों की तरह,
हर मोड़ पर एक ऊंची दीवार थी
झांका दरारों से कनखियों की तरह,
दिल से मिटाया मेरा नाम बार बार
उनके गालों पर रहा सुर्खियों की तरह,
मैं गूंगा था,उन्हे शौक था शोर का
बस बिलखता रहा जोकरों की तरह,
ये लिखना तो बस एक दोहराव था
बस उन्हीं को लिखा, हर तरफ़,हर तरह...
| [+/-] |
प्यार थोड़े ही होगा... |
चार दरवाजों वाले तुम्हारे शहर में,
ओह!
सॉरी
तुम्हारे-मेरे शहर में
उस आखिरी बदसूरत सर्द शाम में
कोई सब कुछ पाकर भी
खाली-खाली सा था
और भटकता था बेइरादा,
उन भ्रमित गलियों में,
उन टूटी सड़कों पर
जाने क्या खोजने को,
रास्ते में मिलते
शक्की आँखों वाले शहरियों को
रोकता था एक पता पूछने को
और किसी के पिता का
नाम ही भूल जाता था,
उस दोपहर
अपना प्यार पा लिया था उसने,
फिर उस शाम अँधेरा पड़ने पर
क्यों आदमियों से,
साइकिलों से
टकराता भटक रहा था वो,
आखिरी बार
उस चौराहे पर इंतज़ार किया उसने
सूरज के बुझने तक,
कि बोलती आँखों वाला कोई आए
और चुपचाप मुस्कुराकर निकल जाए,
कोई अगली सुबह
कैद होने वाला था
अपनी ही मोहब्बत में
और उससे पहले गिड़गिड़ाना चाहता था
कि तुम उसके साथ आज़ाद हो जाओ,
उलझा शहर,
उलझे लोग,
उलझे पते!
मैं बेवफ़ा नहीं था,
बस उस शाम
तुम्हारा घर नहीं ढूंढ़ पाया,
और क्या था वो मुझमें-तुममें?
प्यार तो नहीं था?
वो तो एक बार ही होता है ना,
प्यार थोड़े ही होगा...
| [+/-] |
ओम शांति ओम |

बरसों पहले सुभाष घई साहब ने 'कर्ज़' बनाई थी, जो मेरी पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है। अपनी पसंद की फ़िल्मों के रीमेक का यह हश्र देखकर दिल पर जो गुजरती है, वह अलग बात है। खैर, ओम शांति ओम एक शुद्ध मसाला फ़िल्म है और सब्जी में मसाले डालने के चक्कर में फराह ख़ान सब्ज़ी डालना ही भूल गई हैं। फ़िल्म में पुनर्जन्म की वही 'तथाकथित' कहानी है, जो बीच-बीच में कभी-कभी याद आ जाती है और कभी-कभी बहुत देर में याद आती है।
पहली बार ऐसा हुआ कि किसी फ़िल्म को देखते समय लगा कि हम जैसे 'मेकिंग ऑफ ए फ़िल्म' देख रहे हैं। फ़िल्म के गाने बहुत अच्छे हैं और फराह ने विशाल-शेखर और जावेद अख़्तर की मेहनत को पूरी तरह भुनाया है। गानों के बीच-बीच में हल्की फुल्की कॉमेडी या कभी कभी थोड़ी सी कहानी आती जाती रहती है। किसी भी मसाला फ़िल्म की तरह तालियाँ बजाने और सीटी मारने के भरपूर दृश्य हैं, लेकिन उन सबका कोई औचित्य समझ नहीं आता।
अगर आपका दिमाग फ़िल्म देखते समय ज़रा सा भी काम करता है, तो आप बहुत से 'लॉजिकल' सवालों में उलझ सकते हैं, जिनके उत्तर आपको कोई नहीं देगा। इसलिए यदि आप मनोरंजन चाहते हैं तो यह मान लीजिए कि निर्देशक ने आपको एक महान बेवकूफ़ दर्शक मान लिया है, जो यह नहीं पूछेगा कि एक बहुत मशहूर अभिनेत्री की बिल्कुल हमशक्ल लड़की हीरोइन बनने के लिए भटकती रहती है और कोई माई का लाल यह नहीं पहचान पाता कि उसकी शक्ल शांतिप्रिया जी से 100%मिलती है। आखिर हमारे शाहरुख भाई में ही वो पहचानने वाली काबिलियत थी।
'मैं हूँ ना' इससे बहुत बेहतर और कसी हुई फ़िल्म थी। फ़िल्म देखकर हम तो फिर भी अपना ठीक-ठाक मनोरंजन कर ही लेते हैं, लेकिन शाहरुख खान की प्रतिभा के प्रति मन में अफ़सोस होता है। शाहरुख की उम्र निकलती जा रही है और वे करण जौहर और फराह खान सरीखों के चक्कर में पड़कर अपने आप को बर्बाद कर रहे हैं। ऐसे किरदार यकीनन शाहरुख के लिए नहीं हैं, पर उन्हें कौन समझाए? इस यारी-दोस्ती के चक्कर में बहुत से पहले भी बर्बाद हो चुके हैं।
लेकिन बात ये भी है कि जब तक सब के सब पैसा कमा रहे हैं, अभिनेता की संतुष्टि कहाँ मायने रखती है?
हिन्दुस्तान के लोग भी अजीब हैं। यहाँ 'नमस्ते लंदन, 'पार्टनर','भूलभुलैया' और 'ओम शांति ओम' हिट हो जाती हैं और 'ओमकारा','ब्लू अम्ब्रेला' और 'नो स्मोकिंग' फ्लॉप हो जाती हैं।
एक और अफ़सोस, अपने प्यारे देश की जनता के लिए!
