दिल डूबता है

पेड़ के पास हो पेड़,
कुत्ते के पास कुत्ता,
शहर के पास शहर
और हे ईश्वर!
आदमी के पास हो कम से कम एक आदमी
जब दुख हो,
रोना आए।

थम जाएँ सडक पर चलने वाले
जैसे बजता हो राष्ट्रगान,
जो ज़्यादा हँसते हों
रुक जाएँ साँस लेने के बहाने,
बिजली कड़के, बारिश हो
तार पर से ख़ुद-ब-ख़ुद उतर आएँ सूखे कपड़े,
हम मोर हों या साइकिल
या इत्मीनान से देख रहे हों रंगीन टीवी
या हाँडी में चढ़े हों दूध बनकर
या सर्दी हों, पहाड़ हों
छत हों, ख़त हों
धूप हों गुनगुनी
जैसे तवे को छू जाए अँगूठा
या मैदे में गुंथे हों,
शर्म से कीचड़ कीचड़ चाहे गटर में गिरे हों
या शीशे हों और बिन्दी-टिक्की,
भले ही गुलमोहर हों या गुल पनाग
या शीशम हों, स्याही हों,
अनाथ हों, बेबस हों,
भीगते हों, छीजते हों,
टूटकर गिर पड़े हों जूठे बर्तनों में,
गलियाए जाएँ, लतियाए जाएँ
और माँगते हों टूक टूक भीख
चाहे कुछ भी हों
पर किया जाए ज़रा रहम ऐ मालिक,
जब रोते हों और बँधी हों हिचकियां
तो अकेले न हों,
चुप करवा जाए कोई आता जाता
या माँ हो
या कोई प्यार करे,
चाहे पैसे ले ले।

दिल डूबता है।
मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं।
सिर धुनता हूं,
माफीनामों पर करता हूं लम्बे दस्तख़त।
प्लीज़ चमकने दो दो-चार इंच सूरज,
दो चार किताबें बख़्श दो
और एक आँख देखने को।



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12 पाठकों का कहना है :

अनिल कान्त : said...

गौरव भाई आपकी इस रचना की जितनी भी तारीफ़ की जाए वो कम है ....बेहतरीन भाव लिए हुए ...

संध्या आर्य said...

जब रोते हों और बँधी हों हिचकियां
तो अकेले न हों,
चुप करवा जाए कोई आता जाता
या माँ हो
या कोई प्यार करे,
चाहे पैसे ले ले।

जब दिल डुबता हो तो वाकई कोई ले ले महले दो महले पर उसे डुबने ना दे ताकि इंसानियत पर बनी रहे भरोसा और इंसानो की बस्ति का सुर्या अस्त ना हो किसी का दर्द देखो तो छ्लक जाये इंसानी रुह....
उस दर्द के वास्ते .....

इंसानियत को जगा देने वाली रचना है ........

बेहतरिन रचनाओ मे से एक.......

शोभा said...

दिल डूबता है।
मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं।
सिर धुनता हूं,
माफीनामों पर करता हूं लम्बे दस्तख़त।
प्लीज़ चमकने दो दो-चार इंच सूरज,
दो चार किताबें बख़्श दो
और एक आँख देखने को।
dil ke bhavon ko kavita ka rup dene ki kala tumko khub aati hai. bahut sundar. badayi.

ajit.irs62 said...

its beautiful Gaurav . keep it up .
best wishes.
-AJIT PAL SINGH DAIA

सुशील कुमार छौक्कर said...

बहुत ही खूबसूरत लिखा है।
पेड़ के पास हो पेड़,
कुत्ते के पास कुत्ता,
शहर के पास शहर
और हे ईश्वर!
आदमी के पास हो कम से कम एक आदमी
जब दुख हो,
रोना आए।

अद्भुत।

ओम आर्य said...

good, as usual

संगीता पुरी said...

हमेशा की तरह ही बहुत सुंदर प्रस्‍तुतिकरण ... बधाई।

anu said...

mazaa aa gaya...

chahe paise le lo..sabse badhiya tha..

anu said...

main hoon anurag trivedi...
naam to suna hi hoga..

विश्व दीपक ’तन्हा’ said...

और एक आँख देखने को।

इस पंक्ति में तुम्हारे दर्द को महसूस कर रहा हूँ। तुम वापस लौटे, इसकी खुशी है।

-विश्व दीपक

vivek said...

bahut badiya gaurav

sudhanshu jain said...

kisi cheej ko dil se chhaho to yahi kuch likhna padega...really gaurav its beautiful expression of feelings or i shud say expression of will frm heart