छतों से कूदकर नहीं आती मृत्यु

अपने दुखों की छाया में बैठकर
हम चरखा कातेंगे गांधीजी!
क्या आप देखते हैं?
उन्हें पहनकर खुश होंगे हमारे नंगे बच्चे
और मान लेंगे कि
वे और बच्चों की तरह
भव्यताओं की संतानें हैं,
हमारी असमर्थताओं की नहीं।
वे अंग्रेज़ी पढ़ेंगे और चहकेंगे।
नहीं पढ़ेंगे हमारी कवितायें।
पढ़ लेंगे तो मर नहीं जायेंगे क्या?

वे बच्चे हैं
और उन्हें ख़ुश रहना चाहिए।

छतों से कूदकर नहीं आती मृत्यु।
वह जीवनदायिनी स्त्रियों की आँखों में छिपकर बैठी होती है कहीं।
तुम्हारे हर झूठ से
मेरा एक हिस्सा अपाहिज हो जाता है
तुमसे मोहब्बत
अधरंग से होते हुए
मेरी मौत पर ख़त्म होगी।

कहाँ हो हे ईश्वर?
क्या बीच का कोई रास्ता नहीं खोजा जा सकता
जिस पर हम एक दूसरे के रास्ते ना काटें
और रोटी खाएं, पानी पियें, रो लें और
सो जाएँ ठीक से हर रात।

मैं तुम्हारे गले लगूँ
और मर जाऊँ।



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8 पाठकों का कहना है :

ओम आर्य said...

....................

.....................

अनिल कान्त : said...

अति उत्तम...और कह भी क्या सकते हैं

Apoorv said...

तुम्हारे हर झूठ से
मेरा एक हिस्सा अपाहिज हो जाता है।
तुमसे मोहब्बत
अधरंग से होते हुए
मेरी मौत पर ख़त्म होगी।

माफ़ कीजियेगा गौरव साहब..आपकी कविता मुझे उस सख्त चमड़े के जूते की तरह लगी..जिसे पहनना नही खाना ज्यादा जरूरी है..सभ्यता का सारा खोखला नशा हिरन करने के लिये..
..अद्भुत

महफूज़ अली said...

कहाँ हो हे ईश्वर?
क्या बीच का कोई रास्ता नहीं खोजा जा सकता
जिस पर हम एक दूसरे के रास्ते ना काटें
और रोटी खाएं, पानी पियें, रो लें और
सो जाएँ ठीक से हर रात।

मैं तुम्हारे गले लगूँ
और मर जाऊँ।


bahut hi khoobsoorat abhivyakti ........

is gahri bhaav wali rachna ke liye badhai.....

सागर said...

यह कितनी बेहतरीन कविता है मैं कह नहीं सकता... अगर ओम आर्य ने सिर्फ ..................... छोड़ा है तो कुछ गलत नहीं किया है... जो मिस कर रहा था मिल गया...

सुशीला पुरी said...

इतनी सुन्दर कविता की बधाई ........साथ ही ''तद्भव ''-२० में आपकी कहानी 'ब्लू फिल्म 'की भी बधाई

VINKAL said...

छतों से कूदकर नहीं आती मृत्यु।
वह जीवनदायिनी स्त्रियों की आँखों में छिपकर बैठी होती है कहीं।
तुम्हारे हर झूठ से
मेरा एक हिस्सा अपाहिज हो जाता है।
तुमसे मोहब्बत
अधरंग से होते हुए
मेरी मौत पर ख़त्म होगी।
dil ko chhoota hai har laphj...kya khoon kya gajab likhte ho tum......

manoj tyagi said...

main kabhi kabhi is soch mein pad jata hoon, ki teri kavitayen descriptive hoti hain ya fir mujhe samajh adhik aati hain...ya fir mera tera background ek sa hai....mast likha hai...