महीने के आखिरी दिनों में

कभी कभी
महीने के आखिरी दिन
ऐसे लगने लगते हैं
जैसे ज़िन्दगी के आखिरी हों।
इधर उधर
अपशकुन से होते हैं,
दुर्घटनाएं अपना होना
जताने लगती हैं।
पुरानी यादें
लपेट लेती हैं अपने ऊपर
नए कवर,
पहले सपने
फिर नींद के घंटे
घटने लगते हैं बेवज़ह।
कोई कुछ माँगता है
और देना चाहो
तो भी
सामान ख़त्म हुआ मिलता है,
कोई नाराज़ होता है
तो जी नहीं करता
मनाने का भी।
प्रतीक्षाएँ मिटने लगती हैं,
उन दिनों
उदासी भी नहीं रहती
आम ज़िन्दगी वाली।
मन करता है
कि किसी सुनसान से शहर के
इकलौते पेड़ के नीचे
दिन भर लेटे रहो।
किताबें, फ़िल्में
नहीं सुहाती उन दिनों।
अपनी ही आदतें
और शौक
अजनबी से लगने लगते हैं।
मन करता है
कि सामने वाले पीपल के
पोस्ट बॉक्स में
एक खत लिखकर छोड़ जाएँ,
नहीं मालूम
कि किसके नाम!
नहीं पता
कि क्या लिखें!
लेकिन कभी कभी
मार्च के आखिरी दिनों में
सचमुच लगता है
जैसे सब कुछ
ख़त्म होने वाला है अचानक,
ज़िन्दगी जैसा।

तुम्हें नहीं लगता?



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2 पाठकों का कहना है :

tanha kavi said...

इतनी निराशा!

skumar parouha said...

वैसे तो निराशावाद हावी रहा है| पर बुद्धिवाद की बेचारगी भी एक अवांछनीय सत्य है|