पत्नी का कमरा

Samuel Aranda
कंडक्टर का पहला अपहरण

रात थी। तारे भौंक रहे थे, कुत्ते चमक रहे थे| ऐसे में चोर आए और कंडक्टर को ले गए।

      कंडक्टर उदास किस्म का आदमी था। उसे इससे पहले अपहरण का अनुभव नहीं हुआ था इसलिए वह नौसिखियों की तरह पूरे रास्ते सवाल पूछता रहा। बस उसने यह सवाल नहीं पूछा कि उसे कहाँ ले जाया जा रहा है क्योंकि वह आँखें बन्द करके भी सिर्फ़ हवा की सरसराहट भर सुन लेता तो बता सकता था कि जीप कौनसे गाँव में से गुज़र रही है। इस तरह उसकी नौकरी पहली बार ठीक से काम आई।

      कंडक्टर की पत्नी हर दिन इतनी ख़ूबसूरत होती जाती थी कि कंडक्टर को उसे बार-बार टोकना पड़ता था कि यहीं रुक जाओ, इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत होना हम सब झेल नहीं पाएँगे। लेकिन फिर वह दो-तीन दिन तक घर नहीं लौट पाता था और इसलिए उसे टोक भी नहीं पाता था। तब वह टोके हुए दिनों की स्थिरता को भी कवर कर लेती थी और घर लौटते ही कंडक्टर का मन करता था कि मर जाए। कुछ दिन पहले ही उसने तैरना सीखा था और इस तरह आत्महत्या का एक रास्ता तो हमेशा के लिए बन्द हो गया था।
 
    उस रात साढ़े नौ बजे उसकी पत्नी उसकी ओर से चेहरा फेरकर सोने के लिए लेट गई थी। वह कुछ देर सीधा लेटकर यह सोचता रहा कि किस तरह शुरुआत करे कि पत्नी उसका हाथ झटककर न हटा दे। बहुत सोचने के बाद वह इस नतीज़े पर पहुँचा कि कमर के निचले हिस्से पर हल्के-हल्के उंगलियाँ फिराना पत्नी को अच्छा लगता है और इसी से शुरुआत करने पर अपमानित होने का सबसे कम ख़तरा है। उसने करवट ली और पत्नी की चादर में हाथ डाला। पत्नी तुरंत कुछ दूर को हट गई। कंडक्टर ने हाथ निकाल लिया और बिस्तर से खड़ा होकर कमरे में चहल-कदमी करने लगा।

ऐसा ही होता था। उसकी सुन्दर पत्नी मोम के पुतले की तरह लेटी रहती थी और बीच में ही कंडक्टर का हौसला जवाब दे जाता था। तब वह उल्टा उछलकर निढाल सा अपने हिस्से के आधे बिस्तर पर आ गिरता था। वह तय करता था कि अब उसे छुएगा भी नहीं लेकिन वह इतनी सुन्दर और वह इतना उदास था कि...।

      उसकी आँखों पर पट्टी बँधी थी इसलिए क़रीब आधे घंटे के सफ़र के बाद उसे पता चला कि उसका अपहरण करने वाले तीन लोग थे। जिस ओर उसके हाथों को बाँधने वाली रस्सी जा रही थी, उसने उधर चेहरा घुमाकर पानी माँगा। उसी तरह, जिस तरह किसी समझदार अपहृत आदमी को माँगना चाहिए।
- क्या जात है?
कंडक्टर को एकदम से अपनी जाति याद नहीं आई और उसके मुँह से अंगूर निकल गया। दरअसल वह कुम्हार था और उनके गाँव के सब कुम्हार अंगूर की खेती करते थे। उसे यही सबसे पहले याद आया।

पहले ने दूसरे से पूछा- भैया, अंगूर झीमरों में आते हैं क्या?
- तू पानी पिला ना यार और ज़्यादा हो तो सुसरी बोतल बाहर फेंक दिये।

पानी के कुछ देर बाद उसने कुछ खाने को माँगा। उसे बिस्कुट खिलाए गए। उसके आख़िरी बिस्कुट के दौरान जीप रुकी। उसकी आँखों की पट्टी उतारी गई और वे चारों जीप से उतरे।
     
कंडक्टर ने रास्ते में ही सोच लिया था कि उसे ज़रूर ट्यूबवैल पर बने किसी कमरे में ले जाकर रखा जाएगा, जहाँ आम के बहुत पेड़ होंगे। यह बिल्कुल ऐसी ही लोकेशन निकली।
पहले ने माचिस जलाई और तीसरे के चेहरे के आगे की।
- इसे...इसे होणा था तेरी बीवी का खसम..(यहाँ तीली बुझ गई) और तूने वो बरफ़ी ब्याह ली।

अब कंडक्टर ने जाना कि दिन में फ़ोन कहाँ से आते थे और अपहरण का कारण पैसे की माँग नहीं, उसकी पत्नी की लवस्टोरी है।

उसने पूछा- साहब, मैं इनका चेहरा नहीं देख पाया। दुबारा जलाओगे?
-         क्यों नहीं? यहाँ होमलाइट के होलसेल डीलर हैं ना हम तो। कुएँ की सीढ़ी से बाँध
साले को। भागने की कोशिश करेगा तो पाताल में जाएगा।

कंडक्टर को अकेला छोड़कर वे गाँव में चले गए जहाँ उन्होंने शराब पीते हुए मीना कुमारी की कोई रोती हुई फ़िल्म देखी और मानव जीवन के नश्वर होने के बारे में बातें कीं।
अकेले छूटे कंडक्टर को दूसरी फ़िक्र यही हुई कि अब छ: वाली बस का क्या होगा।(पहली फ़िक्र के बारे में हम बाद में बात करेंगे) वह पछताया कि उन तीनों को 6005 वाले कंडक्टर का नम्बर देकर फ़ोन करने को ही कह देता कि उसकी मेडिकल छुट्टी की अर्जी दे दे। मेडिकल की बात याद आने पर उसे यह अफ़सोस हुआ कि कुबड़े डॉक्टर को मेडिकल बनवाने के सौ रुपए भी देने पड़ेंगे।
यह कंडक्टर की पत्नी का गाँव था। इस गाँव तक कोई बस नहीं आती थी और यदि वह जीप न होती तो बहुत संभव था कि उन चारों को गाँव से आठ किलोमीटर पहले पड़ने वाले जंक्शननुमा गाँव में अगली सुबह के नौ-दस बजने का इंतज़ार करना पड़ता। तब आठ-नौ सवारियाँ जुटने पर कोई ताँगे वाला तैयार होता और वे चारों ताँगे में बैठकर उस गाँव में पहुँचते।

कंडक्टर की शादी के समय वह और उसके दो चचेरे भाई कार से आए थे और बाकी बारात छ: ताँगों में। पाँचवें किलोमीटर के पत्थर के बाद कार कुछ बिगड़ गई थी और कंडक्टर ने अपने उदास भाइयों के साथ एक ताँगे में ही लिफ़्ट ली थी। वह वर्षों से किसी ऐसी ज़गह नहीं गया था, जहाँ बस न जाती हो। ताँगे में बैठते ही उसका मन किया था कि टिकट काटने लगे और उसने टिकट की कॉपी निकालने के लिए जेब में हाथ भी मारा था, लेकिन कॉपी वहाँ नहीं थी। यदि अपहरण के बाद उसे बस से लाया जाता, तब ऐसी किसी हरकत की और भी अधिक संभावना थी। लेकिन शुक्र था कि दुनिया में समय रहते जीपें बना ली गई थीं।

सारा गाँव जानता था कि कंडक्टर की पत्नी शादी से पहले भी गाँव की छँटी हुई लड़कियों में से एक थी। इस छँटे होने को रिश्ते वालों को लाखों में एक होना बताया जाता था। सब जानते थे कि तीसरे अपहरणकर्ता से प्यार करने से पहले उसने एक एक करके अपने दो मौसेरे भाइयों, अपने एक टीचर और फिर एक साथ दो अधेड़ों से प्यार किया था। कंडक्टर के पिता जब उसे देखने आए थे, तब प्लेट लाते हुए उसके हाथ बिल्कुल आदर्श स्टाइल में काँप रहे थे और उसने ख़ासी मेहनत की थी कि अपना नाम बताते हुए हकलाए। कंडक्टर के पिता ग्रामीण बैंक के रिटायर्ड चौकीदार थे और ख़ुद को फौजी कहलवाना पसन्द करते थे। उन्होंने सीबीआई के स्टाइल में पूरे गाँव में लड़की की इंक्वायरी की। पूछा दो ही लोगों से लेकिन पूरे गाँव में हल्ला मच गया कि लड़की हाथ से निकल जाने वाली है।
कुछ ही मिनटों में कंडक्टर के पिता को पता चल गया कि वह कौनसे वार को कौनसे खेत में मिलती है और किस दिन व्रत रखती है। यह भी कि उसका कौनसा तिल अब तक किसी ने नहीं देखा और हर रात तीन बजे उसकी आँखें एक बार ज़रूर खुलती हैं।
       लेकिन पिताजी की आँखें उसका रूप देखकर ऐसे बन्द हुई थीं कि खुल न सकीं। उन्होंने लौटकर बताया कि लड़की असली ऐश्वर्या राय है और ऐसी गाय है कि सब पता होने पर भी नकली का भेद खोलने के लिए बम्बई नहीं जाना चाहती। उन्होंने यह भी जोड़ा कि गाय जर्सी नहीं, देसी है। कंडक्टर और उसकी माँ देर तक बदल-बदलकर फ़ौजी का एक-एक पैर दबाते रहे और सोचते रहे कि कौनसा टीवी माँगना चाहिए।

       टीवी, फ़्रिज और सोफ़ा आया लेकिन गाय की ज़गह पत्नी ही आई। कंडक्टर ने तीन दिन की मेडिकल ली। उस बार मेडिकल नहीं बन पाया था और तीन दिन की तनख़्वाह कटी थी। कंडक्टर सोचता था कि कभी तीन अतिरिक्त दिन काम करके उन पैसों की भरपाई कर लेगा लेकिन एक्स्ट्रा तीन दिन कभी आते ही नहीं थे। कभी एक भी महीना, गलती से भी एक भी दिन लम्बा नहीं खिंचा।

       अपहरण से अगली सुबह साढ़े पाँच बजे के नियम पर कंडक्टर की आँखें खुलीं। हल्का हल्का उजाला हो रहा था, हरा कुछ ज़्यादा हरा और नीला, कुछ कम नीला दिख रहा था। पूरा वातावरण अहा प्रकृति-वाह प्रकृति गा रहा था। बस कोयलें और चिड़ियाएँ सोती रह गई थीं और अपना फ़र्ज़ उसी तरह नहीं निभा पाई थीं, जिस तरह अधिकतर पुलिसवाले नहीं निभा पाते।
       जब वे तीनों कुएँ वाले कमरे में दाखिल हुए तो कंडक्टर अपने हाथों में बँधी रस्सी को कुएँ की सीढ़ियों से रगड़ रहा था। उनके घुसते ही वह यह काम और तेजी से करने लगा जैसे अब भी रस्सी कट गई तो कुएँ के रास्ते कहीं भाग जाएगा। तीसरे ने आगे बढ़कर उसके लिए थप्पड़ की एक रसीद काटी। वह बिल्कुल शांत होकर लेट गया। तीसरे ने अपनी जेब से मोबाइल निकालकर उसकी आँखों के सामने कर दिया। वह डायल किए गए नंबरों की लिस्ट थी। उसमें कंडक्टर की पत्नी का नम्बर भी था, जिसे पिछली दोपहर फ़ोन किया गया था। नम्बर दिलरुबा के नाम से सेव था।

       कंडक्टर हँसा, शायद उन तीनों की नासमझी पर, जो ये नहीं समझते थे कि एक दिन में चीजें कितनी बदल सकती हैं, कि लोग हमेशा नहीं जीते, कि बंदूक किसी की सगी नहीं होती।
उसने गर्व से कहा- मेरे वाले में वाइफ़ के नाम से स्टोर है।
इस पर वे तीनों भावुक हो गए। तीसरा तुरंत कमरे से बाहर निकल गया। दूसरे ने अपनी जेब से एक कोरा कागज़ और पेन निकालकर कंडक्टर की ओर बढ़ाया।

- अपने माँ बाप के नाम एक चिट्ठी लिख कि फ़िरौती में उनंचास हज़ार नौ सौ पचास रुपए चाहिए। ऐसा लिखना कि पढ़ते ही जिसम दिल से बाहर निकलकर बैठ जाए।
पहले ने पूछा- पचास हज़ार ही क्यों नहीं मँगा लेते?
- सारे नोट पाँच सौ के आ जाएँगे साले। फिर चाय भी पीनी हो तो घूमना दुकानों पे खुल्ले करवाते हुए।
कंडक्टर ने लिखना शुरू किया-
आदरणीय माँ और पिताजी,
यहाँ कुछ भी कुशल नहीं है और आप लोगों को मुझसे ज़रा भी प्यार है तो वहाँ भी कुछ कुशल नहीं होगा।

वह रुका- एक मिनट यार, सीधे फ़ोन पे ही बात करवा दो।
दूसरा तीसरे से पूछने बाहर गया। कुछ क्षण बाद तीसरे के चिल्लाने की आवाज़ आई- मेरा बचपन का सपना था कि कहीं चिट्ठी लेकर जाऊँ और बदले में ढेर सारे पैसे लेकर वापस आऊँ...और तुम बहन के...अम्बानी की औलाद, मोबाइल लेकर आए हो। गड्ढ़े में डाल इसको।
       
दूसरा लौट आया और उसने अपना मोबाइल फ़ोन कुएँ में फेंक दिया। कंडक्टर ने आगे लिखना शुरू किया-

उनंचास हजार पाँच सौ रुपए इनको दे देना। एफ़.डी की तारीख़ देख लेना। मेरे ख़याल से उसके पूरी होने में दो-ढ़ाई महीने ही बचे होंगे। इतने कम टाइम के लिए तुड़वाना मत। मैं तब तक यहाँ जैसे-तैसे रह लूँगा। आपकी ऐश्वर्या राय की वज़ह से ही मैं यहाँ बचा हुआ हूँ। उसका ख़याल रखना। (पहले उसने लिखा था- आपकी ऐश्वर्या राय की वज़ह से ही मैं यहाँ हूँ और थप्पड़ खाया था) मेरे मोबाइल में 6005 वाले कंडक्टर का नम्बर होगा। उसे छुट्टी की अर्जी देने को कह देना। कहना कि ससुराल गया है।
आपका अभागा बेटा

उनके चिट्ठी लेकर चले जाने के बाद एक बारह तेरह साल का लड़का चाय का गिलास और पारले जी एक एक पैकेट लेकर आया। उसने फूफाजी कहकर कंडक्टर को नमस्ते की। चाय पिलाते-पिलाते उसने कंडक्टर को बुआजी के कई कारनामे सुनाए और यह जोर देकर बताया कि उसका अपहरण करने वाले कितने लुच्चे किस्म के आदमी हैं।

-         आप किस्मत वाले हो जो चाय पी रहे हो। आपसे पहले एक फूफाजी को तो चाय में ही तेज़ाब घोलकर पिला दिया था।

कंडक्टर के हाथ से गिलास छूटकर कुएँ में जा गिरा।

- छोड़ेंगे क्या बेटा ये मुझे?
- रिकारड तो नहीं है फूफाजी ऐसा कोई इस गाँव में कि आदमी बँध के आया हो और खुल्ला गया हो पर फिर भी आखरी बोल तक नी पता चलता कि मैच कौण जीतेगा..

वह लड़का उछलता हुआ चला गया। छ: ऐसे ही दिनों के बाद सातवीं सुबह, जब उसकी रखवाली पर बैठा दूसरा सो रहा था, कंडक्टर रस्सी काटने में क़ामयाब हो गया और भाग निकला।

तीन किलोमीटर तक खेतों में वह उन दिशाओं में दौड़ता रहा जो उससे पहले खोजी भी नहीं गई थीं। वह घर भी नहीं लौटना चाहता था। यदि उसका अपहरण नहीं होता, तब भी वह उस रात घर से भाग ही आता।

बहुत कम रोचक और बहुत ज़्यादा अपमानित करने वाली तीन दिवसीय यात्रा के बाद कंडक्टर एक बड़े शहर में पहुँचा। शहर उसके सामने नए ढंग से खुला। जब आप बस में बैठकर यह सूचना लेकर उसके पास जाते हैं कि आज रात या कल सुबह लौट जाएँगे, तब वह चमकता हुआ दिखाई देता है। वह आपके गले लगकर आपको रोकने की भी कोशिश करता है। लेकिन जब आप अपना झोला लेकर इस उम्मीद में जाते हैं कि वह शरण देगा तो वह वेश्या की तरह का बर्ताव करता है। पैसा है तो आप सम्राट हैं, मालिक और पैसा नहीं, तो कुत्ते।

शाम तक कंडक्टर भूखा रहा। जाने क्यों, उसने तय कर लिया कि अब यहीं रहेगा। अँधेरा घिरने लगा तो वह एक बड़े से घर के फ़ाटक के सामने जाकर बैठ गया जैसे अन्दर भगवान रहते हैं और प्रसन्न होकर वर देंगे। कोई आधे घंटे बाद तेज रोशनी फेंकती हुई एक कार आई और उससे बिल्कुल एक इंच दूर ऐसे रुकी, जैसे टीवी पर अपना विज्ञापन कर रही हो। उसमें से एक आदमी उतरा और जितने महंगे उसके कपड़े थे, उसने उतनी ही सस्ती गाली कंडक्टर को दी। कंडक्टर तीस साल का खाया-पिया हट्टा-कट्टा आदमी था और उसने दो बीघा ज़मीन जैसी फ़िल्में भी नहीं देखी थीं, फिर भी उसने काँपती हुई आवाज़ में कहा कि उसे काम चाहिए। कार वाले आदमी ने डाँटकर उसे सुबह आने के लिए कहा। कंडक्टर ने खाने को कुछ माँगा, जबकि वह चुरा या छीन भी सकता था। और जैसा कि आप जानते हैं, उसे इतना अपमानित किया गया कि उसने आदमी से कहा कि वह एक कॉमेडी टीवी शो से आया है, सामने कार में कैमरा रखा है और मुस्कुराइए।
मुस्कुराकर वह आदमी अपने घर में चला गया। पश्चाताप में कंडक्टर ने तय किया कि अपने हरामज़ादे पेट को दो दिन तक कुछ नहीं देगा। लेकिन आधे ही घंटे में उसे आसमान में रोटियाँ दिखने लगीं। उसने सोचा कि अब तक तो सब रफ़ा दफ़ा हो गया होगा और कुछ भी हो, अगर उसे अपने गाँव की बस मिल जाए तो वह अभी वापस भाग जाएगा। लेकिन उसमें पैदल चलने की हिम्मत नहीं थी। उसने एक रिक्शा किया और बस अड्डे पर पहुँचा। बस अड्डे के पास पहुँचते ही उसे लगने लगा था, जैसे यही उसका घर है, किसी बस के बोनट पर बैठकर ही उसने पहली साँस ली थी, जैसे फिर वह कान के पीछे पेन खोंसकर बड़े बड़े शहंशाहों को झाड़ता चला जाएगा और बस में खड़े हुए सब लोग उसके हुक्म पर आगे या पीछे खिसकते जाएँगे। वह उन लोगों की तरह रिक्शा से उतरा, जो इस शहर के अपने घर में अपने पीछे बीवी और फ़्रिज़, कूलर, कार छोड़कर आए होंगे। रिक्शावाले ने पैसे माँगे तो कंडक्टर ने उसे एक झापड़ रसीद किया और कहा कि जो सौ का नोट उसने दिया है, उसमें से पच्चीस रुपए काटकर बाकी लौटाए, नहीं तो वह पुलिस को बुलाएगा। दो-चार लोग जुट गए और उन्होंने सहमति जताई कि यहाँ सारा अपराध इन साले बिहारियों की वज़ह से ही है, जो दिन में रिक्शा चलाते हैं और रात में गर्दन काटते हैं। रिक्शावाला पिटने को ही था कि उसने अपनी जेब से अस्सी रुपए निकालकर कंडक्टर को दे दिए। कंडक्टर ने उसे ईमानदारी से जीने की नसीहत दी और कहा कि रुपए-पैसे से ऊपर भी एक दुनिया है और बड़े से बड़ा आदमी भी आटा खाता है और आँखें बन्द करके ही सोता है। माहौल इतना धार्मिक हो गया था कि जब भीड़ छँटी तो कई लोग नीली छतरी वाले के न्याय के बारे में ही बातें कर रहे थे।

बस जल्दी ही मिल गई। 6005 ही थी लेकिन उस दिन कंडक्टर नया था। कंडक्टर ने चढ़ते ही बस के कंडक्टर को बताया कि वह स्टाफ़ है। दूसरे कंडक्टर का कभी अपहरण नहीं हुआ था और वह ऐसे मुस्कुराया जैसे उसकी बीवी सदा से बिना प्रेमियों की थी। जब कंडक्टर ने स्टाफ़ बोला तो बस के बाकी पाँचों यात्रियों ने उसे ईर्ष्या से देखा। सबकी टिकट काटकर दूसरा कंडक्टर, जिसे हम सुविधा के लिए हँसमुख कंडक्टर कहेंगे, उसके पास आकर बैठ गया और उससे पूछा कि उसका रूट कौनसा है। कंडक्टर ने रूट के साथ-साथ यह भी बताया कि वह मौत के मुँह से भागकर आया है, लेकिन पुलिस की तरह भूख ये सब बहाने नहीं सुनती। हँसमुख कंडक्टर ने उसे अपने टिफ़िन में से पराँठे खिलाए। पीछे की सीट पर बैठे एक धोती वाले बूढ़े ने कंडक्टर से उसके पिता का नाम लेकर पूछा कि क्या वह उनका ही बेटा है?
- बताया तो मुझे यही गया है ताऊजी लेकिन कुछ दिन से मानने लगा हूँ कि इम्पोसिबल कुछ भी नी है आजकल।

बहरहाल, आधा पराँठा ताऊजी के भी हिस्से आया। यह हिस्सा उन्होंने अपने नौ-दस साल के पोते के साथ बाँटकर खाया। इस तरह, जब बस का एक्सीडेंट हुआ और सभी यात्री मरे, तब माहौल पराँठा-पराँठा हो गया था और उस समय बच्चा सोच रहा था कि वह बड़ा होकर मिठाइयों की दुकान खोलेगा।

लेडी डॉक्टर और अमर दर्जी

उसे खाना बनाने और खाने का इतना शौक था कि वह चाहती थी कि उसकी शादी में उसके पिताजी दहेज की रकम देने के लिए, उसके और उसके उनके जॉइंट खाते में पैसे जमा करवाने की बजाय महीने-महीने के अंतराल पर उन दोनों को दावतें देते रहें। यह मुमकिन न हो सका। लेकिन मुमकिन तो बहुत कुछ न हो सका था। उसकी माँ मरने तक पहाड़ नहीं देख पाई थी और उसका विकलांग बड़ा भाई बच्चे पैदा करने में असमर्थ था। लेकिन वह फिर भी उम्मीद से लबालब भरी रहती थी। उसे लगता था कि किसी भी उम्र में डॉक्टर बना जा सकता है। उसने दसवीं के बाद यह कहकर पढ़ाई छोड़ दी थी कि वह पढ़ना तो चाहती है लेकिन अभी उसके पास इतना समय नहीं है कि बोरिंग मास्टरनियों को दिन में छ: घंटे झेल सके। उसने कहा था कि वह आठ-दस साल बाद फिर से पढ़ना शुरू करेगी और तब लेडी डॉक्टर बनना चाहेगी।

लेकिन समय अपने बाप का भी इंतज़ार नहीं करता। वह गाँव की सबसे सुन्दर लड़की थी लेकिन कुछ था जिसमें वह पीछे छूटती जाती थी। आख़िर एक दिन अपनी माँ के कहने पर उसने एक दर्जी से सिलाई सीखना शुरू किया। ऐसे, जैसे कपड़ों की सिलाई करते-करते एक दिन वह किसी के पेट के टाँके सिलने लगेगी।

दर्जी इतना दुबला था कि उसकी एक हड्डी तोड़ो तो दो के चटकने की आवाज़ सुनाई देगी। लेकिन वह बहुत धार्मिक किस्म का आदमी थी। सुबह-शाम नियम से एक-एक घंटा हनुमानजी की पूजा करता था। उसकी एक पत्नी, दो बेटे और तीन कुछ नहीं था। बेटे पाँच और आठ साल के थे। दर्जी गाँव का सबसे अच्छा दर्जी था और उसकी दुकान उसके घर के सबसे बाहर वाले कमरे में ही थी। उसी में उसने दो महीने तक लड़की को सलवार, शर्ट, पैंट और ब्लाउज काटने सिखाए। लड़की कुछ नहीं सीख पाई। उसका मन बस उस कमरे में बज रहे गाने सुनने में लगता था। वहीं उसने यह जाना कि हीर और राँझा की तरह बंटी और बबली की भी पूजा की जानी चाहिए और फिर एक अख़बार से उसे यह पता चला कि स्तनों का आकार बढ़ाया भी जा सकता है।

दर्जी के दोस्त भी उस जितनी धार्मिक प्रवृत्ति के ही थे और उन्होंने गाँव के बाहर वाले मन्दिर के पुजारी को अपना गुरु बना रखा था। वे सब उल्लू के पंजे खोजकर हर अमावस की रात उसके पास ले जाते और वह उन पंजों को मंत्रबद्ध करके उनके गले के लॉकेटों में डाल देता। फिर वे मन्दिर के गर्भगृह में कतार से बैठते और दो-तीन घंटे हनुमानजी का ध्यान करते।

-         कल जब मैं ध्यान में था एक सुबह उसने लड़की को बताया घुप्प अँधेरे में
एक्कोदम। ज़ीरो वाट का बलब भी नहीं और ऐसा लगा कि सामने दरवाजा खुल गया और एक्कोदम इतनी तेज लाइट आई माँ कसम और...और बता तू, आगे क्या होगा लाइट में?
लड़की मंत्रमुग्ध सी सुन रही थी। बोली- टॉर्च।
- टॉर्च नहीं, गदा थी गदा। बिल्कुल वैसी, जैसी मिन्दर में है। बस लाल रंग की झालर लटक रही थी हैंडिल से...
- झूठ बोल रहे हो।
- अरे, हद करती है। हनुमान जी की कसम। बाद में मैंने पूछा सबसे। किसी को नी दिखी थी। मैं समझ गया कि बालाज़ी ख़ुश हो गए हैं अपणे से। अब बेड़ा पार अपणा।

लड़की कनफ्यूज्ड रही। उसे यह भरोसा करने लायक बात तो नहीं लग रही थी लेकिन दर्जी का उत्साह देखकर अविश्वास करने का जी भी नहीं करता था। कुछ देर बाद उसने दर्जी से पूछा कि क्या वह उसे भी ध्यान करने का वह तरीका बता सकता है, जिससे हनुमानजी ख़ुश हो जाएँ।

- इस्पेशल तेरे को बताऊँगा लेकिन वह फुसफुसाकर बोला और किसी को बी नी...
लड़की ने उस दिन सूट की बाजू काटनी सीख ही ली। चलते हुए उसने बहुत हिम्मत करके दर्जी से पूछा अगर गदा की जगह जॉन इब्राहिम को देखना हो तो विधि में कुछ फेरबदल करके यह हो सकता है?
लड़की ने तुरंत तर्क दिया कि लड़कियों को हनुमानजी की पूजा करने और उन्हें तथा गदा को देखने की अनुमति नहीं है इसलिए उसके दिमाग में यह आया। कुछ सोचकर दर्जी ने कहा कि वह एक-दो दिन एक्स्ट्रा ध्यान करके इसका पता लगाने की कोशिश करेगा।
अगले दिन ही बेसब्र होकर लड़की ने फिर पूछ लिया। दर्जी ने कहा कि गदा के सिवा और कुछ देखने के लिए इक्यावन रुपए का प्रसाद चढ़ाना होगा और फिर अपने लक्ष्य की तस्वीर ध्यान में रखकर, उसी तरह रात को मन्दिर के गर्भगृह में ध्यान करना होगा।
तय हुआ कि जब सब सो जाएँगे, तब लड़की घर से किसी तरह बाहर निकलकर आएगी। गली के मोड़ पर दर्जी इंतज़ार करता हुआ मिलेगा और वे दोनों मन्दिर जाएँगे।
ऐसा ही हुआ। लड़की जब मन्दिर पहुँची तो फूली नहीं समा रही थी। हालाँकि घुप्प अँधेरा था लेकिन उसे दुबले-पतले दर्जी का सहारा था क्योंकि दर्जी के घने बालों पर हनुमानजी ने अपना हाथ रख रखा था।
चार घंटे का ध्यान बेकार गया। दर्जी को भले ही श्रीराम की भी झलक मिलने लगी हो, लड़की को कुछ नहीं दिखा। वह नाराज़ होकर समाप्ति का मंत्र पढ़े बिना ही उठ गई और निकल आई। दर्जी भी श्रीराम जी को होल्ड पर रखकर उसके पीछे-पीछे निकल आया। दर्जी ने रास्ते में उसे समझाने और मनाने की बहुत कोशिशें कीं लेकिन उसने कहा कि आज के बाद उसने दर्जी का चेहरा भी देखा तो उसकी सारी औलादें तिलचट्टी पैदा हों। आख़िर जब गाँव बिल्कुल पास आ गया तो दर्जी ने उसे बाँहों में भरकर ज़मीन पर गिरा दिया और उसके होठ चूमने की कोशिश करने लगा।
हमने तो श्रीमान, पहले ही आपको बताया था कि उसकी ढाई हड्डियाँ तोड़ोगे तो पाँच के टूटने की आवाज़ आएगी। लड़की खाते-पीते घर की थी और ऊपर से उसे खाने-पीने का शौक भी था, इसलिए उसने दर्जी को उछालकर एक ओर फेंक दिया और खड़ी हो गई।
- रेप करेगा?
और एक ज़ोरदार लात उसने पड़े हुए दर्जी के मुँह पर मारी। कुछ और लातों के बाद दर्जी बोल पाया कि यह ज़्यादा ध्यान करने से हुआ है कि उसका अपने दिमाग पर नियंत्रण ही नहीं रहा। उसने अपने बेटों की कसम खाकर कहा कि वह उसे अपनी छोटी बहन मानता है। लड़की ने उसके चेहरे पर थूका, ऐसी असुन्दरता से, जैसे बहुत सी लड़कियों को थूकना चाहिए था और वे थूकती नहीं थीं, और वह वापस घर लौट आई। सब सो ही रहे थे। अगली सुबह उसने अपनी माँ से कहा कि जो सिलाई-बुनाई सीखने की बात भी की तो उसकी ज़ुबान काटकर हाथ में दे देगी। उसकी माँ को इतना गुस्सा आया कि वह उसे थप्पड़ मारकर देर तक रोती रही। माँ ने पूरा दिन खाना नहीं खाया। लड़की अपनी दो प्यारी सहेलियों के पास गई और इतने दिन तक उन्हें कम वक़्त देने के लिए माफ़ी माँगी। उसकी सहेलियों ने गाँव की ख़बरों से उसे अपडेट किया। यह बताया कि कौन किसके साथ भागने वाली है और कौन बस मज़े ले रही है।

दर्जी, जो भी था जैसा भी था, आदमी का बच्चा था, इसलिए उसका भी आत्मसम्मान था, जिसकी हड्डियाँ नहीं थीं कि तोड़ी जाएँ और दर्जी माफ़ी माँगता रहे। सोलह साल की एक लड़की ने, अँधेरे में ही सही, एक मर्द के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई थी। दर्जी ने हनुमानजी कि तस्वीर के सामने खड़े होकर कसम खाई कि प्रतिशोध लेगा। उसकी आँखें डबडबा गई थीं और उसने कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे को तीन बार रिवाइंड किया। उसकी पत्नी, जो बस निर्जीव होकर मूर्ति बनने ही वाली थी, खाना लेकर आई और साढ़े ग्यारह अक्षरों के एक वाक्य में उसकी उदासी का कारण पूछा। दर्जी ने कहा कि धन्धा मन्दा चल रहा है। लोग नंगे घूमने लगे हैं, लड़कियाँ घर में ही एक कपड़ा काटती हैं और दो ड्रैस बना लेती हैं।

उसकी पत्नी ने सोचा कि दुनिया का अंत नज़दीक है। उसके बड़े बेटे ने उनकी बातें सुनीं और उसे लगा कि अब सिलाई मशीन कुछ ज़्यादा काम की तो है नहीं। उसने तय किया कि जिस दिन भी मौका लगा, सौ-पचास में किसी को यह मशीन बेच देगा।

अँधेरे में थप्पड़ खा लेना इतनी बड़ी बात भी नहीं थी कि दर्जी जैसा परिवार वाला और संस्कारित आदमी आत्महत्या कर ले। लेकिन दर्जी सब कपड़ों को हमेशा के लिए अधूरा छोड़ गया। उसकी पत्नी पहले से ही इतनी उदास थी कि उससे ज़्यादा उदास नहीं हो पाई। उसके बच्चे इसलिए रोए क्योंकि उन्हें लगा कि अब रात में डर लगा करेगा।

लेकिन मरने से पहले दर्जी ने अपने सब भक्त दोस्तों को अपने घर में दावत दी और खीर खाते-खाते बताया कि उसने लड़की को चख लिया है। किसी को यक़ीन नहीं हुआ। अदालत की तरह उन्होंने सबूतों की माँग की। दर्जी ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और एक फ़ोटो दिखाई। अँधेरे की फ़ोटो थी और मोबाइल भी, माशा अल्लाह चाइनीज़ था, इसलिए कुछ भी साफ नहीं था। हाँ, लड़की लेटी हुई थी और यह बताने पर उसे जानने वाले लोग उसे फ़ोटो में पहचान सकते थे।
- कहाँ ली?
उसके दोस्तों की आँखें फैल गई थीं।
- मिन्दर में।
उसके बाद तो दोस्तों ने फ़ोटो में मंदिर का फ़र्श और पीछे वाले आले भी पहचान लिए। फिर दर्जी ने चटखारे लेकर पूरी कहानी सुनाई और अंत में राम का नाम लेते हुए सब दोस्तों ने विदा ली। दर्जी कुछ देर तक आँगन में लेटकर आसमान को देखता रहा और रोता रहा। पत्नी और बच्चे सो चुके थे। फिर दर्जी उठकर अपने कमरे में आया, लैम्प जलाया, सारे कटे हुए कपड़े जी भर के देखे। फिर लैम्प उठाकर घर से बाहर निकल गया और किवाड़ बाहर से बन्द कर दिए। जब वह नदी की ओर जा रहा था तो दूर से ऐसा लग रहा था कि लैम्प अकेला जा रहा है।

अगले दिन जब लड़की को पता चला कि दर्जी मर गया है तो उसे थोड़ा अफ़सोस हुआ। लेकिन थोड़ा सोचने के बाद उसे लगा कि दर्जी इसीलिए मरा है ताकि वह ज़िन्दगी भर एक अपराधबोध में रहे। उसी क्षण उसने अपराधबोध उठाया और फूँक मारकर हवा में उड़ा दिया।

जिस गति से बेटियाँ जवान होती हैं, लड़की उससे एक किलोमीटर प्रति घंटा की अधिक स्पीड से बदनाम होनी शुरू हुई। मंदिर वाली कहानी उस धुंधली फ़ोटो के साथ गाँव भर के उस हर एक मोबाइल तक पहुँच गई, जिसमें फ़ोटो देखी जा सकती थी। यह सब तीन-चार दिनों में ही हो गया। रास्ते में कहानी में कई गवाह जुड़ गए जिन्होंने रात में लड़की को अपने घर से निकलते और दर्जी के साथ मन्दिर में घुसते देखा था। दो-तीन ने तो यह भी कहा कि उन्होंने पहले भी उन दोनों को एक-दूसरे को चूमते देखा था। तीन-चार और नौजवान भी सामने आए जो लड़की के साथ कई बार पर्सनल हो चुके थे।

पूरा किस्सा लड़की के विकलांग भाई ने भी सुना और फ़ोटो में भी देखा। उसने घर आकर लड़की को कई थप्पड़ लगाए। लड़की ठीक से यह भी नहीं जान पाई कि उसकी ग़लती क्या है? उसकी माँ ने कहा कि जैसे टीवी के धारावाहिकों में दिखाते हैं कि पैदा होते ही पच्चीस किलो दूध से भरे बर्तन में डुबोकर लड़कियों को मार देना चाहिए, पहले टीवी आया होता तो वह लड़की के साथ यही करती। लड़की रात भर रोती रही और शाप देती रही कि दर्जी की आत्मा को हर रात चूहे नोचें। पूरी कहानी उसे अगले दिन अपनी सहेलियों से पता चली। उसने अपनी माँ की कई बार कसम खाई तब जाकर सहेलियों को यक़ीन हुआ कि कहानी सच नहीं है।
इस तरह दर्ज़ी हारी हुई बाजी जीतने वाला बाज़ीगर या देवदास बन गया और लड़की, चालू लड़की कही जाने लगी जिसने अपनी हवस की आग में दर्जी के प्यार के साथ-साथ उसे भी जला दिया था।

लड़की गाँव की सबसे सुन्दर लड़की थी, यह जितनी बार भी कहा जाए, कम है। इसलिए गाँव के तेरह से पैंसठ के बीच के सभी मर्दों में कभी न कभी उसे पाने की चाह उभरना ज़रा भी अप्राकृतिक नहीं था। लेकिन चूँकि वह लड़की से चालू लड़की बन गई थी, इसलिए उससे एकतरफ़ा प्रेम का कंसेप्ट ही ख़त्म हो गया था। अब जो भी उसकी ओर आकर्षित होता, उसके पास अपनी एक कहानी होती। यदि गिनीज बुक वाले वहाँ आते तो कहानीकारों के जनसंख्या घनत्व में वह गाँव दुनिया में पहले नम्बर पर होता।

माना गाँव की जनसँख्या छ: हज़ार है और उसमें से आधे पुरुष हैं और उनमें से नब्बे प्रतिशत हफ़्ते में औसतन दो बार लड़की को पाना चाहते हैं तो एक हफ़्ते में कितनी नई कहानियाँ बनती होंगी, गणित के विद्यार्थियों को चाहिए कि इसकी गणना करें।

लड़की लगातार दुबली होती गई। उसके पिता ने तय किया कि जल्द से जल्द उसकी शादी कर देनी चाहिए। लड़की ने ऐतराज़ जताया और पिटी। पिटते-पिटते उसने कहा कि वह एक दिन अपने पूरे परिबार और गाँव की आँखें निकालकर खा जाएगी। फिर उसने अपने पिता से कहा कि वह उन समेत दुनिया के हर मर्द से नफ़रत करती है और मरते दम तक करती रहेगी। उसने कहा कि अच्छा है कि उसका भाई बच्चे पैदा नहीं कर सकता, नहीं तो वह भी लड़का होने तक बच्चे पैदा करता (लड़का की ज़गह उसने सूअर कहा)।

लड़की को थोड़ा और भूखा रखा जाने लगा। जैसे सुबह उठने के बाद एक बजे तक वह किसी तरह भूख पर कंट्रोल कर भी लेती लेकिन फिर उसे माँ या भाभी से कुछ माँगना ही पड़ता। उसे तीन बजे तक टाला जाता। यह उसके पिताजी ने तय किया था। उनका कहना था कि सतरह साल की उम्र में ही वह इतने मर्दों को खा चुकी है, इसलिए अब रोटियों में कुछ कमी होनी चाहिए।
तीन-साढ़े तीन बजे उसे दो रोटी और अचार दिया जाता। फिर रात के आठ बजे एक और रोटी। उसे सबसे अलग खाना होता था। उसका घर से बाहर निकलना भी बन्द था। पन्द्रह दिन में एक बार उसकी सहेलियाँ उससे मिलने आती थीं। तब उसे सब्जी मिलती थी।

उसे सपने में दिखता था कि हलवे का कोई पहाड़ है जो पूरा उसे ही खाना है या किसी पेड़ पर दही-बड़े लगे हुए हैं या वह सोई हुई है और उसकी माँ आकर उसके सिरहाने बैठ जाती है और रोती-रोती उसके बाल सहलाती रहती है। वह सपना देखती थी कि उसकी भाभी इतनी ख़ुश है जैसे उसके पेट में कोई बच्चा हो। कोई फ़ोटोग्राफ़र आया है और वे आँगन में घड़े के पास बैठकर फ़ैमिली फ़ोटो खिंचवा रहे हैं, जिसे वह एलबम में लगाएगी और सालों बाद अपने क्लीनिक की दीवार पर।

उसे देखनेवाले आने लगे। तब दो दिन पहले से उसे अच्छा खाना दिया जाता। एक-दो बार उसने प्रतिरोध किया तो बाद में उसके खाने में और कटौती होने लगी। फिर उसने उनका साथ देना शुरू कर दिया। उसे समझ में आ गया कि वह इतने दिन से अपने आपको बेकार में ही कष्ट दिलवा रही है। शादी के लिए ऐसे मना कर रही है जैसे उसने बाहर कोई दूसरी जात का लड़का अपने लिए देख रखा है। अचानक उसमें शादी के लिए उत्साह जगने लगा। उसे शादी किसी पीड़ाहारी बाम की तरह लगने लगी। उसने शरमाना सीखना शुरू किया। यह देखकर उसकी माँ और भाभी उसके क़रीब आने लगीं। खाना नियमित होता गया और फिर वह सबके साथ ही खाने लगी। माहौल इतना ख़ुशगवार होता था कि आप यह भी कह सकते हैं कि बीच का तनाव मैंने ही जानबूझकर रच दिया था। चलिए, जो भी हो, अब आप ख़ुश होंगे कि मेरी हार हुई और सुख की जीत, जैसी हमेशा होती है।

एक दिन, एक गंजा आदमी अपने बेटे के लिए उसे देखने आया। वह पूरा समय सिर झुकाकर बैठी रही। गंजा आदमी उसे देखता रहा। उसका देखने का तरीका ऐसा था कि यदि वह संभावित ससुर न होता तो यक़ीन मानिए, मैं ही उसकी आँखें फोड़ डालता। बाकी ससुरों की तरह उसने भी गाँव में पड़ताल की और किस्से सुने। लेकिन घर जाकर, जब उसकी पत्नी और बेटा बदल-बदलकर उसके पैर दबा रहे थे, उसने कहा कि लड़की, लड़की नहीं, ऐश्वर्या राय है और रिश्ता पक्का।

शादी जून में हुई। लड़का कंडक्टर था। उसकी बस का नम्बर 4888 था और वह रोज़ शराब पीता था। जिस दिन पीता नहीं था, तब भी पीना तो चाहता ही था। लड़की के पिता ने न बैंक में जॉइंट खाता खुलवाया और न ही हर महीने उन दोनों को दावत देने का वादा किया। कंडक्टर और उसके माता-पिता को लगा कि धोखा हो गया। टीवी, फ़्रिज़ तो आजकल आठवीं पास बेरोज़गारों के भी आते हैं।

सुहागरात थी, लेकिन फ़िल्मों की तरह फूल नहीं बिछे थे। कंडक्टर ने उस रात पी नहीं थी। कुछ देर तक उन्होंने इधर-उधर की बातें कीं। कंडक्टर ने उसे बताया कि वह ड्राइवर बनना चाहता था। लड़की ने बताया कि वह अब भी डॉक्टर बनना चाहती है। कंडक्टर हँस दिया। लड़की चुप रही। फिर दोनों ने प्यार किया और लड़की के मन में मर्दों के लिए जो नफ़रत थी, वह किसी अशारीरिक कारण से और बढ़ गई।

अगले दिन, जब उसका सारा मेकअप उतर गया था, कंडक्टर ने उससे कहा कि वह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत लड़की है। साथ ही यह भी कि वह बाहर के लोगों को थोड़ा कम दिखा करे। उसकी माँ ने भी कहा कि ज़माना बहुत खराब है और अगले गेहूँ से पहले रामचन्द्र जी को अवतार ले ही लेना चाहिए। दहेज में धोखे वाली बात के बाद से कंडक्टर की माँ का मानवता पर से भरोसा उठ गया था। उसका ब्लडप्रेशर लो रहता था, जिसे वह अपनी सहेलियों को हाई बताती थी।

लड़की ऐसे घुलने लगी जैसे चाय में ब्रेड या बिस्कुट घुलते हैं। खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी और उसकी माँ-भाभी भी रोज़ फ़ोन करके हालचाल पूछती थीं, लेकिन वह मायके के भूखे दिनों से भी ज़्यादा गति से दुबली होने लगी। कंडक्टर अँधेरा होने के बाद लौटता था और रोज़ कम से कम एक सीडी लेकर आता था। खाना खाने के बाद वे दोनों अपने कमरे में चले जाते थे। वह शराब पीता और कुछ घूँट लड़की को भी पिलाता। पूरे दिन में बस पीने वाले मिनट ही लड़की को अच्छे लगते थे। पीने के बाद कंडक्टर अक्सर रोने लगता था। वह लड़की को बताता कि कभी-कभी टिकट काटते हुए उसे लगता है कि उसे अभी बस से कूदकर कहीं और चले जाना चाहिए। वह किसी की भी गाड़ी चला लेगा लेकिन उसे ड्राइवर ही बनना है। वह लड़की से कहता कि वह अपने गाँव का सबसे उदास आदमी है। लड़की चुप रहती। उसे कभी कंडक्टर से सहानुभूति नहीं हुई। कंडक्टर की यह उदासी उसे खराब नाटक लगती थी, जिसका इस्तेमाल वह उसका प्यार पाने की उम्मीद में करता था। नहीं तो ऐसा क्यों होता था कि सुबह उठकर वह देरी होने की चिंता करता हुआ, पूरे उत्साह से अपने काम पर जाता था और जब भी अपने दोस्तों के साथ होता था, अश्लील चुटकुलों पर पेट पकड़कर हँसता रहता था। सारी उदासी लड़की के सामने ही जागती थी और वह भी सीडी देखने और प्यार करने से पहले।

Christophe Agou
लड़की का दुबली होते जाना, कंडक्टर को उसके और सुन्दर होते जाने जैसा लगता था। वह रोज़ उसे इस तरह और सुन्दर होते जाने से रोकता। वह उसे घर के और अन्दर रखने की कोशिश करने लगा। इतना कि घर के सबसे अन्दर के कमरे में दीवार खींचकर एक और कमरा बनवाया गया। उसमें कोई खिड़की या रोशनदान नहीं था। उसके बाहर कंडक्टर ने चॉक से पत्नी का कमरा भी लिख दिया। एक रात उसने बहुत लाड़ से लड़की को बाँहों में भरकर कहा कि जब वह बाहर जाए तो लड़की पूरा समय उसी कमरे में रहा करे। कंडक्टर ने महाकवि समीर द्वारा रचित किसी गीत का हवाला देते हुए कहा कि जब वह बाहर जाएगा तो अपना एक हिस्सा उस कमरे में ही छोड़कर जाएगा। इस तरह वे दोनों हमेशा साथ रहेंगे। लड़की चुप रही। कंडक्टर की माँ ध्यान रखती थी कि काम निपटाने के बाद लड़की पूरा समय उसी कमरे में रहती है या नहीं।

कंडक्टर अपने दोस्तों को गर्व से अपने आत्मिक प्रेम के बारे में बताता था। इसी बीच एक दिन उसने बताया कि उसकी पत्नी उससे इतना प्यार करती है कि उसके साथ बैठकर पीती है। 6005 वाले दोस्त ने पूछा कि क्या पहली बार उसने बहुत आनाकानी नहीं की थी? कंडक्टर ने आसमान की ओर सिर उठाकर कहा कि वह उसे कभी किसी चीज के लिए मना नहीं करती। 6005 वाले ने कहा कि यह इसलिए भी हो सकता है कि वह पहले से ही ये सब चीजें करती रही हो। कंडक्टर हँस दिया।

उस शाम उसने अपनी माँ से पूछा कि क्या लड़की फ़ोन-वोन पर किसी से बातें करती है? उसकी माँ ने कहा- हाँ। उसने रात को लड़की से पूछा कि वह फ़ोन पर किससे बातें करती है? लड़की ने कहा - किसी से भी नहीं - ऐसे स्वर में कि कोई बच्चा होता तो उसे गाय का रंभाना भी समझ सकता था

दो-तीन दिन बाद एक दोपहर फ़ोन पर एक कॉल आई। कंडक्टर उस दिन छुट्टी पर था। फ़ोन उसी ने उठाया। दूसरी तरफ़ कुछ सेकंड सन्नाटा रहा और फिर फ़ोन कट गया। दो घंटे बाद यह फिर हुआ। लड़की पत्नी का कमरा में थी। कंडक्टर ने ज़ोर से उसे पुकारा। वह दौड़कर आई।

-         फ़ोन किसका था अभी?
-         मुझे कैसे पता होगा?
कंडक्टर ने उठकर उसके बाल ज़ोर से पकड़े और फिर से पूछा। वह कराहते हुए बोली- मुझे नहीं पता।
कंडक्टर ने उसके बाल पकड़े हुए ही उसे ज़मीन पर गिरा दिया। कंडक्टर की आँखों में आँसू आ गए थे।
-         सारा दुख मुझे ही मिलना है क्या वह निरीहता से बोला और लड़की को बालों से
पकड़कर पूरे आँगन में घसीटने लगा। कंडक्टर के पिता बाहर से आए और यह देखकर दरवाजे से ही लौट गए।

पिछले कुछ महीनों में लड़की बहुत हल्की हो गई थी। इतनी कि कंडक्टर उसे हवा में उछालता तो उड़कर शायद आसमान में ही चली जाती। इसलिए कंडक्टर उसे जिस गति से घुमा रहा था, वह उससे दुगुनी गति से घूम रही थी। धरती कुछ और गोल हो गई थी और ऐसे में लड़की ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।
- और घुमाओ।
उसे मज़ा आ रहा था। इस पर कंडक्टर और उदास हो गया और उसे वहीं छोड़कर फूंकनी उठा लाया। लड़की बरसों बाद इतना हँस रही थी। कंडक्टर ने उसके कंधे पर फूंकनी मारी। लड़की उसी क्षण चुप हो गई। कंडक्टर ने बाद में अपने दोस्तों को बताया कि वह उससे इतना प्यार करता है कि जब वह उसके कोमल शरीर पर वार कर रहा था, तब घाव उसके अपने दिल में हो रहे थे। उसके दोस्तों ने उसे दिलासा दी।

पहले वार के बाद कंडक्टर ने दुबारा फूंकनी हवा में उठाई और आख़िरी बार पूछा- बता, किसका फ़ोन था?
- मेरे यार का।
कंडक्टर के हाथ से हथियार छूट गया। वह पत्नी का कमरा में जाकर बन्द हो गया और खूब रोया।
कंडक्टर का प्यार बेहद सच्चा मालूम होता था इसलिए लड़की की इस बेवफ़ाई के बावज़ूद दो-तीन दिन बाद उसे लड़की पर फिर से प्यार आया। लड़की किसी नकली लाश की तरह पड़ी रही।

कंडक्टर और भी उदास रहने लगा। 6005 वाले से उसने कहा कि जाने वे कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला। 6005 वाले ने कहा कि औरत की तो चप्पलें भी बेवफ़ा होती हैं। उसने बताया कि वह भी इस तकलीफ़ से गुज़र चुका है और उसका दर्द समझता है। फिर उसने कहा कि यदि वह कुछ पैसे खर्च कर सके तो वह उसे एक चालू औरत के पास ले जा सकता है। कंडक्टर ने कहा कि सभी औरतें चालू होती हैं, इसलिए इस वाक्य में सिर्फ़ औरत कहने से भी काम चल जाता।
चालीस साल की उस साँवली और मोहक औरत ने एक बार के ढ़ाई सौ रुपए लिए। वह अकेली रहती थी और अंग्रेज़ी के कुछ शब्द भी बोलती थी।

जैसे स्कूल से बच्चे लौटते हैं, कंडक्टर ख़ुशी-ख़ुशी घर लौटा। उसने खाना परोसती लड़की को एक चुटकुला भी सुनाया। रात में जब लड़की सो रही थी और वह सीडी देख रहा था, उसने लड़की की चादर में हाथ डाला और उसकी कमर का निचला हिस्सा सहलाने लगा। लड़की दूर हट गई।

कंडक्टर को अपना अपमान महसूस हुआ। वह चाहे कितना भी प्यार करता रहा हो, कितना भी उदास और भावुक हो, लेकिन हर चीज की एक हद होती है। आदमी कुत्ता नहीं कि वह चूमने लगे तो उसे दुतकारो। कंडक्टर उठ खड़ा हुआ और बेचैनी से कमरे में इधर-उधर घूमने लगा। उसे साँस लेने में भी तकलीफ़ हो रही थी और वह शायद इसीलिए कमरे से बाहर आ गया। पूरे चाँद की रात थी और न होती तो शायद उसे आँगन में पड़ी सिल न दिखती। वह सिल अपने सिर पर उठाकर लाया और चादर ओढ़कर ख़ुद को ऐश्वर्या राय समझ रही, अपनी पत्नी के सिर पर गिरा दी।