हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था

एक आदमी दिखाता था अपना हाथ बार बार
कैमरे के सामने
जिसमें से चूता था टप टप खून,
एक आदमी ने अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर
लिखा था, ‘हमें बचा लो’
कोलगेट के टूथपेस्ट या जिलेट की शेविंग क्रीम से।
खिड़की पर ज़ूम होता था बार बार कैमरा।
जाने कौनसा मॉडल था,
बहुत बढ़िया था रिज़ोल्यूशन।

दनादन गोलियाँ निकलती थीं
चलती हुई जिप्सी में से,
लोग लेट जाते थे लेटी हुई सड़क पर,
हम सब लिहाफ़ों में लेटकर देखते थे टीवी,
बदलते रहते थे चैनल,
बार बार चाय पीते थे।

समाचार वाली सुन्दर लड़कियाँ बताती थीं
हमें और भी बहुत सारी नई बातें
और जब हम सब कुछ भूल जाना चाहते थे
उनकी छातियों पर नज़रें गड़ाकर
तब सारी उत्तेजनाएँ जैसे किसी खानदानी दवाखाने की
शिलाजीत की गोलियों में छिप जाती थी।
उचककर छत से चिपककर
फूट फूट कर रोने का होता था मन।
नहीं आता था रोना भी।

हेमंत करकरे नाम का एक आदमी
मर गया था
और नहीं जीने देता था हमें।
ऐसे ही कई और साधारण नामों वाले आदमी
मर गए थे
जो नहीं थे सचिन तेंदुलकर, आमिर ख़ान
या अभिनव बिन्द्रा,
नहीं लिखी जा सकती थी उनकी जीवनियाँ
बहुत सारे व्यावसायिक कारणों से।

वह रात को देर से पहुँचने वाला था घर,
फ़्रिज में रखा था शाही पनीर
और गुँधा हुआ आटा,
एक किताब आधी छूटी हुई थी बहुत दिन से,
माँ की आती रही थीं शाम को मिस्ड कॉल,
उसे भी करना था घर पहुँचकर फ़ोन,
ढूंढ़ना था कोल्हापुर में
कॉलेज के दिनों की एक लड़की को,
बस एक बार देखना था उसका अधेड़ चेहरा,
उसके बच्चे,
अपने बच्चों के साथ देखनी थी
पच्चीस दिसम्बर को गजनी।
गजनी माने आमिर ख़ान।

एक दिशा थी
जहाँ से आने वाले सब लोग
भ्रमित हो जाते थे,
एक प्यारा सा चमकीला शहर था
जिसका दुखता था पोर पोर,
जबकि वह एक से अधिक पिताओं का दौर था,
खेलते-सोते-पढ़ते-तुनकते-ठुनकते पचासों बच्चे
रोज हो जाते थे अनाथ,
हमें आता था क्रोध
और हम सो जाते थे।

कमज़ोर याददाश्त और महेन्द्र सिंह धोनी के इस समय में
यह हर सुबह गला फाड़कर उठती हुई हूक,
हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर
और बहुत सारे साधारण लोगों को बचाकर रख लेने की
एक नितांत स्वार्थी कोशिश है,
इसे कविता न कहा जाए।



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16 पाठकों का कहना है :

बी एस पाबला said...

इतनी छोटी उम्र में अपने भावों को, भाषा की गलतियां किए बिना, एक कविता रूपी पाठय में उकेरना मुझे तो बहुत पसंद आया।

मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं

वेद रत्न शुक्ल said...

भाई! शानदार... हार्दिक शुभकामनाएं।

vijay gaur/विजय गौड़ said...

बहुत ही सुंदर कविता है गौरव। भाषा और शिल्प के स्तर पर भी और कथ्य के भी। शुभकामनाएं।

Ratan Singh Shekhawat said...

भाई! शानदार... शुभकामनाएं।

Parul said...

हमें आता था क्रोध
और हम सो जाते थे।

Anil Pusadkar said...

सलाम शहीदो को और आपको भी इस ईमानदार अभिव्यक्ति के लिये।दिल को छू लिया आपने,आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाय कम होगी।

mehek said...

shahidon ko naman

डॉ .अनुराग said...

आपने कभी सोचा है की अमेरिका पे दुबारा हमला करने की हिम्मत क्यों नही हुई इनकी ?अगर सिर्फ़ वही करे जो कल मनमोहन सिंह ने अपने भाषण में कहा है तो काफ़ी है.....अगर करे तो....
फेडरल एजेंसी जिसका काम सिर्फ़ आतंकवादी गतिविधियों को देखना ....टेक्निकली सक्षम लोगो को साथ लाना .रक्षा विशेषग से जुड़े महतवपूर्ण व्यक्तियों को इकठा करना ....ओर उन्हें जिम्मेदारी बांटना ....सिर्फ़ प्रधान मंत्री को रिपोर्ट करना ,उनके काम में कोई अड़चन न डाले कोई नेता ,कोई दल .......
कानून में बदलाव ओर सख्ती की जरुरत .....
किसी नेता ,दल या कोई धार्मिक संघठन अगर कही किसी रूप में आतंकवादियों के समर्थन में कोई ब्यान जारीकर्ता है या गतिविधियों में सलंगन पाया जाए उसे फ़ौरन निरस्त करा जाए ,उस राजनैतिक पार्टी को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए .उनके साथ देश के दुश्मनों सा बर्ताव किया जाये .......इस वाट हम देशवासियों को संयम एकजुटता ओर अपने गुस्से को बरक्ररार रखना है .इस घटना को भूलना नही है....ताकि आम जनता एकजुट होकर देश के दुश्मनों को सबक सिखाये ओर शासन में बैठे लोगो को भी जिम्मेदारी याद दिलाये ....उम्मीद करता हूँ की अब सब नपुंसक नेता अपने दडबो से बाहर निकल कर अपनी जबान बंद रखेगे ....इस हमले को याद रखियेगा ......ये हमारे देश पर हमला है !

सागर नाहर said...

गौरवजी
बधाई दूं या बहादुरों की मौत का शोक व्यक्‍त करूं?

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

" शोक व्यक्त करने के रस्म अदायगी करने को जी नहीं चाहता. गुस्सा व्यक्त करने का अधिकार खोया सा लगता है जबआप अपने सपोर्ट सिस्टम को अक्षम पाते हैं. शायद इसीलिये घुटन !!!! नामक चीज बनाई गई होगी जिसमें कितनेही बुजुर्ग अपना जीवन सामान्यतः गुजारते हैं........बच्चों के सपोर्ट सिस्टम को अक्षम पा कर. फिर हम उस दौर सेअब गुजरें तो क्या फरक पड़ता है..शायद भविष्य के लिए रियाज ही कहलायेगा।"

समीर जी की इस टिपण्णी में मेरा सुर भी शामिल!!!!!!!
प्राइमरी का मास्टर

Ashwini said...

Solanki... bahut achhi aur bhavuk samwad hai.meri subhkamnayen hamesha tumhare saath hai mitr.

विकास कुमार said...

कायल हो गया हूँ, और क्या कहूँ?

समर्थ वाशिष्ठ / Samartha Vashishtha said...

शानदार कविता!

इसे कविता ही कहा जाए और ऐसी ही होनी चाहिए कविताएं!

Abhi said...

कर चले हम फ़िदा जान ओ तन साथियो, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो ....... !

आतंक से लड़कर , जान न्योछावर करके भी न मिला इन शहीदों को चैन , और अब स्वार्थ से भरी राजनीति के शब्दों से आहात हैं वो रूह.
खून देकर औरों की आजादी को बचाया, अपनों को दूरी के दर्द से रुलाया , पर किसको फिक्र है उस आजादी की रक्षा की .... शायद किसी को नही ...... हम तब तक इसी तरह इन हादसों का शिकार बनते रहेंगे और भूल जायेंगे कुछ समय बाद... सिर्फ़ कुछ शब्दों की टिप्पडी करके ...." आह दुर्भाग्य , कितना ग़लत है , शर्म की बात है..."

हुंह !! क्या हम कभी सोचते हैं इन सारी घटनाओं से सबक लेने की और बाहर आने की... शायद नही... क्यूँ की कोई अपने रजाइयों से बहार नही आना चाहता..... लोग फ़िर से खुश हैं , सारे day मनाये जायेंगे .... उत्सव होंगे , मिठाइयाँ बाटी जाएँगी ... जो चुनाव जीत गए वो भंगरा कारेंगे और फ़िर से अपने कान बंद कर लेंगे इन घटनाओं की गूज से ...
सिवाय उनके जिन्होंने अपने जिगर के टुकड़े को खो दिया है , दुखी हैं, जीवन जीने के लिए एक कारण ढूँढ रहे हैं और सिर्फ़ एक सवाल पूछते हैं ," क्यूँ ये घटनाएं हो रही हैं , कौन जिम्मेदार है इन सब का, जबकि सरकार प्रत्येक वर्ष लगभग २००० करोड़ सिर्फ़ रक्षा बजट पर व्यय करती है और देश मैं १२५ करोड़ से ज्यादा नागरिक हैं जिनमें लगभग ४० करोड़ सजग और समझदार शिक्षित लोग हैं..?"

हमें आगे बदना होगा सिर्फ़ अपनी टिप्पडीया देने से कुछ नही होगा..... जागो अगर अब नही जागे तो फ़िर हमेशा के लिए इस डर का गुलाम बना दिया जाएगा ..... आपकी रचना और आवाज की अभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद ...

bhawna....anu said...

ye koi swaarthi prayaas nahin hai.....behad hi chubhne wala sach hai...mujhe lagta hai is kavita ko kisi aisi jagah hona chahiye tha jahan zyada log is bhawna se khud ko jod paate.
aur haan ....wo saadhaaran log bilkul nahin the.....!
u have written a masterpiece.

Bhavya said...

कहां से लाते है शब्द और उन्हे बांधने की कला। शानदार है आप, आपकी अभिव्यक्ति। जारी रखिएगा। एक बड़ा फलक आपके इंतजार में है। मुझे विश्वास है। लेकिन सरलता के साथ। जनता भारी भरकम शास्त्रों में नहीं आम बातों में यकीन रखती है। सच और झूठ के बीच की चीज को वो नहीं समझती। वो केवल या तो सच जानती है या झूठ। उसे अंत में सच की जीत का यकीन आज भी है। वो सपनों को देखने के लिए ज्यादा फंतासी नहीं बुनता। भगवान के सामने हाथ जोड़ता है। और मांगता है कि उसे मिल जाए। उस आम आदमी की खुशी बन जाए, तो बेहतर। नहीं तो खुद की संतुष्टि परम सुखम।