रोटी और शिमला मिर्च

कुछ लोग मेरी तरफ़ थे
कुछ उस तरफ़ जिधर दुनिया गहरे रंगों की दिखती थी
चाँद इतना ही छोटा कि ख़ूबसूरत लगे
रास्ते उतने पत्थर जितना संगमरमर ज़मीन में है
जितने देवता बादलों में
जितनी तक़दीरें बदली हैं व्रत कथाओं की नायिकाओं की
जिन्हें बेटे मिले हैं सौ, पति समझदार या राजा
और इस तरह दिन बुहारी फिरने जितनी आसानी से बहुरे हैं

दुनिया बदलने वाले सब लोग,
जिन्हें नहीं मालूम था पहले कभी कि
फ़ीस माफ़ी की आसान चार लाइनी अर्ज़ी लिखना
किस तरह सबसे मुश्किल और रुलाऊ काम होता है,
क्या वे बाद में कतारों में लगे होंगे किसी दिन
टिकट खरीदते, बिल घटवाते या लोन माँगते हुए
वर्गपहेलियाँ बनाते हुए क्या उन्होंने भी माँगी होगी एक चाय उधार
ताकि कुछ मोटी गृहणियों की दुपहरियाँ थोड़ी आसान हो सकें
कुछ बच्चे सीख सकें बीस तीस नए शब्द
जो कभी काम न आएँगे

क्या यह सच है कि
दुनिया को वर्गपहेलियों की इतनी ज़रूरत न होती
तो कवि श्याम प्रकाश कुछ और कविताएँ लिख पाता
और मरते वक़्त रोटी और शिमला मिर्च होती उसके पेट में



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5 पाठकों का कहना है :

निखिल आनन्द गिरि said...

नहीं, ये झूठ है.....मैं पूरे होशोहवास में कह रहा हूं...

रहिमन said...

चैनल का यह नौकर गलत कह रहा है गौरव..तुमने बहुत सही बात लिखी है..बहुत अच्छी कविता. तुम्हारे लेखन में जो निखार आ रहा है वो यह कि वर्ग संघर्ष तुम्हारी रचनाओं का मूल बन रहा है जो कि बहुत जरूरी था.. साधुवाद.

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सटीक चित्रण परिस्थितियों का।

संध्या आर्य said...

जो दूर से देखती थी
जमीनी भूखो को और
निगल भी जाती,
कुछ भैसो पर बैठी दुबली पतली
पत्थराई सिंगो से दो चार होती,
खुंटे से बंधी गायो के
दिन कटते नादो के पास
दूह लिये जाने तक,

डीहो पर बैठने वाली
पुर्वजो की पंचयती
अशिक्षित समाज के मूँह पर
नाक खडे कर रहे थे,
अछूतो को हाशिया बना
रच रहे थे समाजिक किताब
जिसके तहत अंधी बनाये गयी गाये
और झोंका गया ज्ञान
रंग बिरंगे शाफावाले मुंछो पर
और छूमंतर हो गयी
अर्जीवाली चार लाइने

शिक्षित आंखोवाले काग
घर से बाहर ही नजर आते
दरवाजे की शान की खातिर,
मुर्गियो के चूजो को
नसीब नही था
अक्षरवाले दाने

सच तो यह भी है
निरक्षरता बदल दी थी लकीरे
बलि चढ गयी थी बेटियाँ
नाखून काटे जाने पर खून था गिरा
जब उन्हे पत्थरो पर घिसा गया !!!!

saanjh said...

kafi mehnat karvaate hain aap apne readers se...haina ;)

aisa nahn ke samajhne mein waqt lagta hai, par ek hisse se doosre hisse mein relation baithane mein waqt lagta hai...

jitni samjhi, bohot khoobsurat lagi, jaane kitni lines aisi thi jinpe waaahhhhh nikal jaati thi...dobaara padhenge..shayad kaii baar, phir kuch comment dene ke qaabil banenge...
:)