जाने कैसा जुनून है!

जब ये निर्मम दीवारें
सह नहीं पाती
मेरे सिर के दर्दनाक आघात
बार-बार
और इन पर लिखने लगता हूं
पसीना मिले खून की लाल स्याही से
वो एक शब्द
तो जानती हो अम्मा,
दीवारें टूटकर बिखर जाती हैं
काँच के मर्तबान की तरह,
जब भाग्य मुस्कुराता है व्यंग्य से
और अकड़ता है मूंछें तानकर,
तब ये डगमगाते कदम
नि:शब्द बढ़ते रहते हैं
अंगूठे पर रखकर भाग्य की मूंछें,
और हर अबोध सफ़र
पढ़ता है वही एक शब्द कायदे में
तो जानती हो अम्मा,
वही बड़ा सा आसमान सिमट आता है
इन्हीं दो हथेलियों में,
जब जब जुड़ता है ज़िन्दग़ी की रेलगाड़ी में
पराजय का एक और कूपा
और सब झंडियाँ
लाल रंग दी जाती हैं,
तब तब मैं बावरा होकर
उस शब्द की हरी पत्तियों से
रंगता फिरता हूं
झंडे, सड़कें, सपने, आँखें
और जानती हो अम्मा,
जाने कैसा 'जुनून' है!
कुछ भी नामुमकिन नहीं होता अब
सच...



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2 पाठकों का कहना है :

परमजीत बाली said...

अपनी संवेदनाओं को बखूबी व्यक्त किया है।सुन्दर रचना है।

Dr. RAMJI GIRI said...

"और सब झंडियाँ
लाल रंग दी जाती हैं,
तब तब मैं बावरा होकर
उस शब्द की हरी पत्तियों से
रंगता फिरता हूं"

बहुत ही खूबसूरत शब्द-विन्यास है गौरव जी.