अपने निबन्ध से पहले गाय कहीं नहीं थी

ऐसा यक़ीन नहीं होता था
कि इतिहास की किताब से पहले भी
और बाहर भी रहा होगा इतिहास
जैसे शायद अपने निबन्ध से पहले
गाय कहीं नहीं थी
कम से कम दो सींग चार थन (या दो?) वाली तरह तो नहीं
फिर भी रोशनी खोने पर
इतिहास खोने का डर था
जिसमें मैं चौथी क्लास में अपनी एक मैडम से हुए
इश्क़ को लेकर था बड़ा परेशान

तब लाल या साँवले रंग के थे लोग
क्योंकि साँवला लाल होना आदत था
उस पर रोने पर
सबके हँसने का डर था
शर्म इतनी आती थी पूरे कपड़े पहनने पर भी
कि मैं साँवला खाली था
फिल्मों में साँवली हिचकिचाती तालियाँ बजती थीं
सब अपनी पत्नियों के पास ले जाकर साँवले दुख
- अफ़सोस कि उन दुखों में बच्चे भी थे जो कार की तरह रोते थे, जिनके नाम मुश्किल रखे जाते थे, प्यारे कम हैरान ज़्यादा –
सब अपनी पत्नियों के पास ले जाकर साँवले दुख
फ़ैक्ट्री में ख़ूब गोरा काम करते थे
मोटा होना काले होने जैसा ऐब था
हम इलाज़ में हो जाते थे आधे डॉक्टर
डॉक्टर माँ के पेट से सीखकर आते थे हँसना
माँ ख़ुद मिट्टी खाती और मुझे रोकती थी

सुख के त्योहार थे
और दुख का निबन्ध तक नहीं था

निबन्ध नहीं को फाड़ा नहीं जा सकता था



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5 पाठकों का कहना है :

अनिल कान्त said...

बहुत सही यार गौरव....कभी-कभी कितना कुछ तो होता है कहने के लिए....लेकिन मौन रहने को जी करता है

संजय भास्कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

विजयादशमी की बधाई एवं शुभकामनाएं

प्रवीण पाण्डेय said...

त्योहार तो सारे खुशी के ही हैं।

विमलेश त्रिपाठी said...

सुख के त्योहार थे
और दुख का निबन्ध तक नहीं था

बेहतरीन पंक्तियां...भई वाह... कविताएं भी अच्छीं...अच्छा लगा...बधाई....

संध्या आर्य said...

खोयी घटनाओ का लिख जाना
और पढ लेना
स्याही से घटित होने वाले
घटनाओ को ही इतिहास
कुदरत के कोख से
जन्मे किताब पर
करिश्मानुमा कुतुबमिन्नार है

अब दुर्लभ है
जिसमे शर्म लाल और साँवले रंग मे
मिलते हो
और रोये गये विषय पर हंसना
एक मुश्किल काम जब आप
व्यस्त हो दैविक अंवेक्षण मे

भटकन के शास्वत होने पर
इंसान अपने खोल मे नंगा हो
रहा है बाजार से भरी
भीड वाली आंखो मे

पहचान एक तरह के नही रहे
अब दोपाया भी चौपाया हो
रहे है कहने को ईक्सवी शताब्दी है

शक्ले भी बदल रही है
पहनावे और ओढावे के
आदमी अब भरपुर आदमी है
अकेले मे
इंसानियत मासूम नही दीखता
पर हैरान ज्यादा

अब ऐब एक ईमानदारी है
जो जीता है वह मरता है
अपने जूतो मे

प्यार के लिये रोना
अब एक आदत
पर आत्मा को पाने मे
इंतजार एक भुलावा है
समय से आगे निकल जाने से
बनती है एक सत्य जो
सत्य है अपने लिबास मे
जो लाल या सांवला नही है !