भविष्य वही था जो परसों बीता

हमेशा की तरह मैंने बेहोशी अपने ऊपर आने दी 
चूरा चूरा रात
पैने पैने लोग
ऐसे ऐसे रोग
जिनके नाम में मौत छिपी थी
कुछ बेचना चाह रहे थे सब
और बुढ़ापे के लिए बचाकर रखना सारे पछतावे
कभी-कभी बीमे और अँधेरा हमेशा जिसमें सर्दी की एक रात
कोई छत से कूदा

चकाचौंध के बीच क्या अर्थ है किसी के भी नाम का
जबकि आदमी आज वो नहीं है, जैसा मैं कल शाम
उसकी हथेली को चूमते हुए उससे पूछता था कि
कितने घंटे सोते हो
दूसरों के घर में क्यों रोते हो?

महीन सी एक लाइन पर
फ़ोन कॉल पर घंटों
घंटों दफ़्तरों के बाहर के स्टूलों पर
वह मेरा एक यार जो घोड़ों की ज़बान जानता था
उससे कोई नहीं पूछता यह सवाल
कि इंटरव्यू उठाकर माथे पर मारा जाए उनके
जो नहीं जानते कि कितनी तरह से हिनहिनाया जा सकता है
कितनी देर तक एक टाँग पर खड़े रहकर कहा जा सकता है
कि आप भगवान हैं मास्टरजी
मुझे पानी पीना है, मेरा बस्ता वहाँ तीसरे बेंच पर है
मुझे पानी पीने दें, जीने दें कृपया

एक पेड़ को चीरते हुए हवा के बारे में सोचने वालों से बुरा
बस गटर में उतरने वालों के साथ हुआ है इस दुनिया में
जिस पर हमें गर्व है और जब राष्ट्रगान बजता है
हम छ:-छ: साल के बच्चों की हथेलियों पर रखकर अपने ठंडे पैर
खड़े होते हैं
उनकी हथेलियों में इतने जूठे बर्तन, चाय के गिलास उलटे
इतना आंखों में सलाइयों सा गुस्सा और यह कोशिश कि हर गाली का अर्थ,
जब आप सोएँगे तो बदल देंगे वे
इतना भविष्य उनकी आँख में कि तारीखें जान छिपाती भागती
कि आप उनके पार देखने की कोशिश में हर चीज की कीमत पूछते हैं
और आपके बच्चे जब पहला अक्षर बोलते हैं
आप पचास शहरों तक कूदते हैं
दो सौ रिश्तेदारों को करते हैं फ़ोन
और मुझसे पूछते हैं कि क्या लिख रहे हो इन दिनों बर्खुरदार
कि यार, बहुत अच्छा था फ़लाना इश्तिहार


हवा के फ़रेब दरअसल उन्होंने रचे हैं
जिन्होंने रचे हैं मोबाइल फ़ोन के नेटवर्क और ऐसी बेशर्म भुलक्कड़ी
और महानता
और संभोग के दो सौ तरीके
कि बहुत लम्बे वक़्त तक न चुभें याददाश्त में खंजर
और यह टीवी है जिसमें आप रोएँ तब भी होने चाहिए आपके प्रायोजक

भविष्य वही था
जो परसों बीता

वे जितना कोयला लाते थे ज़मीन के नीचे से, संसार के सबसे सुन्दर बच्चे,
जिनकी आँखों में झाग थे और तलवों में कीलें
और ज़मीन रोज़ बुहारी जाती थी
हम आग जलाते और गाने गाते थे उसके इर्द-गिर्द
पर कभी चैन न उतरा हमारे गले से नीचे
किसी सपने में नहीं आई नींद

हमें जो जो लौटता मिला
हमने उसे कहा नाकाबिल
कि जाओ घर में, जंजीर चढ़ाकर दरवाजे की डरो
जो जो बड़े हैं, उन्हें नमस्ते करो

और हम जब जब लौटे
हमें समेटकर रख दिया गया भीतर
एक कमरा, जिसमें हमेशा शाम रहती थी
और रोशनदान पर चिपकाए गए थे नंगे अख़बार
और जब कोई मेहमान आता
हम हमेशा सो रहे बताए जाते थे

इतना पढ़ाया गया बच्चों को
कि वे कैद को एक शब्द की तरह देखते हैं।