बारहवीं ए की लड़कियाँ


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भाई जेल में था। अपने जन्मदिन के अगले दिन से। मैं हर महीने की पाँच या आठ तारीख को उससे मिलने जाती थी। कैमेस्ट्री के ट्यूशन के बाद। ट्यूशन लगभग ज़रूरी से हो गए थे, आप पढ़ना चाहें या न चाहें। एक फ़ायदा यह था कि हरनाम सर स्कूल टेस्ट के सारे प्रश्न ट्यूशन वालों को पहले ही बता देते थे और दूसरा, प्रैक्टिकल में जब बाहर से आया एग्जामिनर उनके घर बैठकर बालूशाही खा रहा होता था तो वे उसके हाथों में एक लिस्ट थमा देते थे। उसमें उन्हीं लड़के लड़कियों के नाम होते थे जो हर महीने उन्हें साढ़े पाँच सौ रुपए देते थे। और पैसा मेरे पापा के पास बहुत था। 

मैं अपने शहर से निकाल दी गई थी। भाई उसी शहर की जेल में था। मुझे एक सौ अठानवें किलोमीटर दूर यहाँ लड़कियों के स्कूल में भेज दिया गया था, हॉस्टल में। यहाँ हॉस्टल में रहना ज़रूरी नहीं था लेकिन मम्मी पापा, जिन्होंने उस दिन के बाद मुझसे कोई बात नहीं की थी, मुझे पहले की तरह खुला नहीं छोड़ना चाहते थे। खुला शायद छोड़ भी नहीं सकते थे। मेरे ऊपर कोई मुकदमा नहीं था इसलिए मुझे जेल भी नहीं भेजा जा सकता था लेकिन मम्मी पापा ने मेरे लिए यह हॉस्टल जेल की तरह ही चुना जहाँ लड़कियों से बाहर का कोई आदमी नहीं मिल सकता था, सिवा उनके माँ बाप के। और मेरे माँ बाप पिछले चार महीनों में एक भी बार नहीं आए थे। बहुत मुश्किल से मेरी हॉस्टल वार्डन तैयार हुई थी कि मुझे जेल में अपने भाई से मिलने के लिए जाने दिया जाए। वह मेरे साथ जाती थी। दरअसल उसके कई प्रेमी भी हमारे पुराने शहर में रहते थे और मुझे साथ ले जाने से उसका बस का सफ़र आसानी से कट जाता था। बाकी भी कुछ काम मुझे करने पड़े थे, जिनका ईनाम यह पाँच या आठ तारीख की मेहरबानी होती थी। हम एक दूसरे की आज़ादी और विचारों की इज़्ज़त करते रहें तो हो सकता है कि मैं बाद में सब कुछ आपको बताऊँ।

पापा मम्मी ने वहाँ का घर बेच दिया था। हालांकि उनके लिए तो वह घर था ही कहाँ! वे छुट्टियाँ मनाने ही तो आते थे। जो भी हो, शहर के लोगों में हमारे लिए इतनी आग थी कि वे उस घर को न भी बेचते तो भी हमें उसके अन्दर बन्द करके उसे जला दिया जाता। उस शाम से अगली सुबह जब पुलिस भाई को पकड़ने आई तो हमारे घर के आगे कम से कम दो हज़ार लोग जमा थे और वे किसी भी पल दरवाज़ा तोड़ने वाले ही थे। पापा मम्मी तब तक नहीं आए थे।

जब पुलिस भाई को लेकर चली तो मैं बाथरूम में बन्द हो गई थी। दो तीन लड़के अन्दर घुस आए थे और भूखे शेर की तरह मुझे ढूंढ़ रहे थे। शायद उनमें बलजीत भी था या हो सकता है कि यह मेरा वहम ही हो। हाँ, वहम ही है शायद। वो ऐसे नहीं आएगा।

मैंने एड़ियाँ उठाकर रोशनदान में से कुछ सेकंड के लिए बाहर देखा था और मुझे याद है कि उनकी आँखों में क्या क्या था। वे मुझे नंगा करके बाज़ार में घुमाना चाहते थे। वे मेरे शरीर से खेलना चाहते थे और ऐसा करते हुए इतिहास में अमर भी हो जाना चाहते थे कि देखो, ऐसे देते हैं हम सजाएँ। इसके बाद जब वे सब घर पहुँचते तो उनकी बेटियाँ, बीवियाँ, बहनें और माँएं उन्हें शुक्रिया कहती और घी पिलाती कि जब तक तुम हो, हमें कोई नहीं छुएगा।
और यह पवित्र बदला उन सबकी आँखों में ही नहीं था, बल्कि वे ऐसा चिल्लाने भी लगे थे। लेकिन इसी बीच दो पुलिसवाले दौड़कर आए और हमारे घर में घुसे लड़कों को उठाकर बाहर ले गए। फिर उन्होंने बाहर ताला लगा दिया और वहीं खड़े हो गए।

भाई को जब दोनों तरफ़ से दस-दस पुलिसवाले घसीटकर जीप की तरफ़ ले जा रहे थे तो कहीं से एक पत्थर आकर उसके माथे पर लगा था और खून बहने लगा था। कुछ लड़के खुशी से चिल्लाए थे। भाई चोट को छूना चाहता था। दर्द से उसकी आँखों में पानी आ गया था लेकिन वे सब जल्दी में थे। वे उसे कुत्ते की मौत मारना चाहते थे। वैसे मैंने कभी कुत्ते की मौत नहीं देखी। मैंने अपनी ज़िन्दगी में अब तक चींटियों, ततैयों और कॉकरोचों के अलावा सिर्फ़ अमरजीत को मरते देखा है। और इन सभी मौतों ने मुझे बराबर परेशान किया है। क्या आदमी की मौत सिर्फ़ इसलिए ज़्यादा त्रासद है कि वह हमारी नस्ल का है या फिर वह तड़पता है तो उसके हाथ पैरों की हरकतों और उसकी चीखों की भाषा हमें समझ आती है? 

जब मैं चार साल की थी और हमारे कमरे में लगातार इधर-उधर उड़ रहे एक ततैये को भाई ने तकिये के कवर के अन्दर दबाकर मसल दिया था तो मैं सोचती रही थी कि इसका भी कोई घर होगा, जहाँ यह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता होगा और उस शाम उसकी पत्नी और बच्चे उसका इंतज़ार करते रहेंगे। वे तो शायद जान भी नहीं पाएँगे कि वह कहाँ गया? उनके यहाँ तो एफ़आईआर भी नहीं होती और ऐसे अख़बार भी नहीं होते जो क्रूर हत्याओं के इंतज़ार में होते हैं ताकि उनमें काम करने वाले पत्रकारों की रोज़ी रोटी आराम से चल सके। मुझे हँसी आती है जब आप क्रूरता और मानवता जैसे शब्द बोलते हैं। आप कितनी प्यारी छवि बनाना चाहते हैं ना अपनी दुनिया की और इसमें जो भी जीव आपको दाग लगता है, उसे मारने के लिए कैसे कैसे तरीके ईज़ाद किए हैं आपने। लेकिन आपके पास तर्क हैं जिनके कारण आप हर रात चैन से सो पाते हैं और अपने बच्चों को गुलाबी गालों वाली परी की कहानी सुना पाते हैं। और यहाँ आप मेरे भाई से कहते हैं कि हत्या को कोई तर्क जायज नहीं ठहरा सकता। और बुद्ध और ईसा और गाँधी की बड़ी बड़ी तस्वीरें आसमान में बन जाती हैं।

मेरा भाई वैसे बुरा नहीं था, जैसे अख़बार उसके बारे में लिखते हैं। न ही वैसा संवेदनहीन, जैसा वह अपने आप को दिखाता है। उसने भीड़ के बीच उस पुलिस की जीप में बैठते हुए बाथरूम के उस रोशनदान की तरफ़ देखा था। मेरी तरफ़। यह देखने के लिए कि क्या मैंने देखा है कि उसे चोट लगी है। कभी कभी इतना भर भी सुकून देता है कि कोई है जो मेरी चोट को जानता है और अभी चाहता है कि इस भीड़ को चीरकर आ जाए और डेटॉल से मेरा माथा धोए और फिर उस चोट को चूमे, जैसे जादू यहीं इस बीस फीट चौड़ी सड़क पर जन्म लेगा।

मैं उस भीड़ में नहीं जा सकती थी। हालांकि कुछ मिनट बाद ही शायद मुझे नंगा करके कंधों पर उठाकर उस भीड़ में ले जाया जाता लेकिन बीच में पुलिस के वे दो जवान आ गए थे जो हमारे घर के दरवाज़े पर खड़े थे। उनमें से एक की आँखों में बहुत पहले का कोई दुख था। वह कभी भी रो सकता था।

हॉस्टल में मेरे कमरे का नम्बर 21 था। मेरे साथ शबाना रहती थी। हम दोनों के ही साथ कोई और रहना नहीं चाहता था और एक दूसरी की वज़ह से ही उस हॉस्टल में हमारा रहना संभव हुआ था। हम दोनों में सिर्फ़ इतनी समानता ही नहीं थी कि हमारे नामों के दो तिहाई अक्षर मिलते थे और हम एक ही कमरे में रहती थीं। अख़बारों के मुताबिक दिल्ली में हुआ कोई बम विस्फ़ोट उसके भाई ने किया था। विस्फ़ोटक पाकिस्तान से आए थे और उसका भाई धमाके में मर गया था। पुलिस का मानना था कि बम वक़्त से पहले फट गया था और वह सूटकेस छोड़कर फ़रार नहीं हो सका था। शबाना उस स्कूल की पुरानी स्टूडेंट थी और धमाके से कई महीने पहले से एक बार भी स्कूल से बाहर नहीं गई थी। वह इसीलिए बच गई। उसकी अम्मी ने आतंकवादियों को सेवईंयाँ बनाकर खिलाई थी और उसके अब्बू ने उन्हें उस बस अड्डे तक का रास्ता बताया था जहाँ बाद में उसके भाई ने बम फोड़ा। वे दोनों ही पकड़ लिए गए थे। उसके अब्बू को जेल में पहली ही रात दिल का दौरा पड़ गया था और वे अपनी बीवी से किए जवानी के सारे वादे तोड़कर चले गए थे। आसानी से बचकर। उसकी अम्मी को दस और साल जीना था।

पाकिस्तान से आए तीनों आतंकवादी पकड़े नहीं गए थे। शबाना की रूममेट निधि सलूजा ने कमरा छोड़ दिया था और कम से कम पचास लड़कियाँ अपने घरवालों को बुलाकर वॉर्डन के रूम में पूरा दिन चिल्लाती रही थीं कि शबाना को स्कूल से निकाल दिया जाए। विद्यार्थी परिषद ने पूरे इलाके के स्कूल इसी बात के लिए बन्द करवा दिए थे। और पता नहीं कैसे, जबकि यह मेरे और उसके अलावा किसी लड़की को अब भी संभव नहीं लगता, शबाना को निकाला नहीं गया था। एक दोपहर मेरे पापा मुझे लेकर हॉस्टल वॉर्डन पूनम सक्सेना के कमरे में पहुँचे थे और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई थी।

पापा स्कूल के ट्रस्टी थे। उनका काफ़ी पैसा स्कूल में लगा था और तब मुझे लगा था कि यही इकलौती वज़ह है कि मुझे उस स्कूल में दाख़िला मिल गया। पापा ने मुझसे कोई बात नहीं की थी और पूनम सक्सेना से कहा था कि अब वे कभी मुझसे मिलने नहीं आएँगे और वह चाहे तो मुझे बाँधकर भी रख सकती है। वह हँसने लगी थी और उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा था। उसकी उम्र बत्तीस के आसपास कुछ होगी। वह अच्छी समझी जाने वाली औरत थी और मुझे बस इसी तरह के लोगों से डर लगता था।  

21 नम्बर कमरा तीन साल से खाली पड़ा था। उसमें किसी प्रतिभा नाम की लड़की ने फाँसी लगाकर आत्महत्या की थी और उसके बाद से कोई लड़की उसमें रहने के लिए तैयार नहीं होती थी। मुझे और शबाना को तैयार करने की ज़रूरत नहीं थी। हम वहाँ उन मुर्गियों की तरह थे जो चिकन की किसी दुकान में लाए जाते हुए चिल्लाती नहीं। यह नहीं कि वे भविष्य नहीं जानतीं। बस वे यह जान जाती हैं कि कोई और रास्ता नहीं है। नहीं मरने का कोई तरीका नहीं।

मुझे हैरत हुई कि अख़बारों में मेरे और भाई के बारे में इतना कुछ छपने के बाद भी शबाना मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। शायद उस बम विस्फ़ोट के बाद उसने अख़बार पढ़ना छोड़ दिया था जबकि उस स्कूल में यह कम्पलसरी था और हर महीने जनरल नॉलेज का एक पेपर होता था।

- तुम्हारी क्या कहानी है?
हमारे साथ की पहली रात ही उसने सिगरेट फूंकते हुए पूछा था। मैंने उससे पूछा था कि सिगरेट यहाँ कैसे लाती हो? उसने कहा था कि तुम्हें अभी बहुत कुछ जानना है और सिगरेट उन चीजों में सबसे कम ज़रूरी है। वह हमेशा चाहती रही कि मैं कभी सिगरेट न पियूं और मैंने कभी पी भी नहीं।

उसने फिर पूछा था- क्या कहानी है तुम्हारी?
तब मैंने उसे बताया था कि मैं और मेरा भाई एक ही क्लास में थे। वो सेक्शन में और हम लड़कियाँ बी सेक्शन में। अमरजीत हमारी क्लास का सबसे प्यारा दिखने वाला लड़का था और मैं उसे दिन भर पास से देखते रहने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थी। मैं बड़े सपने देखती थी- साथ के एक घर के जिसमें हम दरवाज़े पर लिखते- अमरजीत और शायना - और ड्रॉइंग रूम में हम हर शाम साथ बैठकर चाय पीते हुई कोई पुरानी फ़िल्म देखते। लेकिन अमरजीत के पापा की लोहे की दुकान थी और वो इंसानों को भी लोहे जैसा ही समझता था। मैं उसकी ज़िन्दगी में तब तक ही महत्वपूर्ण थी जब तक मैं उसे किताबें खरीदवा सकती थी। उसे इंजीनियर बनना था और मैं जानती थी कि उसकी ज़िन्दगी में मेरी अहमियत उन किताबों की जिल्द जितनी भी नहीं है लेकिन होता है ना कि आप सोचते हैं कि आज अच्छा है तो उसे जी लेते हैं, कल की कल देखेंगे। आप सच की आँखों में आँखें डालकर तभी देखते हैं जब वह लड़का एक दिन आपको फ़ोन करके कहता है कि अगली उन्नीस को उसकी शादी है और वह शादी में आपकी पसंद की एक मिठाई बनवाना चाहता है। यह हत्या है। आप मानें या न मानें पर यह दुनिया की सबसे निर्मम हत्याओं में से एक है। बेशर्म और व्यावहारिक और आपकी दुनिया की नैतिक हत्या। आप बस उसकी गरीबी देखते हैं, उसके पिता की मौत और उसके भाई का पागलपन। आप बस देखते हैं कि उसकी माँ देख नहीं सकती और अब वही है, जिसे अपने सारे सपने छोड़कर दुकान संभालनी है और शादी करनी है। आप उसे अपनी फ़िल्मों का मज़बूर नायक बनाते हैं जैसे अमीर लड़कियों का दिल सोने का बना होता है, जिस पर कभी भी पॉलिश करवाई जा सकती है। उसे भी यही लगता था या मुझे लगता है कि उसमें इतना सोच सकने का दिमाग ही नहीं था। उसकी दुनिया में गणित सबसे ज़रूरी चीज थी और ऐसे लोगों को चाहिए कि गणित से ही शादी करें। लेकिन परी की किस्मत खराब थी।

मैं बेवकूफ़ थी। मैंने अमरजीत के बाल काटे थे और उसकी दाढ़ी साफ की थी। वह चुपचाप बैठा रहा था। सिर्फ़ इसलिए कि हैलिडे रेसनिक की किताब उसके सामने थी। बिना पगड़ी और दाढ़ी के वो ऐसा लगता था कि शाहिद कपूर सात जन्म में नहीं लग सकता। भाई ने उस दिन हम दोनों को साथ देखा था और पता नहीं क्यों, उस शाम उसने खाना नहीं खाया था। बाद में उसने मुझसे कहा भी कि अमरजीत मुझे बहुत दुख देगा। मैंने कहा कि मुझे पता है। लेकिन मुझे यह पता नहीं था कि पहले पता होने से दुख की तीव्रता कम नहीं हो जाती।

वह इकलौती बार था, जब मैंने भाई के मुँह से दुख शब्द सुना। वरना कोई और दिन होता तो वह कहता कि उसे इस शब्द का मतलब भी नहीं मालूम। उसका सपना था कि वह खुद को पत्थर बना ले। और बहुत दिन तक तो वह मुझे भी पत्थर बनाना चाहता था। कभी कभी तो मैं उसे ख़ुश करने के लिए वैसी होने की एक्टिंग भी कर देती थी। तब वह हँसता था लेकिन उस रात उसे देर से नींद आती थी।

वह बहुत अकेला था, जैसे बदला ले रहे लोग होते हैं। उतना ही हड़बड़ी में जैसे ज़िन्दगी बहुत होमवर्क वाली कोई छुट्टी हो जिसे जल्दी से जल्दी ख़त्म करना हो। एक रात हमारे नौकर गोपाल ने मुझे बताया था कि मम्मी पापा की तब तक शादी नहीं हुई थी और मम्मी प्रेगनेंट हो गई थी। मम्मी ने किसी मालिश वाली के बताए तरीके से गर्भ गिराने की कोशिश की थी, जो कामयाब नहीं हो पाई। फिर उन दोनों ने शादी कर ली थी। भाई आठवें महीने में पैदा हुआ था। नौकर ने बताया कि पहले तीन महीने में वह एक बार भी नहीं रोया। डॉक्टरों की सारी कोशिशों के बावज़ूद। इस बात को कोर्स की किताब में पढ़ाना हो तो कोई नौसिखिया मास्टर आपको इसका मतलब यह भी बता सकता है कि ज़िन्दगी के पहले तीन महीनों में वह एक बार भी दुखी नहीं हुआ।

एक डर उसे हमेशा रहा, जो इतना निराकार था कि हम उसके बारे में चाहकर भी कभी बात नहीं कर पाए। उसे अक्सर सपना दिखता था कि वह किसी अँधेरे कुँए में लेटा है और कोई उसके सीने में कटार घोंप रहा है। नौ-दस साल की उम्र तक कई बार ऐसा होता था कि वह बाहर खेल के बीच में से भागा आता था और मुझसे लिपटकर रोने लगता था। पापा मम्मी उसके कुछ वक़्त बाद ही हमारे साथ कम रहने लगे थे। तब हम दोनों बहन-भाई एक-दूसरे के ऊपर हाथ रखकर सोते थे। डर मुझे भी लगता था लेकिन वैसा कि लाइट जला दो तो सब कुछ ठीक। उसे जैसे कुछ पता था। कुछ बहुत बड़ा पता, जिसे जानने के बाद आप या तो आपके लिए सब कुछ बहुत भयानक हो जाता है या बहुत उथला। उसने उथला चुना। और जब तक हम नौवीं में आए, वो सीडी प्लेयर पर घंटों पॉर्न देखने लगा। उसके दोस्त उसे सब कुछ लाकर देते थे और हमारे घर में मम्मी पापा नहीं होते थे, इसलिए वहाँ देखना आसान था। मैंने उसे कभी रोका नहीं। अब लगता है कि शायद मैं रोकती तो वह रुक जाता। शायद वह चाहता भी हो कि मैं रोकूं। लेकिन मैं उसे तब तक अनदेखा करती रही जब तक उसने नहीं कहा कि मैं भी उसके साथ बैठकर वह सब देखूं।

मैं चौंकी नहीं, जैसे निधि सलूजा चौंकती। मैं उसे देखती रही, उसकी बेचारगी को, उसके ख़त्म होने को, उस आख़िरी क्षण को, जब वह नदी के किनारे पर खड़ा होकर मुझसे कहेगा कि उसे आख़िरी धक्का मैं दूँ। मैं पन्द्रहवें साल में थी और वो सोलहवें में। और मैंने दो घंटे तक उसके साथ बैठकर वो सीडी देखी। धरती नहीं फट गई, जैसा आप सोचते हैं। बस इतना ही कि मैंने उसका दिल रखने के लिए कहा कि अच्छी है, वैसे ही जैसे निधि सलूजा अपने भाई का दिल रखने के लिए सुनील शेट्टी की किसी एक्शन फ़िल्म की तारीफ़ करती होगी। भाई को अच्छा लगा था।
और फिर यह उसने बचाव का अपना तरीका ढूंढ़ा। जैसा वह अपने आप को देखना चाहता था, वैसा सोचता और होने की कोशिश करता और फिर मुझसे पूछे बिना मुझे भी उसमें शामिल कर लेता। कभी कभी मुझे लगता है कि वह सिर्फ़ मम्मी से नफ़रत करता था क्योंकि शुरू में उसने हर उस चीज का विरोध शुरू किया, जिन्हें मम्मी ठीक मानती थी या उसे लगता था कि मानती होगी। यह मीठा दूध पीने से और सोने से पहले पैर धोने से मना करने से शुरू हुआ और उस रात परी के ब्यूटी पार्लर पर ख़त्म।  

Ratcatcher
वह खोने से शायद इतना डरता था कि वह कहने लगा कि चीजें पाई ही नहीं जा सकती और पाई भी नहीं जानी चाहिए। वह अपने क़रीबी दोस्तों को अक्सर गर्व से बताता था कि मेरे और शायना के लिए दुनिया खिलौनों की दुकान की तरह है। मैं चुप रहती थी क्योंकि यह विरोध ही उसके लिए इकलौती शरणगाह था या बस पेनकिलर। और जब वह कहता था कि अमरजीत की भाभी रानी ऐसा पटाखा है जिसे वो अपनी छाती और बाकी जगहों पर फोड़ना चाहता है तो वह कुछ और कहना चाहता था जिसके लिए भाषा बनाई ही नहीं गई थी। शायद इस तरह वह मम्मी से लड़ता था।
रानी अमरजीत के बड़े भाई बलजीत की बीवी थी। बलजीत उन दिनों शराब के अलावा सिर्फ़ पानी पीता था।
भाई मुझे सब कुछ बताता था। पिछले साल वो रानी के घर लगभग रोज़ जाने लगा था और वो और रानी उसकी अंधी सास की चारपाई के नीचे एक-दूसरे से लिपटकर सो जाते थे। उन्हीं दिनों अमरजीत किताबों के लालच में मुझसे मिलने लगा था। बलजीत को शराब छोड़कर फ़िजिक्स और जादू का शौक चढ़ा था और वही इकलौता आदमी था, जिसके बारे में बात करते हुए भाई की आँखों में चमक आ जाती थी। एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह बलजीत के सामने रानी के होठों को चूमता है तो उसे ऐसा लगता है कि वह अपनी माँ के होठ चूम रहा है, अपने पिता के सामने। फिर अगले दिन उसने कहा कि बलजीत उसे बच्चे जैसा लगता है और जब वह कोई जादू सीखकर उसे दिखाता है तो उसे और रानी को ऐसी ख़ुशी होती है जैसी माँ बाप को होती है। फिर एक दिन उसने कहा कि रानी बच्ची है और ऐसा कहते हुए ही यह उसने ख़ुद भी पहली बार महसूस किया और वह डर गया। उस पूरी रात वह बुखार में तपा और मैं अपनी गोद में उसका सिर रखकर बैठी रही। अगली सुबह जब वह ठीक हो गया तो उसने जैसे फिर वही तय कर लिया था, जो वह भूलने लगा था- विरोध। वह अपने दोस्तों को रानी के साथ के अपने किस्से चटखारे लेकर सुनाता था और वे सब दोस्त, जो आज उसी स्कूल में बारहवीं क्लास में पढ़ते हैं, उसमें अपनी कल्पनाएँ जोड़ते थे और उन कहानियों को आगे सुनाते थे। उनमें से कोई भी आज जेल में नहीं है। उनकी माँएं हर शनिवार उनकी नज़रें उतारती हैं और उन्हें इंजीनियर बनाना चाहती हैं।

फिर अमरजीत ने मुझसे कहा कि अगली उन्नीस को उसकी शादी है और उस उन्नीस को मैंने रात भर शराब पी (शबाना को यह सुनकर आश्चर्य हुआ, उसे मेरा चेहरा देखकर लगता नहीं था कि मैंने कभी शराब पी होगी)। और हम दोनों ही उससे बदला लेना चाहते थे। लेकिन कैसे, ये हमें नहीं पता था।

उसके पिता की लोहे की दुकान के एक हिस्से में ही उसकी बीवी परी ने ब्यूटी पार्लर खोल लिया था। अचानक एक दिन भाई ने मुझसे कहा कि वह परी को भोगना चाहता है। और इस पर मुझे आज भी आपत्ति है। जैसे टूथपेस्ट के विज्ञापनों में दाँत चमकते हैं, वैसे परी का चेहरा चमकता था। उसके अन्दर कोई रोशनी थी कि उसे छूना ही किसी पाप जैसा था। वो भी उन मैले हाथों से, जो अमरजीत के थे, उसकी संवेदनहीन महत्वाकांक्षाओं और त्रिकोणमिति के निर्जीव सूत्रों से मैले, जिन्हें वो किसी बड़ी डिग्री से धो लेना चाहता था और आखिर में मज़बूरी में उन्हें लेकर दुकान पर बैठने लगा था। या मेरे भाई के, उसकी बेचारगी और उसके चुने हुए उथलेपन से मैले हाथ, उसके निराकार डर से मैले हाथ, उस खून से मैले हाथ जो उसकी छाती से निकलता था, जब रात को सपने में कोई उसमें खंजर घोंपता था।

भाई के जन्मदिन वाली उस शाम दुकान बन्द करने का वक़्त था। मैं और भाई वहाँ पहुँच गए। मैं अमरजीत को लेकर दुकान के भीतर वाले हिस्से में गई और भाई ने परी के ब्यूटी पार्लर में जाकर उसका दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लिया। अमरजीत मेरी छातियाँ सहलाता रहा। बाहर परी चिल्लाती रही। और उसी दिन उनके घर पर बलजीत ने एक समीकरण खोजा जो कहता था कि यथार्थ अनेक हैं जिनमें से एक में परी ने मेरे भाई का बलात्कार किया और अमरजीत ने भाई की हत्या की।

लेकिन परी ने घर जाकर बताया कि उसका बलात्कार हुआ है और भाई ने अमरजीत की हत्या कर दी है। अख़बारों में भी यही छपा और फिर हम दुनिया के सबसे बुरे लोग थे।

शबाना ने मुझसे पूछा कि मैं कहानियों की तरह घुमावदार बातें बनाने की बजाय सीधे सीधे उसे क्यों नहीं बताती कि उस रात क्या हुआ। मैंने कहा कि मुझे नहीं मालूम। उसने कहा कि उसे अच्छी तरह मालूम है कि उसका भाई उस विस्फ़ोट वाले दिन एक इंटरव्यू के लिए कनॉट प्लेस में था और उसके सूटकेस में उसकी मार्कशीट्स, एक जोड़ी कपड़े और एक सत्यकथा मैगजीन थी। उसकी अम्मी ने ज़िन्दगी में कभी सेंवईयाँ नहीं बनाई और पुलिस के रिकॉर्ड में जिस दिन उसके अब्बू ने आतंकवादियों को बस अड्डे का रास्ता बताया था, उस सुबह ही उन्हें मिर्गी का दौरा पड़ा था जिसमें उन्होंने अपनी जीभ काट ली थी और गिरने से उनकी कुहनी में फ़्रैक्चर हो गया था।

- लेकिन पता होने का भी कोई फ़ायदा नहीं है, जैसे नहीं पता होने का नहीं है।
वह आख़िर में बोली।

किसी ने हमारे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। शबाना दरवाज़ा खोलने गई। शायद पूनम सक्सेना थी। वह धीमी आवाज़ में शबाना से कुछ कह रही थी। उतनी ही धीमी आवाज़ में, जैसे अमरजीत उस रात उनकी दुकान के अन्दर वाले स्टोर में मेरे टॉप को उतारकर उसी कील पर टाँगते हुए कह रहा था, जिस पर वैल्डिंग वाला पाइप टँगा था।

- तुम हर रात मेरे पास आ जाया करो। मैं तुम्हें जन्नत दिखाऊँगा।

यह थी उनकी दुनिया और यह था उनका स्वर्ग। वे लड़के समझते थे कि जब हम उनके कंधों पर सिर रखकर सोना चाहती हैं तब हम असल में उनके शरीर के किसी हिस्से को छूने के लिए मरी जा रही होती हैं। जैसे होठों को चूमना, होठों को चूमने के अलावा, आगे कुछ है ही नहीं। मेरा भाई भी शायद ऐसा ही सोचता था लेकिन यह सोचना उसने नशे की तरह चुना था और अमरजीत को तो अंदाज़ा भी नहीं था कि जहाँ उसका स्वर्ग है, मेरी ज़मीन उसके बाद से शुरू होती है।

और तब मुझे अमरजीत पर तरस आया, हँसी आई। और मुझे लगा कि यह इस क़ाबिल नहीं है कि मैं इससे कोई बदला लूँ। और तभी मुझे परी का ध्यान आया और मैं अपना टॉप पहने बिना बाहर भागी, उसके ब्यूटी पार्लर की तरफ़। दरवाज़ा अब भी अन्दर से बन्द था लेकिन उसकी खिड़की लोहे की दुकान वाली तरफ़ भी खुलती थी। उसमें से मैंने देखा कि परी के शरीर के निचले हिस्से पर कोई कपड़ा नहीं है। वह ज़मीन पर बैठकर रो रही थी। और उसके सामने मेरा भाई एक कोने में खड़ा था- उस औरत की तरह जो कुछ मिनट पहले किसी प्राइवेट क्लीनिक से अपना अबॉर्शन करवाकर लौटी है और क्लीनिक से बाहर निकलते हुए पीछे से डॉक्टर ने उसे कॉंग्रेचुलेशंस कहा है।

वह रो रहा था। वैसे, जैसे वो क्रिकेट के बीच से भागकर आता था और मुझसे लिपटकर रोता था। बिना किसी तात्कालिक वज़ह के, बिना किसी तसल्ली की उम्मीद के।

शबाना दरवाज़ा खुला छोड़कर ही अन्दर आई। पूनम सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। फिर अचानक वह अन्दर आ गई और उसने कहा कि तुम दोनों ही आ जाओ। शबाना ने ठंडी सी आँखों से मेरी तरफ़ देखा। मैंने पूछा- कहाँ?
पूनम बोली- कपड़े बदल लो।

शबाना ने अपने शॉर्ट्स उतारे और जींस पहनने लगी। मैंने फिर से पूछा कि कहाँ जाना है। और पूनम सक्सेना तेज़ी से मेरी तरफ़ आई, मेरी बाँह पकड़ी और मुझे खींचकर पलंग से उतार दिया। शबाना तैयार हो गई थी, लेकिन मैं नहीं। वह शबाना को लेकर चली गई। मुझे लग रहा था कि यह हमारे भाइयों के नाम की सज़ा का एक ज़रूरी हिस्सा है, जो हमें दिया ही जाना है।    

और दस मिनट बाद 21 नम्बर कमरे में बाईस-तेईस साल के दो लड़के आए, जबकि लड़कियों के उस हॉस्टल में आधिकारिक रूप से नर कबूतर का भी आना मना था। और वे मुझे खींचकर बाहर ले गए। हमारा कोने वाला कमरा था। मुझे उस तरफ़ ले जाया गया, जिधर वॉर्डन का कमरा और स्कूल की बिल्डिंग थी।

पूनम सक्सेना के ऑफिस में उसकी कुर्सी पर करीब चालीस साल का एक मोटा, कुरते पाजामे वाला आदमी बैठा था। उसकी हर उंगली में अंगूठी थी। अपना काला चश्मा उसने मेज पर रख रखा था और अपने पैर भी। पूनम सक्सेना उसकी बगल में खड़ी थी। शबाना मेज के इस तरफ़। मुझे भी उसके साथ खड़ा कर दिया गया।

मैं और शबाना कार की पिछली सीट पर थे। साथ में उनमें से एक लड़का भी था। वह मोटा आदमी, जो मुझे उस रात बाद में पता चला कि स्कूल का मालिक है और वहाँ का विधायक भी, आगे की सीट पर बैठा था। दूसरा लड़का कार चला रहा था।

मैंने और शबाना ने रास्ते भर कोई बात नहीं की। तीन घंटे बाद लौटते हुए भी नहीं। हमें हॉस्टल के गेट पर छोड़कर कार चली गई। जब मैं उतर रही थी तो हमारी सीट पर बैठे लड़के ने मेरे कूल्हों पर हाथ फेरा।

हमारा कमरा खुला ही था, लेकिन लाइट ऑफ थी। हम अन्दर आए। मैंने दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर दिया। मैंने लाइट ऑन नहीं की। रोशनदान में से बहुत हल्की रोशनी आ रही थी, जिससे छत पर मार्कर से लिखे Death का टी और एच दिख रहा था। शबाना अपने बैड पर जाकर लेट गई। मैं दरवाज़े के पास वैसे ही खड़ी रही, जैसे मैं हिलना नहीं जानती। कुछ पल बाद शबाना ने पूछा- पानी पियोगी?
मैंने हाँ में गरदन हिलाई और शायद मेरे मुँह से हल्की सी हूंSS’ जैसी आवाज़ भी निकली। वह उठी। उसके हाथ बोतल की जगह जानते थे। बोतल लेकर वह मुझ तक आई और खड़ी हो गई। हम दोनों ही कुछ नहीं बोले।

अचानक मैं पूरा दिन अकेले छूटे किसी आठ महीने के बच्चे की तरह उससे चिपक गई और कराहने लगी। मुझे कहीं दर्द हो रहा था, अपने भाई के माथे की चोट जैसा दर्द, लेकिन कहाँ, ये मैं नहीं जानती थी।

उस दर्द को ढूंढ़ने में मुझे परी की बहुत याद आई। मैंने उसकी हथेलियाँ चूमीं और उसकी जाँघों पर गुलाब रखे। मुझे धुंधले लाल रंग का अपना बचपन याद आया जिसमें मम्मी पापा कहीं नहीं थे। मेरा डरा हुआ भाई था जो मेरे ऊपर हाथ रखकर सो रहा था। करीब दो घंटे बाद मैं शबाना के बिस्तर पर सोई, उसकी सुरक्षा के घेरे में। उससे पहले उसने मुझे बताया कि बम धमाके अक्सर आपको ऐसे मारते हैं कि आपकी लाश में आँख या कान या एक टाँग कभी नहीं मिलती। वह बहुत प्यार से मेरे बालों में अपनी उंगलियाँ फिराते हुए मुझसे जानना चाहती थी कि लोग एक-दूसरे को मारते क्यों हैं? मैं जानना चाहती थी कि हम चूहों को क्यों मारते हैं या मच्छरों और तिलचट्टों को?

मैंने गोल-गोल घूमने का एक सपना देखा जिसमें शबाना ने मुझे कोई पंजाबी लोरी सुनाई।  

हम अगले दिन स्कूल नहीं गए। स्कूल के ऑडिटोरियम में उस शाम कोई विदेशी फ़िल्म दिखाई गई जो दो बहनों की कहानी थी, जो बहुत कम बोलती थीं। मैं और शबाना सबसे पीछे बैठे थे। आधी से ज़्यादा लड़कियाँ बीच में ही उठकर चली गई थीं। तान्या शर्मा और निधि सलूजा ठहाके लगाती हुई निकली थीं। फ़िल्म ख़त्म होने को ही थी, जब शबाना ने मेरी तरफ़ झुककर धीमे से कहा कि उसे अपने अब्बू की याद आ रही है। इसके जवाब में मुझे कुछ कहना नहीं आता था। मैंने उसकी हथेली अपने हाथ में ली और सहलाती रही।

मृत्यु का कोई दृश्य फ़िल्म में नहीं था।

उससे अगले दिन मैं पूनम सक्सेना के साथ अपने शहर गई, काला चश्मा लगाकर और स्कार्फ़ ओढ़कर। वह बाहर बैठी रही। मुझे भाई से मिलने के लिए बीस मिनट मिले।

उसके माथे वाली चोट कुछ सूख गई थी, लेकिन छूने पर थोड़ा दर्द होता होगा। वह दुबला हो गया था। उसकी भूरी आँखें अब नीली लगने लगी थीं। मैंने उससे कहा कि वह पहले से ख़ूबसूरत लग रहा है। वह हँस दिया, जैसे चौराहे पर भीख माँग रहे बच्चे हँसते हैं। फिर उसने मुझसे पूछा कि क्या उसे फाँसी होगी? मैंने उसे शबाना के बारे में बताया, उसकी हथेलियों के बारे में जो इतनी ठंडी रहती हैं कि आप कितना भी उबल रहे हैं, आपको बचा लेंगी। उसने फिर से पूछा कि उसे फाँसी ही होगी क्या? मैंने उसे अपने हॉस्टल के कमरे के बारे में बताया, जिसमें हमने एक कुत्ते की तस्वीर लगा रखी थी जो समुद्रतट पर खड़ा है और शायद समन्दर में कूदने ही वाला है।

उसे मेरी फ़िक्र हुई। उसे लगा कि मैं वहाँ तकलीफ़ में हूँ। और जब उसने यह पूछा तो मुझे उस पर हँसी आई। मैंने उससे पूछा कि परी के बारे में वो क्या सोचता है? वह कुछ देर मुझे देखता रहा। उसकी उंगलियाँ काँपी, फिर उसने अपनी जेब से निकालकर एक छोटी सी किताब मुझे दिखाई, जो वह उन दिनों पढ़ रहा था। उसने कहा कि हम सब बहुत अकेले और छोटे हैं और हममें से किसी की भी उतना पाप करने की औकात नहीं, जितनी हमें लगती है। न ही उतना भला करने की।

और तब मैंने उससे कहा कि वो सतरह साल की दूध जैसी लड़की तुम्हारी किताब और सनक के बारे में नहीं जानती, और दुनिया तुम्हारे खेलने के लिए नहीं बनाई गई है।

वह अलग था। उन फ़िल्मों की तरह, जिनकी कहानी आपको वैसे समझ नहीं आती कि किसी दूसरे को सुना सकें लेकिन जिनमें आप लगातार रोते हैं। मैं उससे छोटी थी मगर उसे मैंने ही पाला था। मैंने ही उसे सिखाया था कि जीने का कोई तरीका ग़लत नहीं होता और तुम मुझे गाली दो या दुलारो, अच्छे रहो या बुरे, मैं तुम्हें समझूं या नहीं, तुमसे प्यार करूं या नफ़रत, लेकिन तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगी। लेकिन मैंने उसकी किताब ज़मीन पर फेंकी और उठकर चल दी। कुछ कदम बाद ही मैं पलटी। वह बहुत बेचैनी से अपनी किताब को देख रहा था जो शीशे के इस तरफ़ पड़ी थी। यही मज़बूर देखना उसका जेल में होना था। वह अकेला था, जैसे वे लोग होते हैं जिनसे सब मिलकर बदला लेते हैं। उस पल मैं उसकी आँखों को चूमना चाहती थी और उसके माथे की चोट के निशान को, लेकिन मैं लौट आई।

सब उसे मारना चाहते थे। एक अख़बार अपने पहले पन्ने के एसएमएस वाले सवाल में यह पूछ भी चुका था कि उसे फाँसी होनी चाहिए या नहीं? इक्यासी प्रतिशत लोगों ने हाँ कहा था। लेकिन यह सौ प्रतिशत भी होता, तब भी मैं उसे मरने नहीं दे सकती थी। ऐसे मज़बूर, किसी सुबह पाँच बजे का अलार्म लगाकर रात भर पसीने से भीगी जागती हुई, यह इंतज़ार करती हुई कि साढ़े पाँच बजेंगे, जब मेरे कमरे में और पूरे देश में, तो चार लोग मेरे भाई की कोठरी का ताला खोलेंगे और हो सकता है कि उस वक्त वह सो रहा हो, तभी उसकी आँख लगी हो। सोते हुए वह कैसा खरगोश जैसा लगता है! हो सकता है कि उस रात उसे खंजर वाला वह सपना न दिखा हो, उसके सपनों में माँ ने उसकी नाक चूमी हो, उसने सपने में जन्म लिया हो और उसे सर्दी लग रही हो। आप ऐसे कैसे किसी को नींद से जगा सकते हैं और फाइलें हाथ में लिए हुए उसे बता सकते हैं कि बारह मिनट बाद उसे मरना है? आप कैसे उसे घसीटते हुए दुनिया से बाहर ले जा सकते हैं, जब वह चिल्ला रहा हो कि उसे चेहरा धोने दीजिए, फिर उसे पूरा दिन अपनी बहन के साथ लूडो खेलनी है?

बाहर बच्चे उस दिन भी अपनी स्कूल बसों का इंतज़ार कर रहे होंगे और कोई गौरैया अपने घोंसले से ऐसे निकलेगी जैसे नए नए प्यार में लड़कियाँ कॉलेज के लिए निकलती हैं।

अगले महीने मैं गई तो उसने मुझसे मिलने से मना कर दिया। हॉस्टल से हमारे साथ एक लड़का आया था, जिसके भरोसे पूनम सक्सेना मुझे छोड़कर किसी नए लड़के के साथ एक सस्ते होटल में गई थी। मैं तीन-चार घंटे एक कमरे में बैठी रही। कैदियों से मिलने-जुलने वाले बाकी लोग आते-जाते रहे। एक गोविन्द नाम के सिपाही ने मुझसे बात की और बताया कि वह मेरे भाई को जानता है। उसने कहा कि जब उसे पकड़ा गया तो वह हमारे घर के दरवाज़े पर खड़ा रहा था ताकि भीड़ अन्दर न घुस जाए। मैंने उसे ध्यान से देखा। उसकी आँखें अब भी वैसी ही थीं। वह ग़लत काम कर रहा था। उसे कविताएँ लिखनी चाहिए थीं। 

हम शाम को लौट आए। उसके बाद भी भाई कभी मुझसे मिलने के लिए तैयार नहीं हुआ। वह कभी अदालत में नहीं गया। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने उसे फाँसी की सज़ा सुनाई। इसकी एक वज़ह शायद हत्या का तरीका भी थी या लोगों का गुस्सा, जो अचानक फूट पड़ा था और फिर कम नहीं हुआ। अमरजीत के सिर को कई बार पत्थर से कुचला गया था। उसकी हत्या एक दिन पहले हुई होती तो मेरा भाई नाबालिग होता। पूरे मुकदमे में उसे वयस्क ही समझा गया। मुझे गोविन्द ने ही बताया कि उसने फाँसी के खिलाफ़ अपील करने से मना कर दिया है। मैंने मम्मी पापा को कई बार फ़ोन किया लेकिन मेरी आवाज़ सुनते ही वे फ़ोन काट देते थे। एक बार हॉस्टल के फ़ोन पर मेरे एक चाचा का फ़ोन आया और उन्होंने मुझे खूब बुरा-भला कहा।  

All about my mother
इस बीच कई बार हुआ कि पूनम सक्सेना रात के ग्यारह-बारह बजे हमारा दरवाज़ा खटखटाती थी और हमें ले जाती थी। उसके बाद मैंने कभी विरोध नहीं किया। मेरे आने के बाद के पाँच महीनों में ही शबाना का सात किलो वज़न कम हो गया था। हम दोनों स्कूल भी कम जाते थे और कभी किसी टीचर ने इसके लिए हमें कुछ कहा भी नहीं। इसी बीच निधि सलूजा ने इंटर स्कूल डिबेट चैंपियनशिप जीती और हॉस्टल के गेट से उसके कमरे तक लड़कियाँ उसे कंधों पर उठाकर लाईं। उस रात उसने हॉस्टल की कैंटीन में सबको पार्टी दी। मैं और शबाना हमारे कमरे के बाहर बालकनी में खड़े होकर उन्हें नाचते-चिल्लाते देखते रहे। उन्होंने अंताक्षरी भी खेली। शबाना ने अचानक कहा कि यह कितना अच्छा स्कूल है, मुझसे कोई फ़ीस भी नहीं माँगता। और वह हँसने लगी। और उसे कोई पुराना चुटकुला याद आया, जो उसने मुझे भी सुनाया। चुटकुले से ज़्यादा उसे सालों पुराना वह सीन याद था जब उसका भाई उनकी रसोई की स्लैब पर बैठकर उसे वह चुटकुला सुना रहा था।

हम फिर उन एक सौ दस लड़कियों को देखते रहे जो कुछ सेकंड के सन्नाटे के बाद पागलों की तरह हँसने लगी थी। किसी ने फुसफुसाकर कोई चुटकुला सुनाया था जो ज़रूर उन्हें किसी लड़के के शरीर का कोई छिपा हुआ हिस्सा दिखा रहा होगा। हमें उन पर तरस आया कि कैसे वे रंगीन पन्नों और सस्ते कागज़ वाली पत्रिकाएँ अपनी ब्रा में छिपाकर बाथरूम में ले जाती हैं, कैसे दूसरी लड़कियों से एक एक डीटेल सुनना चाहती हैं जब उनके किसी रिश्तेदार लड़के ने उन्हें छुआ होगा, कैसे अपने पिताओं के कन्धों से लटककर झूमती हुई कहती हैं कि वहीं शादी करेंगी जहाँ वे कहेंगे और कैसे अंग्रेज़ी बोलना सीख रही हैं ताकि कुछ सालों बाद किसी शहर के बड़े से घर में अपने इंजीनियर पति से पैदा हुए बच्चों का होमवर्क ठीक से करवा सकें।           

शबाना ने अपने वॉकमैन पर एक धुन मुझे सुनाई- ईयरफ़ोन का एक सिरा उसके कान में था और एक मेरे। वह धुन उसने ख़ुद बनाई थी जब वह गिटार बजाया करती थी। हमने जंगल और गिलहरियों के बारे में सोचा।

तभी किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। सवा ग्यारह बजे थे।

अगली दोपहर जब मैं स्कूल से लौटी तो हॉस्टल के चौकीदार ने कहा कि मेरे भाई का फ़ोन आया था। मुझे लगा कि उसे ग़लतफ़हमी हुई होगी। लेकिन वह यही कहता रहा। उसने कोई नम्बर भी नहीं छोड़ा था। मैंने चौकीदार की बहुत मिन्नतें कीं तो उसने मुझे जेल का नम्बर कहीं से पता करके दिया। मैंने उससे उस नम्बर पर फ़ोन करवाया। उन्होंने कहा कि वे इस तरह किसी कैदी से बात नहीं करवाते। मैंने उन्हें गोविन्द से बात करवाने को कहा। गोविन्द ने मुझे कुछ नहीं बताया। बस यही कहा कि आज ही यहाँ आ जाओ, किसी भी तरह। मैंने कहा कि वह भाई से कहे कि फिर से फ़ोन करे। उसने कहा कि वह कोशिश करेगा लेकिन अब मुश्किल है। मुझे लगा कि वे अब उसे मारने ही वाले हैं।

पूनम उस दिन बाहर थी और उसके बिना मेरा जा पाना बहुत मुश्किल था। मैंने चौकीदार से कहा कि स्कूल के मालिक से मेरी बात करवा दो, तो उसने साफ़ मना कर दिया।

इसके बाद भी हॉस्टल में रोज़ जैसी ही रौनक थी। लड़कियाँ एक दूसरे से प्रैक्टिकल की नोटबुक लेती हुई घूम रही थीं और फ़िक्र कर रही थीं कि उन्होंने तीन हफ़्ते से थ्रेडिंग नहीं करवाईं। शबाना ने मुझसे कहा कि आज रात हम वहाँ से निकल जाएँगे।    

और जैसा कि बलजीत ने सिद्ध किया था कि यथार्थ कई होते हैं, सिर्फ़ एक नहीं। और फिर यह नहीं हुआ कि उस रात साढ़े बारह बजे दीवार फाँदकर बाहर जाने की कोशिश में पहले चढ़ी शबाना नीचे गिर पड़ी हो और उसका घुटना टूट गया हो। यह नहीं हुआ कि उसे छोड़कर मैं चौकीदार के पास गई और बाहर जाने के लिए मैं वह सब कुछ करने को तैयार थी जो वह मुझसे चाहता था। यह नहीं हुआ कि मैंने वह सब किया भी और आखिर में अपनी पैंट पहनते हुए उसने कहा कि वह मेरे लिए कुछ नहीं कर सकता। यह तो बिल्कुल नहीं हुआ कि हमें 21 नम्बर कमरे में लाकर बन्द कर दिया गया, जबकि शबाना दर्द से कराहती रही और मैं सुन्न हुई सुबह के साढ़े पाँच बजने का इंतज़ार करती रही।
 
वह दुनिया की अंतिम रात थी लेकिन बाहर बच्चों ने सुबह अपनी स्कूल बसों का इंतज़ार किया और कोई गौरैया अपने घोंसले से ऐसे निकली जैसे नए नए प्यार में लड़कियाँ कॉलेज के लिए निकलती हैं।

सोते हुए मेरा भाई खरगोश जैसा लगता था। हम दोनों ने कभी लूडो नहीं खेली।