सब कुछ छिना जा रहा

सब कुछ छिना जा रहा
रेंगकर छिपकलियां होती जा रहीं ओझल
दीवारों पर से उतरती पपड़ी के निशान
किसी हिन्दी शब्द जैसे हैं
जिसका अर्थ अभी इसी क्षण हम कुएं में फेंक आएंगे
भूल जाएंगे

‘तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो’ गाती हुई लड़कियों को
बीच में रोककर चूमा नहीं जा सकता
स्कूल चूंकि प्रार्थनाओं से चलते हैं
कतारों में चलेगा प्रेम
और अपनी अपनी कक्षाओं में जाकर बैठेगा
आसमान से तोड़कर लाए जाएंगे मास्टरजी
जो रबी और खरीफ का फर्क जरूर जानते होंगे
यह रजिस्टर में लिखा है
और फिर सामने बोर्ड पर कि
वे छीनेंगे मुझसे मेरी निराशा
मैं कहीं का न रहूंगा

घोड़ों पर मौत आएगी दूरबीन की तरह
मेरे ऊपर खुदी होगी उसकी कीमत
और जब आप मुझे खोलेंगे
तो दरअसल मर रहे होंगे
’शहीद होना था’ यह एक पश्चाताप की तरह
दूर से देखा जा सकेगा
पास से लगेगा वाक्य

जब सब पिट रहे होंगे
मैं दृश्य से निकाल दूंगा चाँटे
हथकड़ियों को धो-माँजकर छिपा दूँगा
डोलियों के नीचे से कहारों को निकालकर
ही रुक पाएंगी शादियाँ

दुखों के नाम नहीं होंगे
कि उनकी हत्याएँ की जा सकें
पैदल चलना होता जाएगा मुहावरा
सुबह का सूरज मुझसे पहले ख़त्म होगा
और फिर रोटी जब बाँटी जाएगी
तब हथियार होगी

स्कूल से लौटती हुई सब लड़कियाँ भी
छीनी जा रही होती हैं



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8 पाठकों का कहना है :

निर्मला कपिला said...

दुखों के नाम नहीं होंगे
कि उनकी हत्याएँ की जा सकें
पैदल चलना होता जाएगा मुहावरा
सुबह का सूरज मुझसे पहले ख़त्म होगा
और फिर रोटी जब बाँटी जाएगी
तब हथियार होगी
लगता है अगर इसी तरह हम लोग संवेदनाओं से दूर होते रहे तो वक्त बहुत दूर नही। अच्छी लगी रचना आभार

वन्दना said...

सही कह रहे हैं…………………कल के चर्चा मंच पर आपकी पोस्ट होगी।

Anonymous said...

अच्छा ??!!

क्या वाकई उपर वाले ने धरती पर केवल दुख,frustration,अन्याय के द्रिश्य ही पैदा किये है ?

very disappointing and discouraging show .

प्रवीण पाण्डेय said...

संवेदनात्मक अभिव्यक्ति ।

डॉ .अनुराग said...

कभी कभी सोचता हूँ...के तुम्हारे भीतर कितने ख्याल होगे जो रोज सर उठाते होगे....पर किसी कागज पे उन्हें जगह नहीं मिलती होगी....ख्याल को लफ्ज़ देना....किसी पेंटिंग में रंग भरना सा है .......इस तरह के वो खूबसूरत लगे.....तुम्हारी कविताएं खूबसूरत नहीं होती.......वो असल होती है........थोड़ी थोड़ी कठोर......बीच के कुछ हिस्सों में मुलायमियत लिए ...शायद उन्हें भी आदत है तुम्हारी....

सन्ध्या आर्य said...

मरती सम्वेदनाये
फैलता समन्दर धुआँ सा
गंधाते रिश्तो मे
सिकुडती सांसे
अंधी लालटेन सी शिक्षा
बहरी होती समाज
प्रार्थनाओ पर टिकी लड्कियाँ
गहरी रातो से उपजी अनाथ विचारे
भेड चालो पर मरती चिट्टियाँ
प्रकृति की लुटी हुई मौसमे
अपने जगह से विस्थापित जलवायु................
....................

सूर्यकान्त गुप्ता said...

संवेदनात्मक अभिव्यक्ति

मोक्ष said...

गौरव..., मैं निशब्द हूँ ...