सँभालिए दिल को कि अंगूर खाने वाले लोग भी मरा करते हैं

मैं जहाँ से आग रचता हूँ, गढ़ता हूँ गालियाँ
वहीं आप बर्फ़ में दबाकर आते हैं अपनी सब्जियाँ और पत्नियाँ,
मैं आपकी मेहरबानियों से इतना तंग आ चुका हूँ
कि यक़ीन मानिए
मैं आपकी भूख के किसी दिन,
चाहे वह इतवार ही क्यों न हो,
आपकी सब्जियों को जला डालूँगा बेलिहाज़
आपकी पत्नियों से नहीं किया जा सकता प्यार और नफ़रत
यह वे जानती हैं

जब आप हँस रहे होंगे
उसी क्षण मारेंगे हम गोली, यह हमारा रिवाज़ है
यानी आप तकलीफ़ में रहें, जियें उदास-उदास तो बचे रहेंगे
दफ़्तर से लौटकर चाय के साथ रोज़ रोएँ तो बेहतर है
आपकी तस्वीरों से पोंछेंगे हमारे बच्चे अपना नंगा पसीना
आपके बच्चों से पूछेंगे हमारी बोली में उनके पिताओं के नाम
जिनमें हमेशा आपका नाम हो, यह ज़रूरी नहीं
सँभालिए दिल को कि अंगूर खाने वाले लोग भी मरा करते हैं
आपको नहीं बचा पाएगा अपोलो
जैसे आपकी माँओं को नहीं बचा पाई थी भागवत
जैसे भीड़ कुछ कम थी तो बढ़ती नहीं थी साँस
जैसे सपने हमारे भी थे, माना थी हड्डियाँ कुछ कम
जैसे दरवाज़े उतने ही बन्द थे गर्मियों में भी
और चौकीदार हमें पहचानने लगे थे
जैसे वक़्त देखकर नहीं भर आता था जी
हूक उठती तो हम आपकी घास पर थूकते थे
जैसे कद गालियों की तरह अन्दर से निकलता था
जैसे चाँद निकलने से नहीं मिट जाती थी भूख
जैसे सूरज के होने का अर्थ ईश्वर का होना नहीं था
जैसे खिलौना एक ही हो
कि होना था हमें ही अपने बच्चों के लिए चींटी

यूँ कुत्ते की तरह चौकन्ना नहीं
मैं भी किसी फूल को अपने माथे पर रखकर
आपकी तरह बिन याददाश्त सोना चाहता था
लेकिन आपका सिर बिल्कुल भी प्यारा नहीं
और मेरे हाथ में बन्दूक है साहब



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6 पाठकों का कहना है :

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।

वन्दना महतो ! said...

वाह! गजब की प्रस्तुति!

saanjh said...

hmmmm...again.....jo likha, kamaal laga, har line mein ek punch tha, har line par maza aata raha

par wahi uljhan...kyun likha, kiske liye likha, maaf karna, ham mandbuddhi logon ko zara waqt lagta hai ;)

vaise dekha jaaye to kya zarurat hai jaan'ne ki ke kyun likha, kiske liye likha, ye sawaal nikaal do to bas itna reh jaata hai....kya khoob likha hai, bohot badhiya nazm

संध्या आर्य said...

धंसी पारदर्शिता मे
दर्द के वजूद को
चाहे कितना भी घीसो
पर वहाँ मरे खुन के ही
निशान मिलते है,
मुस्कान चाहे जितना भी फैल जाये
आंखे नमकीन हो
एहसास लड्खडाने लगती है
रेत के बनी महल पर

लोग कहते है वो
मार दी जायेगी
जो अल्पसंख्यक है
बेबस और असहाय
जिसने पहन रखे है
सफेद ईमानदारी और
सच की चुडियो मे
सुहाग लपेट रखी है
निश्चयबद्ध चीजे फांसी चढती है
यह सच है

हमे अनिश्चित होना चाहिये
ताकि बचा पाये अपनी
भेडचाल वाली मानसिकता को
शबाशी पाये नाक के शान पर
चिथडे चिथडे हो जाने के बाद ही
हम बच पयेंगे
दिल पर बढने वाले
दबावो से


जिजीविषाये माचिश की
बाँक्स सी भडकीली
इन्हे पता होती है कि
हरियाली जलती नही है
और आग बुझती नही
उर्जा भी अपने श्रोत से
नष्ट नही होती परंतु
परिवर्तित हो जाती है

माँये भी अल्पसंख्यक होती है
लिंग भेद से
चढना होता है पहाड
बेटियो के लिये
बिना जख्मी हुये
सम्भव नही है
हरी घासोवाली ऊँचाईयाँ

प्रेम की जरुरत
जिस्म नही होती
अविरल है
भौतिक नही !!!

सागर said...

बड़ी प्यारी कविता लिखी है भाई... पिछले तीनो कवितायें आपकी शानदार हैं... शब्द दर शब्द गुज़रते हुए लगा यह वहीँ आ गए हैं जैसा देखते हैं, भीतर ही भीतर जलते हैं, सुलगते हैं और घटते हैं... बहुत तरक्की करो, खूब आगे बढ़ो और हमारी भावनाओं को शब्द दो. बधाई साथी.

संध्या आर्य said...

देखे है श्वेत श्याम पंक्षियो को
गगन छुते हुये
जिन्हे मय्यसर नही होती
हरी आंखो की चमक
कत्ल भी बेलिहाज़ होती है
भूख की तरह

सुकून मे जीवन
पर संघर्ष मे जिंदगी
मजबूरी वाले हालात
प्याज काटने जैसा
काटते जाने पर
सुखती जाती, हरी घासे
छोड देना बच्चो को
बिना टोपी रिश्तो के शीलन मे
बगैर सोचे की भविष्य
लकवाग्रस्त हो सकती है
न्युनतम तापमान पर
माँये बेटो के नाम की खाती थी रोटियाँ
सेकती थी सरेआम गालियाँ भी


जानवर खरीदे जाते
ईमान के नामपर
ऐसे लोगो की एक जमात
जो चरते थे घास
और सोख लेते थे
ठंढी हवाओ को
और अनाथो के हिस्से मे
आने वाली हरी चमक को भी
विधवाओ की चुडियाँ
इन्ही लोगो ने चुराई थी
जख्मो के कोलाहल के साथ
तहखाने मे ढुंढती थी आदते
जिसके सुहाग के सिंदूर
पर लिखा था पराया


भाव के तीर से
लहु बहता
शब्दो की चुभन से
मोर भी नाच उठते थे
फुटते बादलो के बीच
उसके आंगन मे
मुस्लसल
बिन मौसम
पर तस्वीरे
श्वेत-श्याम ही रह जाती
उसके हरे जख्मो पर !!