हिज़्र

यूँ मैं झेलता तुम्हारे जाने की आवाज़
कि सीढ़ियों पर बिछा देता अपनी आँखें
और नीचे की ओर धंसती इस कुतुब मीनार से
नीचे फेंकता कीचड में
अपनी कविताएँ एक एक करके।
मैं तुम्हारे जबड़े में डालता अपना दिमाग
और शराब की बासी गंध के बीच
तुम मुझे तमीज़ से खाती जानेमन।

मैं जिस दिन मरता
उस दिन कुत्ते रोते
और चिडियाएँ
गिलहरियाँ और रात के आत्मघाती अंधेरे भी।

मैं यूँ अकेला बैठकर ना देखता तस्वीरें
और ना करता प्रार्थनाएं,
तुम्हें पुकारता और तुम लौट आती
मेरे ध्वस्त होने से ठीक पहले।

हम ज़रा कम भावुक होते
तो बेहतर करते प्रेम।



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13 पाठकों का कहना है :

Mithilesh dubey said...

बहुत खुब, लाजवाब अभिव्यक्ति ।

M VERMA said...

हम ज़रा कम भावुक होते
तो बेहतर करते प्रेम।
बहुत सुन्दर, क्या बात कही है. भावुकता का अतिरेक प्रेम मे बाधक है.

अनिल कान्त : said...

Waah !!

सागर said...

हम ज़रा कम भावुक होते
तो बेहतर करते प्रेम

सुबह-सुबह जायका ख़राब कर दिया... सच जीभ नीम कर दिया...

विंकल said...

हम ज़रा कम भावुक होते
तो बेहतर करते प्रेम।

BAHUT KHOOB GAURAV...HAR LAPHJ TUMHARA TAREEF MANGTA HAI OR TERI HAR SOCH KO IS GAURAV KA SLAAM.

डॉ .अनुराग said...

हम ज़रा कम भावुक होते
तो बेहतर करते प्रेम।

चुनाचे हर हिन्दुस्तानी के सीने में एक ही गम है ...

ओम आर्य said...

आपकी रचना पर टिप्पणी देना मेरे लिये एक कठिन काम है,पर जहाँ मै आपको पढकर आनन्द मे डुबा दिया जाता हूँ ,उन पंक्तियो को मै हमेशा से यह चाहता हूँ कि आप तक यह बात जरुर पहुंचा दू,

मैं तुम्हारे जबड़े में डालता अपना दिमाग
और शराब की बासी गंध के बीच
तुम मुझे तमीज़ से खाती जानेमन।

ek emotion jo maine mahsoos to karee par bayaan nahi kar paunga

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हम ज़रा कम भावुक होते
तो बेहतर करते प्रेम।

yah solaha aane sach kahi hai aapane .....ya yo kahe ki mujhe lagi .

bhagawaan se duaa hai aap aise hi likhate rahe .

सुशीला पुरी said...

kya baat hai !!!!!!!!!

Pankaj Upadhyay said...

वाह बन्धु.... मिलकर बहुत खुशी हुई और आप गूगल रीडर मे एड हो गये :)

बहुत ही उम्दा रचना..

अम्बरीश अम्बुज said...

मैं तुम्हारे जबड़े में डालता अपना दिमाग
और शराब की बासी गंध के बीच
तुम मुझे तमीज़ से खाती जानेमन।
kya baat kah di.. kamal ki kalpana shakti hai bhai..

Mukesh Kapil said...

aisa kyon lagta hain ... ki yeh kavita hamare ird gird hain...

Satya.... a vagrant said...

bahut umda gaurav.

हम ज़रा कम भावुक होते
तो बेहतर करते प्रेम।

bahut umda.

संध्या आर्य said...

तेरे शब्द
तितलियो के पंखो पर टके
रंगो जैसे है जानेमन

जिसपर आंखे तैरती है
तन्हाईयो के साहिल पर
निशार होते वक्त मे
शब्द शब्द उडना

घण्टो रहना समुंद्री
गहराईयो के बीच
और पा जाना तेरा
एक एक मोती

जलपरियो के गलबाहियो
के बीच तेरा दैविय हो जाना
और मर जाना आत्मसात मे

तब तेरे खुशबू से भरे शब्द लिपट
जाते है जिस्मो-ज़ान से!