क्या समय को भी बदला जा सकता होगा
कपड़ों या फिर मन की तरह
कि दुश्मनों के बच्चों में मिलाकर छोड़ आएँ अपने बच्चे
और अपने बूढ़े होने का इंतज़ार करें
कितना प्यार करें आख़िर इन कमज़ोर होते हाथों से
इस बिना फ़ुर्सत के समय में
और कितने पैदा करें बच्चे?
ख़त्म करने को दुश्मनियाँ
कितने जुलूसों में शामिल हों
कितने शामियानों के नीचे सिर झुकाए
यह सोचने की ज़गह वह सोचते हों
जो पिता ने सिखाया था कि सोचना चाहिए,
और ठीक कहाँ ख़त्म हों
कि आपको लगे- अच्छे ख़त्म हुए इस बार
शहर के बाहर से मँगाए जाते हैं मौसम
हमारी तरह हर बार
और हम मौसमों की तरह
एक भी बार नहीं ले पाते अपना मज़ा,
जैसे सफ़र में हों
नाम पूछते हैं और भूल जाते हैं
पानी माँगते हैं और पछताते हैं
मैं बार-बार तुमसे कहता हूँ
कि जब मैं चला जाऊँ, रखना मेरा ख़याल
खिड़की से बाहर जो हाथ है
उसे बचाए रखेंगे क्या ये खंभे और ट्रक
मेरे लौटने तक?
क्या यह शोर चीलों के आने तक
इसी तरह होता रहेगा?
जब मैं यहाँ नहीं होऊँगा
और नहीं होगा मेरे मनहूस उदास हो जाने का डर
क्या लगाएँगे ये लोग मेरी ठीक-ठीक क़ीमत
और कौनसी भाषा में
किस तरफ़ चेहरा करके हँस रहे होंगे?
है तुम्हें कुछ अंदाज़ा मेरी सोनपरी?
और कहाँ से होकर आएगी वह सुबह
जिसे उम्मीद के अर्थों में इस्तेमाल किया जाता रहा है?
