ये कुएँ में कूद जाने या कविता पढ़ने के दिन नहीं हैं माँ

वह मेरे होने की हर ज़गह है
ज़मीन, सपनों, भीड़ भड़क्के और पिस जाने में
और जहाँ मैं नहीं,
वह वहाँ कहीं नहीं है।

वह शोर के बीच मुझे सन्नाटे के रंग में ढूँढ़ती हुई,
वह सब त्रासदियों के बीच से मुझे रबड़ लेकर मिटाती हुई,
वह मेरे हर अपमान पर रखती हुई अपना माथा,
मेरी हर उपलब्धि पर से छिपाती हुई अपनी अपढ़ सादी पहचान,
जो मेरे अन्दर और आसपास है औरत
और खो गई है,
खो रही है
या खो जाने वाली है,
जिससे लगातार नाराज़ हैं हम दोनों
और नहीं मनाते।

यह बहुत बरस पहले की बात है
कि हम साथ में हरे सपने देखते थे
और ख़ुश रहते थे।
वे और दिन थे माँ सुनो,
उन दिनों खील खाकर ख़ुश रहा जा सकता था,
देखे जा सकते थे गुब्बारे और पतंग शाम भर,
तुम मेरा माथा भी फोड़ सकती थी
और फिर छिपा सकती थी मुझे कहीं अन्दर गहरे सुरक्षित।

ये कुएँ में कूद जाने या कविता पढ़ने के दिन नहीं हैं माँ,
बाहर निकलकर देखो काला होता आसमान,
यहाँ जो इस शहर और इससे अगले शहर में जो आग लगी है
और माँ,
पानी प्यार की तरह ख़त्म होता जा रहा है,
अभी बोने हैं उसके बीज।

हम जहाँ जन्म लेते हैं,
अक्सर करते हैं उस ज़गह से नफ़रत।
हमारी प्यारी ख़ूबसूरत चाँद सी माँएं
धीरे धीरे खलनायिकाएँ होती जाती हैं
हमारी धुएँ से भरी लड़ाइयों में।



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12 पाठकों का कहना है :

प्रशांत मलिक said...

उन दिनों खील खाकर ख़ुश रहा जा सकता था
vaah mast likha hai..

सागर said...

वह शोर के बीच मुझे सन्नाटे के रंग में ढूँढ़ती हुई,
वह सब त्रासदियों के बीच से मुझे रबड़ लेकर मिटाती हुई,
वह मेरे हर अपमान पर रखती हुई अपना माथा,
मेरी हर उपलब्धि पर से छिपाती हुई अपनी अपढ़ सादी पहचान,
जो मेरे अन्दर और आसपास है औरत
और खो गई है,

यह बहुत बरस पहले की बात है
कि हम साथ में हरे सपने देखते थे
और ख़ुश रहते थे।
वे और दिन थे माँ सुनो,
उन दिनों खील खाकर ख़ुश रहा जा सकता था,
देखे जा सकते थे गुब्बारे और पतंग शाम भर,
तुम मेरा माथा भी फोड़ सकती थी
और फिर छिपा सकती थी मुझे कहीं अन्दर गहरे सुरक्षित।

लो जी, हमने यह दोनों पैरा ही निकल लिया है... और ले जा रहा हूँ.. विशेष कर "वह सब त्रासदियों के बीच से मुझे रबड़ लेकर मिटाती हुई", और " मेरी हर उपलब्धि पर से छिपाती हुई अपनी अपढ़ सादी पहचान".

फिलहाल तो कोमा में हूँ... होश टूटे तो...

RJ said...

speechless..........just fell in love again!!
good luck 4 the next1..all bestest wishes!!! :)

राहुल पाठक said...

gourav kuch eksarasta si aa rahi hai.......maine tumhari kshadikaye padi hai Hindigum me ..lagbhag sari hi post...tumse achhi ksadika koi nahi likh sakta...isliye thoda change karte hue kuch nai kshdikaye likho....this is just a request....

tumahri kuch kshdikaye jo bahuuuuuuuut hi achi lagi hai..

1.बेशर्म
पिछले बरस
इसी दिन
मैं मर गया था,
बहुत बेशर्म हूँ,
फिर ज़िन्दा हूँ इस साल।

2.अब-3
अब कहाँ होता होगा
बिन छुए प्यार,
कौन होगा बेवकूफ़
कि तेरी आँखें ही देखता रहे

3.पतन
गर्म चाय ने
पैर पर गिरकर
मुझे जला दिया,
मुझे जलाने को
तुम भी तो बहुत गिरे थे!

4.शर्म
डूबता सूरज
शर्म से लाल है,
चलो,
डूबते हुए
किसी को तो शर्म आई।

5.तुझ बिन
एक शहर,
चौंसठ मोहल्ले,
चौबीस हज़ार आठ सौ इकत्तीस घर,
दो लाख दस हज़ार आठ लोग,
तुझ बिन सब मुर्दे,
सब घर शमशान।


bahut kuch save karke rakhe the......mil nahi rahe.....

plz dont mind if m wrong.....

RJ said...

अब-3
अब कहाँ होता होगा
बिन छुए प्यार,
कौन होगा बेवकूफ़
कि तेरी आँखें ही देखता रहे!


ye tumne likha hai..????? itni kam wrds me itni pyari baat maine fst time padhi hain.....n really hav no wrds to say bt ofcourse tears in the eyes!!! :)

neera said...

इस ब्लॉग का सामान सबसे अलग, सचेत, सत्य में लिपटा, आत्मा के दरवाज़े खोलता हुआ ..
क्या देकर लिखते हो ऊपर वाले और मां को ... :-)

अमिताभ श्रीवास्तव said...

kuch nahi likh saktaa..kam se kam is rachnaa ke aage kyoki ye to bas padhhte hi rahnaa chahiye..aour padhh kar iski aagosh me hi rahnaa jyada sukh deta he.

डॉ .अनुराग said...

अजीब बात है कल वागर्थ के किसी पुराने पन्ने में किसी की कविता पढ़कर तुम्हारी याद आई थी .ऐसे ही तेवर .ऐसी ही तल्खी ...

शिरीष कुमार मौर्य said...

एक दिन सागर ने फोन किया तो बातचीत में आपका ज़िक्र भी था गौरव. आज आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा और अफ़सोस हुआ कि ये अब तक मेरी ब्लॉग सूची में क्यूँ नहीं था. कविता बहुत देर तक गूंजने वाली कविता है. इसमें दरअसल जो है वो शुरूआती डीटेलिंग के बाद है और अंत तक पहुँचते पहुँचते चमकने लगता है.

ritu raj said...

kya bolu!!

Alok Shankar said...

मुझे जब भी कभी खुश होना होता है .. सिर्फ अपने लिए , जब एक दम सेल्फिश होना चाहता हूँ , तब तुम्हारा ब्लॉग पढता हूँ |

विश्व दीपक said...

मैं जलता हूँ तुमसे,
लेकिन अफ़सोस कि
चिनगी लम्हे में हीं बुझ जाती है!

शायद
कभी-किसी दिन
ऐसा जलूँ कि
मेरी अना राख हो जाए..
तभी फिर
जगूँगा मैं फिनिक्स-सा,
हाँ
तभी फिर लिख पाऊँगा ऐसी कविताएँ...

-विश्व दीपक