पतंग

पागल हवा, जा बाहर देखकर तो आ कि कहीं मेरे पति तो नहीं आ रहे। मैं खुद देख आती मगर मैं अपने पहलू में सोए अपने प्रेमी को जगाना नहीं चाहती।

एक पहाड़ी लोकगीत की पंक्तियां, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह इतना अशुभ है कि इसे गाने वाली औरत अगली सुबह मृत मिलती है।


(चित्र- Fleck)     

वे चुपचाप लेटे रहते। सुबह जाग जाने के बाद भी एक डेढ़ घंटे तक ऐसा ही लगता कि सो रहे हैं. मेरी नज़र अक्सर बहुत देर बाद उन पर पड़ती।
- आप कब जगे?
मैं हमेशा यही पूछता। यही हमारी गुडमॉर्निंग थी।
- बस अभी...
उनका हमेशा यही उत्तर होता। मेरे जान लेने के बाद कि वे सो नहीं रहे हैं, वे चाहकर भी ज्यादा देर तक बिस्तर पर लेटे न रह पाते. मुझे यह अपराधबोध दिन भर सालता रहता कि मैं उनके घर के साथ साथ उनकी नींद में भी  घुस आया हूं। फिर भी अगले दिन जब मैं उन्हें गुमसुम लेटे छत को ताकते हुए देखता तो पूछे बिना न रह पाता।

मैं सुबह जल्दी नहा धोकर इस तरह घर से निकल जाता था, जैसे किसी दफ्तर में नौकरी करता हूँ। वे कभी कुछ कड़वा नहीं कहते थे और उनके हावभाव में भी हमेशा मेरे प्रति एक स्निग्धता सी ही रहती थी, फिर भी मुझे ज्यादा देर उनके सामने बने रहना असहज सा लगता था। मैं चाहता था कि वे रात में जल्दी सो जाएँ और सुबह देर से जगें। शायद वे यह समझते थे, इसीलिए बिस्तर से जल्दी नहीं उठते थे। उनके उठने के आधे पौन घंटे के भीतर मैं हमेशा निकल जाता था। वे सात बजे उठते तो पौने आठ तक और वे ग्यारह बजे उठते तो पौने बारह तक। मुझे उनका सामना करना कठिन लगता था। शायद उन्हें भी मेरा सामना करना मुश्किल लगता हो। मैं दिनभर यहाँ वहाँ भटकता रहता था और अँधेरा हो जाने से पहले कभी घर नहीं पहुँचता था। कभी कभी ग्यारह-बारह भी बज जाते। वे मेरे लिए खाना बनाकर रखते थे और अगर किसी दिन मेरे लौटने से पहले सो जाते तो रसोई के दरवाजे पर एक बड़ी सी चिट चिपका देते।
दाल गरम कर लेना। फ्रिज में खीर रखी है। आदि आदि...

 उस खीर के चावल के हर दाने को निगलते हुए मुझे शर्मिंदगी सी होती थी। मुझे लगता था कि मैं नंगा हो रहा हूँ। मैं हर रात सोने से पहले सोचता था कि कल रहने के लिए कोई और ठिकाना ढूँढ़ लूँगा, लेकिन हर शाम फिर वहीं लौट आता था। मेरे लौटने के समय वे जाग भी रहे होते, तब भी हमारे बीच ज्यादा बातें नहीं होती थीं। वे अक्सर कोई किताब पढ़ रहे होते। जब तक मैं हाथ-पैर धोकर आता, वे खाना गर्म करके मेज पर लगा चुके होते। उनकी पूरी कोशिश रहती थी कि रात का खाना हम दोनों साथ ही खाएँ। खाना खाते हुए मैं पूरे समय थाली में ही नजरें गड़ाए रखता था। वे अपनी किताब पढ़ते रहते। मुझे अक्सर बहुत देर में नींद आती थी। वे यह कहकर सोने के लिए लेटते थे कि मैं जब तक जगूँ, लाइट जलाकर रख सकता हूँ। यह बात वे कई बार दोहरा चुके थे कि उन्हें रोशनी में भी अच्छी नींद आ जाती है। फिर भी मैं उनके सोने के कुछ देर बाद लाइट बुझा देता था और लेट जाता था। अगर बहुत बेचैनी होती तो बाहर बालकनी में कुर्सी पर बैठा रहता। मुझे उनके डबलबेड पर सोना अटपटा सा लगता था। कभी कभी आधी रात के बाद मेरी आँखें अचानक खुल जातीं और मेरा मन करता कि मैं अभी अपना बैग उठाकर, भागकर किसी और शहर में चला जाऊँ, या उसी शहर के किसी और कोने में। मगर उस शहर के किसी कोने में इतनी जगह और सहृदयता नहीं थी कि मुझे मुफ्त में पनाह मिल सकती। यदि मृत्यु के बाद इतना लंबा अज्ञात न फैला होता तो मैं शायद मर ही जाता।

मैं अक्सर औंधा लेटकर सोता था और जब सोते हुए अनजाने में उनका हाथ मेरी पीठ पर रखा जाता तो मेरी आँखें तुरंत खुल जाती। मैं हिलता भी नहीं क्योंकि मैं किसी भी तरह अपनी असहजता जताना नहीं चाहता था। इस तरह पास लेटे व्यक्ति की पीठ पर हाथ रख लेने में कुछ भी असामान्य नहीं था लेकिन मैं फिर से उनके करवट बदलने और हाथ के हट जाने का इंतज़ार करता रहता और उसके भी बहुत देर बाद मुझे फिर से नींद आती थी।

घर में दो और कमरे भी थे। मैंने कई बार चाहा कि उनसे कह दूँ कि मैं अलग कमरे में सोना चाहता हूँ। मैं कहता तो वे तुरंत सहमत भी हो जाते और उसी समय किताबों वाले कमरे के पलंग पर नई चादर बिछा देते। मगर उस स्थिति में रात भर एक पंखा और चलता और मैं उन पर तिनका भर बोझ भी नहीं बढ़ाना चाहता था। कभी कभी, जब शाम में बारिश होती और मैं देर रात में लौटता तो वे खाना खाते हुए कहते थे कि जब बारिश हो रही थी, तब वे बहुत उदास हो उठे थे। वे किसी के साथ बैठकर चाय पीना चाहते थे, लेकिन कोई भी नहीं था। फिर वे हँसकर कहते कि उन्हें मेरी बहुत याद आई। मैं चुपचाप अपने कौर तोड़ता और निगलता रहता था। उनका एक भी दोस्त नहीं था। कभी कभी वे बहुत देर तक अपने मोबाइल फोन के बटन तो दबाते रहते थे। स्नेक्स तो नहीं खेलते होंगे। तब क्या वे किसी को मैसेज लिखते हैं? क्या यह संभव है कि वह अब भी उनसे बात करती है?

कभी-कभार उनके कॉलेज के किसी साथी प्रोफेसर का ही फोन आता था और तब भी बस काम की बातें ही हुई करती थीं। उनकी दुनिया में बाकी कोई नहीं था।

उस शहर में इतनी उदासी थी कि बारिश को सोचते हुए मुझे अनाथ बच्चों की आँखें याद आती हैं। मैं बारिश के समय अक्सर बाहर होता था और देखता था कि बस स्टॉप के शेड के नीचे आने के लिए पैदल चलते लोग अचानक भागने लगे हैं और मोटरसाइकिलों वाले लोग रुकने लगे हैं। मैं सच्चे दिल से चाहता था कि बरसात कभी न आए क्योंकि जब भी बरसात होती थी, मुझे अपना बेघर और बेकार होना पूरी नग्नता के साथ हर क्षण लगातार दिखने लगता था।

सन्ध्या एक न्यूज चैनल पर खबरें सुनाती थी और मुझसे प्यार करती थी। उसे मेरी फिक्र रहती थी और उसके लिए खबरें लिखने वाला पंजाबी लड़का यह आसानी से जान जाता था, जब वह उन क्षणों में रुकती थी, जहाँ उसके सामने लिखी पंक्ति में दूर-दूर तक अल्पविराम नहीं होता था। राजनैतिक उठापटक के समाचार बोलते हुए भी उसकी आँखों में एक बेचैन सी मासूमियत आ जाती थी। जींद के पास के किसी गाँव में प्रेमी युगल को मारकर पेड़ पर लटका देने वाली खबर पढ़ने के बाद जो टीएमटी सरिया ब्रेक आया था, उसमें वह रोने लगी थी। दो-तीन मिनट के ब्रेक में जहाँ बाकी एंकर अपने बाल ठीक करती थीं और तेजी से अपने लेपटॉप पर पेज पलट-पलटकर देखती थीं, वह मुझे एसएमएस लिखती थी। जब किसी महत्वपूर्ण लाइव बहस के दौरान देर तक ब्रेक नहीं आता था, तब वह व्याकुल हो उठती थी और बहुत तीखे सवाल पूछने लगती थी। ऐसे ही एक साक्षात्कार के पैंतीसवें मिनट में उसने एक दाढ़ी वाले अहंकारी मुख्यमंत्री से कह दिया था कि अपने राज्य में हुए मुस्लिमों के नरसंहार के लिए पूरी तरह वे ही ज़िम्मेदार हैं। फिर मुख्यमंत्री ने मुस्कुराकर पानी माँगा था और फिर उठकर चले गए थे। फिर लालकिला बासमती चावल की ओर से प्रायोजित ब्रेक आया था और शाम को चैनल हैड ने उसे फोन कर कहा था कि वे उसकी स्पष्टवादिता की तहेदिल से प्रशंसा करते हैं और उसके गौरवशाली भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हैं, लेकिन फिलहाल चैनल की कुछ अंदरूनी समस्याओं की वज़ह से उसे छुट्टी पर भेजना चाहते हैं। वे छुट्टियाँ बहुत लम्बी खिंची और आख़िर में उसे कह दिया गया कि वह चाहे तो कहीं और काम ढूँढ़ सकती है। यह उन दिनों से कुछ पहले की बात है, जब भारत के सभी समाचार चैनल एक लड़की पर उसके पिता द्वारा किए गए बलात्कार की कहानी के मुख्य अंश दिखा रहे थे और बैकग्राउंड में राजेश खन्ना की किसी फिल्म का उदास संगीत बजता था। पिता के चेहरे पर लाल वृत्त लगाकर एक तीर का निशान लगाया जाता था, जिसके दूसरे सिरे पर वहशी पिता या हैवान बाप लिखा होता था। गृहणियाँ पारिवारिक धारावाहिकों से और अधेड़ पुरुष नेताओं से ऊब चुके थे और यह आँखें गड़ाकर देखते थे, चिंताएँ जताते थे। फिर बाद के दिनों में, जब दिल्ली में हर हफ्ते होते विस्फोटों से ज़्यादा सनसनी पैदा करती उनकी भयानक ख़बरें देशवासियों को डरा रही थीं, तब उन चैनल हैड पर आरोप लगा कि वे दाऊद इब्राहिम और एक हिंदूवादी संगठन से एक साथ पैसे खाते रहे थे।
मेरे लिए सन्ध्या की कहानी पूरे देश की कहानी थी।

उन लम्बी छुट्टियों की एक शाम में, जब हम इंडिया गेट के सामने की घास पर अपनी निराशाओं के साथ बैठे थे, उसने मुझसे कहा कि वह आज शाम अपने कमरे पर नहीं जाएगी क्योंकि वह सुबह तक मेरे साथ ही रहना चाहती है। एक मेंहदी लगाने वाली लड़के ज़िद करके उसके बाएँ हाथ पर मेंहदी लगाने लगी थी। उसका दाहिना हाथ मेरे हाथ में था और वह मुस्कुरा रही थी। क्या आप जानते हैं कि कुछ महीने पहले एक शाम जब निढाल सा होकर बिस्तर पर पड़ जाने की चाह में मैं सीधा ही घर में घुस गया था तो मैंने क्या देखा था?

वह लड़की सन्ध्या पीएचडी कर रही थी। वे उसके गाइड थे। वे, जो मेरी बहन के पति थे और जिनके घर में मैं मजबूरी में रह रहा था, वे जो उदास रहते थे और खाने के समय मेरी प्रतीक्षा करते रहते थे, वे उसी डबलबेड पर उस लड़की के साथ लेटे थे, जिस पर मैं उनके साथ सोता था। मैं इस समय उस जापानी पीली छतरी के बारे में बात करना चाह रहा हूँ, जिस पर लाल रंग के फूल कढ़े थे और जिसे ट्रेन में एक औरत बेच रही थी। टिकट के पैसों के अलावा मेरी जेब में कुल सत्तर रुपए थे और वह एक सौ बीस से नीचे आने को बिल्कुल तैयार नहीं थी। मैं कुछ भी करके उसे खरीद लेना चाहता था, लेकिन खरीद न सका। मैं अपनी गरीबी की बात नहीं कर रहा। वह तो मैं ट्रेन में था, नहीं तो ऐसा भी हुआ है कि दस हज़ार रुपए हफ्तों तक मेरी जेब में पड़े रहे हों और मुझे खर्च करने को ज़गह न मिली हो। उसके बाद वैसी छतरी मुझे किसी दुकान, बस या रेलगाड़ी में बिकती हुई नहीं दिखी। उस छतरी को न पाने का जो खालीपन है - पीले रंग का, जिस पर लाल फूलों के रंग की उदासी है जो कभी-कभी विक्षिप्तता हो जाती है और मैं नहीं जानता कि यह आपको कैसे समझाऊँ - वह इतना गहरा है कि जब मैं जीजाजी से चिपटकर लेटी हुई सन्ध्या के बारे में आपको बताना चाहता हूँ तो मुझे वह निर्जीव छतरी याद आती है। इसके अलावा मैं कोई भी बात आपको ठीक से नहीं बता पाऊँगा। मैं बोलने लगूँगा तो बोझिल रूप से हकलाने लगूँगा या अपनी स्मृतियों में खो जाऊँगा, जो कि मुझे कभी-कभी लगता है कि मैंने अपनी कल्पनाशक्ति से ही रच ली हैं। अब मैं नहीं बता सकता कि क्या वे ठीक उसी मुद्रा में आलिंगनबद्ध थे जैसा मुझे अब याद है या जब मैं पहुँचा, वे अपनी शेल्फ़ में से मुग़ल इतिहास की कोई किताब निकालकर उसे दे रहे थे और मैंने सोच लिया था कि कुछ देर पहले वे उस मुद्रा में रहे होंगे। जब वे दीदी को ब्याहकर ले जा रहे थे और दुर्भाग्य से मैं भी उसी कार में ड्राईवर के साथ वाली सीट पर बैठा था, उन्होंने दीदी की गर्दन के पीछे से एक हाथ ले जाते हुए उनके कन्धे पर रख लिया था। यह मैंने शीशे में नहीं देखा और न ही पलटकर, लेकिन मैं जानता हूँ। वे फुसफुसाकर आपस में बातें कर रहे थे। मेरी उम्र चौदह-पन्द्रह साल रही होगी, लेकिन वे मुझे बिल्कुल बच्चा ही समझ रहे थे। मुझे सब कुछ सुनाई दे रहा था और बुरा यह था कि सब कुछ समझ में भी आ रहा था। मैं जब भी शादियाँ देखता हूँ तो मुझे वे कुछ वाक्य ही याद आते हैं। यह ऐसा था, जैसे आपने अपनी बहन को संभोग करते हुए देख लिया हो।  
         
  इसलिए जब मैंने उस बिस्तर पर सन्ध्या को देखा तो मुझे कार की अगली सीट पर अपने आप में सिमटकर बैठे उस लड़के की याद आई, जो अपने कान बन्द कर लेना चाहता था मगर यह दिखाना भी उसकी ज़िम्मेदारी थी कि उसे कुछ नहीं सुना।
- रात में मिलते हैं।
दरवाजे पर जब दीदी के ससुराल की औरतें स्वागत के लिए खड़ी थीं, कार से उतरते हुए जीजाजी ने कहा था। दीदी हँसी थी।

- तुम्हारा कोई दोस्त नहीं है क्या? कभी किसी को घर बुला लिया करो। इस तरह हमें भी लगेगा कि घर में रहते हैं।
दिल्ली के उन दिनों में जीजाजी ने मुझसे कहा था। मुझे गुस्सा आया था और उससे मेरी आँखें भीग गई थीं। मैं कहना चाहता था कि नहीं, यह मेरा घर नहीं है। मुझे जिस दिन भी कोई और जगह मिलेगी, मैं तुरंत यहाँ से चला जाऊँगा और आपके घर को याद भी नहीं करूँगा। यह एक बहुत बड़ा और खतरनाक शहर है, जिसकी सड़कों पर सोते हुए मुझे डर लगता है और मेरी परवरिश ने एक झूठे और थोथे आत्मसम्मान की भावना भी मुझमें भर दी है, जो मुझे फुटपाथ पर सोने से रोकती है। लेकिन जिस दिन भी मैं कहीं और चला गया, आपसे हर रिश्ता तोड़ लूँगा।

सन्ध्या सुन्दर थी। उसने पत्रकारिता पढ़ी थी और संघर्ष के दिनों में उसे जब कोई और रास्ता नहीं सूझा, उसने दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी में रजिस्ट्रेशन करवा लिया था। वे हारे हुए दिन थे। वह भी अक्सर मेरी तरह उदास रहती थी। उसके भी बड़े सपने थे, जिनकी भूख उसके अस्तित्व को दिन-रात खाए जाती थी। जर्नल और किताबें उसकी स्वाभाविकता को ख़त्म करती जा रही थीं। कभी-कभी जब वह आती थी और जीजाजी कॉलेज से नहीं लौटे होते थे तो मैं उससे बातें करने लगता था। इस तरह दो-तीन महीने ही बीते होंगे कि उसका एक न्यूज चैनल में सेलेक्शन हो गया। वह ईमानदार थी। ऐसा मैंने हमेशा महसूस किया था।...और वैसे भी यदि आप मेडिकल साइंस की किताबें पढ़ेंगे तो उनमें हॉर्मोनों की वज़ह से पैदा हुई शारीरिक ज़रूरतों के बारे में बहुत विस्तार से लिखा होगा। किसी इनसान को भूख लगी है और वह अचानक कहीं भी किसी भी अनजान घर से माँगकर एक रोटी खा ले तो आप उसे चरित्रहीन नहीं कह सकते और तब तो बिल्कुल भी नहीं, जब उन दिनों में आप उसके एक सामान्य परिचित से ज्यादा कुछ भी न रहे हों। बाद में यदि वह संयोगवश आपसे प्रेम करने लगती है और आप पहले के समय की ऐसी किसी घटना को याद कर अपने आप को मानसिक यंत्रणाएँ देते रहते हैं, यह सोचकर कि उसने आपके साथ विश्वासघात किया है तो यह एक किस्म की सनक ही है। डॉक्टर कहते हैं कि ऐसे ही लोगों के लिए इतना खर्च करके पागलखाने बनाए गए हैं।

वे दोनों नहीं जानते थे कि उस शाम मैंने उन्हें देख लिया था और वापस लौट गया था। वह सम्बन्ध जैसा भी हो- क्षणिक या गहरा गुरु और शिष्या के ऐसे सामान्य सम्बन्धों की तरह घृणास्पद रूप से दैहिक नहीं था। सन्ध्या बहुत कोमल थी और किसी भी तरह की कालिख उसके स्वभाव को छू भी नहीं गई थी। वह हताशा में जी रही थी और कई बार ऐसा होता है कि मृत्यु की ओर ले जाती उस हताशा से बाहर निकलने की छटपटाहट में हम हर संभव रास्ता आजमा लेना चाहते हैं। ऐसा न भी हो तो यह हर ज़िन्दा आदमी का मूल अधिकार है कि उसे जिस समय जो अच्छा और सही लगे, वह कर सके। मगर मैं सुनता हूँ कि तेज आवाज़ में टीवी चल रहा है, जिसमें गुलशन कुमार माता की कोई आरती गा रहे हैं और उन दोनों का एक चित्र है, जो संगीत की उस धुन के साथ मेरे दिमाग पर छप गया है। कभी कभी सही और गलत को सोच सकने की नैतिकता से परे हम सिर्फ़ पीड़ित होते रहने के लिए मज़बूर होते हैं। कभी-कभी सुख हमें आकर्षित करके अपने पाश में इस तरह जकड़ लेता है कि हम कुछ भी नहीं सोच पाते और वही निर्णय लेते हैं, जो उस समय सुख की ओर ले जा रहा होता है। आप देख रहे होंगे कि मेरे पास उस शाम को माफ़ कर देने के कितने तर्क हैं और मैं स्वयं भी कोई दूध का धुला नहीं रहा हूँ, मगर फिर भी मैं बार-बार तीर खाए हुए हिरण की तरह उसी जंगल में भटकता हूँ, जिसे टी-सीरिज ने मेरे दिमाग की नसों में रच दिया है।

यदि आप छत पर जाकर पतंग उड़ाते हैं या मैदान में जाकर क्रिकेट खेलते हैं तो आप अपने माता-पिता और भाई-बहनों को एक एकांत देते हैं, जिसमें वे आराम से आपके खिलाफ षड्यंत्र रच सकते हैं। इसीलिए मैंने कभी घर के बाहर क्रिकेट नहीं खेला और जीवन में केवल एक बार पतंग उड़ाई। तब मैं दस साल का था। एक पतंग हमारे टीवी एंटिना में उलझ गई थी। बहुत कोशिशों के बाद मैंने उसे निकाला था। वह नारंगी रंग की थी, जिसके बीचों-बीच एक सफेद तारा बना हुआ था और उस तारे के ऊपर ही उसकी सींक थी। अब मुझे लगता है कि पतंग उड़ाना भी कविता लिखने की तरह सीखा या सिखाया नहीं जा सकता। जिसे यह आता है, अपने आप ही आता है। उसके साथ जो थोड़ी सी डोर थी, उसी से मैं वह पतंग उड़ाने की कोशिश करने लगा। आधा घंटा बीत गया और अच्छी-खासी हवा भी चल रही थी, लेकिन मैं नाकाम रहा। मैं उसे झटका देकर उड़ाता था, वह एक बार हवा में गोता खाती थी और फिर छत से आ टकराती थी। इतने में माँ मुझे बुलाने के लिए छत पर आ गई। वह कुछ सामान लाने के लिए मुझे नुक्कड़ की दुकान पर भेजना चाहती थी। साथ ही वह कहने लगी कि मुझे पतंग नहीं उड़ानी चाहिए क्योंकि हमारे घर की छत पूरी तरह खुली हुई थी और मैं गिर सकता था। उसी सुबह पढ़ाई न करने पर माँ ने मुझे एक थप्पड़ मारा था और मैं उससे नाराज़ था। मैंने ऐसे दिखाया जैसे मुझे उसकी कोई बात न सुनी हो। मैं पतंग उड़ाने की अपनी कोशिश में लगा रहा। नीचे कुकर की सीटी बजी और आपने सुना होगा कि माँ ने कहा था, छत खुली हुई है। छत ऐसे खुली थी, जैसे आसमान। बस वह असीमित नहीं थी और माँ ऐसे गिरी, जैसे आसमान के किनारे से कोई तारा फिसलकर नीचे गिर जाए। सब्जी में एक भी सीटी ज़्यादा लग जाती थी तो माँ घर में कहीं भी हो, बदहवास सी होकर गैस बन्द करने के लिए दौड़ पड़ती थी। तभी मेरी पतंग थोड़ी उड़ने लगी और मैं खुशी में बहरा अन्धा हो गया। सुख कभी-कभी हम पर ऐसा ही असर डालता है। माँ ने सँभलने के लिए फ़ुर्ती से हाथ-पैर चलाए होंगे। दस-बारह सेकंड के लिए मुँडेर की एक ईंट को वह पकड़े रही। वह चिल्लाई भी। उसने मेरा नाम पुकारा। वैसे, जैसे उसके सिवा कोई नहीं पुकारता था। मैं ख़ुश था और उससे अपनी नाराज़गी इतनी जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहता था। इसलिए मैं मंत्रमुग्ध सा अपनी पतंग को देखता रहा और मैंने पलटकर नहीं देखा। मैंने नहीं देखा कि वह एक ईंट के सहारे झूल रही है। मुझे लगा कि वह आख़िरी सीढ़ी पर खड़ी होकर गुस्से से मुझे पुकार रही है। सुबह के सवा ग्यारह बजे थे और एक घंटा पहले ही हम सबने एक साथ चन्द्रकांता देखा था।
उन दस-बारह सेकंड में माँ ने क्या-क्या सोच लिया होगा? हम सबका पूरा अतीत और पूरा भविष्य शायद! वह कौनसी दृष्टि थी हे ईश्वर, जिससे उसने मुझे आखिरी बार देखा था? मैं बेफ़िक्र था और अपनी पतंग को देखता हुआ मुस्कुरा रहा था। वही उसके लिए दुनिया का आखिरी सीन होगा और फिर उसने आँखें बन्द कर ली होंगी। एक रुपए की वह ईंट मेरी माँ का बोझ नहीं सह पाई और उसे लेकर चालीस फीट नीचे जा गिरी।

माँ तारा नहीं बनी कि शाम का खाना जल्दी-जल्दी निपटाकर हम आकाश की ओर मुँह फाड़कर उसे एकटक देख पाएँ। माँ पतंग बन गई और मैंने पहले उसे एक अख़बार में लपेटकर उस मिट्टी में गाड़ दिया, जिसमें वह गिरी थी। लेकिन मुझे उसकी इतनी याद आती थी कि तीसरे ही दिन मुझे वह पतंग निकाल लेनी पड़ी। मैं उसे अपने बस्ते में रखकर स्कूल ले जाना चाहता था। मैं नहाते हुए उसे बाथरूम के आले में रख देना चाहता था, ताकि वह देख सके कि मैं ठीक से रगड़-रगड़कर नहाता हूँ या नहीं। मैं कुहनी या गर्दन का मैल उतारना भूल जाऊँ तो वह मुझे याद दिला सके। आप समझने की कोशिश कीजिए कि एक दस साल का बच्चा, जिसे अब तक उसकी माँ नहलाती रही हो, बहुत कुशलता से अपने आप नहीं नहा सकता। मगर इस तरह पतंग के भीगकर गल जाने का डर था और बस्ते में रखने पर फट जाने का।

उन मुश्किल दिनों में, जब रात में चाँद पतंग के आकार का दिखता था, चाहे दूज हो या अष्टमी या पूर्णिमा, मैंने अपने जीवन की पहली चोरी की। क्लास में एक दिन मेरी आँखों से अचानक टपटप आँसू बहने लगे। मैं डेस्क पर रखे अपने बस्ते पर सिर रखकर बैठ गया, जैसे हम बच्चे अक्सर थककर बैठ जाते थे। गणित वाले सर क्लास में नहीं आए थे और सब बच्चे शोर मचा रहे थे। सर क्लास में आते तो एकदम से शांति हो जाती और तब मेरे सुबकने की आवाज़ सबको सुनने लगती। उनके आने पर सबके साथ मुझे भी खड़ा होना पड़ता और तब तो सबको मेरा आँसुओं से भीगा चेहरा दिख ही जाता। मैं ऐसा नहीं होने दे सकता था। उन कठिन दिनों में भी मेरा एक आत्मसम्मान था, जिसे मैं नहीं गँवा सकता था। मैंने अपने साथ बैठने वाले अर्जुन के बस्ते की जेब से उसका रोएँदार रुमाल निकाला और तेजी से अपना चेहरा पोंछकर उसे अपने बस्ते में रख लिया। मैं कभी भी रो सकता था। मेरी माँ मर चुकी थी और दुनिया में रुमालों की सबसे ज्यादा ज़रूरत मुझे ही थी।

जब सर आए और इधर-उधर बिखरे बच्चे तेजी से अपनी-अपनी सीट पर आकर लम्बे खिंचते हुए स्वर में वेलकम सर कहते हुए खड़े हो गए, तब अर्जुन ने सबसे पहले अपने बस्ते की जेब में ही हाथ डाला और अपना प्यारा रुमाल नदारद पाया। रोने से मेरा चेहरा थोड़ा तो लाल होगा ही और आँखें भी, और ऐसे में मैं उसे हड़बड़ी में डेस्क पर और उसके नीचे अपना रुमाल खोजते देखता रहा। वह लाल रंग का दृश्य था, जिसमें मैं रोने के बाद चुपचाप किताब खोलकर बैठा था। वह एक अमीर पिता का लड़का था। जयपुर तक रोज़ उनकी दो बसें जाती थीं और दो आती थीं। उसने सिनेमाहॉल में कई फिल्में देख रखी थीं। उसे गर्लफ्रेंड का अर्थ पता था और उसकी सुन्दर सी माँ थी, जो हमेशा हँसती रहती थी। हँसते हुए उनके गाल गुलाबी हो जाते थे और मेरा उन्हें छू लेने का मन करता था।
सर जब बोर्ड पर क्रय मूल्य और विक्रय मूल्य के बारे में बता रहे थे, तब अर्जुन ने खड़े होकर कहा कि उसका रुमाल किसी ने चुरा लिया है। ऐसी चोरी के बाद सब बच्चों के बस्तों की तलाशी ली जाती थी। यह एक अपमानजनक और दोस्ती तोड़ सकने वाली प्रक्रिया थी, जिसमें पीड़ित बच्चा क्लास के हर बच्चे को संभावित चोर मानकर तलाशी लेना शुरु करता था। उसने मुझी से शुरु किया और मुझी पर खत्म।

वे एक ऐसे खालीपन की ओर ले जाते दिन थे, जिन्हें जीवन भर कोई भी उपलब्धि, स्नेह या साहचर्य नहीं भर सकता। ऐसी रिक्तता, जिसके बाद आप हमेशा अपंग सा महसूस करते हैं। वे जो सर थे, जिनका नाम शिवदयाल या शिवप्रकाश था, विधुर थे। शादी से अगली सुबह ही उनकी पत्नी मर गई थी। चौबीस साल की उम्र में उन्हें दिल का दौरा पड़ा था और अब मैं समझ सकता हूँ कि सर के पास उस गुस्से की एक वज़ह थी, जो वे हमारी उंगलियों के बीच पेन फंसाकर, उन्हें दबाकर उतारा करते थे। लेकिन तब मेरी उम्र दस साल थी और मैं सिर्फ़ सुख और दुख ही समझ पाता था। सिर्फ़ हँसी और विलाप।

उन्होंने मुझे आधे घंटे तक मुर्गा बनाया और दो बस्ते मेरी पीठ पर रख दिए। पूरी बात बताते हुए यह बात अब भी मुझे उतनी ही तीव्रता से याद आती है कि मेरी माँ नहीं थी। शाम में घर लौटने के बाद भी ऐसा कोई उल्लास नहीं था, जिसमें डूबकर मैं अपनी उंगलियों, पीठ और पिंडलियों का दर्द भूल जाता। उन अधूरे दिनों में पापा पागल होने लगे थे। कभी-कभी वे आधी रात के बाद शहर की सड़कों पर बेवज़ह भटकते हुए मिलते और कोई उन्हें पहुँचाने आता। तभी हम दोनों भाई-बहन जागते और हमें पता चलता कि वे उठकर कहीं चले गए थे। उन्होंने माँ की गुमशुदगी के इश्तिहार छपवा लिए और छिप-छिपकर उन्हें सारे शहर की दीवारों पर चिपकाते रहे। वे खाना खाते हुए अचानक उठ जाते और सारी रोटियाँ तोड़-तोड़कर हवा में फेंकने लगते और मुस्कुराते रहते। बहुत देर तक ऐसा करने के बाद वे फूट-फूटकर रोने लगते थे। तब मैं और दीदी भी उनके साथ रोने लगते और हमारा घर एक पवित्र सी उदासी में माथे तक डूब जाता था। रोते-रोते हम एक-दूसरे के चेहरों के आँसू पोंछते रहते और एक-दूसरे को चुप करवाते रहते। जैसे मैं रोते-रोते कोई ऐसा चुटकुला सुनाने लगता था, जिसे सुनकर कभी दीदी और पापा  बहुत हँसे थे। पापा हमें अपने आगोश में ले लेते और यह अहसास दिलाने की कोशिश करते कि हम उतने ही सुरक्षित हैं, जितने माँ के आँचल में होते थे। लेकिन ऐसा नहीं था। वे ख़ुद जान जाते थे कि वे हमें वह बेफ़िक्री और सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं। वे देर तक हमें अपनी बाँहों में भरकर हमारी पीठ सहलाते रहते। उनके आँसू हमारे सिर पर गिरते और हमारे कंधों पर लुढ़कते हुए खो जाते। दुनिया के सबसे उदास बच्चे वे हैं, जिन्होंने अपने पिता को बेबस होकर रोते हुए देखा है। हमें दुनिया एक जंगल, रेगिस्तान या समुद्र की तरह लगती थी।

- तुम्हारी इस बेवज़ह उदासी की वज़ह पक्का तुम्हारे बचपन में ही कहीं है।
मेंहदी लगाने वाली लड़की बीस रुपए लेकर जा चुकी थी। सन्ध्या मेंहदी वाली हथेली सीधी खोलकर सुखा रही थी और दूसरे हाथ से मेरे बाल सहला रही थी। मैं उसकी गोद में सिर रखकर लेटा था और उसे साथ लेकर या अकेले ही कहीं दूर पहाड़ों पर भाग जाना चाहता था।
- हाँ, मैं जानता हूं।
- अरे मैं कितनी बेवकूफ़ हूं! भूल गई बिल्कुल। एक ख़ुशख़बरी सुनानी है तुम्हें आज। मुझे एमटीवी का एक शो होस्ट करने का ऑफर मिला है।
- बम्बई चली जाओगी तुम?
- बम्बई नहीं, मुम्बई शोना...
- मैं बम्बई ही कहूँगा। यहाँ इंडियागेट के सामने खड़ा होकर, मैं चिल्ला चिल्लाकर भी बम्बई कहूं तो भी कोई मुझे कुछ नहीं कहेगा। यह आज़ाद शहर है और मैं बहुत हताश हूँ, मगर मैं इससे बहुत प्यार करता हूँ।
- तुम भी चलना मेरे साथ।
- मगर मैं अभी क्या करूंगा वहां? मैं वहाँ जाना चाहता हूँ मगर मुझे बहुत डर भी लगता है। और तुम क्या अपनी ख़बरों की दुनिया छोड़ दोगी?
- वह मैं छोड़ चुकी हूं। पिछले महीने मुझे निकाल दिया गया था हुज़ूर।
- हम कहीं और चलते हैं सन्ध्या, जहाँ यह एमटीवी का हल्ला और वह घर न हो, जहाँ मैं हर शाम जाता हूँ और रात में मेरा मन करता है कि नींद की बहुत सारी गोलियाँ खाकर मर जाऊँ।
- बाबू तुम इतने डिप्रेस्ड मत रहा करो। सब कुछ ठीक हो जाएगा।
- हम पहाड़ों पर कहीं रह लेंगे। मैं भूखा भी रह लूँगा...
- उसकी ज़रूरत नहीं है बाबू। देखना, एक दिन हम कितने बड़े आदमी बनेंगे और तब हम इस तरह बेफ़िक्री से यहाँ नहीं बैठ पाएँगे। ऐसी खुली ज़गहों पर लड़के-लड़कियों के झुंड हमें घेर लिया करेंगे।

ये सब बातें बेमानी थीं। जिन बातों से मेरे करीबी लोग मुझे हौसला बँधाया करते थे, वे फूले हुए गुब्बारों में उद्दंड हवा की तरह भरी हुई बातें थीं, जो नुकीले वर्तमान के हल्के से स्पर्श से ही कहीं अंतरिक्ष में उड़ जाती थीं। मैं जानता था कि मैं दुनिया के सबसे काबिल लोगों में से एक हूँ लेकिन उन दिनों मुझे कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। मेरा चेहरा शायद इतना आम या भीड़ जैसा होता जा रहा था कि दस बार मिलने के बाद भी मैं ग्यारहवीं बार जब शिखर पर बैठे मोटे लोगों से मिलने जाता था तो मुझे अपना पूरा परिचय और मुझे रेफ़र करने वाले व्यक्तियों के नाम दोहराने पड़ते थे। फिर जब मैं बताता था कि मैं अपने सपनों में बैठी वह इमारत ज़मीन पर बनाना चाहता हूँ तो वे मुस्कुराकर मुझे देखते रहते और कुछ तो मेरे सामने ही ठहाके मारकर भी हँसते। उनमें से कोई भी मुझे चाय और नमकीन के बिना लौटने नहीं देता था। कभी कभी वे मुझसे सहानुभूति भी जताते और कहते कि अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है, तुम यह पागलपन छोड़कर कुछ और भी कर सकते हो। वे मुझे निट या एप्टेक से कोई डिप्लोमा कर लेने को कहते। उसके बाद मैं अपने कस्बे में जाकर कोई कम्प्यूटर सेंटर या साइबर कैफे खोल लेता, जहाँ सतरह अठारह साल के लड़के आकर चैटिंग करते और वैबकैम पर नंगी अमेरिकन लड़कियाँ देखते। कुछ कहते कि मैं अपनी छूटी हुई ग्रेजुएशन पूरी कर लूँ और फिर कहीं एमबीए में दाखिला ले लूँ। मेरी उम्र तेईस साल थी और मुझमें इतनी आग थी कि मैं समन्दरों को जलाकर राख कर सकता था, लेकिन मैं ऐसे डरे हुए और डराने वाले प्रभावशाली लोगों के नीचे था जो मेरी एमबीए की फीस भरने को तो तैयार थे, लेकिन शिखर तक के रास्ते का नक़्शा बताने को कतई नहीं।

कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़कर बेकार घूमने के शुरुआती दिनों में ही मैंने अचानक जाना था कि मेरे आसपास सिर्फ़ डिग्रियों पर भरोसा करने वाले अन्धे लोग हैं। उन्हें सिर झुकाकर सब आदेश मान लेने वाले ग्रेजुएट्स, पोस्ट ग्रेजुएट्स और रिसर्च स्कॉलर्स की ज़रूरत थी। उनकी उस व्यवस्था में मैं एक बदरंग पैबन्द था।

मैं बहुत सारी नई चीजें बना सकता था। मैं खाली कागज़ों पर दूसरों को न समझ में आने वाले चित्र बनाता रहता। वे मेरी कविताएँ देखते और मुस्कुराने या ठहाका मारने से पहले के विराम में उन्हें अक्सर जटिल या दुरूह बताते। मैं कभी-कभी अकड़ से उठकर चल देता था और कभी-कभी इतना टूट जाता था कि मेरी विनम्र बातें उनके पैर छूती हुई जान पड़ती होंगी। मैं उन्हें कहता कि वे मेरी सबसे सादी कविताएँ हैं, मैं न चाहकर भी उनकी व्याख्याएँ करता और उन्हें छोटा बनाता (बाद में इस पश्चाताप में मैंने घंटों दीवारों में सिर फोड़ा है)। कभी-कभी उनका समय पाने के लिए मैं सरल तुकबंदियाँ उन्हें सुनाता। वे ख़ुश होकर मेरी प्रशंसा करते और कहते कि तुममें प्रतिभा है, बस तुम्हें उसे पॉलिश करना है। वे सच में मुकुट के चारों ओर अजगर की तरह लिपटकर बैठे हृदयहीन लोग थे और जाने किन दुर्भाग्यशाली क्षणों में मैं उनकी कृपादृष्टि पाने के लिए उन जैसा हो जाना चाहता था। बाद में ऐसा बन जाने के लिए मैं कई दिनों तक अपने आप को कोसता रहता और फिर अगली ही किसी मुलाकात में मैं उन्हें चुभने वाले बहुत सारे सच कहता और वे मुझे लगभग धक्के मारकर अपने दफ़्तरों और कोठियों में से निकाल देते। मैं उन्हें कहता कि मैं फिल्में बनाना चाहता हूँ तो वे मुझे नोएडा या पूना के किसी फिल्म स्कूल का पता दे देते थे। फिर वे डेविड धवन या यश चोपड़ा की फ़िल्मों की बातें करने लगते थे। फिर मैं अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें बेवकूफ़ कह देता और निकल आता।

मैं पहियों पर चलने वाला एक घर बनाना चाहता था। उसका पूरा नक्शा और एक एक इंच का डिजाइन मेरे दिमाग में था, लेकिन मैं ऐसा कर सकता हूँ, यह विश्वास उन्हें दिलाने के लिए आर्किटेक्चर की एक बड़ी डिग्री की ज़रूरत थी। मैं भावुक होकर अपने आइडिया उन्हें धाराप्रवाह सुनाता रहता था। मेरी आँखें बन्द हो जाती थीं और कभी-कभी तो मैं उन विचारों और सपनों में इतना खो जाता था कि बताते बताते मेरी आँखों से पानी गिरने लगता था। तब वे मुझे रुमाल पकड़ाते थे और मुझे चोरी का वह रूमाल और सज़ा याद आती थी। अर्जुन, जिसका रूमाल मैंने चुराया था, दुबई में बस गया था। वहाँ उसने अपने पिता के पैसों से अपना कोई बिजनेस शुरु कर लिया था। तीन बेडरूम के अपने फ्लैट में वह अपनी कश्मीरी प्रेमिका के साथ रहता था।
इंडिया गेट वाली शाम में सन्ध्या सुबह तक मेरे साथ रहना चाहती थी। मेरा अपना कोई घर नहीं था और जीजाजी के उस चितरंजन पार्क वाले घर में मैं उसे ले जाना नहीं चाहता था। कैसे ले जा सकता था भला, जब उसका, मेरा और उनका एक साझा अतीत था, जिसकी याद ही मुझे मार डालती थी।

वह जो थी सन्ध्या, उसके गाल नर्म थे और जैसे उसने कभी कोई पाप न किया हो, उसकी आँखें साफ थीं और पारदर्शी होने का भ्रम देती थीं। तीन हफ़्ते बाद ही मैं ऑटो-रिक्शा पर उसे एयरपोर्ट तक छोड़ने गया, जहाँ से वह मुम्बई उड़ गई।
- कैसा लगता है हवाईजहाज में बैठकर?

मैं बाद में फ़ोन पर पूछता रहा और वह बताती रही। पहाड़, बादल, समुद्र, घास जैसे खेत और गूगल अर्थ से जैसा धरती का नक्शा दिखता है, वैसी धरती के बारे में। एमटीवी का चटपटी चैट आपने ज़रूर देखा होगा। वह कमाल की एंकर थी। पहली बार जिसने भी उसे उस शो में देखा-सुना, उसने यह कहा कि वह शो उसके लिए और वह उस शो के लिए परफेक्ट है। वह खिलखिलाकर हँसती थी, तेजी से अंग्रेज़ी में बोलती थी, मेहमानों से तीखे चटपटे सवाल पूछती थी और ऐसे कपड़े पहनती थी, जिनके नाम मुझे आज तक नहीं पता। मैं अपने दोस्तों को फ़ोन कर-करके उसका शो देखने के लिए कहा करता था और उस लम्बी उदासी से पहले, जब वह व्यस्त होती थी और मुझसे एक मिनट की बात के लिए भी उसे चार-चार दिन में समय मिलता था, मैं बहुत दिन तक अपने एकांतिक गर्व में डूबा रहा था।

कभी-कभी आप एक घंटे के शो में, जिसमें तीन ब्रेक और अड़तालीस विज्ञापन आते हैं, अपनी प्रेमिका को सलमान ख़ान के साथ गप्पें लड़ाते हुए देखते हैं। सलमान के चेहरे पर झुर्रियाँ हैं और आप जानते ही हैं कि वह कैमरे के सामने अपनी शर्ट उतारने को कितना आतुर रहता है। आपकी प्रेमिका ने, जो किन्हीं अनजान क्षणों में टीवी पर सैंडी हो गई है, काले रंग का कोई ऐसा परिधान पहन रखा है कि उसके कंधों पर उसके भीतर के कपड़ों की स्ट्रिप दिखाई दे रही है। सलमान अश्लील सा कोई मज़ाक करता है, जिस पर वह प्यार से हँसती है, देर तक जैसे न्यूज के अपने आख़िरी दिनों में दाढ़ी वाले भयंकर से दिखने वाले बाबाओं के तंत्र-मंत्र और टोटकों पर गंभीरता से चर्चाएँ करते हुए हँस देती थी और अपने बॉस से डाँट खाती थी और आप चकित हैं कि यह वही सन्ध्या है, जो औरंगजेब के शासनकाल पर लम्बी चर्चाएँ करती थी या टीवी में मेधा पाटकर के आन्दोलन पर एक घंटे की स्पेशल रिपोर्ट बनाती थी।

शो के तुरंत बाद मैं उससे बात करने वाला पहला व्यक्ति होना चाहता था। कभी एकाध बार वह फ़ोन उठा भी लेती तो उसका मूड उखड़ा हुआ होता था। वह थकी हुई होती और अधिकांश समय चुप ही रहती। मैं कुछ मिनट तक पागलों की तरह बहुत सारी बातें एक साथ कहता रहता, कभी कभी उसे अपनी जानबूझकर की गई बेवकूफियों पर हँसाने की कोशिश भी करता मगर एक लम्बे विराम के बाद वह इट डजंट साउंड फ़नी कहती और जैसे मैं राजकपूर था, फ़ोन काट देती थी।

रुकिए, कुछ देर रुककर मैं सच में रो लेना चाहता हूँ। जो मुझ पर बीतती थी, उसका दस फ़ीसदी भी बता पाने में मैं नाकाम हो रहा हूँ। आप विश्वास कीजिए, वे सब बिल्कुल एक जैसे हैं। आपकी अधेड़ माँएं और पिता, नौकरियाँ करते दोस्त और मशहूर होती प्रेमिकाएँ। आख़िर में उन्हें आपके होने या न होने से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। हर एक के पास आपका विकल्प मौज़ूद है। वे अगर कहते हैं कि वे आपसे बहुत सारा प्यार करते हैं और आपके बिना नहीं रह सकते तो वे झूठ बोलते हैं। अपने अन्दरूनी कोनों में उन्होंने आपके न होने की स्थिति में कैसे ख़ुशी से जीना है, इसका पूरा प्लान बना रखा है। वे बहुत व्यावहारिक लोग हैं। आप मरेंगे तो एक भी आदमी नहीं मरेगा। आप अकेले कमरे में रात भर बेचैनी से आँखें फाड़े छत ताकते रहेंगे, तब तो एक पत्ता भी नहीं हिलेगा। वे सुबह उठेंगे और नाश्ता करके अपने-अपने काम पर निकल जाएँगे।

मैं देर रात में उसे फ़ोन करता था।
- मैं अपने सारे थोथे संस्कारों को भूलकर बीयर पी लेना चाहता हूँ सन्ध्या। यह उदासी मैं नहीं झेल सकता।
- तो पी लो।
वह निरपेक्ष सी रहती थी।
- कहाँ से लाऊँ...और बीयर खरीदने के लिए क्या कहना पड़ता है दुकान वाले को?
- आईएनए चले जाओ...
और फिर वह चुप हो जाती थी। बैलेंस ख़त्म होने से पहले मुझे फ़ोन रख देना पड़ता था। मैं अपनी हताशा और गुस्से के बोझ तले दबा रात में घंटों तक दिल्ली की सड़कों पर भटकता रहता था। आप कभी यह भटकना दोहराकर मेरी मनोदशा समझने की कोशिश करेंगे तो मैं सच में हाथ जोड़कर आपका शुक्रिया अदा करता हूँ, मगर पूरी विनम्रता के साथ यह भी कहना चाहता हूँ कि आप पूरी तरह असफल ही रहेंगे। वे, जो पागल नहीं हैं, वे इसलिए पागल नहीं हैं क्योंकि वे पागल हो ही नहीं सकते।

उन दिनों मैं और देर से उनके घर लौटता था। वे फिर भी जागते हुए ही मिलते थे। वे किसी नए गाने या फ़िल्म के बहाने मुझसे कोई बात करने की कोशिश करते और मैं कम से कम शब्दों में बात ख़त्म करने की। फिर एक दिन उन्होंने अपने आप ही कहा कि उन्हें रोशनी में नींद नहीं आती, इसलिए यदि मुझे देर तक जागना हो तो मैं दूसरे कमरे में चला जाऊँ। यह उन्होंने अचानक कहा। वे बाकी दिनों की तरह सोने के लिए लेट गए थे और मैं एक किताब लेकर बैठा था, जिसे मैं पढ़ नहीं पा रहा था। यूँ तो मैं बहुत दिनों से दूसरे कमरे में सोना चाहता था मगर उन्होंने कहा तो मुझे बुरा लगा। मुझे लगा कि कुछ दिन बाद किसी रात वे इसी तरह लेटे लेटे कहेंगे कि मुझे अपना बैग उठाकर उनके घर से चले जाना चाहिए। मैं चला जाना भी चाहता था, लेकिन मेरे पास छ: दिन भी कहीं रहने लायक पैसे नहीं थे। मेरा सुनसान घर बहुत दूर एक कस्बे में था, जहाँ मैं लौटना नहीं चाहता था।

माँ के पतंग बनने के बाद पापा का पागलपन डेढ़-दो साल तक उनके साथ रहा था और फिर अचानक एक दिन जैसे उन्हें जीवन का कोई सूत्र मिल गया था। उन दिनों हम सब परेशान थे। दीदी शायद मुझसे कुछ कम परेशान थी क्योंकि उन दिनों उसने लिपस्टिक लगाकर अपने आप को देर तक शीशे में निहारना शुरु कर दिया था। वह आराम से ऐसा कर पाती थी जबकि मैं कभी-कभी अपना ही चेहरा नाखूनों से नोच लेना चाहता था। मेरा अपनी आँखें फोड़ डालने और माँ की बुनने वाली सलाइयों से अपने कानों के परदे फाड़ देने का मन करता था। पापा कभी-कभी अपने सब कपड़े उतारकर फेंकने लगते थे। बाहर का दरवाज़ा चौपट खुला होता था और ऐसा वे अक्सर शाम के वक़्त ही करते थे, जब गली में अच्छी-खासी चहल-पहल होती थी। पड़ोस के लोग हमारे दरवाज़े पर आ जुटते थे। मेरी एक बूढ़ी बुआ कुछ दिन तक हमारे पास रही थी और फिर वह भी तंग होकर चली गई थी। उन्होंने बहाना बनाया था कि गाँव में उनकी भैंसें उन्हें ही ठीक से दुहने देती हैं, इसलिए उनके जाए बिना काम नहीं चलेगा। बुआ के जाने के बाद मैं और दीदी ही उन्हें सँभालने के लिए रह गए थे। पड़ोसी कहते थे कि हमें किसी रिश्तेदार को बुला लेना चाहिए। पापा के कुछ दोस्त भी थे, जो डेढ़-दो साल के उस समय में लगातार कम और दूर होते गए थे। शाम को दफ़्तर से थके हारे लौटे पड़ोसियों के मनोरंजन में खलल डालते हुए मैं दरवाज़ा बन्द कर देता था और फिर मैं और दीदी पापा को कुर्सी पर बिठाकर उन्हें बाँध देते थे। वे हमसे तीन गुनी उम्र के होंगे और यह असंभव सा लगता है, लेकिन ऐसा हम दोनों ने कम से कम पचास बार किया है तथा मेरी और दीदी की हथेलियों पर रस्सी से बने स्थायी निशान हैं। वे निशान पापा के कंधों, घुटनों और पेट पर भी होंगे। वे हमारा पारिवारिक चिह्न बन गए हैं और हम जब भी एक दूसरे को ढूँढ़ेंगे तो वे काम आएँगे।

वह पीले रंग की एक कमज़ोर सी रस्सी थी, जो झाड़ू या घड़े की तरह बरामदे के एक कोने में अपने नियत स्थान पर रखी रहती थी। उससे पहले वह कपड़े सुखाने के काम आती थी। फिर माँ ने उसकी ज़गह नई रस्सी बाँध दी थी और उसके मरने से पहले के दिनों में दीदी हर शाम सत्तर बार वह रस्सी कूदती थी।
वह रस्सी जिन दिनों हम तीनों की गर्दनों पर कसती जा रही थी, पापा अचानक एक औरत को घर ले आए।
- आज से ये यहीं रहेंगी।
उन्होंने ऐलान करने की तरह कहा। उसकी आँखें चमकती और इधर-उधर भटकती रहती थी। मुझे हर वक़्त लगता था कि वह कुछ ढूँढ़ती रहती है और जिस दिन उसे वह चीज मिल जाएगी, वह उसे उठाकर भाग जाएगी। उसकी उम्र तीस के आसपास थी और पापा को लगता था कि वह उनसे बेइंतहा प्यार करती है। वे उससे दस-बारह साल बड़े थे, उन्हें पागलपन के दौरे पड़ते थे और उनका पेट निकल आया था, फिर भी। फिर वे ठीक होने लगे थे और साथ-साथ हमें भूलने भी लगे थे। कभी-कभी वे हमारे सामने ही उसे बाँहों में भरकर चूमने लगते और वह झूठी शर्म से अपने गाल लाल कर लेती। दीदी सकपकाकर वहाँ से हट जाती थी, लेकिन मैं स्तब्ध सा बैठा लगातार उन्हें देखता रहता था। मुझे लगता था कि हम दोनों भाई-बहन गायब होने लगे हैं, इसलिए पापा कभी कभी हमारी उपस्थिति महसूस नहीं कर पाते। मैं दुबला होता जा रहा था। यह मुझे अदृश्य होने की प्रक्रिया का ही एक चरण लगता था। मेरे सब निकर और पैंटें ढीली होने लगी थीं। दीदी मुझे कपड़े पहनाते हुए अक्सर माँ हो जाती थी।

माँ, जो पतंग बन गई थी, एक दिन उस औरत ने अपनी तलाशती-भटकती हुई आँखों से उसे बक्से में देख लिया और निकालकर कूड़े में फेंकने चली। जब मेरी नज़र उस पर पड़ी, वह बाहर के दरवाज़े तक पहुँच गई थी। मैं दौड़कर गया और उससे पतंग छीन ली। यह उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने मेरे हाथ से पतंग छीनने की कोशिश की और वह बीच से फट गई। जैसी माँओं की मुस्कुराहटें होती हैं, वह उस आकार में फटी। मैंने नज़र भर के उसे देखा और नीचे फ़र्श पर रख दिया। फिर मैं चिल्लाया और धकेलकर उस औरत को मैंने नीचे गिरा दिया। मेरी उम्र बहुत कम थी और यह मुझे याद है।
मैं उसके पेट पर बैठ गया और जानवरों की तरह अपने नाखून उसके चेहरे पर मारने लगा। जब तक वह मुझे अपने ऊपर से धकेलने में कामयाब हुई, मैं उसके चेहरे को लहूलुहान कर चुका था। उसकी एक आँख से भी खून बह रहा था और वह गालियाँ बकती हुई दर्द से छटपटा रही थी।

पापा शाम को दुकान से लौटे तो उसकी आँख पर पट्टी बँधी हुई थी और उसने मुझे पापा से खूब पिटवाया। उन्होंने अकेले ही उसी रस्सी से मुझे उस कुर्सी पर बाँध दिया और अपनी चप्पल उतारकर मेरे गालों पर मारते रहे। एकाध बार गर्दन और सिर पर भी। वह अपनी आँख पर हाथ रखकर कराहती जाती थी और पापा मारते जाते थे। मैं यहाँ जोड़ता हूँ कि हथेलियों पर रस्सी के निशानों की तरह मेरे बाएँ गाल पर बाटा के बी की हल्की सी छाप अब भी है। वह हमारा पारिवारिक चिन्ह नहीं है। वह सिर्फ़ मेरे हिस्से आई।

माँ, जो सुन्दर हँसती थी और अच्छा चूरमा बनाती थी, मैं उसकी कसम खाकर कहता हूँ कि उस दिन मेरी आँखों से एक भी आँसू नहीं टपका। मैं लगातार उस औरत को ही देखता रहा और यदि यह अतिशयोक्ति नहीं है तो मेरा पूरा जीवन-दर्शन और दुनिया को समझने का आधार उस देखने से ही शुरु होता है।

पापा जब थक गए तो उसे लेकर अपने कमरे में चले गए। कमरा बन्द हो गया। दीदी ने आकर मेरी रस्सी खोली और मुझे चूमते हुए घंटों तक रोती रही। वैसा प्यार मुझे कभी किसी ने नहीं किया, माँ ने भी नहीं।

अगले दिन पापा उसे लेकर कहीं चले गए। बुआ हमारी देखभाल के लिए आ गई। बुआ को ऊँचा सुनता था, वह कमर झुकाकर चलती थी और दिनभर झुँझलाती रहती थी। दीदी के भाग जाने से पहले (कभी न कभी भाग जाना हमारे जीन में ही है) वह हम दोनों को सामने बिठाकर बताती रहती थी कि हमने पिछले जन्म में ज़रूर कई बड़े पाप किए हैं...शायद गौहत्या।
- बलात्कार भी बुआ?
मैं पूछता था। वे सिलबट्टा उठाकर मुझे मारने दौड़ती थीं। उन क्षणों में मैं और दीदी खूब हँसते थे। शायद कभी-कभी हमें अच्छा भी लगता था कि पापा चले गए हैं। उस औरत के आने के बाद से जो मनहूसियत घर पर छा गई थी, वह धीरे-धीरे हटती जा रही थी। लेकिन कुछ दिन बाद ही दीदी उस हटने को अपने साथ लेकर फुर्र से कहीं उड़ गई।

वह एक भला सा लड़का था, जो मुझे बिल्कुल भी पसन्द नहीं था। वे कुछ ही दिन थे, जो बहुत धीरे-धीरे बीते। उन दिनों ने मुझे कल्पना करना, सपने देखना और देर तक उदास रहना सिखाया। पच्चीस-तीस दिन जब तक दीदी नहीं लौटी मैं बुआ के साथ अकेला रहा। हम धीरे-धीरे अपने सब मज़ाक और समझाइशें भूलते गए। बुआ ने बुढ़ापे में और मैंने बचपन में वह सत्य जान लिया, जिसे एकांत कहते हैं।

- कहाँ रही थी तुम इतने दिन? और क्या करती थी सारा दिन?
कुछ साल बाद दीदी की शादी से कुछ दिन पहले मैंने अकेले में उससे पूछा था।
- वह मुझे दिल्ली ले गया था।
वह बिना किसी संकोच के बोली।
- क्या तुम दोनों ने...?
- हाँ हम दोनों ने....
फिर मैं दीवारों और जालों को देखता रहा।
- कैसा लगता है दिल्ली देखकर?
- ऐसा लगता है कि अभी बहुत जल्द किसी क्षण में हमें मर जाना चाहिए। वहाँ मृत्यु एक फ़र्ज़ की तरह आती हुई दिखती है।
- तुमने अच्छा किया कि तुम लौट आई।
- हमारे पैसे ख़त्म हो गए थे।
- जो पैसे कभी न ख़त्म होते तो तुम कभी ना लौटती दीदी?
- हाँ, हम कुछ दिन वहीं रहते और फिर देहरादून चले जाते।
- तुम्हें मेरी याद आती थी?
उसने मुझे अपने सीने से चिपका लिया और चुप बैठी रही।
वे कुछ नहीं बोलतीं। वे आपकी स्मृतियों में बसी रहती हैं और लौटती नहीं। आपको लगता है कि वे बहुत स्वार्थी हैं और उन्हें खुशियाँ बहुत प्यारी हैं. लेकिन एक सुहावनी सुबह में वे सारी सम्पन्नता ठुकराकर कहीं जंगलों में चली जाती हैं।

बहुत दिन तक भूखे या बेरोज़गार नहीं रहा जा सकता। सब आपकी विवशता पढ़ लेते हैं और भीख के दाने या अपमानित कर देने वाली नौकरियाँ ऑफर करते हैं। एक दिन जीजाजी ने मुझे चालीस-पैंतालीस की उम्र के एक आदमी से मिलवाया। वह आप सबकी तरह एक भला आदमी था। वह बहुत हँसता था और अपेक्षा करता था कि आप भी हँसें। दिल्ली में उसकी ग्यारह करोड़ की संपत्ति थी। उसने मुझे मार्केंटिंग के किसी काम के लिए रखा और उसी दिन मैंने जीजाजी का घर छोड़ दिया। पहले दो दिन उसने मुझे अपने दफ़्तर की ठंडक में आराम से बिठाए रखा। वहाँ कम्प्यूटरों पर गाने चलते रहते थे और सो जाने का मन करता था। उस आदमी ने, जिसका नाम हरदीप सिंह था, तीसरे दिन मुझे एक औरत से मिलवाया।

यह एक संयोग ही था कि वह औरत जिस गली में रहती थी, उसका नाम पतंग वाली गली था और उस औरत की आँखें भी हमेशा कुछ खोजती सी रहती थीं। जब वह मेरे सामने खड़ी थी तो उसकी आँखें पूरी सड़क को देख रही थी। उसने मुझे कागज़ पर एक पता लिखकर दिया और एक लिफाफा उस पते पर पहुँचाने को कहा।
- क्या है इसमें?
मैंने ऐसी बहुत सी फिल्में देखी थीं, जिनमें ऐसे लिफाफों में ड्रग्स होती थी।
- खोलकर देख सकते हो।

मैंने उसे खोला। उसमें आठ-दस तस्वीरें थीं। आधी, आधी नंगी और बाकी आधी, नंगी। मुझमें उत्तेजना सी जगी। उसने मेरे हाथ से तस्वीरें लेकर वापस लिफाफे में रख दीं और लिफाफा मेरे हाथ में दे दिया। मैंने वे तस्वीरें उस पते पर पहुँचाई। वहाँ हरदीप सिंह की उम्र का ही एक मोटा आदमी था, जो पंजाबी के लहजे में हिंदी बोलता था। उसने मुझे चाय पिलाई और उनमें से एक लड़की चुनी। मैं वापस पतंग वाली गली में गया (और गली के उस नाम पर मुझे बार-बार रोना आता है) और उस औरत से मिला। उसका नाम गुड्डी था। उसने मुझे मोनिका का करोलबाग का पता बताया। मैं फ़ोन करने के बाद करोलबाग में मोनिका के घर के बाहर सड़क पर खड़ा रहा। वह शायद अपने परिवार के साथ रहती थी। दस मिनट बाद वह दो-तीन किताबें लेकर उतरी और हम ऑटो से डिफेंस कॉलोनी गए। उसमें शिल्पा शेट्टी और मनीषा कोइराला की तस्वीरें चिपकी थीं।

           आप लोग नहीं जानते कि मैं क्या चीज था। वह सिर्फ़ मैं जानता था या मेरा ख़ुदा। मैं दुनिया बदल देना चाहता था, भूकंप के झटकों की तरह मेरा दिमाग रात रात भर काँपता रहता था और अजीब से अद्भुत ख़याल आते थे। ऐसा होता था कि मेरे पेन की रिफिल या कमरे के खाली कागज़ खत्म हो जाते थे और मैं आटे की लेई से दीवार पर लिखने की कोशिश करता था। मेरे पास सिर्फ़ दो जींस ऐसी थीं, जिन्हें बाहर पहना जा सकता था और दो-तीन पुरानी जींसों को ऐसी ही किसी रात में मैंने एक स्कूल का डिजाइन बनाने के लिए फाड़ डाला था। मैं जिस किराए के कमरे में रहने लगा था, किसी दिन मैं उसमें बम लगाकर उसे उड़ा भी सकता था। मुझे पूरी दिल्ली से और पूरी दिल्ली को मुझसे खतरा था।

वे सब लोग, जिनकी दुकानों से मैं टूथपेस्ट या बिस्किट खरीदता था, वे डाकिए और कूरियर वाले, जो मेरे कमरे के ऊपर-नीचे-दाएँ बाएँ के सब कमरों में चिट्ठियाँ लाते थे, लेकिन मेरे कमरे में कभी नहीं, वे लड़कियाँ, जिन्हें ऑटो में बिठाकर मैं ग्रीनपार्क या डिफेंस कॉलोनी के बड़े घरों के दरवाज़ों तक छोड़कर आता था, उन घरों के मालिक वे अमीर लोग, जिनकी शरीफ़ पत्नियाँ वेश्याओं सी लगती थीं, कभी समझ ही नहीं सकते थे कि मैं क्या था।

वह जो सन्ध्या थी, जिसे आप सब टीवी पर रणबीर कपूर या उसके पिता का इंटरव्यू लेते हुए देखते होंगे, मुझे भूल गई थी। मुझे आप कई बार भूल सकते थे। उन दिनों मैं आपके दरवाज़े पर दिन में कई बार आता, तब भी आप मेरी पहचान पूछते। इसमें आपकी गलती नहीं है। दरअसल आपकी परवरिश उसी तरह हुई है और उस परवरिश को आपने अपने ऊपर इस कदर हावी हो जाने दिया है कि आप उन्हीं लोगों को याद रखते हैं जो अख़बार या टीवी में दिखते हैं या जो आपके काम आ सकते हैं।

मैं ग्रीनपार्क और डिफेंस कॉलोनी के जिन लोगों के काम आता था, उन्हें मेरा मोबाइल नम्बर जुबानी रटा हुआ था। रीना, लिली, सारा, मोनिका को भी। वे मुझे शहर की सबसे ख़ुश और आज़ाद लड़कियाँ लगती थीं। उनमें से जिनके परिवार थे, उनका कभी घर लौटने का मन नहीं करता था। वे खुलकर गालियाँ देती थीं, हँसती थीं और मेरे सपने सुनती थीं।

पापा कभी नहीं लौटे। पुलिस की एफआईआरों और बुआ के साथ कुछ महीनों के बाद वह औरत लौट आई और मैं सालों तक उसके पीछे लगा रहा कि वह क्या करती है, किस किस से मिलती है, लेकिन पापा को कोई सुराग नहीं मिला। उसने बाद में कस्बे के कई बच्चों को अनाथ किया। समय के साथ वह आश्चर्यजनक रूप से अमीर होती गई। पाँच साल बाद उसने कस्बे में एक धर्मार्थ अस्पताल खोला और अमर हो गई।

वह शाम मेरे दिमाग पर चढ़कर बैठ गई थी, जब मैंने अदिति को अपनी बहन के पति सुधीर माथुर के साथ बिस्तर पर देखा था, जब वहाँ सुगन्धित फूल खिल आए थे और उन दोनों को केवल अपने शरीर याद थे। मैं उस शाम के चित्र को गोली मार देना चाहता था या चीर-फाड़कर किसी गटर में फेंक देना चाहता था...रुकिए, उसका नाम अदिति नहीं, सन्ध्या है। मैं तुम्हारा नाम कैसे भूल सकता हूँ सन्ध्या? ये कैसे दिन आ गए हैं? 

            ख़ैर, सारा पच्चीस साल की थी। आठ साल के अपने इस करियर में वह दिल्ली में चालीस चालीस लाख के दो फ्लैट ले चुकी थी। वह एक दिन मुझे अपने घर ले गई।
- तुम दुबले होते जा रहे हो।
यह आम वाक्य था। यह कोई भी, किसी से भी कह सकता था। इसकी प्रतिक्रिया में मैंने उसे अपने आगोश में भर लिया। उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उसके हाथ हवा में मरे हुए से लटके रहे। मुझे बुरा लगा और मैंने छोड़ दिया। मैं सिर झुका कर बैठ गया।
- तुम्हें सेक्स करना है?
वह मेरी बगल में बैठकर मेरी हथेली अपनी हथेलियों के बीच रखकर प्यार से बोली।
क्या मैं इतना बेचारा लगता था? इतना कुंठित और अकेला? वह ऐसे क्यों कह रही थी, जैसे रहम खा रही हो?

मैं हाहाकार की तरह जोर से हँस दिया। मैंने बेफिक्री से अपनी हथेली छुड़ाई और खड़ा होकर चहलकदमी करने लगा। मैंने गुलाब के फूलों और डॉक्टर लड़कियों के बारे में बात की। मैंने उसे कॉर्पोरेट कंपनियों के धंधा करने के तरीके समझाए और अपने कस्बे की दो असफल प्रेम-कहानियाँ सुनाईं। मैंने उससे कहा कि उसे अपने घर में एयरकंडीशनर लगवा लेना चाहिए। मैंने उसे अपनी माँ के बारे में बताया, साथ ही मकर संक्रांति और पतंगों के बारे में। मैंने उस गड्ढ़े के बारे में बताया, जिसमें माँ गिरी थी। मैंने बचपन की वे जगहें उसे बताई, जो हर रात मुझे सपने में दिखती थीं।

- सारा, आदमी की ज़िन्दगी का एक मकसद है...यहाँ बहुत गर्मी है.... मुझे माँ की याद आती है...यह शहर...मैं जवान नहीं होना चाहता था...मैं बहुत बहादुर हूँ सारा...चाँद से मुझे मोहब्बत सी होती है...रिक्शे वाले को....चार पैसे के लिए आदमी क्या क्या नहीं करता...सुना है कि आंत्रशोध में नींबूपानी पीना चाहिए, ऐसा पढ़ा था मैंने...फाटक से पार करते हुए रेल के नीचे आ जाने पर...सन्ध्या सारा...टीवी में बहुत सी दिक्कतें हैं...वह हमें लाचार बनाता है...
मैं बकता रहा, जब तक उसने आकर मेरे होठों को चूम नहीं लिया। मेरी आँखों से पानी बह रहा था। समय बहुत निर्मम था और सारा, जो दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत और अच्छी लड़की थी, उसने मेरे कलेजे पर फाहे रखे।

जब वह मुझमें थी, मुझे ग्लानि होनी शुरु हुई। एक भयंकर अपराधबोध। मुझे सन्ध्या की याद आई। बेशर्मों और हृदयहीनों की तरह मैंने सारा को दुतकारा। फिर अगले ही क्षण माफी माँगी और फिर प्यार किया। इतना प्यार, जितना सिर्फ उसे किया जा सकता था।

  बाद में वह चाय बनाकर लाई और उसने मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में भरकर प्यार से मुझे समझाया- तुम सेक्स को इतनी अहमियत क्यों दे रहे हो? उन दिनों का उन दोनों का प्यार तुम्हें इतना नहीं खाता, जितना उनके बीच का सेक्स।

- हाँ, सच है सारा, तुम सच कह रही हो..पर मैं कर नहीं पाता कुछ...वह लड़की मुझे भूल गई है और कहती है कि बिजी है। मेरे जी में आता है कि कभी उसकी शक्ल न देखूँ, लेकिन यह सोचने के बीस मिनट बाद ही मैं बुरी तरह तड़पने लगता हूँ। मुझे ठीक से साँस नहीं आता...मैं कुछ काम भी नहीं कर पाता सारा...
- जिस शाम तुम्हारे पापा ने उस औरत के लिए तुम्हें बाँधकर मारा था, उस शाम तुमने अपने पिता को उल्टा क्यों नहीं मारा? उस दिन तुम उन्हें जान से मार डालते और अनाथ हो जाते तो शायद आज इस तरह बेचैन न होते।
- पर सारा..अब उन्हें कहाँ ढूँढ़कर मारूँ मैं?
वह कुछ नहीं बोली। उसने मुझे गले से लगा लिया और देर तक मेरे बाल सहलाती रही। चाय ऐसे ठंडी हो गई, जैसे ठंडी होने के लिए ही बनी हो। शाम इस तरह छाती गई कि रोशनदान के दोनों कबूतर दिखने बन्द हो गए। सड़क का शोर पहले बढ़ा और फिर कम होता गया। फिर सारा ने टीवी ऑन कर दिया। सन्ध्या का शो चटपटी चैट शुरु हो चुका था।

हम बहुत से लोगों की हत्या कर देना चाहते हैं। ऐसा भला बेवज़ह क्यों होता होगा?
एक दोपहर दीदी ने रोते हुए मुझे फ़ोन किया था और कहा था कि वह डिप्रेशन के समन्दर में डूबती जा रही है। तब मैं हमारे कस्बे वाले घर में था और वह महीनों बाद मुझे फ़ोन कर रही थी। दीदी ने कहा था- सिद्धार्थ, मैं निनि को लेकर कहीं मर जाऊँगी।
बाकी उसने कुछ नहीं बताया था। मैं उसी समय कुछ कपड़े लेकर बस में बैठ गया था। सुबह जब मैं दिल्ली पहुँचा तो दीदी और निनि घर में नहीं थे। जीजाजी को भी नहीं पता था कि वे अचानक कहाँ चले गए?
- क्या आप लोगों के बीच कोई झगड़ा रहता था?
थाने जाने से पहले और लौटकर मैं रोज़ उनसे पूछता था। वे हमेशा सिर हिलाकर नहीं में उत्तर देते थे। दीदी का फिर कोई फ़ोन भी नहीं आया। मैं यह सोचकर नहीं आया था कि अब कभी नहीं लौटूँगा, लेकिन कुछ दिन बाद मैंने ऐसा ही तय कर लिया था। जीजाजी सामान्य से ही रहते थे। बस कभी कभी थोड़े उदास। वे मुझसे बातें करना चाहते थे, मगर कुछ कहने की हिम्मत भी उनमें नहीं थी। सन्ध्या उनके घर आती थी। फिर मैं उससे प्यार कर बैठा और फिर वह शाम आई, जब टीवी पर गुलशन कुमार कोई भजन गा रहा था।

उस घर की दीवारों का यदि कोई धर्म होता तो वह मेरे और दीदी के दुख के नियमों से बना होता। उसके मंत्र हमारे चीखने की आवाज़ में होते और हम वहाँ इसलिए मर रहे होते क्योंकि हमें क्षमा करना पड़ता था या हम ख़ुद ही क्षमा कर देते थे। क्षमा वहाँ आत्महत्या जैसी होती।

बीच के ब्रेक में एक फ़िल्म का ट्रेलर आया और उसमें जो गाना चल रहा था, उसकी दो लाइनें मेरी एक कविता की पंक्तियों से हूबहू मिलती थी। वह बहुत बड़ी फिल्म थी। उतनी बड़ी, जितना किसी हिन्दी फिल्म को सोचा जा सकता है। मैं जब उनसे मिला था तो उन्होंने मुझे चाय पिलाई थी और भविष्य के लिए बहुत सारा हौसला बँधाया था। उन्होंने मेरी कॉपी लेकर रख ली थी और कहा था कि पढ़कर बताएँगे। उन्होंने कभी नहीं बताया। यह सब था, लेकिन वह समय यह सब सोचने का नहीं था। ब्रेक ख़त्म हुआ तो सन्ध्या आई। उसने कैमरे की आँखों से मेरी आँखों में झाँककर देखा और मेरी जान ही निकाल दी। वह अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू ले रही थी और उसमें लीन सारा किसी बात पर जोर से हँसी, उसी क्षण मैंने तय कर लिया कि मैं सन्ध्या से प्यार करता हूँ और प्यार पवित्र ही हो, यह ज़रूरी नहीं। मेरे लिए उसे पाना, ज़िन्दा रहना था। जो बातें मैं भूल नहीं पा रहा था, उन्हें भूलने के लिए मुझे परिदृश्य से दीदी की और अपनी आत्महत्या हटानी थी। हाँ, क्योंकि मुझे भी किसी और की तरह उतना ही ख़ुश और सफल रहकर जीने का पूरा अधिकार है, इसलिए मुझे हमारे परिवार का स्थायी धर्म क्षमा बदलना था। मुझे सब माफियों को ज़मीन में गाड़ देना था और अपने चेहरे पर कालिख पोतकर अपने रुदन को ललकार या अट्टहास में बदलना था।
मैंने सारा को चूमा और तेजी से बाहर निकल आया। वह हैरान सी पीछे से पुकारती रही।

                आपने चाहे कितना भी दृढ़ निश्चय किया हो और आपके भीतर कितना भी लावा फूट रहा हो, मगर फिर भी किसी की हत्या कर देना आसान काम नहीं है। आपका अपना अस्तित्व ही आपको बार-बार पीछे खींचता है। जब आप चाकू से उसका गला रेत रहे होते हैं, तब उसकी चीखें आपको भविष्य के किसी अंतहीन पश्चाताप के प्रति आग़ाह भी करती हैं। आपको उसके साथ बिताया हर क्षण उन दो-तीन मिनट में दिख जाता है। मैं जब जीजाजी को मार रहा था तो मुझे फ्रिज में रखी वह खीर लगातार दिखाई देती रही, जिसे वे मेरे लिए बनाकर रखते थे और चिट छोड़कर सो जाते थे। जिस पैर से वे छटपटाकर मुझ पर वार करते रहे, वह वही पैर था, जो वे सोते हुए अनजाने में मेरे पैर पर रख देते थे।

मुझे लगा था कि सब कुछ नाटकीय होगा। मैं पहुंचूंगा तो मुझे सन्ध्या उनकी बाँहों में मिलेगी और मुझे जोरों से गुस्सा आएगा। सब कुछ भयानक ढंग से होगा। मगर सब कुछ कारुणिक सा था। वे सोफे पर बैठे पढ़ रहे थे। बाद में जब वे दर्द से चिल्ला रहे थे तो मैं उनके साथ ही रोने लगा और मैं उन्हें उठाकर अस्पताल ले जाना चाहता था। मगर वे उस कॉकरोच की तरह थे, जिसे अधमरा छोड़कर मैं उसकी बाकी ज़िन्दगी को और बुरा नहीं बनाना चाहता था। मैंने बार-बार अपनी सारी इच्छाशक्ति समेटी और उन पर चाकू से बेतहाशा वार किए। हाँ, उनका यही अंत होना चाहिए। उन्होंने मेरी बहन को मार डाला...मेरी छोटी सी भानजी को...और सन्ध्या कभी उनकी प्रेमिका थी, जिसके साथ वे बेशर्मी से इसी बिस्तर पर सोते थे..टीवी पर भजन चलाकर। इस तरह मैं अपने पिता को भी मार रहा था, जिन्होंने दो छोटे-छोटे बच्चों को जीते जी मार डाला था और ख़ुद को भी, जिसने एक पतंग के लिए अपनी माँ मार डाली थी। हाँ, पुरुष ऐसे ही होते हैं और उनका यही अंत होना चाहिए।
मगर प्रायश्चित यूँ नहीं होते। उनके लिए आपको ज़िन्दगी भर आग में जलना पड़ता है। आप बहुत कुछ पाते हैं। सुकून के कुछ छोटे और कुछ लम्बे अंतराल, पहाड़ सी शक्ति, इन्द्रधनुष सी शोहरत, काँच के महंगे महल और अपनी सन्ध्या, मगर वह आग बार-बार आपके पास लौटती है। उसे बुझाने के लिए कोई पानी नहीं है। अपने दुखों को मिटाने वाले प्रायश्चित के लिए कोई गंगाजल नहीं और यह कितना त्रासद है कि आपको लगातार जीवित और ख़ुश रहने की कोशिश भी करनी है!

मैं राह भूले बेपरवाह मुसाफिर की तरह सीटियाँ बजाता हुआ अपने बचपन की गली में लौटता हूँ। वह मेरे लिए सबसे सुरक्षित खोह है। जब मैं सात साल का हूँ और मेरी एक माँ है। मैंने सोच रखा है कि मैं एक बड़ा और शरीफ आदमी बनूँगा और सम्मान का जीवन जियूँगा। मेरी नज़र बिल्कुल भी धुंधली नहीं है और जब बारिश होती है, तब उसमें भीगते हुए मैं आसमान को साफ देख सकता हूँ। मैं वहाँ लौटा हूँ, जहाँ कोई दुख नहीं है। सच में वे ऐसे ही जादुई दिन थे, जब हम सबको ग़ुमान था कि ये दिन हमेशा हमारे साथ रहेंगे। सर्दी की रातों में मैं रजाई में माँ की गोद में दुबककर टीवी के जासूसी धारावाहिक देखता था और मुझे पूरा यक़ीन था कि कोई आएगा तो माँ मुझे बचा लेगी। वे सब कुछ टूटने और हमें नंगा छोड़ जाने से पहले के दिन थे। तब हम बेफ़िक्री से ठहाके मारते थे और ख़ूब खाते थे। हमें गहरी नींद आती थी और दुनिया हमें बर्फ सी सफेद लगती थी। हम इतने स्वस्थ थे, जैसे भगवान हों। मुझे उस याद में कोई दर्द याद नहीं आता। पैर छिलने का दर्द भी अँधेरे सा ठंडा लगता है।

जब आपको पता होता है कि आपके साथ, आपके पीछे आपकी माँ खड़ी है तब आप अपने पड़ोस के बच्चे को गाली देकर भाग सकते हैं, इम्तिहान बिगड़ने पर भी निश्चिंत होकर घर लौट सकते हैं और इज़्ज़त की एक छोटी सी, छोटे शहर की ज़िन्दगी जी सकते हैं।

जब माँ वहाँ नहीं होती, जहाँ उसे होना चाहिए, तब आप तेज़ाब पी लेना चाहते हैं, दुनिया ख़त्म कर डालना चाहते हैं या राजा बन जाना चाहते हैं।

राजा बनना आसान नहीं, मैं बस सुकून का एक छोटा सा अंतराल पाने के लिए सब आरोपों और सजाओं से बचकर भागता हुआ सन्ध्या की शरण में पहुँचता हूँ और वह मुझे निराश नहीं करती। क्या वह हमेशा से ही ऐसी थी? मुझसे मिलने के लिए बेकरार, तड़पती हुई और हर क्षण यही चाहती थी कि मैं उसके पास मुम्बई आ जाऊँ और यह कहना भी नहीं चाहती थी। वह बताती है कि वह मुझे कुछ सिखाना नहीं चाहती थी और न ही मेरा हाथ पकड़कर उठाना चाहती थी। वह मुझे मेरे अपने अंदाज़ में हुलसकर जीते हुए और तिल तिलकर मरते हुए देखना चाहती थी।

क्या तुम सच कह रही हो सन्ध्या? और दिल्ली में बहुत सारे बादल थे, जो बरसते थे तो मेरा मर जाने का मन करता था...और तुम नहीं जानती कि मेरे हाथों से क्या हो गया है।

वह मुस्कुराती है, जैसे दुनिया की हर बात जानती हो।
यह भी हो सकता है कि बीच में जब पेज थ्री पर फोटो के साथ यह खबर छप रही थी कि एक पार्टी में सन्ध्या की ड्रैस का फीता खुल गया था और एक फ़ोटोग्राफर ने उसके उभारों को अपने कैमरे में कैद कर लिया था और शाबासी के तौर पर प्रमोशन पाया था कोई और भी आया हो, पराग अग्रवाल या रोहन शर्मा और अब वह फिर से अकेली हो गई हो। मुझे नहीं लगता कि मुम्बई में इतने महीनों तक वह मेरी याद में तड़पती रही थी। जो तड़पते हैं, उन्हें समझदारी याद नहीं रहती। और आप नहीं जानते कि वह कितनी सुन्दर थी और एमटीवी में कितने हैंडसम वीजे थे और कितने प्रतिभावान प्रोड्यूसर।

ये सब यहाँ के अख़बार और मेरी बिल्डिंग के लोग मुझे बताते हैं कि मैं इस शहर के हिसाब से नहीं ढला तो यह शहर मुझे मार डालेगा। इसीलिए वे मुझसे कहते हैं कि शुरु के दिनों में मुझे पेज थ्री नहीं पढ़ना चाहिए और न ही सन्ध्या का शो देखना चाहिए। मुझे सब चीजों से निरपेक्ष होकर संन्यासियों की तरह समुद्रतट पर घूमना चाहिए। इस शहर के हिसाब से ढलने का यही पहला चरण है।

वैसे ख़ुशख़बरियाँ और भी हैं। एक आदमी है, जो कहता है कि मुझे कहानियाँ कहने का कोई जादुई ढंग आता है। वह मेरे सपने सुनकर गदगद हो जाता है और उसकी आँखों से प्रशंसा और स्नेह के आँसू गिरने लगते हैं। वह मेरे भटकते हुए वाक्यों को अर्थ देता है और मुझे टीवी के विज्ञापनों की तरह घर-घर तक पहुँचा देने का वचन भी। वह मुझे बताता है कि मैंने बहुत दूर तक जाने के लिए जन्म लिया है। भले ही ये सब बातें झूठ हों या झूठ निकलें, लेकिन उसकी आँखों का रंग कहीं न कहीं उस पतंग जैसा ही है। मैं यह बात उस आदमी को कभी नहीं बताऊँगा।

सन्ध्या मुझे अपनी बाँहों में भरकर बहुत लाड़ से कहती है कि वह जीवन भर उस आदमी की कृतज्ञ रहेगी। हम अपने आसपास के अँधेरे को अपनी हँसी से भर देते हैं और बदले में कुछ नहीं माँगते।
हे ईश्वर! यदि तुम कहीं हो तो हमें तुमसे कुछ और नहीं चाहिए।
  

तीन महीने बाद

- क्या बात है तुम्हारी इस कहानी में तो! पता ही नहीं चलता कि कितनी सच्ची है और कितनी झूठी...
उस पतंग के रंग जैसी आँखों वाला, वह सीधा सा दिखने वाला आदमी अपनी जगह से उछल ही पड़ा है।
- बस इसमें दो चार ड्रैमेटिक ट्विस्ट डालने पड़ेंगे और तुम प्लीज बुरा मत मानना पर हीरो को थोड़ा कम दुखी दिखाना पड़ेगा। उसे थोड़ा बोल्ड होना चाहिए, थोड़ा ख़ुशमिज़ाज और कभी-कभी मस्ती भरा गाना गा सकने लायक ज़िन्दादिल भी। मौजां ही मौजां टाइप! और चीजों को इस तरह नहीं छोड़ा जा सकता कि कोई प्रायश्चित ही नहीं है। लास्ट के मर्डर को थोड़ा जस्टिफाई करेंगे...और जो भी है, ये क्या...सुधीर माथुर, इसे थोड़ी और डार्क शेड देनी पड़ेगी। यह हेल्पलेस सा लगता है। ऐसे इनसान को कोई क्यूं मारेगा भला? और सन्ध्या को इससे दूर रखना चाहो तो रखो but can you bring that Sara to act in our film? एकाध real लोग होंगे तो और भी अच्छा काम होगा। देखो तुम पर्सनली मत लेना किसी भी चीज को। इसमें जो सच भी हैं, उन अनुभवों से भी डीटैच्ड रहना सीखो। और अब हम मिलकर लिखेंगे इसे फिर से...फिर देखना...हम कितनी लाज़वाब फ़िल्म बनाते हैं…mind blowing type…
- पर हम पिक्चर का नाम पतंग ही रखेंगे सर...
- नहीं यार... वह हल्का सा झुंझला गया है इसीलिए तो मैं इतनी देर से समझा रहा हूँ। this sounds offbeat…
- नहीं सर, प्लीज पतंग ही...
- और इसकी दीदी वाली पूरी कहानी पर अलग से एक फ़िल्म बनाएँगे। उसमें वूमैन वाला इश्यू हाईलाइट करेंगे तो शायद कुछ सरकारी फंड भी मिल जाए।
- पर इस पिक्चर का नाम सर...