जुनून-2

जो पढ़ने वाले जुनून-1 नहीं पढ़ पाए थे, वे उसे यहाँ पढ़ सकते हैं। यह दूसरा जुनून सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि बाद में लिखा गया...बाकी यह जुनून कहीं से भी कम नहीं है...

सवाल नहीं सुनता,
थामे नहीं थमता,
बहुत बेअदब हूं,
ऐसे बढ़ता हूं
कि उम्र बन जाता हूं,
बाँधे नहीं बँधता,
आकाश की छाती पर पाँव धरकर
ऐसे उड़ता हूं
कि अब्र बन जाता हूं,
एक घूंट में पीकर सारी ज़िन्दगी
गंवारों की तरह पोंछता हूं
जोश से सना चेहरा,
ऐसी प्यास हूं
कि सूखा हलक बन जाता हूं,
इतना करीब हूं
कि छूने में नहीं आता,
इतना विशाल हूं
कि फैलकर फलक बन जाता हूं,
खर्च होता हूं
और ख़त्म नहीं होता,
इतना अनंत हूं
कि प्रीत बन जाता हूं,
पाट दी हैं मैंने
हथेलियों की सब रेखाएँ,
इतना विश्वस्त हूं
कि जीत बन जाता हूं,
रात भर जागकर
उनींदे ख़्वाबों को खिलाता हूं
पींग भरती दावतें,
ऐसा रईस हूं
कि शौक बन जाता हूं,
सब पूर्वानुमान झुठलाकर
फाड़ फेंकता हूं इतिहास,
ऐसे चूसता हूं नियति का लहू
कि जोंक बन जाता हूं,
गोद ले लिया है मुझे
जुनून ने,
जुनून ही माँ है,
जुनून ही पिता,
मैं जागता हूं,
भागता हूं,
झूमता हूं,
नाचता हूं
और गिरता हूं ठोकरें खाकर
फिर बार बार
माँ की गोद में -
जुनून की गोद में...



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9 पाठकों का कहना है :

समय चक्र said...

बहुत बढ़िया गौरव जी कभी जुनून पार्ट 3 भी लिख दीगिएगा

Reetesh Gupta said...

अच्छा लगा पढ़कर ...बधाई

Anonymous said...

junoon ka exp har kisi ko nahi hota ..junoon mey jakar banda kaif kuch pa bhi leyta hai nd khota bhi hai...bt who cares kia khone wala hai woh ..junoon jub pura hota hai ooske baad oosi bande ka naya roop aata hai samne...jo kisi ney socha nahi hota ...kudh oosne bhi..junoon life hai ..junoon power hai ..junoon God hai coz God= power.....i ll say jin logo ney junoon ko kabhi nahi feel kia they r like ..Nice try Gaurav:) .......

kamal said...

इतना विशाल हूं
कि फैलकर फलक बन जाता हूं,

यकीनन जनून ही है जो हमे समय की परख करना सीखता है ....
सपनो को सच करना है तो आप के सर जनून का भूत आ जाना ही होगा .

Anonymous said...

very nice poem...

Avanish Gautam said...

काश ऐसा जुनून सब में हो.

Anonymous said...

shaandar bahot shaandar..junoon ki hawa baha do. ye junoon sab men phaila do

Anonymous said...

gaurav tumhari virasat bhi padhi .. kamaal hai ..hila dene wali kavita likhi hai..tumhari kavita padhkar ..tughlaq ki wo panktiyan yaad aa gayi.. umangon ghari umra hai..saare aalam ko fatah karne ki umra....

विश्व दीपक said...

शब्दों से एक समां-सा बांध देते हो,
दिल का हरेक कुहासा छांट देते हो,
ऎसा लिखते हो कि लेखन भूल जाता हूँ,
तुमसा हीं लिखूँ,यह ख्वाब टांक देते हो।

बहुत अच्छा लिखे हो दोस्त।
जुनून पार्ट ३ का इंतज़ार रहेगा।

-तन्हा।