मेरा 'about me' भी चुरा लिया गया

यूं तो मैं इस तरह की बातों पर कभी पोस्ट नहीं लिखता, लेकिन अभिव्यक्ति की चोरी भी मुझसे बर्दाश्त नहीं होती। मेरी कविताओं को ऑर्कुट पे बहुत से लोगों ने अपने प्रोफ़ाइल में बहुत अधिकार के साथ अपनी कहकर टाँक लिया तो मैंने ध्यान नहीं दिया, न ही कुछ कहा। वही ईसा मसीह वाली बात याद आती रही कि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं, इसलिए इन्हें माफ़ कर दो। लेकिन कोई कब तक माफ़ करे?
मैं समझता था कि ब्लॉग विशेषकर हिन्दी ब्लॉग वही लिखते हैं, जिन्हें किसी भी तरह से अपने को अभिव्यक्त करने का माध्यम चाहिए होता है। मगर अभी गिरिराज जोशी जी ने बताया कि तुम्हारा जो पहले orkut पर about me था, वो किसी सज्जन(जिन्होंने अब अपनी भूल स्वीकार कर उसे हटा लिया है, इसलिए उनका नाम भी यहाँ से हटा दिया गया है) ने अपने ब्लॉग पर सबसे नीचे 'मेरे बारे में' कहकर बहुत शान से लगा रखा है। वैसे मैंने उन्हें भी लिख दिया है, मगर मैं अब तक आहत हूं कि क्या चुराकर अपने नाम से लिखते समय ज़रा भी शर्म अपने आप से नहीं आती?
हुज़ूर, आप अपनी 'छोटी सी दुनिया' में लड़की बनाना, प्रेगनेंट करना जैसी हिट्स बढ़ाने वाली चाहे कितनी भी पोस्ट लिखें और जिस तरह का नाम आप चाहते हैं, कमाएँ । मगर अपने बारे में तो अपने आप लिखें। मैं आशा करता हूं कि इस पोस्ट के बाद पश्चातापस्वरूप या फिर बात फैलने के परिणामस्वरूप वे अपना about me खुद लिखेंगे।
सोच रहा था कि कुछ अच्छा लिखूंगा, लेकिन ये फालतू की बात बीच में आ गई। अच्छा फिर कभी....



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22 पाठकों का कहना है :

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

काफ़ी गंभीर बात है..

apurn said...

sahi kaha
main bhi apne purane shayari ke blog me shayari pe apna nazariye likha tha
main aise he ek copyright wali websites pe apni wesite ka link dala tab pata chala ki ek mahashay ne vo bhi chori kar liya
sath me kuchh shayari
meri kavita kai wesites ke forum me aur blog pe bina mere naam ki mil jati hai.......
par fir wahi baat ki india me copyright ka matlab right to copy hota hai :-)

रवीन्द्र प्रभात said...

सचमुच गंभीर बात !

अल्पना वर्मा said...

यह बहुत ही गंभीर बात है गौरव और मैं अपना एक अनुभव बताती हूँ-
एक बार [६ महीने पहले]मेरी ही एक रचना [दिल कीबात-एक ग़ज़ल] मुझे ही किसी अनजान महाशय ने ओरकुट में स्क्रेप कर दी-और जब मैंने उन के प्रोफाइल पर देखा तो देखा उन्होंने कोई[संजीव शर्मा थे] अपने प्रोफाइल में बड़े शान से पूरी ग़ज़ल और उनके दोस्त ने आगे वोही जाने किस किस को स्क्रेप कर रखी थी-बहुत बुरा लगा था.

जब मैंने उन से copyrights का हवाला दे कर उन पर मुकदमा करने की बात की बात की तो मुझे कहते हैं कि--मैं फलां फलां हरियाणा प्रकाशन house का संपादक हूँ और मेरे जैसे लेखक/कवि अपनी रचना प्रकाशित कराने के लिए उनके आस पास चक्कर काटते हैं.-''
लेकिन शायद बन्दा डर गया और दो दिन बाद उस का प्रोफाइल ही दिखायी नहीं दिया [जानती हूँ क्योंकि मैंने ओरकुट को शिकायत लिखने के लिए पूरा लिंक कॉपी कर के सेव किया था.]
इसलिए समझ सकती हूँ कि तुम को कितना दुःख और गुस्सा आया होगा.जब तुम्हारा परिचय ही किसी ने चुरा लिया.

lovely kumari said...

bahut galat bat hai PD jee se aisi ummid nhi thi.aap apni pahchan jarur wapas lijiye.

Sarvesh said...

किटर पीटर वाली बात क्या? पढ़ने में मजेदार लगा होगा डाल दिया. लेकिन क्या वो आपका वास्तविक अबाउट में था? बोल दीजिये वो खटर पटर बना दे. अब देखिये सब सोफ्टवेयर वाले एक ही तरह का काम करते हैं. उस हिसाब से आपका और उसका अबाउट में एक ही हो सकता है.वैसे पहली बार मैं उसके ब्लोग पर पढ़ था तो बड़ा इन्तेरेस्तिंग लगा था.

PD said...

अजी कुपित क्यों होते हैं.. मुझे पता होता की आपका है तो आपके नाम के साथ लगा देता..
वैसे मैं क्षमाप्रार्थी हूं अगर इससे आपको ठेस पहूंची हो तो..
चलिये इसके पीछे का भी एक तत्य आपको बताता चलूं.. बात उस समय की है जब मैं कुछ भी नहीं लिखता था और आपके वे शब्द मेरे पास किसी ई-मेल के जरीये पहूंचा ता.. शायद वर्ष 2006 की बात है.. मैंने इसे बस नेट का बहता पानी समझ कर प्रयोग में ले लिया था.. अगर पता होता की ये आपका है तो भी मैं आपसे इजाजत लेकर आपसे मांग ही लेता(इतना अच्छा जो है :)) और मुझे पता है की आप इंकार नहीं करते क्योंकि मैं हमेशा आपका ब्लौग पढता हूं और आपके विचारों से काफी प्रभावित हूं.. वैसे आपसे एक बात भी कहनी है, आप ये सीधे मुझसे भी कह सकते थे, पहले आपको मेरा विचार तो जान ही लेना चाहिये था.. खैर अब आप जैसा कहें वही सही.. तो क्या हुकूम देते हैं?? :)

PD said...

वैसे एक बात और.. आपका कोई मेल या कमेंट मुझे अभी तक नहीं मिला है..

गौरव सोलंकी said...

सर्वेश भाई, पहली बात तो ये कि 'परिचय' सॉफ़्टवेयर नहीं है और न ही सोफ्टवेयर से बना है।
प्रशांत जी, मैंने पहले आप से भी कह दिया था और हर बार की तरह मैं वहीं रुक जाता, लेकिन मैं यह बात आपसे ही नहीं, सबसे इसलिए कहना चाहता था कि नेट पर बहते पानी में हाथ धो लेना बुरा नहीं है, लेकिन ये तो आप तब भी जानते थे कि ये आपका नहीं है तो उसे बहता पानी मानकर या तो आगे जाने देते या रोक देते।
यह कहाँ का नियम हुआ कि उस पानी का स्रोत खुद को बताकर अपना नाम लिख दिया?
आप मेरा लिखा पसन्द करते हैं, यह मेरे लिए हर्षदायक बात है, लेकिन यह बात भी उतनी ही कष्टदायक है कि आप लिखते हैं, फिर भी किसी और का परिचय अपना परिचय बना लेते हैं {चाहे वह कितना भी अच्छा लगा हो)
हुक्म देने वाला मैं कौन होता हूं! हाँ, अनुरोध है कि अब से ऐसा करें तो जिसका सामान हो, उसका credit लिख दें और यदि पता न हो तो अपने खाते में लिखें ही नहीं। अभी आप उसे वहाँ से हटा देंगे तो कुछ बेहतर लगेगा।

PD said...

चलिये आपका कहा सर आंखों पर.. मैं उसे वहां से हटा लेता हूं.. वैसे मैंने वहां ना तो अपना नाम ही लिखा है और ना ही ऐसा कुछ जिससे ये लगे की वो मेरा लिखा हुआ है..

अगर आप भी मेरा एक अनुरोध माने तो बड़ी कृपा होगी.. आप ये पोस्ट हटा लें.. वैसे ये आपके ऊपर है, मैं बस एक अनुरोध कर रहा हूं.. :)

PD said...

लीजीये जी हटा दिया..

गौरव सोलंकी said...

क्या इसके अलावा कुछ और लिखने की आवश्यकता थी कि उसे आपने 'अपने बारे में' कॉलम में लिखा?
वैसे अब आपने उसे हटा दिया है तो शुक्रिया कहूंगा।
यह पोस्ट आपको बदनाम करने के लिए नहीं है, इसीलिए मैंने शीर्षक में आपका नाम कहीं नहीं लिखा। यह पोस्ट आपके उस कृत्य की निंदा के लिए है, जो गलत था, चाहे अनजाने में ही। इसे delete करना भी ब्लॉग परम्परा का अपमान होगा।
अब आपकी ईमानदारी पर मुझे कोई शक नहीं। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। आशा करता हूं कि उधर भी बुरी भावनाएं नहीं होंगी। :)

PD said...

वैसे मुझे अभी भी समझ में नहीं आ रहा है की आपने मुझे कब कहा था?? आप बार बार मुझे ये कह रहे हैं की आपने मुझसे संपर्क किया और अभी पिछला वाला कमेंट भी पढा, जिसमें आपने कहा की आपने मुझसे पहले भी कह दिया ता.. बस थोड़ी जिज्ञासा हो रही है कि आपने मुझे कब कहा?? मुझे अपने किसी भी ई-मेल पते पर आपकी चिट्ठी नहीं मिली है..

वैसे मेरी तरफ़ से कोई गिला नहीं है.. मैंने अपने जीवन मे इतना सिखा ही है कि अगर कोई गलती करते हो तो उसे स्वीकार करने का साहस भी होना चाहीये..

चलिये आपको मैं अपनी परंपरा तोड़ने के लिये नहीं कहूंगा.. मगर इतना तो कर ही सकते हैं की वहां से मेरा नाम और मेरे चिट्ठे का लिंक हटा दें.. :)
एक भाई का यह आग्रह तो स्वीकार कर ही लें..

गौरव सोलंकी said...

आपने जो अपने ब्लॉग पर बातचीत का बक्सा लगा रखा है, उसमे मैसेज छोड़ा था। पता नहीं मिला कि नहीं...
ठीक है, मैं आपका नाम हटा देता हूं। आपने गलती स्वीकारी, अच्छा लगा।

PD said...

आपका बहुत बहुत धन्यवाद..
वैसे क्या आप मुझे अपना ई-पता देंगे? आप मुझे बहुत ही दिलचस्प व्यक्ति लगे हैं.. शायद हम अच्छे मित्र बन जायें?? :)
वैसे एक बात कहूं? मैं आपकी आई आई टी के अगले पार्ट का बहुत दिनों तक इंतजार किया था.. :)

PD said...

हां जी आपका मैसेज मैंने अभी देखा.. सभी जगह ढूंढ लिया मगर वहीं नजर नहीं पड़ी थी.. :)

nav pravah said...

गौरव भाई, जो कुछ भी हुआ वो सही तो नहीं ही कहा जा सकता,खैर,अब जबकि पी डी साहब ने स्विक्रोक्ती कर ली है और वो शर्मसार हैं तो बेहतर होगा की मामले का पटाक्षेप कर दिया जाए.पर आपने विरोध प्रकट करने का जो कम किया ये बहुत जरुरी और वाजिब था क्योंकि इस तरह किसी की रचना के साथ खिलवाड़ निहायत ही गंभीर बात है.कम से कम लोगों को सबक तो जरुर मिलेगी.
ये अच्छी बात है की किसी को मेरी रचना जांचे पर उसका क्रेडिट मुझे ही मिलना चाहिए.
दुआओं सहित
आलोक सिंह "साहिल"

DR.ANURAG ARYA said...

हैरानी हुई जानकर ..........

दिवाकर मणि said...

ये तो वाकई अजीब बात है. यह बीमारी केवल ब्लॉगजगत ही नहीं अपितु हर क्षेत्र में गंभीर रूप से विद्यमान है. एक महोदय जो हमारे विश्वविद्यालय में फारसी भाषा के प्रोफ़ेसर थे, उनका पी.एच.डी. का शोध-प्रबन्ध तो ईरान के किसी विद्वान की पुस्तक से पन्ना-दर-पन्ना (बिना संदर्भ दिए)मारा गया था. दुःख तो यह भी है कि जब तक यह बात खुलकर सामने नहीं आती वैसे लोग नैतिकता का नगाड़ा भी खुब बजाते फिरते हैं.

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