आजकल कुछ लिखने का मन नहीं करता। मान लो कि मैंने दो-चार कहानियाँ और लिख दीं तो क्या उनसे दुनिया बदल जाएगी? कल शुक्रवार है और मैं पिछले चार दिन से अपने कमरे में बीमार पड़ा हूँ। इन दिनों मुझे भूख नहीं लगती और इसमें एक बात अच्छी भी है कि पैसे कम खर्च होते हैं। मुझे पैसों की सख़्त ज़रूरत है और यदि मैं कहूँ कि इस कहानी को पढ़ने वाला हर व्यक्ति - यदि यह कहानी है, तो - मुझे पचास रुपए ही दे दे तो आप तुरंत यह ब्लॉग बन्द कर देंगे और कभी इधर नहीं लौटेंगे और यह तब, जब पचास रुपए तो अठन्नी जितने अर्थहीन हो गए हैं। इसीलिए मेरा मन करता है कि मैं इस कहानी को यहीं छोड़ दूँ। आखिर क्यों लिखूँ मैं और किसके लिए? क्या इससे बेहतर यह नहीं होगा कि इतने समय में मैं भी आपकी तरह ऐसा कोई काम कर लूँ जिससे ख़ूब सारा पैसा कमाया जा सके? मैं कहानी लिख दूँगा और आप पढ़ लेंगे और फिर कुछ देर बाद शायद भूल भी जाएँगे। भूले नहीं भी तो क्या आपका याद रखना मेरी बीमारी ठीक कर देगा? मैं किसी दिन भूखा मर रहा होऊँगा तो क्या आपका वह अहसान से लदा याद रखना मेरा पेट भर देगा? अरे..नहीं नहीं। ख़ुश मत होइए और न ही सहानुभूति जताइए। मैं आपसे कुछ माँग नहीं रहा हूँ। मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि हालात ही कुछ ऐसे हो गए हैं कि मुझे अपने पाठकों से ही चिढ़ होती है। मैं इसे चाहकर भी आपसे नहीं छिपा सकता। इसमें मेरा नुक्सान ही नुक्सान है और मैं अपनी बीमारी के साथ साथ इस ताज़ी पैदा हुई नफ़रत से भी जूझ रहा हूँ। मैं आत्मघाती क़िस्म का इंसान हूँ और अपनी इस प्रवृत्ति से मुझे डर भी लगता है। मैं नहीं जानता कि जितने महान लेखक हुए हैं, वे किस तरह से अपने आप को बरकरार रख पाए मगर मुझे कुछ दिनों के लिए लगने लगा है कि लेखक होना अपने आप के साथ किया गया सबसे बड़ा अन्याय है। यह तमाशबीनों के बीच मुफ़्त में घंटों नाचने जैसा है और यदि आप अपनी आत्मा इसमें झोंक देते हैं तो यह आत्महत्या है।
मेरे प्रिय कवियों में से एक शिव कुमार बटालवी ने एक बार कहा था कि यह संसार ही ऐसा है, जिसमें बुद्धिजीवियों को धीरे धीरे नष्ट होते जाना है। वे अपनी जवानी में ही मर गए, मेरे पसंदीदा गुरुदत्त की तरह। हर सुबह के सपने में मैं चाहता हूँ कि अचानक पता चले कि यह ज़िन्दगी एक बुरा सपना थी, जो टूट गया। धूप जब आती है तो मैं अकेला होता हूँ। बाहर उम्मीदों के हरे पौधे हैं। मैं रोज़ तुम्हें देखते हुए जगना चाहता हूँ। क्या तुम पढ़ रही हो?
एक लम्बी नदी के आख़िरी बेसुध किनारे पर हम तीन लोग हैं- बेचैन, भावुक और पराजित। ”हमें उन लड़कियों के लिए अपने आप को बर्बाद नहीं करना चाहिए था यार” - वह इस तरह मुझसे कहता है, जैसे अपने आप से कह रहा हो – “हमारे पास और भी ज़रूरी काम थे। हमें दुनिया बदलनी थी। ढेर सारी किताबें लिखनी थी, जिन्हें लोग अपनी नौकरियाँ छोड़ छोड़कर पढ़ते। ढेर सारी फ़िल्में बनानी थीं, जिन्हें देखने के बाद लोग अपनी छुट्टियों के एकांत में घंटों उदास रहते। कितना अच्छा होता कि हम उन्हें भोगते और भूल जाते और फिर दूसरी लड़कियाँ होती, जो कम हँसती। नदी के इस किनारे पर, जहाँ से शहर नर्क जैसा दिखता है, हम तीन अकेले हैं। हम उस चक्रवात के इंतज़ार में हैं जो समुद्रों से होकर रेगिस्तान तक पहुँचेगा और सब कुछ डूब जाएगा, जैसे सिन्धु घाटी सभ्यता डूबी थी। कितना अच्छा रहे कि हमारा भी कोई अवशेष न बचे। हमारे देवता हमारे घमंडी शहरों के साथ चूर-चूर होकर बिखर जाएँ। - हमने कितना बड़ा जीवन उस शहर में जिया है और अब हमें कुछ भी याद नहीं। याद है तो बस रफ़्तार, शोर और अलार्म घड़ियाँ। - और लड़कियाँ.. - वे सब मज़बूर थीं। उन्हें माफ़ कर दो। - मैं क्यों आज तक मज़बूर नहीं हो पाया? जब मेरी दोनों टाँगें कटकर मेरे शरीर से अलग हो गई थी, मैं तब भी मज़बूर नहीं था...और वे सब तब मज़बूर थीं, जब हँसती थी, नाचती थी और गोलगप्पे खाती थीं। उसके पैर नहीं हैं मगर उसे विश्वास है कि वह हम तीनों में सबसे तेज दौड़ेगा। इसमें हमें भी कोई सन्देह नहीं है। मैं चुप हूँ क्योंकि मैं चिल्लाना चाहता हूँ। फिर वे दोनों रितेश देशमुख के किसी डायलॉग को याद कर देर तक हँसते हैं। हम सोचते हैं कि क्षितिज में सूरज डूबेगा तो सुबह होगी, जिसमें हम ज़मीन के नीचे की सड़कों पर से होते हुए भाग जाएँगे। वे मुस्कुराकर उठ खड़े होते हैं और नदी की ओर चले जाते हैं। हम इंतज़ार करेंगे क्योंकि हमने जन्म लिया है और हम नास्तिक हैं। एक दिन हम हर उस दरवाज़े पर जाएँगे और उसे खरीद लेंगे, जहाँ से हमें धक्के मारकर बाहर निकाला गया है। हम अपने क्रोध पर गर्व करेंगे और सब कुछ याद रखेंगे। नदी के उसी तीसरे किनारे पर, जहाँ से अब भी वे दोनों जाते हुए दिखते हैं, मैं किसी नाव में बैठकर जाऊँगा और तीसरी कक्षा के बच्चे के से भोलेपन से उन्हें चिल्लाकर बताऊँगा कि वे लड़कियाँ, जो बहुत हँसती थीं, अचानक बहुत बूढ़ी हो गई हैं और वातानुकूलित घरों में, जहाँ सुविधाओं के सिवा बाकी सब कुछ जेल जैसा है, दिन भर बैठकर दीवारों में अपना अन्धा भविष्य पढ़ती हैं। मैं तब भी नहीं चाहूँगा कि वे उन्हें माफ़ करें। आईसीआईसीआई की एक उदास लड़की मुझे फ़ोन करती है और बीमा करवाने का आग्रह करती है। उसे मार्च तक लक्ष्य पूरा करना है, नहीं तो उसकी नौकरी छूट जाएगी। वह उन लड़कियों की तरह घर में नहीं बैठना चाहती। मेरे पास बीमा करवाने के पैसे नहीं हैं। फ़ोन के लम्बे आशा भरे सन्नाटे के बीच हम दोनों अपनी अपनी दुनिया में देर तक अकेले हैं। फिर वह रो पड़ती है।
मैं एक रेलवे स्टेशन की बेंच पर पड़ा दर्द से छटपटा रहा हूँ। मेरे सिर में भयंकर दर्द है और मैं जीवन में पहली बार भगवान को याद करता हूँ। मुझे पूरा यक़ीन है कि वह कहीं नहीं है। क्या यह देवदास का सा अंत है? एक चाँद सी लड़की आकर मेरे कानों में फुसफुसाती है कि हम दोनों साथ मरेंगे। क्या यह उसका आग्रह है कि मैं उसका गला दबाकर अपने साथ मरने का मौका दूँ? वह बेंच पर मेरे ऊपर लेट गई है। इस तरह, जिस तरह स्टेशन पर कोई नहीं लेटता। उसके घुटने मेरे घुटनों पर, उसकी आँखें मेरी आँखों में। उसके शरीर में बेसन और मिट्टी के तेल की ख़ुशबू बसी हुई है।
- मैं तुम्हारी हूँ।
वह कहती है और जिस क्षण मैं दुनिया का कोई स्वामित्व नहीं चाहता, सुबह के छ: बजे उगते चाँद सी एक लड़की मेरी है। मैं दर्द के कीचड़ में लथपथ हूँ। ऐसा लगता है कि मेरी धमनियों में बहते हुए खून में तेज़ाब मिला हुआ है। एक भीड़ हमारे चारों ओर इकट्ठा हो गई है। उसमें तरह तरह के लोग हैं। वे सब हम दोनों को एक साथ ज़मीन में गाड़ देना चाहतेहैं। हम दोनों हाथ बढ़ाकर उनकी मदद करते हैं। किसी को ज़मीन में गाड़ देना क्रोसिन पेन रिलीफ़ जैसा ही तो है। उन लोगों को अपनी अपनी रेलगाड़ी के आ जाने से पहले यह काम पूरा करना है। उनके घरों में इंतज़ार करती पसीने से भीगी हुई औरतें और कार्टून नेटवर्क देखते हुए बच्चे हैं। वे उनसे अनकहा वादा कर आए हैं कि हर महीने उनके लिए मोटी तनख़्वाहें लेकर आएँगे। उनका सारा प्यार और परिवार इसी तनख़्वाह पर टिका है। वे औरतें, जिनके दिमाग इतने ग़ुलाम हैं कि उन्हें बहुत पहले ही मर जाना चाहिए था। वे बच्चे, जो बेवकूफ़ और ख़ुश हैं। भागवत पढ़ते हुए वे बूढ़े, जिन्हें डायबिटीज है और जिनकी जवानी सस्ते जासूसी उपन्यासों के भरोसे गुज़री है।
- तुम हमारी सभ्यता के लिए ख़तरा हो।
भीड़ ने मेरे सामने की लाल दीवार पर सफेद रंग से लिख दिया है। मैं उसके नीचे लिखता हूँ कि मैं किसी सभ्यता को नहीं पहचानता। वह लड़की चुप है। मैं जानता हूँ कि वह अब नहीं बोलेगी। भीड़, जिसका कोई चेहरा और चेहरे पर आँखें नहीं हैं, उसके उभारों को खा जाना चाहती है। भीड़ में स्त्रियाँ भी हैं मगर भीड़ आश्चर्यजनक ढंग से पुरुष है। उन्होंने बहुत सारी किताबें लाकर हमारे ऊपर पटक दी हैं। वे किताबें, जिनके प्रति बेशुमार घृणा के बावज़ूद, परीक्षाओं में पास होने के लिए जिन्हें हमने साथ साथ पढ़ा है। वे किताबें, जिन्हें आत्ममुग्ध आई ए एस अफ़सरों और मोटे प्रोफ़ेसरों ने मिल-जुलकर लिखा है (शायद अगस्त की गीली शामों में एक दूसरे के सरकारी क्वार्टरों में पकौड़ियाँ खाते हुए), जिनके पहले और आख़िरी पन्नों पर दो दो बार उनकी क़ीमत लिखी है और जो महंगी साड़ियाँ खरीदती हुई गुमनाम पत्नियों और अनपढ़ माँओं को समर्पित हैं। जिनकी प्रस्तावना में लेखक अपने आप को इतना अज्ञानी मान रहे हैं कि विनम्र होकर टूट टूट जाते हैं।
- यह है हमारी सभ्यता, हमारा ज्ञान और इतिहास।
वे सब एक स्वर में कहते हैं। वे सब कुछ जानते हैं। उन्हें सब कुछ याद है - तैमूर से लेकर मैकाले तक – लेकिन वे बार बार भूल जाते हैं और किताबें उठा उठाकर खोजते हैं। इस हड़बड़ी में आधी किताबें उनके पैरों के नीचे हैं, जिन्हें छूकर वे बार बार उस हाथ को माथे पर लगाते हैं। फिर वे एक अंतहीन गड्ढ़ा खोदते हैं और तब हमें बुरी तरह से भयभीत कर देने में सफल हो ही जाते हैं। मैं बारी बारी से उन सबके पैर पकड़ता हूँ और माफ़ी माँगता हूँ। इस बीच उन्होंने हम दोनों के अंतरंग क्षणों की कुछ तस्वीरें खींच ली हैं, जिन्हें वे अपने सरकारी टेलीविजन पर साढ़े आठ बजे के समाचारों से पहले के कुछ मिनटों में दिखाएँगे। कुछ पैसे लेकर वे हमें जीने का मूलभूत अधिकार बख़्श देते हैं। वह उठती है और मेरी कायरता पर नाराज़ होकर चली जाती है। उसका नाम क्या था, मुझे याद नहीं। मैं तरस खाने लायक एक भुलक्कड़ बेचैनी में ज़िन्दा हूँ और मर गया हूँ।
घोड़े दौड़ते हैं नींद में, उन्हें बेचकर सो जाती हो तुम। हम अपने सपनों में आग लगाकर दिन रात रोशनी बाँटते हैं अथक, तुम मुझे देखती हो ऐसे जैसे काँच को देखती हो और शोर के पीछे की गली में हम लावारिस पड़े हैं। हाँ, तुम थोड़ी आश्वस्त।
जीत की तालियों की गगनचुम्बी गड़गड़ाहट के बिना हम जान झोंककर तमाशा करते हैं दोस्तों! यह और बात है कि हमारी आँखों के नीचे पड़े काले गढ्ढों और दुखती काँपती टाँगों से आप होते हैं विकर्षित और खाली बोतलें फेंकते हैं। मगर यकीन मानिए, जिस समय हमें अपने बिस्तरों में दुबककर प्रेम करना चाहिए था, हम आपके लिए गीत लिख रहे थे।
आप बार बार यही क्यों कहते हैं कि वे बुरे बने। उन्हें छोड़कर क्या आप कल रात भर मेरे जागने के बारे में दो बातें करना चाहेंगे?
कैसी हवा चलती है माँ, बार बार लगती है भूख, तलाशता हूँ जेबें।
यह 'ब्लू फ़िल्म' नामक कहानी का चौथा हिस्सा है। पहले तीन हिस्से ब्लॉग पर बहुत दिन पहले पोस्ट कर चुका हूँ। फिर लगा कि ब्लॉग पर शायद लोग लम्बी कहानियाँ नहीं पढ़ते, इसलिए रुका रहा। पिछले कुछ समय से कई साथियों ने लगातार कहा कि मैं पूरी कहानी ब्लॉग पर डालूँ, इसलिए इस चौथे अंश के साथ कहानी को आगे बढ़ा रहा हूँ। जिन्होंने इंतज़ार किया, उम्मीद करता हूँ कि वे क्षमा करेंगे। हालांकि लम्बी प्रतीक्षाएँ ऐसी पीड़ा देती हैं, जिनके लिए माफ़ी सम्भव नहीं ...फिर भी अंग्रेज़ी में कहूँ तो please bear with me... भाग 1 जामुनी जादू भाग 2 पापा जल्दी घर आ जाओ भाग 3 मैंने देखा कि मेरी तीन माँएं हैं
घर के बाहर भीड़ लगी थी। तीन लड़के लता का पीछा करते हुए घर तक आए थे। लता ने तेजी से अन्दर घुसकर माँ को बाहर बुला लिया था और बताया था कि कई दिन से ये लड़के ब्यूटीपार्लर से घर तक उसके पीछे आते हैं। माँ उन लड़कों को रोककर गालियाँ देने लगी थी। वे लड़के भी हँस-हँसकर जवाब दे रहे थे। आस पड़ोस के और राह चलते लोग आ जुटे थे। अच्छा खासा तमाशा बन गया था।
पिताजी कुछ देर से बाहर आए। तब तक माँ अकेली बोलती रही। उसने लता को अन्दर भेज दिया। मैं घर में नहीं था। मैं यादव के घर में पड़ा रागिनी को याद कर रहा था। कोई पड़ोसी कुछ बोल नहीं रहा था। माँ चिल्लाती चिल्लाती रोने को हो गई थी। लड़के खड़े बेशर्मी से हँसते रहे थे।
पिताजी चश्मा लगाते हुए बाहर निकले। उन्होंने सफेद कुरता पायजामा पहन रखा था। उनके चेहरे पर कुछ था कि उनका अध्यापक होना पहली नज़र में ही पता चल जाता था। ऐसा लगता था कि उन्हें मारो तो वे सिर्फ़ धमकाएँगे, मार नहीं सकेंगे। उन तीन लड़कों में जो लड़का ‘मुख्य’ लड़का था, वह गली की एक बूढ़ी औरत को बुला लाया। वह उसके उस दोस्त की माँ थी, जिससे मिलने वे तीनों रोज़ शाम को आते थे। उस बूढ़ी औरत ने चिल्ला चिल्लाकर इस बात को सत्यापित किया। पिताजी चुप रहे। हो सकता है कि पिताजी कुछ बोले भी हों मगर वह किसी को सुना नहीं। भीड़ और बढ़ गई थी जैसे शाहरुख़ ख़ान की कोई फ़िल्म चल रही हो। फ़िल्म होती तो उस दृश्य में मेरे पिताजी को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया जाता। सब ‘मुख्य’ लड़के की मुस्कुराहट पर तालियाँ बजाते। मैं और लता भी हॉल में बैठकर ऐसी कोई फ़िल्म देख रहे होते तो पिताजी को खलनायक ही समझते। वैसे वे पूरी फ़िल्म के खलनायक या नायक कभी नहीं बन सकते थे क्योंकि वे अध्यापक थे। उनका एक ही सीन होता।
पिताजी ने थोड़ी तेज आवाज़ में उन्हें चले जाने को कहा तो भीड़ को सुना। भीड अब पहले से धीरे फुसफुसाने लगी। यह उन लड़कों को अपमानजनक लगा। मुख्य लड़के ने हँसना बन्द कर दिया। उसके पीछे पीछे बाकी दोनों लड़के भी गंभीर हो गए। सब वहीं खड़े रहे। फिर अचानक मुख्य लड़का तैश में आ गया और उसने पिताजी को गाली दी।
वह एक लम्बी गली थी, जिसमें हमारा घर था। उस गली के दोनों कोनों पर खड़े आदमियों ने वह गाली सुनी। हमारे घर के पचास मीटर के दायरे में ही साठ सत्तर लोग होंगे। घरों में बैठे लोगों और छत से देख रहे लोगों के साथ गाय, भैंसों, कुत्तों, चिड़ियों, कबूतरों, मेंढ़कों और चूहों के कानों को जोड़कर ठीक ठीक हिसाब लगाया जाए तो करीब दो हज़ार कानों ने वह गाली सुनी। मेरी जानकारी में पिताजी को ऊँचा तो नहीं सुनता था, लेकिन और कौनसी वज़ह हो सकती है कि पिताजी ने पूछा, “क्या?”
यह ‘क्या’ उन लड़कों को किसी चुटकुले सा लगा और वे हँस दिए। भीड़ चुप, जैसे भीड़ को अजगर सूंघते हों। दो क्षण के लिए भीड़ का सिर झुका और फिर उठ गया। आँखें तीर की तरह हमारी देहरी पर। माँ, जिसे कभी कभी ऊँचा सुनता था, उसने अपनी बाटा की चप्पल उतारी और लड़के के मुँह पर दे मारी। माँ का निशाना इतना अच्छा नहीं था लेकिन लड़का बचने के प्रयास में नीचे झुक गया तो चप्पल सीधे उसकी नाक पर लगी। भीड़ हँसी, भीड़ फुसफुसाई, अजगर सूंघता हुआ लड़कों के पास आ खड़ा हुआ। लड़के स्तब्ध से कुछ क्षण खड़े रहे और फिर चले गए। पिताजी भीड़ के पार से गली के दूसरे मोड़ को देखते रहे। माँ ने नाली के पास पड़ी अपनी चप्पल उठाई और एक चप्पल पैर में पहने, एक हाथ में लिए भीतर चली गई। भीड़ भी छँट गई।
उस रात माँ ने राजमा की सब्जी बनाई। मैं उसी के साथ रोटियाँ खा रहा था, जब माँ ने मुझे शाम की पूरी घटना सुनाई। मुझे लगा कि उस घटना को सुनकर मुझे ज़ोरों से गुस्सा आना चाहिए था, जो नहीं आया। मैंने और दिनों की अपेक्षा आधी रोटी ज़्यादा ही खाई होगी। माँ बीच बीच में रोने लगती थी। मुझे दुख होता था। लता अन्दर बैठी किसी पत्रिका का बुनाई विशेषांक पढ़ रही थी। उस रात पिताजी मुझे नहीं दिखे, हालांकि वे घर में ही थे।
शाम को मैं यादव के घर में पड़ा रहा था। मैं रागिनी के गीत गाता रहा था और वह उकताकर अपना ब्लू फ़िल्मों का कलेक्शन उठा लाया था। उसके पिता का ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस था। उनके घर वी.सी.आर. था।
- इसके कितने सही हैं ना यार! बस ऐसे मिल जाएँ एक बार...
- फिर क्या करेगा?
- फिर तो वही बताएगी कि क्या किया?
उसने ऐसा चेहरा बनाया कि उसके दिमाग में बना चित्र मुझे साफ साफ दिख गया। मुझे हँसी आ गई। मैं उठकर बैठ गया और यादव की तरह टकटकी बाँधकर टीवी देखने लगा।
वह ख़ुशी नहीं थी, जो हमें उन फ़िल्मों को देखकर मिलती थी। या तो वह उम्र ऐसी थी या वह समय, या वह शहर, कि हमारा रोने का मन करता था तो भी हम ब्लू फ़िल्में देखते थे, गुस्सा आता था तो भी, प्यार के बिना जीना असंभव लगने लगता, तो भी...
हमारी आँखों की कोरों में इतनी बेचैनी भरी पड़ी थी कि उन दिनों वे फ़िल्में न होती तो हम आत्महत्या कर लेते। उन देशी विदेशी नीली फ़िल्मों ने हमें जिलाए रखा। वे फ़िल्में हमारी भगवान थीं।
तुम जब ट्रेन में उन्हें घूरते हो उनके चरित्र की थाह पाने को या कहा जाए कि खोजते हो एक इशारा, एक दृष्टि या इस तरह एक अदद मौका उन्हें क्रूरता से भोगने का तब वे किसी एक दिशा की ओर लगातार ताक रही होती हैं और पूर्व नहीं है वह दिशा, सूरज नहीं है वहाँ।
तुम अँधेरा पोत देते हो उनके सुनहरे गालों पर, उनके सपनों के कपास पर छिड़क देते हो कोयला।
मुश्किल दिनों में वे लपककर आती हैं भूख की तरह और परीकथाएँ सुनाती हैं अनंत।
अचानक किसी कोने से निकल आओगी तुम एक दिन और जब हम राख की कल्पना में रो रहे होंगे बेहिसाब या बरसता होगा अमृत तब हम यूँ ही संयोगवश जान लेंगे ख़ुशी के तरीके।
वे सब जब किसी हॉल या मन्दिर में जमा हो रहे होंगे दोस्त, तब मैं तुम्हें मोटरसाइकिल की लाँग ड्राइव पर दूर किसी सुन्दर गाँव में ले चलूँगा या हम भूल जाएँगे षड्यंत्रों से भरी अपनी भदेस भद्दी संकरी पथरीली भाषा और मैं तुम्हारे स्तनों से खेलते हुए एक नई पतंग, नए आसमान के बारे में बताऊँगा।
मैं तुमसे जिस रोज़ नींद माँगूंगा, सोती रहना देर तक और भूल जाना।
हम अकेले खोद लेंगे सारे कुएँ, हम अकेले छील लेंगे सारे खेत, आ जाइए, हम अकेले देंगे आपके बदतमीज़ मुश्किल प्रश्नों के सारे उत्तर और आपका चेहरा भाड़ में झोंक देंगे।
यूँ मैं झेलता तुम्हारे जाने की आवाज़ कि सीढ़ियों पर बिछा देता अपनी आँखें और नीचे की ओर धंसती इस कुतुब मीनार से नीचे फेंकता कीचड में अपनी कविताएँ एक एक करके। मैं तुम्हारे जबड़े में डालता अपना दिमाग और शराब की बासी गंध के बीच तुम मुझे तमीज़ से खाती जानेमन।
मैं जिस दिन मरता उस दिन कुत्ते रोते और चिडियाएँ गिलहरियाँ और रात के आत्मघाती अंधेरे भी।
मैं यूँ अकेला बैठकर ना देखता तस्वीरें और ना करता प्रार्थनाएं, तुम्हें पुकारता और तुम लौट आती मेरे ध्वस्त होने से ठीक पहले।