बहुत सर्दी लगती थी तो भी कुछ ओढ़ने का मन नहीं होता था। मन शराबी सा था और मुझे शराब पीना नहीं आता था। सुबह सुबह सूरज उंगली छुड़ाकर छिपने के लिए भागता था और फिर न जाने क्यों, मोड़ से लौट आता था। वह एक सुन्दर लड़की थी जिससे प्रेम करते हुए ठीक ठीक पता भी नहीं लग पाता था कि प्रेम उससे है या उसकी सुन्दरता से? फिर भी रोना आता था। सुन्दर होना अभिशप्त वरदान था। वैसे उसके होठों के ऊपर हल्का हल्का रोयाँ था, जो मुझे लगता था कि नहीं होना चाहिए। वह उबासी लेती थी तो उसका शरीर लय में नहीं रहता था। वह स्लीवलेस नहीं पहनती थी। मैं उसकी बगलें देखना चाहता था। वह बहुत हँसती थी, इसलिए मुझे ऐसा लगता था कि उसकी आत्मा हमेशा उसके हॉस्टल में छूट जाती होगी। मुझे अपने परफ़ेक्शनिस्ट होने की बदगुमानी से बेहद चिढ़ थी।
हम दोनों के बीच में मेरा आत्मसम्मान था जो चिथड़े चिथड़े कर दिया गया था। और मैंने तय किया कि सुन्दर लड़कियों से प्यार नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा तय करते हुए गूगल पर खोजकर देखे गए कैटरीना कैफ़ और प्रियंका चोपड़ा के दर्जनों चित्र भी मेरे दिमाग में घूमते रहे।
स्त्री मेरे मन में शरीर होती जाती थी। मैं घंटों फ़ोन लेकर बैठा रहता था और एक ही बात सोचता था...किसे फ़ोन करूं कि कुछ आराम आए? ए से शुरु करके एक एक नम्बर और नाम देखता हुआ बार बार ज़ैड तक पहुँच जाता था। मेरे मोबाइल में दो सौ छियानवे नम्बर थे और एक भी ऐसा नहीं था जिससे बात करके उस बेचैनी के चले जाने की उम्मीद हो। क्या मैं किसी और दुनिया में किसी और का फ़ोन लेकर बैठा रहता था? क्या किसी भी दुनिया को अपने किसी अवांछित व्यक्ति से भी इतना दूर हो जाने का, इतना क्रूर हो जाने का हक़ था?
यह बहुत भयावह था कि आप दिन भर रोएँ और शाम को सड़क पर टहलने निकलें तो कोई भी न पूछे कि क्या हुआ? कुत्ता भी नहीं। कूड़ादान भी नहीं।
यह इस बात को चार बार लिखे जाने जितना त्रासद था।
यह याद आता था कि शायद किसी ने कभी कहा तो था कि परेशानी हो या न भी हो, किसी भी वक़्त मुझे फ़ोन कर लेना। लेकिन किसने कहा था, यह याद नहीं आता था। मैं दीवारों पर सिर पटकता था। रात रोज़ हो जाती थी। मेरा एकांत मुझे महानता का अहसास करवाता था। मेरा एकांत मुझे मारे जाता था। लोग अलार्म भरते थे और सो जाते थे।
मैं एक सैकेंड हैंड बंदूक खरीदना चाहता था और ठीक ठीक दाम में चार छ: गोलियां। मैं उसकी आँखों के बिल्कुल ऊपर, माथे के बीच में बनते गोल गोल भँवर में गोली मारना चाहता था। मैं उससे इतना प्यार करता था कि उसे अपने सामने मरते हुए देखे बिना जी नहीं सकता था। प्रेम मुझे हिंसक बनाता था।
कुत्ते भौंकते थे। ‘ओए लकी लकी ओए’ में एक गाना बजता था...
जुगनी चढ़दी एसी कार
जुगनी रहंदी शीशे पार
जुगनी मोहमोहणी नार
ओदी कोठी सैक्टर चार।
जुगनी हँसदी वे हँसदी...
...और जुगनी ठठाकर हँसती थी। हॉल में ठहाके गूँजते थे और मुझे लगता था कि पूरा देश रोता है।
| [+/-] |
हँसती हुई जुगनी |
| [+/-] |
तुम्हारा प्रायश्चित |
छत पर धूप को सेकना
तुम्हें झुठलाने जैसा है,
तुम्हें सच मानना है आत्महत्या जैसा।
तुम्हारा आँखें बन्द कर लेना
डूब जाने जैसा नहीं,
रात जैसा है,
तुम्हारा देर तक अलविदा के पत्थर पर खड़े रहना
तुम जैसा नहीं,
सड़क या दुकान या शहर जैसा है।
जिस तरह फूटते हैं गुब्बारे,
शाम होती है,
पेड़ देते हैं फल,
किताबें खो जाती हैं,
रेडियो बजता है,
दरवाजों पर ताले लगे होते हैं,
फ़ोन मिलते हैं स्विच्ड ऑफ़,
साँस नहीं आती,
सोमवार आते हैं,
इसी तरह किसी दिन
घर से निकलकर चलता चला जाऊँगा मैं
और कभी नहीं लौटूंगा।
मेरा इंतज़ार किया जाए।
यह तुम्हारा प्रायश्चित हो।
| [+/-] |
तीसरा समय जान ले लेगा हमारी |
तुम्हारी आत्मा में छेद हो गए हैं
और तुम बोलती हो तो
तुम्हारा बोलना डूब जाता है
(और यह प्रशंसा नहीं है)।
तुम्हारी आँखों में तमंचे हैं
जैसे तुम्हें झुटपुटे में लूटना है किसी को
आम के घने पेड़ों वाली सड़क पर।
तुम लूटती हो तो
कोई हल्का सा गीत गुनगुनाने का मन करता है।
हल्के गीतों ने बचाकर रखा है
बार बार किया जा सकने वाला प्रेम
और गुनगुनाना।
आओ कम्बल ओढ़कर
कम-ज़-कम एक तस्वीर ही खिंचवा लें
कि अपनी (माने अपनी अपनी) संतानों को गर्व से बता पाएँ हम
अपने अँधेरों को साझा करना,
एक खराब कविता लिखना
और रात के खाने का बंक मारकर
प्यार करना।
तुम नहीं हो तो
मेरे कलेजे में है एक डर
एक फ़ुटपाथी शौर्य
और एक सुस्ताती उदासीनता।
मैं बुरा नहीं हूं,
लेकिन मेरी भूख में मेरा पूरा संसार है
जिसे गोरी लड़कियों और मैकडोनाल्डीय बर्गरों ने बरगला दिया है।
डर को टॉफ़ी देकर बहकाया नहीं जा सकता,
डर चाहता है चाँद के चाँदी बन जाने की सुरक्षा,
डर निराकार है,
डर शाश्वत है,
डर ही है ईश्वर,
आसमान में है लम्बी आग,
तुम खो गई हो,
प्रेम के बिना जीना होता जा रहा है आसान,
उम्मीद पर टिकी है दुनिया
और यह दुनिया का सबसे ज़्यादा नाउम्मीदी भरा ख़याल है।
प्रेम के बिना जीना होता जा रहा है आसान!
कैसे भला?
सब बातें राज़ की हैं
इसलिए सब राज़दार ख़त्म किए जा चुके हैं।
धुंध में तसले में बैठकर नहाता है सूरज,
तुम्हें भीगे बालों में
देर तक छूटती रहती है कँपकँपी।
एक बात है
जिसे पूरी करने के लिए
फ़ोन काट देना बहुत ज़रूरी है,
एक बात है
जिसमें बसती है दुनिया की सारी ऑक्सीज़न।
सुनो,
यह आदमकद शीशों,
ऊबे हुए लोगों,
आलू के परांठों,
तिलिस्मी दरवाज़ों
और टीवी की दुनिया है।
यह एक दूसरा ही समय है
जब हमारी माँएं
हमारी प्रेमिकाओं की तरह हमें भूल गई हैं।
तीसरा समय जान ले लेगा हमारी।
| [+/-] |
सात नीम चौदह झूले |
- तुम्हारे हिस्से कुछ भी नहीं आया...न पहली रात न आखिरी।
- और ये जो इतने सारे दिन सिर्फ़ मेरे हिस्से आए?
- एक पहाड़ पर एक महल था, उसमें एक...
- मुझे कहानी नहीं सुननी। कहानियाँ ख़त्म होने पर ऐसा लगता है जैसे किसी ने ठग लिया हो मुझे।
- क्या तुम्हें भी लगता है कि आसमान में घूमती हुई चील बहुत उदास होती होगी?
- मेरा सब उदास चीजों से बहुत सारा प्यार करने का मन करता है।
- मुझे ऐसी बेवकूफियाँ पसन्द नहीं...
- कैसी? उदासी जैसी या प्यार जैसी? या चील होने जैसी?
- उदास होकर प्यार करना तो प्यार करके भी उदास रहना है ना?
- नहीं, दोनों अलग अलग हैं।
- फिर तुम साथ साथ क्यों करते हो?
- नहीं, मुझे प्यार नहीं होता, बस उदासी होती है और बहुत सारी फ़िक्र होती है। स्टेशन पर भीख माँगते लोगों की फ़िक्र होती है, एड्स से मर रहे लोगों की भी, दंगों में मर रहे लोगों की, मार रहे लोगों की भी, मुझे डेढ़ हज़ार रुपए में आठ घंटे पढ़ाने वाले प्राइवेट स्कूलों के मास्टरों की फ़िक्र होती है, उनके आत्मसम्मान की, उनके बच्चों की फ़िक्र होती है, मुझे बेचारे अब्दुल कलाम की फ़िक्र होती है, कभी कभी विश्वनाथन आनन्द की भी...मुझे न जाने क्यों लगता है कि वह अकेले में अक्सर रोता होगा, मुझे मनोज बाजपेयी की फ़िक्र होती है, उसकी पत्नी नेहा की भी, नेहा के रूठे हुए पुराने मुस्लिम नाम की भी, मुझे कुदालों, कुल्हाड़ियों, कुम्हारों, कठफोड़वों और किताबों की भी बहुत फ़िक्र होती है, कुम्हारों की सबसे ज़्यादा। मैंने बरसों से चाक नहीं देखा...या शायद कभी देखा ही नहीं मगर मुझे फ़िक्र होती है, इतनी कि साँस नहीं ले पाता। मुझे ‘गुमशुदा की तलाश’ में दिखाए जाने वाले बच्चों की फ़िक्र होती है, सर्कस में हंटरों से पिटते हाथियों की भी...
- फिर तो तुम्हें मेनका गाँधी की भी फ़िक्र होती होगी?
- नहीं, रत्ती भर भी नहीं।
- ऐसा करते हैं कि एक फ़िक्र की रात निश्चित कर लेते हैं। मैं रात भर तारे गिनूंगी और तुम फ़िक्र करना।
- लेकिन उस रात बादल होंगे और तारे नहीं होंगे।
- तो मैं बादल गिन लूंगी, जैसे तुम मेरे बाल गिनते हो।
- नहीं पगली, वैसे तो तारे गिने जाते हैं।
- छोड़ो।
- जब मैं बच्चा था तो एक स्कूल था, जिसमें रुई की किताबें होती थीं और मोम के बेंच। वहाँ सात नीम के पेड़ थे जिन पर चौदह झूले टँगे थे...
- यानी हर पेड़ पर दो दो?
- नहीं, वहाँ किसी को गणित नहीं आती थी।
- तो ये कैसे मालूम पड़ा कि सात पेड़ थे और चौदह झूले?
- यह बात स्कूल के दरवाजे पर लगे बोर्ड पर लिखी थी। ‘आधुनिक सुविधाओं युक्त सहशिक्षा विद्यालय’ के नीचे।
- क्या ऐसे लिखा था कि चौदह झूलों युक्त सात नीम?
- नहीं, अकेला सात बटे चौदह लिखा था किनारे पर।
- इसके तो हज़ारों अर्थ हो सकते हैं।
- क्या क्या?
- कि उसका पता सात बटे चौदह हो या वह स्कूल उन्नीस सौ चौदह की जुलाई में शुरु हुआ हो या वहाँ सात कक्षाएँ हों और हर एक में चौदह बच्चे हों या चौदह जुलाई पेंटर का जन्मदिन हो या उसकी प्रेमिका का या हो सकता है कि वह इकहत्तर सौ चौदह हो, जो पेंटर का पारिश्रमिक हो और स्कूल वालों ने न चुकाया हो और बाद में किसी दिन पेंटर ने रात को गुस्से में बोर्ड पर वह लिख दिया हो। तुम्हें सही याद है कि वह बटे था, एक नहीं?
- मुझे कभी बटे याद आता है और कभी एक! लेकिन यदि उसने गुस्से में लिखा होता तो उसे पूरा ही लिख देना चाहिए था कि रमेश पेंटर के इकहत्तर सौ चौदह रुपए स्कूल वालों पर बकाया हैं।
- और नीचे साइन कर देने चाहिए थे।
- साइन तो थे..
- सिर्फ़ साइन नहीं। वह तो हर पेंटर करता है, अपने काम पर अपना नाम लिखने के लिए।
- हो सकता है कि उसके पास इतना लिखने लायक रंग ही बचा हो।
- लेकिन पेड़ हों या पैसे, गिने किसने होंगे? हैडमास्टर ने या पेंटर ने?
- पैसे तो थे ही नहीं, वे तो बकाया थे। उन्हें कोई कैसे गिन सकता था?
- फिर यह कैसे पता चला होगा कि स्कूल वाले रमेश को इतने रुपए देंगे?
- अब रमेश कौन आ गया बीच में?
- तुम्हीं ने तो बताया कि पेंटर का नाम रमेश था। तुम सब कुछ भूल जाते हो।
- मुझे याद नहीं कि मैंने उसका नाम भी लिया था। पेंटर सुनते ही तुम्हारे दिमाग में कोई रमेश पेंटर आया होगा और तुम्हें फिर यही याद रहा होगा कि मैंने उसका नाम बताया है।
- चलो छोड़ो यह सब। झूलों से आगे की बात बताओ।
- बारहवें झूले की तख्ती पर मैंने अपना नाम लिख दिया था।
- फिर?
- उस स्कूल की छत पर पहला आसमान था। एक मैडम थी जो दुनिया की पहली मैडम थी। मैं उससे बहुत प्यार करता था, वह मुझे रोज़ मारती थी।
- मुझे नहीं सुनना।
वह रूठ गई थी। मैं उसे मनाने के लिए दाल-बाटी-चूरमा लाया जो उसने पिछले महीने मुझसे मँगवाया था। जो लोग खाने की चीजों से मान जाते हैं, उन्हें मनाना आसान है। बाकी लोगों को तो मनाया ही नहीं जा सकता। बाकी लोगों का रूठ जाना उनके मर जाने जैसा होता है।
खाते खाते ही वह बोली- एक और लड़की थी ना?
- कौनसी?
- जो रोते रोते सो जाती थी। जिसका नाम हर दिन बदल जाता था।
- जिसके घर में एक बिल्ली थी जो बिना बताए कहीं चली गई थी?
- हाँ, वही।
- अब उसकी कोई ख़बर नहीं है। मैं उसे ढाई साल पुराने नाम से ढूंढ़ता हूं, लेकिन उसका नाम तो रोज बदल जाता है।
- जो कभी ऐसा हो कि तुम फ़िल्म देखने जाओ और वह अचानक तुम्हें मिल जाए तो?
- या ट्रेन में मेरे सामने वाली बर्थ पर...
- या न्यूज़ चैनल वाले जब भीड़ इकट्ठी करके कुछ पूछते हैं, उनमें कभी दिख जाए...
- हाँ, और तब मैं पीछे का सारा दृश्य याद कर लूंगा। फिर उस हलवाई की दुकान पर जाकर पूछूंगा कि वह लड़की, जो बार बार बालों में हाथ फिराते हुए बोल रही थी, कहाँ मिलेगी?
- हलवाई कौन?
- मैंने मान लिया था कि टीवी में भीड़ के पीछे एक दुकान दिख रही होगी, बीकानेर मिष्ठान्न भंडार।
- न्यूज़ चैनल वाले मिठाई की दुकान पर क्यूं जाएँगे भला?
- शायद वहाँ आग लग गई हो...
- आग लग गई होगी तो तुम दुकान कैसे ढूंढ़ोगे...और हलवाई भी?
- फिर वह नहीं बता पाएगा क्योंकि वह बूढ़ा होगा। उसका बेटा उसे रोज देखता होगा, शायद उसके पीछे उसके घर तक भी जाता हो। वह बता देगा।
- तुम्हें उसके बेटे पर गुस्सा आएगा?
- हाँ, थोड़ा सा, लेकिन मैं कुछ कहूंगा नहीं।
- मैं जानती थी कि नहीं कहोगे।
- तुम कैसे जानती थी?
- उस दिन मन्दिर के सामने वो काली टी शर्ट वाला लड़का मुझे घूर घूर कर देख रहा था और तुम चुपचाप निकल आए थे।
- तुम्हें देखना कोई अपराध थोड़े ही है। तुम कुतुब मीनार थोड़े ही हो।
- उसे देखना अपराध है?
- हाँ, वहाँ पुलिसवाले रहते हैं जो बताते हैं कि क्या देखना है और क्या नहीं।
- वह बार बार बालों में हाथ फेरती थी?
- कौन?
- जो मिठाई की दुकान के बाहर खो गई थी..
- तुम्हें कैसे पता? तुमने देखा है उसे?
- उसे सबने देखा है और सब भूल गए हैं।
- वह चूड़ीदार पहनती थी, वह गिद्धा करती थी, वह सुबह सुबह ब्रश करने से पहले हँसती थी, उसे नीला रंग पसन्द था, काले धब्बों वाली तितलियाँ और हरे सेब। वह धुंधली नींद सोती थी और सफेद सपने देखती थी। उसने मेरे लिए खीर बनाकर रखी थी, जिसे वह मुझे खिला नहीं पाई।
- और फिर खीर में कीड़े पड़ गए होंगे? सारा दूध बेकार गया। आधा लीटर तो होगा ही?
- उनके घर में भैंस थी।
- फिर उसे धुंधला सोने, सपने देखने और गिद्धा पाने का टाइम कहाँ से मिलता था? जिनके घर में पशु होते हैं, वहाँ गोबर उठाना पड़ता है, दूध दुहना पड़ता है, सिर पर चारा उठाकर लाना पड़ता है। तुम ही सोचो, गोबर उठाते उठाते प्यार करना किसे याद रहता है? और याद भी रहे तो दोनों काम साथ साथ करना असम्भव सा नहीं लगता?
- वह कहती थी कि उसे याद रहता था।
- जरूर झूठ बोलती होगी। उसका जन्मदिन अक्टूबर में तो नहीं आता था?
- आता था नहीं आता है...
- अक्टूबर में जन्मी लड़कियाँ झूठी होती हैं।
- मुझे उसका जन्मदिन पक्का याद नहीं।
- तुम उसे बचाना चाह रहे हो, तुम भी झूठे हो।
- हाँ।
- तभी तुम्हारे हिस्से कुछ भी नहीं आया...न पहली रात न आखिरी...
- और ये जो इतने सारे दिन आए?
| [+/-] |
हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था |
एक आदमी दिखाता था अपना हाथ बार बार
कैमरे के सामने
जिसमें से चूता था टप टप खून,
एक आदमी ने अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर
लिखा था, ‘हमें बचा लो’
कोलगेट के टूथपेस्ट या जिलेट की शेविंग क्रीम से।
खिड़की पर ज़ूम होता था बार बार कैमरा।
जाने कौनसा मॉडल था,
बहुत बढ़िया था रिज़ोल्यूशन।
दनादन गोलियाँ निकलती थीं
चलती हुई जिप्सी में से,
लोग लेट जाते थे लेटी हुई सड़क पर,
हम सब लिहाफ़ों में लेटकर देखते थे टीवी,
बदलते रहते थे चैनल,
बार बार चाय पीते थे।
समाचार वाली सुन्दर लड़कियाँ बताती थीं
हमें और भी बहुत सारी नई बातें
और जब हम सब कुछ भूल जाना चाहते थे
उनकी छातियों पर नज़रें गड़ाकर
तब सारी उत्तेजनाएँ जैसे किसी खानदानी दवाखाने की
शिलाजीत की गोलियों में छिप जाती थी।
उचककर छत से चिपककर
फूट फूट कर रोने का होता था मन।
नहीं आता था रोना भी।
हेमंत करकरे नाम का एक आदमी
मर गया था
और नहीं जीने देता था हमें।
ऐसे ही कई और साधारण नामों वाले आदमी
मर गए थे
जो नहीं थे सचिन तेंदुलकर, आमिर ख़ान
या अभिनव बिन्द्रा,
नहीं लिखी जा सकती थी उनकी जीवनियाँ
बहुत सारे व्यावसायिक कारणों से।
वह रात को देर से पहुँचने वाला था घर,
फ़्रिज में रखा था शाही पनीर
और गुँधा हुआ आटा,
एक किताब आधी छूटी हुई थी बहुत दिन से,
माँ की आती रही थीं शाम को मिस्ड कॉल,
उसे भी करना था घर पहुँचकर फ़ोन,
ढूंढ़ना था कोल्हापुर में
कॉलेज के दिनों की एक लड़की को,
बस एक बार देखना था उसका अधेड़ चेहरा,
उसके बच्चे,
अपने बच्चों के साथ देखनी थी
पच्चीस दिसम्बर को गजनी।
गजनी माने आमिर ख़ान।
एक दिशा थी
जहाँ से आने वाले सब लोग
भ्रमित हो जाते थे,
एक प्यारा सा चमकीला शहर था
जिसका दुखता था पोर पोर,
जबकि वह एक से अधिक पिताओं का दौर था,
खेलते-सोते-पढ़ते-तुनकते-ठुनकते पचासों बच्चे
रोज हो जाते थे अनाथ,
हमें आता था क्रोध
और हम सो जाते थे।
कमज़ोर याददाश्त और महेन्द्र सिंह धोनी के इस समय में
यह हर सुबह गला फाड़कर उठती हुई हूक,
हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर
और बहुत सारे साधारण लोगों को बचाकर रख लेने की
एक नितांत स्वार्थी कोशिश है,
इसे कविता न कहा जाए।
| [+/-] |
एक आदमी था, एक थी औरत |
हरी धूप में हरी बातें,
पीली धूप में पीली बातें,
तुम्हारा अपना सफेद रंग
कोई तुमसे बिना पूछे उठा ले गया है पगली।
मेरा नीला उदास हो जाना
कोई दुर्घटना नहीं,
ऐसे में मैं सुना सकता हूं तुम्हें
हँसी की सबसे प्यारी कहानियाँ।
हँ सो कि ख़ त्म हो र हा है नी ल
अँ धे रे को ज ग ह दे ने के लि ए,
क म जो र बा लों की त र ह टू ट ते जा ते हैं श ब्द।
तुम्हें इतना अच्छा लगता है ना हँसना,
अब हँसो उसी तरह
जैसे इंडिया गेट घूमते हुए हँसती हो,
नहीं तो मारी जाओगी,
सच कहता हूं।
आधी रात में भाट गाते हैं विरुदावली।
माँ ने सिखाया है कि
कायर लोग करते हैं प्रेम,
कायर लोग मोमबत्तियों पर हाथ रख लेते हैं शपथ,
कायर बच्चे कहानियाँ पढ़ते हैं,
कायर पुरुष गढ़ते हैं कविताएँ,
कायर स्त्रियाँ घर से भाग जाती हैं।
कायरों की पूरी जमात से
ख़ौफ़ज़दा हैं साहसी लोग
इसलिए दफ़्तर जाने वाले वीरों
और बच्चे पैदा करने वाली वीरांगनाओं के लिए
भाट गाते हैं विरुदावली।
उत्साह जवानी में होने वाली एक लाइलाज़ बीमारी है
जिसने बिना आवाज़ किए लील ली हैं
संसार की सबसे काबिल नस्लें।
सबसे बुद्धिमान लोग हो गए हैं पागल,
सबसे सच्ची किताबें प्रतिबंधित कर दी गई हैं,
संसार के सबसे उत्साहित युवा
कर बैठे हैं प्रेम
बर्फ़ीली चोटियों और रहस्यमयी अँधेरी कन्दराओं से।
इतराओ मत,
मेरा मतलब तुमसे नहीं है...
एक आदमी था,
एक थी औरत,
एक आकाश था,
थोड़ी सी खुशी और
कुछ अमर तिलचट्टे थे,
ढेर सारे एकांत में थीं मुट्ठी भर वर्जनाएँ,
आदमी की हथेली में थी औरत की रीढ़।
कुछ ज़रूरी भेजी गई-गैरज़रूरी पाई गई चिट्ठियों
और खो गई तस्वीरों के अलावा
एक और बात थी
जो किसी को याद नहीं रही।
दुनिया की सबसे उदास बातें
किसी भी भाषा में नहीं कही जा सकती।
कविता लिखना कुछ कुछ
बिन माँ के बच्चों के रोने जैसा है।
| [+/-] |
नींद, बेरुखी, फूल |
जैसे पढ़ते पढ़ते लोग बन जाते हैं किताब,
जैसे नाचते नाचते लोग बन जाते हैं ओडिसी,
जैसे खरीदते खरीदते बाज़ार,
जैसे ठोकते पीटते औजार,
जैसे टीवी देखते देखते चित्रहार,
जैसे ड्राइव करते करते लोग बन जाते हैं कार,
तुम जमकर बन गई हो वनीला आईसक्रीम,
नींद, बेरुखी, फूल
या जैसे उदास सा बिहार।
| [+/-] |
बस एक रात और हाय रब्बा! |
1
छत को गिर जाना है किसी दिन
अचानक टूटकर मेरे ऊपर
और जब रात भर गोल गोल घूमती है धरती
मेले वाले बड़े झूले की तरह
(मैं नहीं मानता गोल गोल घूमना
मगर कोई इसे सिद्ध करने के लिए
फाँसी चढ़ गया था शायद कभी।
एक बलिदान पर सौ झूठ हों सच।
आमीन!)
तो उस अचानकता को बचाए रखने के लिए
यह छत टस से मस नहीं होती।
तुम फ़ोन पर मुझसे कहती हो – अपना ख़याल रखना,
मुझे याद आता रहता है गार्नियर का विज्ञापन।
बहुत सारी तुम भी।
जो टीवी देख सकते हों,
कम से कम उन्हें तो नहीं करना चाहिए था
किसी से प्रेम।
२
आज रात बर्फ़ गिरेगी दिल्ली में,
चाँद जम जाएगा
या कम्बल ओढ़कर करता रहेगा प्यार।
काश कि बर्फ़ न गिरे,
इतनी गर्मी हो कि चाँद आसमान के बिस्तर से उठकर
आ खड़ा हो छत पर,
मैं दूर खेतों में खड़ा झलता रहूं साँसों का पंखा।
चाँद कुँवारा सोए
और कुँवारा जग जाए
बस एक रात और
हाय रब्बा!
| [+/-] |
बीच के लोग रहेंगे देर तक ज़िन्दा |
समय निश्चित रूप से
बौराए हुए आत्मघाती शोर का है
लेकिन सन्नाटा भी लगातार चुन चुन कर
निगल रहा है अपने शिकार।
बीच के लोग रहेंगे
देर तक ज़िन्दा।
रसोई में सजे भगोने में
घूम रही हैं दो मकड़ियाँ,
या शायद एक।
निश्चिंत होकर सो जाना
गाँव से आए ताऊजी के
देर रात दरवाजा पीटने पर
दुबारा आटा गूंथती माँ के मुस्कुराने जितना
अवसाद भरा झूठ है।
न खुलने के सामाजिक अपराध पर
देर रात, सुबह तड़के या भरी दोपहर में
पिटते रहना
दुनिया भर के बन्द दरवाजों की नियति है।
इतना आहिस्ता रोती हो तुम
कि मुझे आती है हँसी,
रोना भी।
इतने गहरे तक पैठा हुआ है
कम्बख़्त मेरी पैदाइश का शहर,
उसके लोग,
उसकी लड़कियाँ
कि उनसे नफ़रत करना चाहूं
तो मर जाने का मन करता है,
प्यार करता रहूं
तो पागल हो जाऊँ।
माँ की एक सहेली थी कक्षा आठ में
जिसका आखिरी इम्तिहान से ठीक पहले ब्याह हो गया था,
जिससे मिलने माँ गई थी
भादो की किसी दूज को शायद
मामा के साथ ताँगे में बैठकर
और लौटते हुए रोती रही थी।
मैंने नहीं देखी माँ की कोई सहेली कभी,
मुझे क्यूं याद आती है वो
सीधी आँख के नीचे के तिल वाले
अपने पूरे चेहरे समेत?
क्यों होता है
मीना कुमारी की तरह
तकिए में चेहरा भींच कर रोते रहने का मन?
कंधे पर रेडियो रखे
एक सफेद कुरते वाला बूढ़ा
रात के अँधेरे में दिख जाता है
हड़बड़ाया, तुड़तुड़ाया, नाराज़, परेशान सा
जैसे सरकारी स्कूल का कोई मास्टर
लड़ आया हो अपने हैडमास्टर से
नाक पोंछते बच्चों के सामने चिल्ला चिल्ला कर,
खिंच गई हों उसके पेट की नसें,
कराहता रहा हो शाम भर
या तबादले के लिए मिलने गया हो एम एल ए से
और उसे मिली हों माँ बहन की गाली,
शायद खड़ा सिर झुकाए हाँ हूँ करता रहा हो,
शायद मुड़ने से पहले फिर से नमस्ते भी की हो,
शायद रोया भी हो घर आकर
और उसकी पत्नी ने अपने बच्चों को न बताया हो
या बस खाट पर पड़ा
सुनता रहा हो रात तक
प्रादेशिक समाचार,
बच्चे खेलते रहे हों क्रिकेट।
नकली घरघराती आवाज़ में
बहुत हँसाया करते थे मेरे पिता
जब कहते थे
”ऐसे बोलो, जैसे मैं रेडियो की तरह बोलता हूँ।“
आखिर पूछ लो ना मुझसे।
कुछ बात है अनकही
जो इतनी भारी है कि
रात भर नहीं बदलती करवट,
चूं भी नहीं करता दुख
कि नाखूनों में फँसा कर उखाड़ लिया जाए।
मेरे नाम से कोई तो रखता होगा व्रत,
नहीं तो दिल्ली में इतने दिन
कैसे ज़िन्दा रह सकता है कोई ख़ामोश नास्तिक आदमी?
| [+/-] |
प्यार, पूर्वाग्रह और लड़कियाँ |
शराब पीकर झूमती हुई लड़की
बेहद मासूमियत से अंग्रेज़ी में कहती है मुझसे
कि मुझसे प्यार करती है वह।
मैं शहर से पूछता हूं कि
क्या किया जा सकता है
तुम्हारी लड़कियों पर भरोसा?
शहर में शोर है,
चुप चुप सा है शहर।
मुझे लगता रहा है कि
इस कमज़ोर सी बेमुरव्वत ज़िन्दगी में
लड़कियों के सहारे पर बड़ी उम्मीदों के पुल बाँधना
अपने आप से किया गया
एक शरारती किस्म का मज़ाक है।
लड़कियाँ होती हैं इतनी अबूझ,
इतनी अनिश्चित
कि अगले ही पल बौखला पड़ने से पहले
वे रुमाल से पोंछ रही होती हैं लिपस्टिक
या गुनगुना रही होती हैं
कोई छद्म रोमांटिक गाना।
लड़कियों को इतनी प्यारी होती है खुशी
कि उसके साथ नहीं जी पाता
प्यार का सनातन दुख।
उन्हें पसंद होते हैं
मज़ाकिया लड़के
मसलन अक्षय कुमार
या वे शायद प्यार कर सकती हैं
डेरीमिल्क से भी
बशर्तें वह हँस सकती हो।
प्यार एक बहुत गंभीर मसला है
और सच में उसके बारे में बात करने पर
ऊबने लगती हैं अधिकांश लड़कियाँ।
उन्हें भले लगते हैं
जादुई सपने,
इन्द्रधनुषी रोमांच,
गुदगुदे बच्चे,
टेडी बियर,
चॉकलेट
और लाल गुलाब।
कभी कभी कुछ और चीजें भी।
आसमान उदास है,
शहर को नहीं है फ़ुर्सत,
शराब पीकर झूमती हुई लड़की
जा चुकी है अकेली अपने घर
और हैं बहुत से पूर्वाग्रह,
लेकिन फिर भी
मेरा जोरों से मन है कि प्यार किया जाए।
मैं सड़क के उस पार बैठी
एक अनजान मासूम सी लड़की से पूछता हूं
कि चलोगी फ़िल्म देखने?
प्यार एक बहुत गंभीर मसला है।
इंटरवल में एक दूसरे के हाथों से
पॉपकॉर्न खाते हुए
हम बात करते रहते हैं
करण जौहर के कालजयी सिनेमा की।